यह
सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक
अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें
यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम
थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच
है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा.
भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.
लेकिन कुछ बातें इस संदर्भ में और जोड़ने और समझने की ज़रूरत है. कांग्रेस जिस तरह आ़ज़ादी की लड़ाई में अपने शामिल होने के सूद के सहारे भारतीय लोकतंत्र की ठेकेदारी का दावा नहीं कर सकती, उसी तरह बीजेपी भी इमरजेंसी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई की कमाई को लोकतंत्र पर अपने कब्ज़े का आधार नहीं बना सकती. आज़ादी की लड़ाई अगर 70 साल पुरानी घटना है तो इमरजेंसी भी 40 साल पीछे छूट चुकी है. लेकिन सिर्फ अतीत हो जाने के तर्क से नहीं, भारतीय लोकतंत्र का हाल देखते हुए भी कांग्रेस और बीजेपी के अपने-अपने दावों को फिर से परखने की ज़रूरत है. मिसाल के तौर पर जेटली को हिटलर और इंदिरा गांधी के बहुत सारे साम्य याद आए, यह नहीं याद आया कि हिटलर ने अंत में एक बंकर में आत्महत्या की. जबकि इंदिरा गांधी ने 19 महीने बाद चुनाव करवाए, उनमें हारीं, तीन साल सत्ता से बाहर रहीं और अंततः जनता पार्टी की टूटन के बाद नए सिरे से चुनाव जीत कर सत्ता में वापस लौटीं. वापसी का यह मौका भी इंदिरा गांधी को जिन वजहों से मिला, उनमें बाकी बातों के अलावा जनता पार्टी से जनसंघ घटक का विश्वासघात भी था. आरएसएस के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखने की ज़िद में जनसंघ से जुड़े नेताओं ने जनता पार्टी को टूटने दिया. इसी से इंदिरा गांधी की वापसी हुई. दूसरी बात ज़्यादा गंभीर है. हिटलर ने सिर्फ देश का हवाला नहीं दिया था, जर्मनी को आर्यों की श्रेष्ठता के सिद्धांत पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश भी की. जर्मनी में सारी हिंसा दरअसल नस्ली श्रेष्ठता की इस वैचारिकी की देन थी. दूसरी तरफ़ इंदिरा गांधी ने भारत की बहुलता का अंत-अंत तक सम्मान किया और अंततः उसी की रक्षा के लिए जान दी. यह बात सार्वजनिक है कि इंदिरा गांधी को ख़ुफिया एजेंसियों ने सलाह दी थी कि वे अपने सुरक्षा दस्ते में सिखों को जगह न दें. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर ऐसा भेदभाव इंदिरा गांधी को मंज़ूर नहीं था. अंततः वे अपने इस विश्वास के लिए शहीद हो गईं. दिलचस्प ये है कि सिख आतंकवाद से जुड़़े चेहरों को जिन दलों ने नायकत्व प्रदान किया, जो आतंकवादियों को सरोपा भेंट करते रहे, जो बेअंत सिंह के हत्यारों की माफ़ी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करते रहे, उनके साथ आज की तारीख बीजेपी खड़ी है. दूसरी बात यह कि हिटलर की यह जो वैचारिक विरासत है, उसके असली वारिस भारत में कौन हैं? कौन हैं जो एक धर्म या नस्ल की श्रेष्ठता के आधार पर एक नया और ख़ौफ़नाक भारत बनाना चाहते हैं. निस्संदेह यह बीजेपी है जो इस मामले में हिटलर के ज़्यादा करीब दिखती है, बल्कि हिटलर, नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली उसकी प्रेरणा रहे हैं, यह बात भी किसी से छुपी नहीं है. आरएसएस के पहली पंक्ति के नेताओं में एक बीएस मूंजे बाक़ायदा इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे और अपनी डायरी में उन्होंने मुसोलिनी की तारीफ़ की थी. वीर सावरकर भारत को जर्मनी की तरह पितृभूमि कहते रहे और मुसलमानों से उसी तरह पेश आना चाहते थे जैसे यूरोप में "नीग्रो' के साथ पेश आया जाता था. तो यह बीजेपी है जो नाज़ी पार्टी के ज़्यादा क़रीब है. अफ़सोस और