Monday, February 25, 2019

ईरान क्यों नहीं झुका?

इस्लामिक रिपब्लिक ईरान से चार दशकों की असहमति का नतीजा यह मिला कि इससे न तो ईरान ने घुटने टेके और न इलाक़े में शांति स्थापित हुई. यहां तक कि अमरीका में ट्रंप के आने के बाद से दुश्मनी और बढ़ गई है. 1971 में यूगोस्लाविया के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टीटो, मोनाको के प्रिंस रेनीअर और राजकुमारी ग्रेस, अमरीका के उपराष्ट्रपति सिप्रो अग्नेयू और सोवियत संघ के स्टेट्समैन निकोलई पोगर्नी ईरानी शहर पर्सेपोलिस में जुटे थे. ये सभी एक शानदार पार्टी में शामिल हुए थे. इस पार्टी का आयोजन ईरानी शाह रज़ा पहलवी ने की थी. लेकिन आठ सालों से कम वक़्त में भी ईरान में नए नेता अयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी का आगमन हुआ और उन्होंने इस पार्टी को शैतानों का जश्न क़रार दिया था.
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले ख़ुमैनी तुर्की, इराक़ और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे. ख़ुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमरीका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे.
1953 में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई. ईरान में क्रांति के बाद आई रूढ़िवादिता को लेकर प्रोजेक्ट सिंडिकेट ने अपनी एक रिपोर्ट में जर्मन दार्शनिक हना एरेंट की एक टिप्पणी का उल्लेख किया है. एरेंट ने कहा था, ''ज़्यादातर उग्र क्रांतिकारी क्रांति के बाद रूढ़िवादी बन जाते हैं.''
कहा जाता है कि ख़ुमैनी के साथ भी ऐसा ही हुआ. सत्ता में आने के बाद ख़ुमैनी की उदारता में अचानक से परिवर्तन आया. उन्होंने ख़ुद को वामपंथी आंदोलनों से अलग कर लिया. विरोधी आवाज़ों को दबाना शुरू कर दिया और इस्लामिक रिपब्लिक और ईरान की लोकतांत्रिक आवाज़ में एक किस्म की दूरियां बननी शुरू हो गई थीं.
क्रांति के परिणामों के तत्काल बाद ईरान और अमरीका के राजनयिक संबंध ख़त्म हो गए. तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह ने अमरीकी दूतावास को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और 52 अमरीकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था.
कहा जाता है कि इसमें ख़ुमैनी का भी मौन समर्थन था. अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से इनकी मांग थी कि शाह को वापस भेजें. शाह न्यूयॉर्क में कैंसर का इलाज कराने गए थे. बंधकों को तब तक रिहा नहीं किया गया जब तक रोनल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति नहीं बन गए. आख़िरकार पहलवी की मिस्र में मौत हो गई और ख़ुमैनी ने अपनी ताक़त को और धर्म केंद्रित किया.
इन सबके बीच सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला बोल दिया. ईरान और इराक़ के बीच आठ सालों तक ख़ूनी युद्ध चला. इस युद्ध में अमरीका सद्दाम हुसैन के साथ था. यहां तक कि सोवियत यूनियन ने भी सद्दाम हुसैन की मदद की थी.
