Thursday, January 31, 2019

हिंदू महासभा का कुकृत्य

कल जब पूरा देश बापू को उनकी 71वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दे रहा था उसी समय अलीगढ़ के में हिंदू महासभा के कार्यकर्ता न केवल गांधी जी की मौत का जश्न मना रहे थे। बल्कि नाथूराम गोडसे द्वारा की गयी महात्मा गांधी की हत्या के दृश्य का मीडिया के सामने नाटकीय मंचन कर इंसानी इतिहास के घृणास्पद पन्नों पर एक नया अध्याय लिख रहे थे। ये सब कुछ हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पांडेय की अगुवाई में हो रहा था। उन्होंने बाकायदा हाथ में नकली रिवाल्वर लेकर लेकर महात्मा गांधी की तस्वीर पर गोली मारी, पुतले से खून बहा और उसके साथ ही कार्यकर्ताओं ने गोडसे जिंदाबाद के नारे लगाए। और फिर आपस में मिठाइयां बांटी। इस तरह से यहां शहीद दिवस को शौर्य दिवस के तौर पर याद किया गया। सोचिए कैसा घिनौना था ये सब। हिंसा इतनी नार्मलाइज हो गई है कि उसको एंजॉय करते हैं? लेकिन न तो पूजा के खिलाफ प्रशासन या सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई की सूचना है और न ही उस दिशा में आगे बढ़ने के कोई संकेत मिले हैं।
एक ऐसे दौर में जब राष्ट्र, राष्ट्रवाद और उसके प्रतीकों के लेकर पूरे देश में हंगामा मचा हुआ है। जेएनयू की एक संदिग्ध घटना जो ठीक से साबित भी नहीं हो सकी, सरकार साढ़े तीन सालों बाद भी कानूनी कार्रवाई लिए बेताब है। तब राष्ट्र के सबसे बड़े प्रतीक बापू के साथ इतनी बड़ी घृणा भरी घटना पर इस संघी सरकार और पूरे हिन्दुत्व पाले की चुप्पी एक बार फिर उसे उसी तरह से कठघरे में खड़ा कर देती है। जैसा कि गांधी के मौत के समय हुआ था।
पीएम मोदी भले मत्था टेककर बापू के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने की कोशिश करें लेकिन ये कितनी ईमानदार है इसकी परीक्षा इस गंभीर मसले पर सरकार की ओर से बरते जाने वाले रवैये से होगी। पूजा पांडेय की हरकत 100 फीसदी राष्ट्रद्रोह के दायरे में आती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पीएम मोदी और योगी की सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई को सुनिश्चित करेगी। ये कोई पहली घटना नहीं है जब हिन्दू  महासभा इस तरह का कार्यक्रम कर रही है। लेकिन पिछली सरकारों के दौरान ऐसा खुलेआम करने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। लिहाजा ये सब कुछ पर्दे के पीछे हुआ करता था। लेकिन पहली बार इसे खुलेआम और कैमरों के सामने आयोजित किया गया है।
दरअसल संघ भी इस बात को जानता है कि अभी महात्मा गांधी को सीधे खारिज नहीं किया जा सकता है। लिहाजा उसके लिए धीरे-धीरे माहौल बनाना होगा। और ऐसे में इस तरह के तत्वों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। एक दूसरे नजरिये से देखा जाए तो हिंदू महासभा से लेकर शिवसेना और सनातन संस्था से लेकर राम सेना जैसे तमाम संगठन, पार्टियां और मंच संघ के विस्तारित परिवार के हिस्से हैं। और सब एक दूसरे को अपने-अपने तरीके से मदद पहुंचाते रहते हैं। अनायास नहीं है जब चुनावी राजनीति की बारी आती है तो सब एक हो जाते हैं। पिछले साढ़े चार सालों से शिवसेना बीजेपी के खिलाफ आग उगलने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी। लेकिन अब जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए हैं तो एक बार फिर हमेशा की तरह दोनों ने गलबहियां कर ली है।
इसी तरह से गोडसे के संगठन हिंदू महासभा के तमाम नेताओं को बीजेपी और संघ न केवल अपना मंच देते रहे हैं बल्कि उन्हें अपना नेता बनाने से भी उन्हें कभी कोई परहेज नहीं रहा। दक्षिणपंथी राजनीति के सबसे बड़े चेहरे सावरकर इनके आदर्श पुरुष हैं जो कभी हिंदू महासभा के अध्यक्ष हुआ करते थे। बीजेपी जो पहले जनसंघ के तौर पर जानी जाती थी उसकी नींव ही हिन्दू महा सभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रखी। और उसके बाद गांधी की हत्या में हाथ होने के आरोपी गोरखनाथ पीठ के योगी और उस दौरान महासभा के नेता रहे दिग्विजय नाथ के चेले अवैद्यनाथ से एक दौर में बीजेपी का गठबंधन हुआ करता था और अब उनका चेला बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार का यूपी में मुखिया बना हुआ है। लिहाजा संघ-बीजेपी और महासभा के बीच नाभिनाल का ये रिश्ता किसी से छुपा नहीं है। लेकिन नौटंकी के लिए ही सही इस महिला के खिलाफ कडी कार्रवाई तो जरूरी है।

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