एक बार अयोध्या फिर से युद्ध भूमि बनने जा रही है. मर्यादा
पुरुषोत्तम माने जाने वाले श्री राम ने अपने जीवन में तो अयोध्या में कोई
युद्ध नहीं लड़ा, लेकिन उनके नाम का यशोगान करने वाले भक्तों ने इतनी
हुंकारें भरीं कि अयोध्या भयभीत लगने लगी. सरकार को कानून व्यवस्था बनाये
रखने के लिए बड़ी तादाद में सुरक्षा कर्मी तैनात करने पड़े. शहर में धारा
144 के अलावा पीएसी की 48 कंपनियां, एक एडीजी, एक डीआईजी, तीन एसएसपी, 10
एसपी, 21 डीएसपी, 160 इंस्पेक्टर, 1000 कांस्टेबल, रैपिड एक्शन फोर्स की
पांच कंपनियां और एटीएस के कमांडो तैनात किए गए. हालात पर निगरानी के लिए
एक दर्जन ड्रोन भी लगाए गए थे. इसके अलावा जिले की पुलस तो थी ही.
इस बात की भी आशंका जाहिर की गई थी कि भीड़ का फायदा उठा कर किसी तरह की
आतंकवादी वारदात करने का प्रयास किया जा सकता है. इस वजह से भी सुरक्षा
जांच और बैरीकेडिंग की व्यवस्था को सतर्क किया गया था. भीड़ के दावे और
तेवरों से आशंकित होकर कुछ परिवारों ने अयोध्या में अपने घर भी छोड़ दिए थे
और बहुत से लोगों ने घरों में 10-15 दिन तक खाने पीने का पक्का इंतजाम भी
कर लिया था. आशंकाएं इतनी बढ़ गई थीं कि पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी
पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को अयोध्या में फौज की तैनाती की जरूरत तक
महसूस होने लगी थी. उन्होंने अयोध्या में संभावित अनहोनी को टालने के लिए
सुप्रीम कोर्ट को स्थिति का स्वतः संज्ञान लेने तक की बात कह डाली थी.
शुक्र
है अयोध्या ने यह सब आशंकाएं निर्मूल कर दीं. वहां अब जीवन फिर से सामान्य
हो गया है. लेकिन सवाल अभी वही है कि अयोध्या में जो कुछ हुआ उसका हासिल
क्या है. क्या इस सब की कोई जरूरत थी भी? क्या इस तरह के आयोजन राम मंदिर
विवाद का कोई स्थायी समाधान सुझा सकते हैं, या फिर यह सब अयोध्या को लेकर
बरसों से खेले जा रहे राजनीतिक खेल का ही हिस्सा है?
‘जा की रही
भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’. रामचरितमानस की ये पंक्तियां
अयोध्या में हुई ताजा हलचलों पर बहुत सटीक बैठती हैं. अयोध्या में मुख्य
रूप से दो कार्यक्रम आयोजित हुए. एक शिव सेना का ‘आशीर्वाद समारोह’ और
दूसरा विश्व हिन्दू परिषद की ‘धर्मसभा’ शिव सेना का कार्यक्रम एक दिन पहले
हुआ और इसके लिए पहली बार चार्टेड प्लेन से अयोध्या पहुंचे शिव सेना प्रमुख
उद्धव ठाकरे ने राम की मूरत के बहाने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी ढीली
पड़ती पकड़ को मजबूत करने की भरपूर कोशिश की.
उद्धव ने शिव सेना को
राम मंदिर आंदोलन का अगुवा बताया. केंद्र सरकार को चार वर्ष से सोता हुआ
कुंभकर्ण कहा और यह भी कहा कि अगर राम मंदिर के लिए कानून याअध्यादेश लाया
जाता है तो शिव सेना उसका खुला समर्थन करेगी. लेकिन जब राम लला के दर्शन
करते वक्त मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने उनसे कहा कि ‘आप तोड़े हो तो मंदिर
बनवाओ’ तो बगलें झांकते हुए उद्धव ठाकरे इतना ही कह पाये ‘जल्दी हो जाएगा,
बिल्कुल बनेगा.’
केंद्र सरकार को कुंभकर्ण कहने के बावजूद उद्धव ठाकरे के पास भी इस बात
का कोई जवाब नहीं था कि इतने समय तक उन्होंने क्या किया और वे अदालती
फैसले पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे. बहरहाल मुंबई से आये हजारों शिवसैनिकों
को अयोध्या लाकर उद्धव ने खुद को कट्टर हिंदूवादी छवि में पुर्नस्थापित
करने का प्रयास करते हुए ‘पहले मंदिर फिर सरकार’ के नारे के साथ अयोध्या से
विदाई ली. बाकी हुंकार अब वे मुंबई में छोड़ेंगे.
इसके बाद बारी
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की थी जिसे परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से सत्तारुढ़
भारतीय जनता पार्टी का पूरा सहयोग मिल रहा था. शिव सेना आक्रामक रुख दिखा
कर चली गई तो विहिप की मजबूरी हो गई थी कि उसका रुख और अधिक आक्रामक दिखे.