यह युद्ध एक समझौते के साथ ख़त्म हुआ. युद्ध में कम से कम पांच लाख ईरानी और इराक़ी मारे गए थे. कहा जाता है कि इराक़ ने ईरान में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था और ईरान में इसका असर लंबे समय तक दिखा.
यह वही समय था जब ईरान ने परमाणु बम की संभावनाओं को देखना शुरू कर दिया था. शाह के वक़्त में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइज़नहावर के वक़्त में परमाणु-ऊर्जा संयत्र बनाने की कोशिश की थी.
ईरान ने परमाणु कार्यक्रम पर जो काम करना शुरू किया था वो 2002 तक छुपा रहा. अमरीका का इस इलाक़े में समीकरण बदला इसलिए नाटकीय परिवर्तन देखने को मिला.
अमरीका ने न केवल सद्दाम हुसैन को समर्थन करना बंद किया बल्कि इराक़ में हमले की तैयारी शुरू कर दी थी. कहा जाता है कि अमरीका के इस विनाशकारी फ़ैसले का अंत ईरान को मिले अहम रणनीतिक फ़ायदे से हुआ.
हालांकि ईरान अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रसिद्ध टर्म 'एक्सिस ऑफ इवल' में शामिल हो गया था.
आगे चलकर यूरोप ने ईरान से परमाणु कार्यक्रम पर बात करना शुरू किया. जेवियर सालोना उस वक़्त यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधि के तौर पर ईरान से बात कर रहे थे.
उन्होंने प्रोजेक्ट सिंडिकेट की एक रिपोर्ट में कहा है कि ईरान में 2005 का चुनाव था और इस वजह से बातचीत पर कोई कामयाबी नहीं मिली. 2013 में जब हसन रूहानी फिर से चुने गए तो विश्व समुदाय ने परमाणु कार्यक्रम को लेकर फिर से बात शुरू की.
दशकों की शत्रुता के बीच ओबामा प्रशासन 2015 में जॉइंट कॉम्परहेंसिव प्लान ऑफ ऐक्शन पहुंचा. इसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी के तौर पर देखा गया.
इस बार अमरीका में चुनाव आया और ट्रंप ने एकतरफ़ा फ़ैसला लेते हुए इस समझौते को रद्द कर दिया. ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए.
यहां तक कि ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा कि ईरान से व्यापार जो करेगा वो अमरीका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा.
इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान पर अमरीका और यूरोप में खुलकर मतभेद सामने आए. यूरोपीय यूनियन ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को बचाने की कोशिश की लेकिन ट्रंप नहीं माने.
अब अमरीका वॉर्सोवा में मध्य-पूर्व पर एक सम्मेलन करा रहा है. वो चाहते हैं कि ईरान विरोधी गठजोड़ में इसराइल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ यूरोप भी एकमत से शामिल हो जाए. ईरान एक बार फिर से संकट में घिरा हुआ है.
पिछले 40 सालों में ईरान ने कई संकट देखे लेकिन इस बार का संकट भी कम दुखदायी नहीं है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप शत्रुतापूर्ण नीतियों से इस इलाक़े में शांति स्थापित नहीं कर सकते हैं और उन्हें ईरान को बातचीत का हिस्सा बनाना चाहिए.

