Wednesday, August 29, 2018

राहुल के विदेश में हमले से क्यों बिलबिलाई भाजपा?

जर्मनी के हैम्बर्ग में और लंदन के स्कूल आफ इकोनोमिक्स में राहुल गांधी के भाषणों ने भाजपाई हलके में कुछ ऐसी हड़कंप पैदा कर दी है जिसे राजनीति के साधारण मानदंडों से समझना कठिन है. वैसे ही एक अर्से से राहुल ने आत्ममुग्ध मोदी की नींद उड़ा रखी है. हाल में लोकसभा के मानसून अधिवेशन में राहुल की बार-बार की चुनौती के बावजूद मोदी उनसे आंख मिलाने के हिम्मत नहीं कर पा रहे थे क्योंकि राफेल सौदे में हजारों करोड़ की दलाली का उनके पास इसके अलावा कोई जवाब नहीं था कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें इतना तो हक बनता ही है कि अपने संकट में पड़े एक मित्र को चालीस हजार करोड़ का लाभ दिला दे. बहरहाल, जर्मनी और लंदन में राहुल के भाषण तो लगता है मोदी कंपनी को और भी नागवार गुजर रहे हैं. मोदी में इतनी भी जवाबदेही नहीं है कि वे देश के अंदर या बाहर, कहीं भी एक प्रेस कांफ्रेंस कर लें. इसके अतिरिक्त किसी भी जगह बुद्धिजीवियों से खुला संवाद तो उनके संघी प्रशिक्षण में एक असंभव चीज है. उनका प्रशिक्षण सिर्फ आम लोगों के बीच झूठी बातों को रटने, सांप्रदायिक बटवारे के लिये हुआ है, जो वे बखूबी करते हैं. भेड़-बकरियों की तरह जुटा कर लाये गये लोगों से जयकारा लगवाते हैं.
लेकिन राहुल ने पूरी जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मसलों पर इन दोनों जगहों पर जिस गंभीरता से भारत की राजनीति को आज के विश्व पटल पर समझने की कोशिश की, उसने उनमें एक बड़े राजनेता के उभरने के साफ संकेत दिये हैं.
सर्वप्रथम तो भाजपाई संबित पात्रा टाइप मोदी काल के प्रवक्ताओं को राहुल का विदेश में मुंह खोलना ही मोदी के विशेषाधिकार के हनन की तरह लगा था. इसके अलावा वे और दो बातों पर बेजा ही उखड़ गये थे, इनमें पहली बात थी भारत में बढ़ती हुई बेरोजगारी की. राहुल ने इसकी विदेश में चर्चा क्यों कर दी? कौन नहीं जानता कि बेरोजगारी कितने प्रकार की सामाजिक समस्याओं का कारण बनती है. इनमें आज की दुनिया की एक सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद भी है. सभी आतंकवादी संगठन बेरोजगार युवकों को ही आम तौर पर अपनी गतिविधियों के मोहरों के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
राहुल ने विदेश में भारत में बेरोजगारी की समस्या को उठा कर लगता है मोदी कंपनी की इस सबसे अधिक दुखती हुई रग पर हाथ रख दिया था. उस पर राहुल ने मोदी के नोटबंदी के पागलपन और जीएसटी की बदइंतजामी का जिक्र करके तो जैसे उनके जख्मों पर नमक छिड़कने के काम कर दिया. राहुल ने कहा कि मोदी ने आर्थिक विकास की दिशा में सकारात्मक तो एक भी कदम नहीं उठाया, लेकिन इन दो नकारात्मक कदमों से पूरी अर्थ-व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है. और इसके साथ ही यह बिल्कुल सही कहा कि यही परिस्थिति तत्ववादी ताकतों के लिये जमीन तैयार करती है ।
राजनीतिक-प्रशासनिक अराजकता से कैसे आतंकवादी ताकतें लाभ उठाती हैं, इसी संदर्भ में राहुल ने अमेरिका की इराक नीति का भी जिक्र किया और कहा कि वहां सद्दाम हुसैन के शासन को खत्म करने में ज्यादा समय नहीं लगा था, लेकिन बाद में नई प्रशासनिक व्यवस्था में जिन लोगों को भी वंचित किया गया, उनसे ही आगे चल कर इराक से लेकर सीरिया तक में आइसिस की तरह के संगठन को अपनी जमीन तैयार करने की रसद मिली.
