जिन पांच राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम) में महीनेभर के भीतर चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्य प्रदेश की स्थिति सबसे दिलचस्प है. चार-पांच महीनों पहले तक यहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने कोई चुनौती नज़र नहीं आ रही थी. कांग्रेस का संगठन जीर्ण-शीर्ण था और माली हालत ख़स्ता. फिर हालात बदले. कांग्रेस का नेतृत्व बदला. मंदसौर में किसानों का आंदोलन हिंसक हुआ और पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत भी. कर्मचारियों की नाराज़गी बढ़ने की ख़बरें लगातार आने लगीं. अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर किए जाने और फिर बाद में उसे उसके पुराने स्वरूप में लाने की दिल्ली की दिग्भ्रमित सी कोशिशों ने जातीय बुखार का पारा चढ़ाया. तब भाजपा की हालत कमजोर लगने लगी. उस वक़्त तो बातें यहां तक होने लगीं कि कांग्रेस इस बार बड़े बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में लौट सकती है.
लेकिन दोनों पार्टियाें के प्रत्याशियों की घोषणा होते-होते हालात फिर बदल गए. प्रदेश की राजनीति समझने वालों की मानें तो अब हालात 19-20 के हो गए हैं. पलड़ा किसी भी तरफ झुक सकता है. और इस नज़दीकी संघर्ष की स्थिति निर्मित करने में भाजपा के साथ कांग्रेस भी बराबर भी ज़िम्मेदार है. कैसे? यही जानने की कोशिश करते हैं. राज्य चुनाव के मुहाने पर है. मतदान की तारीख़ नज़दीक है. लेकिन 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस अब तक अपने अंतर्विरोधों में उलझी दिख रही है. इसके कई उदाहरण हैं. मसलन एक नवंबर को ही ख़बर आई कि पार्टी प्रत्याशी तय करने के लिए दिल्ली में हुई बैठक के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की समन्वय समिति के मुखिया दिग्विजय सिंह और चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया आपस में उलझ गए. वह भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने. बाद में अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली और अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की पहल पर मामला सुलटा. दो दिन बाद मालूम हुआ कि मालवा और ग्वालियर-चंबल की क़रीब एक दर्ज़न सीटों पर प्रत्याशियों के नामों को लेकर दोनों में मतभेद थे. वैसे बताया जाता है कि राहुल गांधी ने अपने स्तर पर दोनों को समझाया और बात आगे बढ़ी.
लेकिन बढ़ी कैसे, वह देखिए. कांग्रेस हमेशा से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार के ख़िलाफ़ मुखर रही है. उनके कथित भ्रष्टाचार के मामले उठाती रही है. इस क्रम में शिवराज के साले संजय सिंह मसानी को भी कई बार कांग्रेस ने निशाना बनाया. लेकिन इन्हीं संजय सिंह को तीन नवंबर को कांग्रेस में शामिल कर लिया गया. संजय मूल रूप से गोंदिया, महाराष्ट्र के कारोबारी हैं. इस हिसाब से कमलनाथ के छिंदवाड़ा के नज़दीकी हुए. लेकिन बताया जाता है कि वे एक-डेढ़ साल से बारासिवनी में सक्रिय थे. यहां से भाजपा का टिकट मांग रहे थे. पार्टी ने उनकी बात नहीं सुनी तो उन्होंने कांग्रेस का रुख़ कर लिया. उनका यह क़दम बनता भी है. लेकिन कांग्रेस की क्या मज़बूरी या ज़रूरत थी कि उन्हें न सिर्फ शामिल किया बल्कि बारासिवनी से ही टिकट भी दिया? इस सवाल का ज़वाब अब तक कांग्रेस के रणनीतिकार दिग्विजय सिंह भी नहीं ढूंढ पाए हैं. होशंगाबाद से भाजपा के पूर्व दिग्गज सरताज सिंह भी कांग्रेस का टिकट पाने में सफल रहे. ऐसे ही जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रमुख हीरालाल अलावा को भी पार्टी ने मनावर ने अपना प्रत्याशी बना दिया. इस तरह के तमाम फैसलों पर कांग्रेस के भीतर से असंतोष की आवाज़ें उठ रही हैं.