35-A हटाना आसान है?

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कहा है कि 35-ए पर सुनवाई में जल्दबाजी नहीं करने का जो उसका रुख़ था उसमें कोई बदलाव नहीं आया है. जम्मू-कश्मीर प्रशासन के प्रवक्ता रोहित कंसल ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर अभी सुनवाई नहीं करे क्योंकि यहां अभी कोई चुनी हुई सरकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 35-ए के ख़िलाफ़ कई याचिकाएं दाख़िल की गई हैं. 'वी द सिटिज़न्स' नाम के एक एनजीओ ने भी एक याचिका दाख़िल की है. 35-ए से जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार मिला हुआ है. जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहां अचल संपत्ति नहीं ख़रीद सकता है. इसके साथ ही कोई बाहरी व्यक्ति यहां की महिला से शादी करता है तब भी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं हो सकता है. 1954 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आदेश से अनुच्छेद 35-ए को भारतीय संविधान में जोड़ा गया था. ऐसा कश्मीर के महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच हुए समझौते के बाद किया गया था. इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने से कश्मीरियों को यह विशेषाधिकार मिला कि बाहरी यहां नहीं बस सकते हैं.
राष्ट्रपति ने यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 370 (1) (d) के तहत दिया था. इसके तहत राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर के हित में कुछ ख़ास 'अपवादों और परिवर्तनों' को लेकर फ़ैसला ले सकते हैं. इसीलिए बाद में अनुच्छेद 35-ए जोडा गया ताकि स्थायी निवासी को लेकर भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के अनुरूप ही व्यवहार करे.
भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय में 'द इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' को क़ानूनी दस्तावेज़ माना जाता है. तीन जून, 1947 को भारत के विभाजन की घोषणा के बाद राजे-रजवाड़ों के नियंत्रण वाले राज्य निर्णय ले रहे थे कि उन्हें किसके साथ जाना है.
उस वक़्त जम्मू-कश्मीर दुविधा में था. 12 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर महाराज हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान के साथ 'स्टैंड्सस्टिल अग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किया. स्टैंड्सस्टिल अग्रीमेंट मतलब महाराजा हरि सिंह ने निर्णय किया जम्मू-कश्मीर स्वतंत्र रहेगा. वो न भारत में समाहित होगा और न ही पाकिस्तान में.
पाकिस्तान ने इस समझौते को मानने के बाद भी इसका सम्मान नहीं किया और उसने कश्मीर पर हमला कर दिया. पाकिस्तान में जबरन शामिल किए जाने से बचने के लिए महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर किया.
'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होगा लेकिन उसे ख़ास स्वायत्तता मिलेगी. इसमें साफ़ कहा गया है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए केवल रक्षा, विदेशी मामलों और संचार माध्यमों को लेकर ही नियम बना सकती है. अनुच्छेद 35-ए 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के बाद आया. यह 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' की अगली कड़ी थी. 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' के कारण भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह के हस्तक्षेप के लिए बहुत ही सीमित अधिकार मिले थे.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने द हिन्दू में लिखे एक आलेख में कहा है कि इसी कारण अनुच्छेद 370 लाया गया. अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विेशेष राज्य का दर्जा दिया गया. इसमें कहा गया है कि संसद के पास जम्मू-कश्मीर के लिए संघीय सूची और समवर्ती सूची के तहत क़ानून बनाने के सीमित अधिकार हैं.
ज़मीन, भूमि पर अधिकार और राज्य में बसने के मामले सबसे अहम हैं. भूमि जम्मू-कश्मीर का विषय है. प्रशांत भूषण का कहना है कि अनुच्छेद 35-ए भारत सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर में सशर्त हस्तक्षेप करने का एकमात्र ज़रिया है. इसके साथ ही यह भी साफ़ कहा गया है कि संसद और संविधान की सामान्य शक्तियां जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होंगी.
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी क़ानून है कि कोई बाहरी यहां सीमित ज़मीन ही ख़रीद सकता है. प्रशांत भूषण मानते हैं कि हिमाचल और उत्तराखंड के ये क़ानून पूरी तरह से असंवैधानिक और देश के किसी भी हिस्से में बसने के मौलिक अधिकार का हनन है.
प्रशांत भूषण ने अपने आलेख में कहा है कि चूंकि जम्मू-कश्मीर भारत में इसी शर्त पर आया था इसलिेए इसे मौलिक अधिकार और संविधान की बुनियादी संरचना का हवाला देकर चुनौती नहीं दी जा सकती है. उनका मानना है कि यह भारत के संविधान का हिस्सा है कि जम्मू-कश्मीर में भारत की सीमित पहुंच होगी.
प्रशांत भूषण का मानना है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में पूरी तरह से कभी विलय नहीं हुआ और यह अर्द्ध-संप्रभु स्टेट है. यह हिन्दुस्तान के बाक़ी राज्यों की तरह नहीं है. अनुच्छेद 35-ए 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' का पालन करता है और इस बात की गारंटी देता है कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता बाधित नहीं की जाएगी.
कई लोग मानते हैं कि अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जिस तरह से जोड़ा गया वो प्रक्रिया के तहत नहीं था. बीजेपी नेता और वकील भूपेंद्र यादव भी ऐसा ही मानते हैं. संविधान में अनुच्छेद 35-ए को जोड़ने के लिए संसद से क़ानून पास कर संविधान संशोधन नहीं किया गया था. संविधान के अनुच्छेद 368 (i) अनुसार संविधान संशोधन का अधिकार केवल संसद को है. तो क्या राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का यह आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर का था? भूपेंद्र यादव मानते हैं कि राष्ट्रपति का यह फ़ैसला विवादित था.
तो क्या अनुच्छेद 35-ए निरस्त किया जा सकता है क्योंकि नेहरू सरकार ने संसद के अधिकारों की उपेक्षा की थी? 1961 में पांच जजों की बेंच ने पुरानलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति मामले में अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के अधिकारों पर चर्चा की थी.
कोर्ट का आकलन था कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 के तहत उसके प्रवाधानों में परिवर्तन कर सकता है. हालांकि इस फ़ैसले में इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया है कि क्या राष्ट्रपति संसद को बाइपास कर ऐसा कर सकता है. यह सवाल अब भी बना हुआ है.

Thursday, February 21, 2019

कौन है जैश ए मोहम्मद?