राहुल का बेरोजगारी और तत्ववाद, इन दो विषयों पर बात करना संघी तत्वों के लिये निषिद्ध विषयों पर बात करने के अपराध के समान था. इसीलिये राहुल के हैम्बर्ग के भाषण से ही उनके प्रवक्ता और चैनलों में बैठे मूर्ख ऐंकर और लगभग उसी स्तर के दूसरे भागीदारों ने चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया. चैनलों पर राहुल को बचकाना कहने की एक होड़ शुरू हो गई. जो खुद पशुओं की तरह अपनी नाक के आगे नहीं देख पाते हैं, सोचते हैं ओसामा बिन लादेन आया और अल कायदा या आइसिस बन गया, उनके लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद और सामाजिक विषमताओं को दुनिया में आतंकवाद के उत्स के रूप में देखने की बात एक भारी रहस्य की तरह थी. और जो उन्हें समझ में न आए, उनकी नजर में वही बचकाना होता है. लेकिन सच यही है कि इन चैनलों की बहसें पशुओं के बाड़ों के निरर्थक शोर से अधिक कोई मायने नहीं रखती हैं.
इसके बाद लंदन में राहुल ने और एक सबसे महत्वपूर्ण बात कह दी कि भारत में आरएसएस मिस्र के 'मुस्लिम ब्रदरहुड' का ही हिंदू प्रतिरूप है. आरएसएस की तुलना हम हिटलर की नाजी पार्टी से लेकर अफगानिस्तान के तालिबान तक से हमेशा करते रहे हैं. लेकिन इस संदर्भ में 'मुस्लिम ब्रदरहुड' का जिक्र करके राहुल ने आज के संदर्भ में आरएसएस के और भी सटीक समानार्थी संगठन की शिनाख्त की है.
यह 'मुस्लिम ब्रदरहुड' क्या है ? इसकी ओर सारी दुनिया का ध्यान 2012 में खास तौर पर गया था जब 2011 की जनवरी में अरब बसंत क्रांति के बाद इसके राजनीतिक संगठन ने मिस्र का चुनाव जीत लिया था । लेकिन बहुत जल्द ही मिस्र में उसकी आतंकवादी गतिविधियां दुनिया के सामने आने लगी और 2015 में ही उसकी सरकार को खत्म करके उसके सारे नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया और दुनिया के बहुत सारे देश उसे एक आतंकवादी संगठन मानते हैं.
'सोसाइटी आफ द मुस्लिम ब्रदर्स' (अल-लखवॉन अल-मुसलिमुन) के नाम से सन् 1928 में मिस्र में एक अखिल इस्लामिक संगठन के रूप में इसका निर्माण हुआ था. यह अस्पतालों और नाना प्रकार के धर्मादा कामों के जरिये पूरे इस्लामिक जगत में अपनी जड़ें फैला रहा था. कुरान और सुन्ना के आदर्शों पर यह पूरे समाज, परिवार और व्यक्ति को ढालने के प्रचारमूलक काम में मुख्यतः लगा रहता था और पूरी अरब दुनिया में इसके अनेक समर्थक हो गये थे. धर्मादा कामों के जरिये अपने राजनीतिक उद्देश्यों को साधना ही इसका प्रमुख चरित्र रहा है और इसे एक समय में सऊदी अरब सहित कई इस्लामिक देशों का समर्थन मिला हुआ था. लेकिन आज सऊदी अरब में भी यह एक प्रतिबंधित संगठन है.
कहना न होगा, तथाकथित सेवामूलक कामों के जरिये राजनीतिक उद्देश्यों को साधने वाला इस्लामिक दुनिया का यह एक ऐसा कट्टरपंथी और तत्ववादी संगठन है जिसकी भारत में सबसे उपयुक्त मिसाल हिंदू तत्ववादी आरएसएस ही हो सकती है. इसीलिये राहुल ने आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करके बिल्कुल सही जगह पर उंगली रखी है.