यही आलम मुद्दों के मोर्चे पर है. सत्ताधारी भाजपा और मीडिया ने कांग्रेस को थाली में सजाकर मुद्दे दिए हैं. फिर चाहे वह व्यापम और ई-टेंडरिंग जैसे बड़े घोटालों का मामला हो या रेत के अवैध खनन का. किसान अांदोलनों के हिंसक दमन से उपजा असंतोष हो या आर्थिक मोर्चे और आधारभूत ढांचा (ख़ासतौर पर सड़कों के मामले में) क्षेत्र में कमतर प्रदर्शन का. कांग्रेस किसी भी मसले पर कोई लहर नहीं खड़ी कर पाई. उल्टा कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में भी जो मुद्दे शामिल किए गए वे ‘राम वन गमन पथ’, ‘गौशाला निर्माण’, ‘गौमूत्र के कारोबार’, ‘आध्यात्मिक विभाग’ स्थापित करने आदि के थे. कांग्रेस के 112 पेज के इस ‘वचन पत्र’ में और भी तमाम बातें थीं. लेकिन चर्चा इन्हीं सब चीजों की ज़्यादा होनी थी, जो हुई भी. इसके बाद भाजपा को यह कहने का मौका भी मिल गया कि विपक्ष मुद्दाविहीन है इसलिए उसने ‘80 फ़ीसदी तक हमारे मुद्दों और नीतियों की नक़ल कर ली.’
इतना ही नहीं कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध का शग़ूफ़ा भी छोड़ा गया. और अगले ही दिन स्पष्टीकरण आ गया कि ऐसी कोई बात कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में नहीं है. शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को जल्द यह अहसास हो गया कि आरएसएस पर प्रतिबंध की बात से भाजपा का जो कार्यकर्ता अपनी ही सरकार से नाराज़ है, वह वापस अपनी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो सकता है. ऐसे और भी अंतर्विरोध हैं, जो कांग्रेस पर भारी पड़ सकते हैं.
दूसरी तरफ भाजपा है जो शिवराज पर ‘विश्वास की अति’ पर खड़ी दिखती है. और ख़ुद शिवराज ‘आत्मविश्वास के अतिरेक’ पर सवार नज़र आते हैं. इसकी भी मिसालें देखिए. भाजपा ने एक नवंबर को मध्य प्रदेश के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. इसमें 177 नाम थे. बाद में एक एक हटा लिया और रह गए 176. इनमें 70 फ़ीसदी तक वही चेहरे थे जो 2013 में चुनाव लड़े थे. यह सूची देखने के बाद सत्याग्रह ने प्रदेश भाजपा के एक पुराने पदाधिकारी से प्रतिक्रिया ली. उनका ज़वाब था, ‘लगता है अब चलाचली की बेला है.’
रदेश की राजनीति के जानकार भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की राजनीति पर नजर रखने वाले एक पत्रकार ने सत्याग्रह से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी ने बड़ा जोख़िम लिया है. इस सूची से एक बात और साफ है कि भाजपा में प्रदेश से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है.’ यह बात भाजपा प्रत्याशियों की बाद में आई सूचियों से भी साबित हुई. इन सभी में एक बड़ा संकेत यह था कि पार्टी ने शिवराज पर लगभग आंख बंद कर भरोसा किया है, इसलिए उनके सुझाए नामों को ही बिना किसी हीला-हवाली के हरी झंडी दे दी गई है.
