Sunday, January 13, 2019

आर्थिक आरक्षण की असलियत

आर्थिक आरक्षण पर केवल लालू प्रसाद की आरजेडी और ओवैसी की पार्टी ने सरकार के खिलाफ मतलब संविधान के मूल्यों के साथ खडे दिखे। बाकी सब तो सवर्ण वोट न खिसक जाये, इस डर से बोलने की हिम्मत भी नहीं कर पाए। और तो और दलित राजनीति करने का दावा करने वाले पासवान, अठावले जैसे जोकर और मायावती भी बोलने की हिम्मत न कर पाए।
भारत में आर्थिक आधार पर सरकारी साहयता पहले से ही मौजूद थी, मनरेगा और अन्त्योदय इसके उदाहरण हैं। संविधान सभा की बहसों को देखिए उसमें किस तरह से आर्थिक आरक्षण को नकार दिया गया था। यहाँ आरक्षण केवल सामाजिक न्याय और बराबरी के लिए दिया जाएगा तय हुआ।
बेहतर होता कि सरकार आकड़े सामने रखे कि कितने ब्राह्मण और ठाकुर या बनिये गरीब हैं? कितनों को समाज में जाति की वजह से बेइज्जत होना पडा है? और माफ करिये एक सच और कह दूँ, कि इनकी जो शुरूआती संपति और जमींदारी है न? वो भी बडी जाति का होने की वजह से ही मिली थी। क्योंकि भगवान के यहाँ से तो सब एक जैसे आए थे कोई 20 -25 बीघा जमीन तो न लाया था?  और सबसे प्रमुख कितने प्रतिशत सवर्ण पहले से ही नौकरियों में हैं? आप इसके नतीजे देखकर बात नहीं करेंगे इसपर।
जो भी ओबीसी और दलित आरक्षण की वजह से नौकरी पाए भी तो वो भी चतुर्थ श्रेणी में आए। बडे पदों पर अभी भी सवर्ण ही भरे पडे हैं।
यहाँ आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व का मामला है। बडा आरक्षण का शौक है तो क्यों नहीं "जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी" सिद्धांत लागू करवा देते हैं? पता चल जाएगा कि 70-75% तो दलित ओबीसी का ही है, बाकी सवर्ण ले जाएँ अपनी जनसंख्या के हिसाब से।
आपने कितने गरीब सवर्णों को देखा है? असल में तो एक दो प्रतिशत अपवाद छोडकर सब अच्छी पोजीशन में हैं। केवल हिन्दी फिल्मों और कहानियों में ही ब्राह्मण गरीब हुआ करता था क्योंकि कहानियां केवल उनपर ही बन सकती हैं। कभी एक गरीब नाई था, एक गरीब दलित था, एक गरीब आदिवासी था, सुना आपने किसी कहानी में? क्योंकि ये कहानी की नहीं बल्कि सच्चाई की गरीबी होती है। जाकर गावों में देखिए गाँव के बाहर कौन सी जाति के लोग बसाए गये? फिर अपने पूर्वजों से उसका कारण भी पूछो। मनरेगा या आपके खेतो में काम करने वाले अधिकतर मजदूर किस जाति के हैं? किस जाति के बच्चे और महिलाएं मजदूरी करते हैं? सरकारी स्कूलों में मिड डे मील खाने वाले बच्चे किस जाति के हैं? ठीक से आकड़े सामने रखो फिर बताओ गरीबी कहाँ है? और आरक्षण किसे चाहिए?
और सुनो अगर आरक्षण ही खत्म करना है तो पहले सम्पत्ति का विकेंद्रीकरण कीजिए। शिक्षा का निजीकरण खतम करके सबको बराबर का मौका दो। फिर दस साल बाद धीरे धीरे जातियों को प्रमोट करो। जैसे ओबीसी से कुछ को लिखित में अपने तथाकथित उच्च वर्ग में होने का सर्टिफ़िकेट दो। जैसे यूपी में यादव और कुर्मी। इसके बाद कुछ कुछ सुधार कर पाई जातियों जाटव, धोबी आदि को ओबीसी में डालो और कुछ आदिवासी जन जातियों को एस सी में शिफ्ट करो। इसके अलावा अंतर्जातीय विवाह करने वालों को सरकारी सुरक्षा और नौकरी दो। तब जाकर जाति खत्म होगी और जब जाति खतम होगी तब आरक्षण खत्म होगा। और मुझे पता है जाति खत्म होने का नाम सुनते ही आप चिढ रहे मुझपर बस यहीं आप गलत हो। ये समाज की हकीकत है कि "जाति कभी नहीं जाती।"

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...