पांच घंटे के उसके कार्यक्रम में 80-90 हजार की भीड़ जुट भी गई हालांकि दावा
साढ़े तीन लाख का था. इस धर्म सभा में अपनी-अपनी भावना के मुताबिक सबने
अपनी अपनी मूरत गढ़ी. विश्व हिंदू परिषद की ध्वनि थी कि मुस्लिम पक्ष अपना
दावा छोड़ दे नहीं तो काशी व मथुरा के लिए भी रण होगा. अध्यादेश पर तो कोई
स्पष्ट नहीं हुआ, लेकिन चित्रकूट के स्वामी रामभद्राचार्य ने दावा किया कि
दिसंबर के बाद केंद्र सरकार मंदिर निर्माण का रास्ता देने जा रही है और यह
बात उन्हें एक केंद्रीय मंत्री ने स्वयं बताई है. लेकिन जब इस पर विवाद हुआ
तो रामभद्राचार्य मंच छोड़ कर ही चले गए.
विहिप ने मंदिर मुद्दे को
2019 के लोकसभा चुनाव की प्रस्तावना बनाने की कोशिश में बड़े-बड़े दावे किए.
लेकिन उनकी हवा राम जन्म भूमि मामले में पक्षकार निर्माेही अखाड़े के महंत
दिनेंद्र दास ने यह कहकर निकाल दी कि ‘विहिप होती कौन है, इस मामले में
पक्षकार हम हैं और हमने सुप्रीम कोर्ट में पूरी भूमि पर दावा किया है.’ ऐसा
ही कुछ एक अन्य पक्षकार महंत धर्मदास का कहना है. वे कहते हैं, ‘पार्टी
नहीं हैं तो किस हैसियत से जमीन मांग रहे हैं. जब चुनाव आते हैं तो शिगूफा
छोड़ने अयोध्या आ जाते हैं.’
पूरी जमीन के विश्व हिंदू परिषद के दावे
पर प्रतिक्रिया में मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी कहते हैं, ‘विहिप न तो
देश की सरकार है, न पक्षकार. सबसे बड़ा सुप्रीम कोर्ट है’. अयोध्या में कई
बरस तक राम लला की पोशाक सिलने वाले सादिक कहते हैं, ‘बाहरी भीड़ यहां हमेशा
दहशत लाती है. रामलला तो हमारे भी प्यारे हैं, इमामे हिंद हैं. मगर
समाजवादी पार्टी के आजम खान चाहते हैं कि अयोध्या में हालात पर यूएनओ नजर
रखे. उन्हें अपने लोकतंत्र पर यकीन नहीं है.
आजम खान पहले भी इस तरह का एक पत्र लिख चुके हैं. उन जैसे लोग यूएनओ
जाने जैसी हरकतें तो कर सकते हैं, लेकिन विवाद के समाधान के लिए पहल करते
कभी नहीं दिखाई देते. मूरत उन्हें भी अपनी भावना की तरह ही दिखती है और वह
भावना सत्ता की देहरी तक ही जाती दिखती है. ठीक आजम खान की ही तरह बीजेपी
के विधायक सुरेंद्र सिंह भी मंदिर के लिए संविधान को ही हाथ में लेने की
धमकी देते हुए कोई संकोच नहीं करते. उनकी मूरत भी उन्हीं की भावना की तरह
है जिसमें संविधान या लोकतंत्र के लिए जगह नहीं दिखती.
प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी मंदिर निर्माण में कांग्रेस को बाधा बताते हुए पार्टी पर
सुप्रीम कोर्ट के जजों को डराने का आरोप लगाते हैं तो कांग्रेस वोट साधने
के लिए मंदिर और मूरत पर कुछ भी बोलने से डर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार की
भावना में मूरत 151 मीटर ऊंची होनी है. इसके ऊपर 20 मीटर का छत्र और 50
मीटर का आधार होना है. यानी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की मूरत सारी
मूरतों से ऊंची होने वाली है. हालांकि योगी सरकार की इस घोषणा के अगले ही
दिन वाराणसी में हुए एक कथित धर्मसंसद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद
सरस्वती की मौजूदगी में अयोध्या में सबसे ऊंची राम प्रतिमा के प्रस्ताव की
निंदा कर दी गयी. यानी योगी सरकार वाली मूरत भी सबकी भावनाओं की मूरत बन
पायेगी इसमें संदेह है.
भावनाओं के इस खेल में मूरतें तो सब अपनी
अपनी तरह गढ़ रहे हैं, लेकिन राजवंशों की तरह कई पार्टियों को सत्ता तक
पहुंचाने वाली अयोध्या आज भी किसी अभिशप्त नगरी की तरह अपनी सूरत बदलने का
इंतजार कर रही है. सरयू में पानी भी उसी तरह बह रहा है और अयोध्या का जीवन
भी यथावत है. अयोध्या का एक और बुरा स्वप्न बीत गया, लेकिन छह दिसंबर की
आहट उसे फिर डराने लगी है.
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