चिंता की बात यह है कि यह क़रीबी सैद्धांतिक स्तर पर हाल के वर्षों में कुछ और बड़ी हुई है. पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों को गैंग बताना, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या, गोरक्षा के नाम पर लोगों को घर से निकाल कर मारना, सड़कों पर पीटना, लव जेहाद के नाम पर होने वाली हिंसा, तरह-तरह के जुलूसों और आयोजनों के बहाने बहुसंख्यकवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति- ये सब बताते हैं कि भारत में पहली बार इतने व्यापक पैमाने पर बहुसंख्यकवाद की आक्रामकता को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है. मॉब लिंचिंग का ऐसा माहौल किसी दूसरे दौर में याद नहीं आता है. सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत की जो नई भाषा दिख रही है, पत्रकारिता पर जिस तरह के दबाव बनाए जा रहे हैं, वे एक तरह की इमरजेंसी का ही इशारा हैं, बल्कि इस मायने में ज़्यादा ख़ौफ़नाक कि यह इमरजेंसी बिल्कुल अदृश्य है. यह सच है कि 'इंदिरा इज़ इंडिया' की तरह इस दौर में कोई 'नरेंद्र मोदी इज़ इंडिया' नहीं कह रहा. लेकिन नरेंद्र मोदी की जिस तरह नायक-पूजा हो रही है, वह इंदिरा गांधी के दौर की ही याद दिलाने वाला है. पूरी सरकार उनके भरोसे है, सारे चुनाव उनके सहारे लड़े जा रहे हैं, हर जगह उनका चेहरा पेश किया जा रहा है. वे आकाशवाणी पर मन की बात कह रहे हैं, विज्ञापनों में गैस बेच रहे हैं और ख़बरों में उनके लंबे-लंबे भाषण इस्तेमाल हो रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े-बडे फ़ैसले या तो गोपनीय ढंग से या फिर हड़बड़ी में लागू किए जा रहे हैं, विश्वविद्यालयों और दूसरे लोकतांत्रिक संस्थानों को तहस-नहस किया जा रहा है. 19 महीने की इमरजेंसी इंदिरा गांधी की वह राजनीतिक महाभूल थी जो उनके दशकों के राजनीतिक करियर पर भारी पड़ रही है, लेकिन बीते 4 साल में जिस चालाकी से इमरजेंसी जैसे हालात बना दिए गए हैं, वह बीजेपी का डरावना सयानापन है.
लेकिन कुछ बातें इस संदर्भ में और जोड़ने और समझने की ज़रूरत है. कांग्रेस जिस तरह आ़ज़ादी की लड़ाई में अपने शामिल होने के सूद के सहारे भारतीय लोकतंत्र की ठेकेदारी का दावा नहीं कर सकती, उसी तरह बीजेपी भी इमरजेंसी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई की कमाई को लोकतंत्र पर अपने कब्ज़े का आधार नहीं बना सकती. आज़ादी की लड़ाई अगर 70 साल पुरानी घटना है तो इमरजेंसी भी 40 साल पीछे छूट चुकी है. लेकिन सिर्फ अतीत हो जाने के तर्क से नहीं, भारतीय लोकतंत्र का हाल देखते हुए भी कांग्रेस और बीजेपी के अपने-अपने दावों को फिर से परखने की ज़रूरत है. मिसाल के तौर पर जेटली को हिटलर और इंदिरा गांधी के बहुत सारे साम्य याद आए, यह नहीं याद आया कि हिटलर ने अंत में एक बंकर में आत्महत्या की. जबकि इंदिरा गांधी ने 19 महीने बाद चुनाव करवाए, उनमें हारीं, तीन साल सत्ता से बाहर रहीं और अंततः जनता पार्टी की टूटन के बाद नए सिरे से चुनाव जीत कर सत्ता में वापस लौटीं. वापसी का यह मौका भी इंदिरा गांधी को जिन वजहों से मिला, उनमें बाकी बातों के अलावा जनता पार्टी से जनसंघ घटक का विश्वासघात भी था. आरएसएस के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखने की ज़िद में जनसंघ से जुड़े नेताओं ने जनता पार्टी को टूटने दिया. इसी से इंदिरा गांधी की वापसी हुई. दूसरी बात ज़्यादा गंभीर है. हिटलर ने सिर्फ देश का हवाला नहीं दिया था, जर्मनी को आर्यों की श्रेष्ठता के सिद्धांत पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश भी की. जर्मनी में सारी हिंसा दरअसल नस्ली श्रेष्ठता की इस वैचारिकी की देन थी. दूसरी तरफ़ इंदिरा गांधी ने भारत की बहुलता का अंत-अंत तक सम्मान किया और अंततः उसी की रक्षा के लिए जान दी. यह बात सार्वजनिक है कि इंदिरा गांधी को ख़ुफिया एजेंसियों ने सलाह दी थी कि वे अपने सुरक्षा दस्ते में सिखों को जगह न दें. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर ऐसा भेदभाव इंदिरा गांधी को मंज़ूर नहीं था. अंततः वे अपने इस विश्वास के लिए शहीद हो गईं. दिलचस्प ये है कि सिख आतंकवाद से जुड़़े चेहरों को जिन दलों ने नायकत्व प्रदान किया, जो आतंकवादियों को सरोपा भेंट करते रहे, जो बेअंत सिंह के हत्यारों की माफ़ी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करते रहे, उनके साथ आज की तारीख बीजेपी खड़ी है. दूसरी बात यह कि हिटलर की यह जो वैचारिक विरासत है, उसके असली वारिस भारत में कौन हैं? कौन हैं जो एक धर्म या नस्ल की श्रेष्ठता के आधार पर एक नया और ख़ौफ़नाक भारत बनाना चाहते हैं. निस्संदेह यह बीजेपी है जो इस मामले में हिटलर के ज़्यादा करीब दिखती है, बल्कि हिटलर, नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली उसकी प्रेरणा रहे हैं, यह बात भी किसी से छुपी नहीं है. आरएसएस के पहली पंक्ति के नेताओं में एक बीएस मूंजे बाक़ायदा इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे और अपनी डायरी में उन्होंने मुसोलिनी की तारीफ़ की थी. वीर सावरकर भारत को जर्मनी की तरह पितृभूमि कहते रहे और मुसलमानों से उसी तरह पेश आना चाहते थे जैसे यूरोप में "नीग्रो' के साथ पेश आया जाता था. तो यह बीजेपी है जो नाज़ी पार्टी के ज़्यादा क़रीब है. अफ़सोस और चिंता की बात यह है कि यह क़रीबी सैद्धांतिक स्तर पर हाल के वर्षों में कुछ और बड़ी हुई है. पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों को गैंग बताना, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या, गोरक्षा के नाम पर लोगों को घर से निकाल कर मारना, सड़कों पर पीटना, लव जेहाद के नाम पर होने वाली हिंसा, तरह-तरह के जुलूसों और आयोजनों के बहाने बहुसंख्यकवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति- ये सब बताते हैं कि भारत में पहली बार इतने व्यापक पैमाने पर बहुसंख्यकवाद की आक्रामकता को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है. मॉब लिंचिंग का ऐसा माहौल किसी दूसरे दौर में याद नहीं आता है. सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत की जो नई भाषा दिख रही है, पत्रकारिता पर जिस तरह के दबाव बनाए जा रहे हैं, वे एक तरह की इमरजेंसी का ही इशारा हैं, बल्कि इस मायने में ज़्यादा ख़ौफ़नाक कि यह इमरजेंसी बिल्कुल अदृश्य है. यह सच है कि 'इंदिरा इज़ इंडिया' की तरह इस दौर में कोई 'नरेंद्र मोदी इज़ इंडिया' नहीं कह रहा. लेकिन नरेंद्र मोदी की जिस तरह नायक-पूजा हो रही है, वह इंदिरा गांधी के दौर की ही याद दिलाने वाला है. पूरी सरकार उनके भरोसे है, सारे चुनाव उनके सहारे लड़े जा रहे हैं, हर जगह उनका चेहरा पेश किया जा रहा है. वे आकाशवाणी पर मन की बात कह रहे हैं, विज्ञापनों में गैस बेच रहे हैं और ख़बरों में उनके लंबे-लंबे भाषण इस्तेमाल हो रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े-बडे फ़ैसले या तो गोपनीय ढंग से या फिर हड़बड़ी में लागू किए जा रहे हैं, विश्वविद्यालयों और दूसरे लोकतांत्रिक संस्थानों को तहस-नहस किया जा रहा है. 19 महीने की इमरजेंसी इंदिरा गांधी की वह राजनीतिक महाभूल थी जो उनके दशकों के राजनीतिक करियर पर भारी पड़ रही है, लेकिन बीते 4 साल में जिस चालाकी से इमरजेंसी जैसे हालात बना दिए गए हैं, वह बीजेपी का डरावना सयानापन है.
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