ज़ाहिर तौर पर इससे शिवराज का मनोबल भी सातवें आसमान पर है. उन्होंने इस बार एक-एक कर अपने लगभग सभी प्रतिस्पर्धियाें को जगह दिखा दी. उदाहरण इसके भी हैं. राज्य में शिवराज के सबसे बड़े दो प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं- केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय. शिवराज के सामने इन दोनों की ही नहीं चली. तोमर के बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे को तो टिकट ही नहीं दिया गया. विजयवर्गीय के पुत्र आकाश को टिकट मिला लेकिन इंदौर-3 से जो लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के असर वाला क्षेत्र है. यहां से सुमित्रा महाजन ख़ुद अपने बेटे मंदार के लिए टिकट मांग रही थीं. लेकिन मंदार को भी टिकट नहीं मिला. जबकि कैलाश अपने बेटे के लिए इंदौर-2 से टिकट चाहते थे. साथ ही अपने लिए भी महू से. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त होने के बावज़ूद कैलाश सिर्फ़ आकाश को टिकट दिला पाए. वह भी जहां से शिवराज की मंशा के अनुरूप पार्टी ने दिया.
बात इतनी ही नहीं थी. थावरचंद गहलोत प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग का जाना-माना चेहरा हैं. उनके बेटे जीतेंद्र को टिकट मिला, लेकिन निकट सहयोगी सतीश मालवीय का पत्ता कट गया. पत्ता पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का भी कटा, तमाम दबाव बनाने के बावज़ूद. बाबूलाल की जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को भोपाल की गोविंदपुरा सीट से टिकट दिया गया. वह भी आख़िरी मौके पर, जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे गौरीशंकर शेजवार को भी सिर्फ़ बेटे के टिकट से ही संतोष करना पड़ा. उनकी सांची विधानसभा सीट से अब उनके पुत्र मुदित शेजवार पार्टी उम्मीदवार हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और शिवराज के मुखर आलोचक रहे सरताज सिंह को तो टिकट के लिए पार्टी ही छोड़नी पड़ी. वे आंसू बहाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए.
कमाल की बात है कि शिवराज पर पार्टी के ‘विश्वास की अति’ और शिवराज के ‘आत्मविश्वास का अतिरेक’ तब दिख रहा है जब लगातार उल्टी ख़बरें भी आ रही हैं. मसलन- अपने गृहनगर बुधनी की जो सुरक्षित शिवराज ने इस बार अपने लिए तलाशी है उस पर प्रचार की शुरूआत में ही उनकी पत्नी साधना सिंह को जनता के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है. इस पूरे इलाके में सड़कों की स्थिति जर्जर है जबकि शिवराज प्रदेश में ‘अमेरिका से बेहतर’ सड़कें होने का दावा करते हैं. वे 13 साल से और उनकी पार्टी 15 सालाें से राज्य की सत्ता में है, लेकिन बुधनी के लोग पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में उनकी नाराज़गी स्वाभाविक है.
लेकिन दोनों पार्टियाें के प्रत्याशियों की घोषणा होते-होते हालात फिर बदल गए. प्रदेश की राजनीति समझने वालों की मानें तो अब हालात 19-20 के हो गए हैं. पलड़ा किसी भी तरफ झुक सकता है. और इस नज़दीकी संघर्ष की स्थिति निर्मित करने में भाजपा के साथ कांग्रेस भी बराबर भी ज़िम्मेदार है. कैसे? यही जानने की कोशिश करते हैं. राज्य चुनाव के मुहाने पर है. मतदान की तारीख़ नज़दीक है. लेकिन 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस अब तक अपने अंतर्विरोधों में उलझी दिख रही है. इसके कई उदाहरण हैं. मसलन एक नवंबर को ही ख़बर आई कि पार्टी प्रत्याशी तय करने के लिए दिल्ली में हुई बैठक के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की समन्वय समिति के मुखिया दिग्विजय सिंह और चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया आपस में उलझ गए. वह भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने. बाद में अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली और अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की पहल पर मामला सुलटा. दो दिन बाद मालूम हुआ कि मालवा और ग्वालियर-चंबल की क़रीब एक दर्ज़न सीटों पर प्रत्याशियों के नामों को लेकर दोनों में मतभेद थे. वैसे बताया जाता है कि राहुल गांधी ने अपने स्तर पर दोनों को समझाया और बात आगे बढ़ी.