जर्मनी और ब्रिटेन में राहुल के भाषणों पर भाजपाई प्रवक्ताओं के उन्माद के रूप को देख कर हम यह सोचने के लिये मजबूर हो रहे हैं कि आखिर उसमें ऐसा क्या था जिसने इन सबकों इस प्रकार से आपे के बाहर कर दिया है? सचमुच, राहुल के इस राजनीतिक विश्लेषण को हमें फ्रायडीय सिद्धांतों पर समझने की जरूरत महसूस होने लगी है जिसमें किसी भी स्वप्न का विश्लेषण (आरएसएस के मामले में उसके रहस्यमय रूप का विश्लेषण) उस स्वप्न के पीछे छिपे हुए मूल विचार के रहस्य बजाय उसकी संरचना के पूरे स्वरूप के ही रहस्य को उजागर करके किया जाता है.
लगता है, राहुल ने कुछ इसी प्रकार से, संघ संसार की पूरी स्वप्निल संरचना की रहस्यात्मकता को उन्मोचित करने का काम किया है और इसीलिये चैनलों में उनके भाषणों को लेकर इतनी भारी चीख-चिल्लाहट मची हुई है. राहुल ने लंदन में अपने भाषण में 1984 के सिख-विरोधी दंगों और डोकलाम प्रसंग पर भी कुछ इतनी महत्वपूर्ण बातें कही हैं जिनसे भाजपाई और भी तिलमिला गये हैं. उन्होंने साफ कहा है कि कांग्रेस कोई कॉडर आधारित पार्टी नहीं है. उसने 1984 के दंगों में कोई बाकायदा हिस्सा नहीं लिया था.दंगों के एफआईआर में जिन लोगों के नाम हैं उनमें भाजपा के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. और, हाल के डोकलाम की सीमा पर हुए नाटक के बारे में भी उनकी टिप्पणी उतनी ही तीखी थी जिसमें उन्होंने कहा कि बिना किसी तैयारी और तयशुदा एजेंडा के राजनयिक वार्ताओं के नाटक किसी से करवाना हो तो उसमें नरेंद्र मोदी आपको सबसे आगे मिलेंगे. जब उन्होंने चीन के राष्ट्रपति के साथ झूला झूला उसके चंद रोज बाद ही डोकलाम में चीनी सेना पहुंच गई.

Thursday, August 9, 2018

एन आर सी हिन्दू मुस्लिम नहीं दूसरा खेल है.

जब असम में एनआरसी आई तो, खूब हो हल्ला मचा, लेकिन मुझे बिना जानकारी के उसपर कुछ लिखना बिल्कुल सही नहीं लगा. अब यहाँ सबसे बुनियादी सवाल है, कि क्या भारत में ऐसे लोग हैं जो नागरिक नहीं हैं और अवैध रूप से देश में दाखिल हो गए हैं? हां, ऐसे लोग हैं. तो, ये पता लगाने के लिए कौन देश का नागरिक नहीं है, पहले हमें ये पता लगाना होगा कि आख़िर नागरिक कौन है? भारत में सक्रिय कोई भी क़ानूनी राजनैतिक दल इसके ख़िलाफ़ नहीं है. अब सवाल ये पैदा होता है कि ये कैसे तय होगा कि कोई भारत का नागरिक है या नहीं? आप इस बात को किसी भी तरह से निर्धारित करें, इसके लिए निष्पक्षता और क़ानून के सामने बराबरी जैसी बुनियादी शर्तें पूरी करना ज़रूरी होगा. इसका ये मतलब है कि नागरिकता तय करने के लिए निष्पक्ष सबूतों की ज़रूरत होगी. सबूतों का मतलब है दस्तावेज़ी सबूत, जिनकी प्रतिलिपि, नागरिकता तय करने वाली एजेंसी को सुरक्षित रखनी होगी, जिसकी जनता पड़ताल कर सके. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की पड़ताल के दायरे में वो सभी लोग आएंगे, जो भारत गणराज्य के परिक्षेत्र में रहते हैं. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की जांच करने वाली एजेंसी भारत की सरकार या इसके नागरिक के हाथ में नहीं हो सकती. इसका ये भी मतलब है कि नागरिकता की जांच का काम सरकार की निगरानी में नहीं हो सकता. एनआरसी के रजिस्ट्रेशन के दौरान इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं किया गया. तो, कुल मिलाकर असम में एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया वही बन गई, जिस मक़सद से इसे शुरू किया गया था. यानी बंगालियों और कुछ दूसरे समुदायों को नागरिकता के दायरे से क़ानूनी तरीक़े से बाहर करना. ताकि, दिल्ली, नागपुर और गुवाहाटी में बीजेपी की नस्लवादी प्यास को बुझाया जा सके. शुरुआत में तो बीजेपी ने एनआरसी ड्राफ्ट प्रकाशित होने पर ख़ूब जश्न मनाया. लेकिन अब पार्टी को लग रहा है कि वो इसके ज़रिए जो सियासी फ़सल काटना चाहती थी, उसके ख़िलाफ़ बंगालियों ने सांप्रदायिक रूप से एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया. बंगाल में पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि सत्ताधारी टीएमसी और प्रमुख विपक्षी दल सीपीएम किसी मुद्दे पर एकजुट हो गए हैं. बीजेपी के ख़िलाफ़ ये मोर्चेबंदी असम से लेकर बंगाल तक फैल गई है. दिल्ली के मीडिया ने एनआरसी के विरोध को हिंदू-मुसलमान का सवाल बना दिया. जबकि हक़ीकत कुछ और ही है. बीजेपी के ही असम में कट्टरहिंदू बंगाली विधायक शिलादित्य देब ने माना कि एनआरसी से बाहर रह गए ज़्यादातर लोग हिंदू बंगाली हैं. असम में आसू और उल्फा जैसे संगठनों में बंगाली विरोधी सोच पहले से ही थी. जब इसका मेल बीजेपी की मुस्लिम विरोधी विचारधारा से हुआ, तो उसका नतीजा एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान सामने आया. हिंदू बंगालियों को सब्ज़बाग़ दिखाए गए, ताकि आसू के पूर्व अध्यक्ष सर्बानंद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बन जाएं. उन्हें हिंदू बंगालियों के वोट इसलिए मिले, क्योंकि बीजेपी ने उन्हें ये भरोसा दिया था कि वो हिंदू बंगालियों को मुस्लिम बंगालियों से अलग करके देखेगी. बीजेपी असल में असमिया और बंगालियों के बीच फंस गई थी. तो, पार्टी ने पहले बंगालियों के वोट हासिल किए, फिर उन्हें उठाकर फेंक दिया. भारत में बांग्लादेशी का मतलब बांग्लादेश के वो नागरिक होने चाहिए, जो ग़ैरक़ानूनी रूप से भारत में हैं. लेकिन बीजेपी की सांप्रदायिक सियासत में बांग्लादेशी का मतलब सारे मुस्लिम बंगाली हैं. जब बात असम और आस-पड़ोस के बीजेपी प्रशासित राज्यों की आती है, तो बांग्लादेशी का दायरा और बढ़ जाता है. तब बांग्लादेशी का मतलब सारे बंगाली हो जाते हैं. फिर वो हिंदू हों या मुसलमान, भारतीय हों या ग़ैर-भारतीय. असम में लंबे समय से 'असम केवल असमियों का' जैसे नारे दिए जाते रहे हैं. इस तरह के नारों का नतीजा 1961 में सिल्चर के बंगाली विरोधी हत्याकांड के तौर पर सामने आया. असम की नस्लवादी राजनीति के चलते वहां की बराक घाटी में रहने वाले बंगाली भाषी मूल निवासियों की हत्याएं हुईं. उन पर अपनी मातृभाषा बांग्ला छोड़ने का दबाव पड़ा. असम में उग्र जातीयता के निशाने पर नेल्ली और सिलापाथोर के गैर-असमिया निवासी भी आए. बाद में गैर-असमिया लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम उल्फ़ा के उग्र हिंसक अलगाववादी आंदोलन के तौर पर सामने आई. अब यहाँ पर वही असमिया माने गए जिनको इन संगठनों ने चाहा, क्योंकि भारत के खिलाफ बंदूक लेकर लड़ने वाले ये संगठन अब सरकार के साथ आ चुके हैं, इसलिए राष्ट्रवादी हो गए, और अपनी लड़ाई को गैर असमिया के बदले गैर भारतीय या बांग्लादेशी घुसपैठिए कर दिया, जबकि असल में उसका अर्थ वही था. 