लेकिन बढ़ी कैसे, वह देखिए. कांग्रेस हमेशा से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार के ख़िलाफ़ मुखर रही है. उनके कथित भ्रष्टाचार के मामले उठाती रही है. इस क्रम में शिवराज के साले संजय सिंह मसानी को भी कई बार कांग्रेस ने निशाना बनाया. लेकिन इन्हीं संजय सिंह को तीन नवंबर को कांग्रेस में शामिल कर लिया गया. संजय मूल रूप से गोंदिया, महाराष्ट्र के कारोबारी हैं. इस हिसाब से कमलनाथ के छिंदवाड़ा के नज़दीकी हुए. लेकिन बताया जाता है कि वे एक-डेढ़ साल से बारासिवनी में सक्रिय थे. यहां से भाजपा का टिकट मांग रहे थे. पार्टी ने उनकी बात नहीं सुनी तो उन्होंने कांग्रेस का रुख़ कर लिया. उनका यह क़दम बनता भी है. लेकिन कांग्रेस की क्या मज़बूरी या ज़रूरत थी कि उन्हें न सिर्फ शामिल किया बल्कि बारासिवनी से ही टिकट भी दिया? इस सवाल का ज़वाब अब तक कांग्रेस के रणनीतिकार दिग्विजय सिंह भी नहीं ढूंढ पाए हैं. होशंगाबाद से भाजपा के पूर्व दिग्गज सरताज सिंह भी कांग्रेस का टिकट पाने में सफल रहे. ऐसे ही जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रमुख हीरालाल अलावा को भी पार्टी ने मनावर ने अपना प्रत्याशी बना दिया. इस तरह के तमाम फैसलों पर कांग्रेस के भीतर से असंतोष की आवाज़ें उठ रही हैं.
यही आलम मुद्दों के मोर्चे पर है. सत्ताधारी भाजपा और मीडिया ने कांग्रेस को थाली में सजाकर मुद्दे दिए हैं. फिर चाहे वह व्यापम और ई-टेंडरिंग जैसे बड़े घोटालों का मामला हो या रेत के अवैध खनन का. किसान अांदोलनों के हिंसक दमन से उपजा असंतोष हो या आर्थिक मोर्चे और आधारभूत ढांचा (ख़ासतौर पर सड़कों के मामले में) क्षेत्र में कमतर प्रदर्शन का. कांग्रेस किसी भी मसले पर कोई लहर नहीं खड़ी कर पाई. उल्टा कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में भी जो मुद्दे शामिल किए गए वे ‘राम वन गमन पथ’, ‘गौशाला निर्माण’, ‘गौमूत्र के कारोबार’, ‘आध्यात्मिक विभाग’ स्थापित करने आदि के थे. कांग्रेस के 112 पेज के इस ‘वचन पत्र’ में और भी तमाम बातें थीं. लेकिन चर्चा इन्हीं सब चीजों की ज़्यादा होनी थी, जो हुई भी. इसके बाद भाजपा को यह कहने का मौका भी मिल गया कि विपक्ष मुद्दाविहीन है इसलिए उसने ‘80 फ़ीसदी तक हमारे मुद्दों और नीतियों की नक़ल कर ली.’
इतना ही नहीं कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध का शग़ूफ़ा भी छोड़ा गया. और अगले ही दिन स्पष्टीकरण आ गया कि ऐसी कोई बात कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में नहीं है. शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को जल्द यह अहसास हो गया कि आरएसएस पर प्रतिबंध की बात से भाजपा का जो कार्यकर्ता अपनी ही सरकार से नाराज़ है, वह वापस अपनी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो सकता है. ऐसे और भी अंतर्विरोध हैं, जो कांग्रेस पर भारी पड़ सकते हैं.