क्या है राफेल घोटाला?

राफेल लड़ाकू विमान फ्रांस की कंपनी डास्सों एविएशन बनाती है. 2007 से भारत इसे ख़रीदने का सपना देख रहा है. उस साल भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट एयरक्राफ्ट खरीदेगा. इसमें साफ साफ कहा गया था कि जो भी टेंडर जारी होगा उसमें यह बात शामिल होगी कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी.
इस आधार पर टेंडर जारी होता है जिसमें 6 लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनियां हिस्सा लेती हैं. जिनमें से एक डास्सो एविएशन भी है. 2011 तक बातचीत और परीक्षण की प्रक्रिया चलने के बाद वायु सेना अपनी राय रखती है कि उसकी ज़रूरत के अनुसार डास्सो एविशन और एक दूसरी कंपनी यूरोफाइटर्स के विमान सही लगते है. 2012 के टेंडर में डास्सो एविएशन ने सबसे कम पैसे में विमान आपूर्ति की बात की. इसके आधार पर भारत सरकार और डास्सो कंपनी के बीच बातचीत शुरू होती है. इसके बीच बहुत कुछ होता है. जब प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस की यात्रा पर जाते हैं, अप्रैल 2015 में तो इस खरीद की प्रक्रिया से संबंधित कई बातें बदल जाती हैं.
रशांत भूषण के मूल सवाल हैं कि राफेल विमान की खरीद की बातचीत की प्रक्रिया में कई साल तक पब्लिक सेक्टर की कंपनी हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड शामिल होती है, 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री के डील साइन करने के 16 दिन पहले डास्सो एविशन जो राफेल बनाती है, उसके सीईओ के बयान के अनुसार हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड कंपनी से बातचीत हो रही है, मार्च 2014 में दोनों के बीच एक करार भी हुआ था कि भारत में 108 राफेल लड़ाकू विमान बनेगा और इसका 70 फीसदी काम एचएएल को मिलेगा और बाकी काम डास्सो एविएशन करेगी. लेकिन प्रधानमंत्री के डील साइन करने से दो दिन पहले हिस्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का नाम कट जाता है. यह खेल कैसे हुआ किसी को पता नहीं, इस सवाल का जवाब कोई दे नहीं रहा है.
प्रशांत भूषण का कहना है कि 60 साल से जो कंपनी विमान बना रही है वो बाहर कर दी जाती है और एक ऐसी कंपनी आ जाती है जिसका कोई अनुभव नहीं है. जिसे भारतीय नौ सेना को खास तरह का जहाज़ बनाकर देना था मगर वो नहीं दे पा रही है. यह सब रिलायंस डिफेंस के बारे में कहा जा रहा है कि इस कंपनी पर 8000 करोड़ का कर्ज़ा भी है भारतीय बैंकों का. यशवंत सिन्हा प्रशांत भूषण और अरुण शौरी के अनुसार इस मामले में बड़ा घपला हुआ है. सरकार सीक्रेसी यानी गोपनीयता के करार का बहाना बना रही है. प्रशांत भूषण का कहना है कि अप्रैल 2015 में जो डील हुई वो 2012 से लेकर 2015 के बीच चली प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है. अचानक तीन साल की सारी बातचीत कैसे पलट गई. किसके फायदे के लिए पलटी गई. 2007 में 126 जहाज़ की कुल लागत 42,000 करोड़ थी. वैसे अंतिम कीमत क्या थी, इसकी जानकारी पब्लिक में मौजूद नहीं है. लेकिन 13 अप्रैल 2015 को दूरदर्शन को इंटरव्यू देते हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि 126 एयरक्राफ्ट की कीमत 90,000 करोड़ होगी. तो अब सरकार दाम क्यों नहीं बता रही है.
विदेश सचिव की बातचीत के अनुसार यूपीए के समय की बातचीत के हिसाब से ही डील हो रही थी. मगर जब डील साइन होती है तब पहले की बातचीत की कई बातें बदल चुकी थीं. पहले डील थी कि 18 फाइटर प्लेन मिलेगा, लेकिन 36 फाइटर प्लेन की बात कहां से आ गई. क्या इसके लिए वायु सेना ने अपनी तरफ से कुछ प्रस्ताव किया था. क्या नई डील को रक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी ने मंज़ूरी दी थी. नई डील के अनुसार नया टेंडर क्यों नहीं जारी किया गया. 4 जुलाई 2014 को यूरोफाइटर ने रक्षा मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखा था कि वह अपनी लागत में 20 फीसदी कमी करने के लिए तैयार है. तो फिर नया टेंडर क्यों नहीं जारी हुआ. मार्च 2014 में एचएएल और डास्सों के बीच एक करार हुआ था, जिसके अनुसार 108 विमान भारत में बनेंगे और 70 फीसदी काम एचएएल में होगा. बाकी का काम डास्सों एविशन कंपनी करेगी.
डील के दो दिन पहले नई कंपनी का नाम सामने आता है. 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस में इसकी घोषणा करते हैं. काम एक नई कंपनी को मिल जाता है. अनिल अबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को. एचएएल को बाहर कर दिया जाता है, जबकि 25 मार्च को डास्सो एविएशन के सीईओ एक प्रेस कांफ्रेंस करते हैं जिसमें वे एचएएल का नाम लेते हैं और बताते हैं कि उनके साथ बातचीत हो रही है. एचएएल चेयरमैन से सुनकर आप सुनकर मेरे संतोष की कल्पना कर सकते हैं कि हमने ज़िम्मेदारियों के साझा करने से सहमत हैं. हम रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रोजेक्ट में तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्द हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि कांट्रेक्ट को पूरा करने और और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी हो जाएगा.

यहां आपको यह समझना है कि रफाएल कंपनी के सीईओ एचएएल के चेयरमैन की बात कर रहे हैं साथ ही वे रिक्वेस्ट फार प्रपोज़ल की बात कर रहे हैं जो यूपीए के समय से चल रहा था. फिर अचानक सब कैसे बदल गया. हमारे सहयोगी उमाशंकर सिंह ने प्रशांत भूषण से बात की है. 36 विमानों की तैयार अवस्था में तुरंत आपूर्ति होनी थी. तीन साल बीत गए मगर एक भी विमान भारत की सरज़मी पर नहीं उतरा है. यह इस प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया है. संसद में बताया गया कि पहली खेप अप्रैल 2019 में आएगी. यानी डील साइन के चार साल बाद. 2022 के मध्य तक 36 एयरक्राफ्ट की पूरी खेप नहीं आ सकेगी.
यह कैसी डील है कि अप्रैल 2015 से अगस्त 2018 आ गया अभी तक रक्षा मंत्रालय को जानकारी ही नहीं है, डास्सो एविएशन ने जानकारी ही नहीं दी है, रिलायंस के इस जवाब के बाद कम से कम रक्षा मंत्रालय को तो जवाब देना ही चाहिए. अब एक सवाल के जवाब में रिलायंस डिफेंस कहती है कि उसे 30,000 करोड़ का ठेका नहीं मिला है. डास्सो एविएशन किस ऑफसेट पार्टनर को कितना काम देगी, यह अभी तय नहीं हुआ है. डास्सो एविएशन ने इसके लिए 100 से अधिक भारतीय कंपनियों को इशारा किया है. इसमें से दो सरकारी कंपनियां हैं एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड. एक तो इशारा करने का क्या मतलब होता है हम नहीं समझे, अभी रिलायंस कह रही है कि रक्षा मंत्रालय को हो सकता है कि ऑफसेट पार्टनर के बारे में जानकारी न हो मगर रिलायंस को पता है कि 100 से अधिक ऑफसेट पार्टनर्स हो सकते हैं. इसमें दो सरकारी कंपनियां भी हैं. क्या यह मुमकिन हो सकता है कि रक्षा मंत्रालय को इतना भी पता न हो. क्या आप इस जवाब से संतुष्ट हुए. खैर आगे बढ़ते हैं. रिलायंस डिफेंस ने उस सवाल का जवाब दिया है कि एक ऐसी कंपनी को ठेका कैसे मिल गया जिसके पास कोई अनुभव नहीं है.
     

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...