दूसरी तरफ भाजपा है जो शिवराज पर ‘विश्वास की अति’ पर खड़ी दिखती है. और ख़ुद शिवराज ‘आत्मविश्वास के अतिरेक’ पर सवार नज़र आते हैं. इसकी भी मिसालें देखिए. भाजपा ने एक नवंबर को मध्य प्रदेश के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. इसमें 177 नाम थे. बाद में एक एक हटा लिया और रह गए 176. इनमें 70 फ़ीसदी तक वही चेहरे थे जो 2013 में चुनाव लड़े थे. यह सूची देखने के बाद सत्याग्रह ने प्रदेश भाजपा के एक पुराने पदाधिकारी से प्रतिक्रिया ली. उनका ज़वाब था, ‘लगता है अब चलाचली की बेला है.’
रदेश की राजनीति के जानकार भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की राजनीति पर नजर रखने वाले एक पत्रकार ने सत्याग्रह से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी ने बड़ा जोख़िम लिया है. इस सूची से एक बात और साफ है कि भाजपा में प्रदेश से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है.’ यह बात भाजपा प्रत्याशियों की बाद में आई सूचियों से भी साबित हुई. इन सभी में एक बड़ा संकेत यह था कि पार्टी ने शिवराज पर लगभग आंख बंद कर भरोसा किया है, इसलिए उनके सुझाए नामों को ही बिना किसी हीला-हवाली के हरी झंडी दे दी गई है.
ज़ाहिर तौर पर इससे शिवराज का मनोबल भी सातवें आसमान पर है. उन्होंने इस बार एक-एक कर अपने लगभग सभी प्रतिस्पर्धियाें को जगह दिखा दी. उदाहरण इसके भी हैं. राज्य में शिवराज के सबसे बड़े दो प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं- केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय. शिवराज के सामने इन दोनों की ही नहीं चली. तोमर के बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे को तो टिकट ही नहीं दिया गया. विजयवर्गीय के पुत्र आकाश को टिकट मिला लेकिन इंदौर-3 से जो लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के असर वाला क्षेत्र है. यहां से सुमित्रा महाजन ख़ुद अपने बेटे मंदार के लिए टिकट मांग रही थीं. लेकिन मंदार को भी टिकट नहीं मिला. जबकि कैलाश अपने बेटे के लिए इंदौर-2 से टिकट चाहते थे. साथ ही अपने लिए भी महू से. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त होने के बावज़ूद कैलाश सिर्फ़ आकाश को टिकट दिला पाए. वह भी जहां से शिवराज की मंशा के अनुरूप पार्टी ने दिया.
बात इतनी ही नहीं थी. थावरचंद गहलोत प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग का जाना-माना चेहरा हैं. उनके बेटे जीतेंद्र को टिकट मिला, लेकिन निकट सहयोगी सतीश मालवीय का पत्ता कट गया. पत्ता पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का भी कटा, तमाम दबाव बनाने के बावज़ूद. बाबूलाल की जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को भोपाल की गोविंदपुरा सीट से टिकट दिया गया. वह भी आख़िरी मौके पर, जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे गौरीशंकर शेजवार को भी सिर्फ़ बेटे के टिकट से ही संतोष करना पड़ा. उनकी सांची विधानसभा सीट से अब उनके पुत्र मुदित शेजवार पार्टी उम्मीदवार हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और शिवराज के मुखर आलोचक रहे सरताज सिंह को तो टिकट के लिए पार्टी ही छोड़नी पड़ी. वे आंसू बहाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए.
कमाल की बात है कि शिवराज पर पार्टी के ‘विश्वास की अति’ और शिवराज के ‘आत्मविश्वास का अतिरेक’ तब दिख रहा है जब लगातार उल्टी ख़बरें भी आ रही हैं. मसलन- अपने गृहनगर बुधनी की जो सुरक्षित शिवराज ने इस बार अपने लिए तलाशी है उस पर प्रचार की शुरूआत में ही उनकी पत्नी साधना सिंह को जनता के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है. इस पूरे इलाके में सड़कों की स्थिति जर्जर है जबकि शिवराज प्रदेश में ‘अमेरिका से बेहतर’ सड़कें होने का दावा करते हैं. वे 13 साल से और उनकी पार्टी 15 सालाें से राज्य की सत्ता में है, लेकिन बुधनी के लोग पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में उनकी नाराज़गी स्वाभाविक है.
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