अगर हम आपको ये बताएं कि संसद से पठानकोट एयरबेस और पुलवामा तक सुरक्षाबलों पर हमले का मास्टरमाइंड आतंक की पाठशाला का फेल छात्र है तो आप क्या कहेंगे?
आपको यकीन तो नहीं होगा लेकिन जैश ए मोहम्मद के जिस सरगना मौलाना मसूद अज़हर की तलाश दुनिया के कई देशों को है वो दरअसल खुद एक सफल लड़ाका बनने में असफल हो गया था. ये बात खुद उसी ने भारतीय जांच एजेंसियों को पूछताछ में कई साल पहले बताई थी. एक ऑनलाइन मीडिया पोर्टल के हाथ मसूद अज़हर से पूछताछ के कागज़ लगे हैं जिनसे खुलासा हुआ कि नाटे और मोटे अज़हर को आतंकी ट्रेनिंग में मिसफिट मानकर वापस घर भेज दिया गया था.
क्लासरूम से लेकर आतंक की ट्रेनिंग तक
10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में पैदा होनेवाले अज़हर मसूद को उसके हेडमास्टर पिता ने पढ़ाई के लिए कराची भेजा था. जामिया-उलूम-उल इस्लामिया में पढ़ते हुए उसने इस्लाम की तालीम ली. यहीं वो ऐसे छात्रों के संपर्क में आया जो आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के नेताओं से ज़बरदस्त प्रभावित थे. उन दिनों ये संगठन अमेरिका के संसाधनों के बूते अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन से टक्कर ले रहा था.
अज़हर ने ऊंचे नंबरों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की और हरकत उल मुजाहिद्दीन के सरगना मौलाना फज़लुर रहमान खलील से मुलाकात कर ‘जिहाद’ में शामिल होने की पेशकश रखी. अफगानिस्तान के युवर में अज़हर की तरबियत यानि ट्रेनिंग शुरू हो गई.
मसूद अज़हर का जोशोखरोश जल्द ही ठंडा पड़ने लगा. ट्रेनिंग कैंप में कई तरह के हथियारों की ट्रेनिंग कराई जा रही थी. इसके अलावा भागना-दौड़ना, छिपना और रेंगकर चलना भी अभ्यास में शामिल था. 5 फीट 3 इंच के अज़हर के लिए अच्छे खासे वज़न के साथ पानी से भरे ट्रेंच को पार करना मुश्किल हो गया. बंदूक से निशाना लगाना तो और भी ज़्यादा कठिन रहा. साथ में ट्रेनिंग वालों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे बने कि चालीस दिन की ज़रूरी ट्रेनिंग को बीच में ही छोड़कर उसने जिहादी बनने का इरादा त्याग दिया. ट्रेनर ने उसे वापस कराची भेज दिया. हताश परेशान अज़हर ने टीचर बनने में ही अपनी भलाई समझी.

मज़हब की अपनी जानकारी को मसूद अज़हर ने आतंकी गढ़ने में लगा दिया. उसने ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ नाम की पत्रिका निकाली. अफगानिस्तान में लड़ रहे ‘हरकत-उल-मुजाहिद्दीन’ पर पत्रिका में खूब लिखा गया. शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्रिका मुफ्त बंटती. पत्रिका के ज़रिए मसूद अज़हर ने मशहूर होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया. वो लोगों की नज़रों में चढ़ने लगा. हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के सरगना को भी उसमें हुनर दिखा. जल्द ही उसे एक अलग विभाग का मुखिया बना दिया गया जिसका काम पाकिस्तानी लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों का प्रचार करना तो था ही, साथ में नए लड़कों को संगठन की ओर आकर्षित करना भी था. इस काम को तब और तेज़ी मिली जब अज़हर की ज़हरीली भाषण कला का हुनर बिखरा.

साल 1992 तक मसूद अज़हर पत्रकार के तौर पर जाना जाता था. उसका मुख्य काम ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ का प्रकाशन और अफगानिस्तान में लड़ रहे साथियों के लिए चंदा इकट्ठा करना था. कामकाज से खुश संगठन के मुखिया खलील ने मसूद अज़हर को विदेशी दौरे करने को कहा. तुरंत उसने सऊदी अरब का दौरा किया और चंद ही दिनों में तीन लाख रुपए की रकम इकट्ठा कर ली. अफ्रीका के ज़ाम्बिया में भी उसका दौरा हुआ. ब्रिटेन में उसने बर्मिंघम, नॉटिंघम, लीसेस्टर और लंदन से चंदा उगाहने की कोशिशें कीं. उसकी कोशिशों ने आतंकी जमात में उसका कद बढ़ा दिया. सरगना खलील को समझ आ चुका था कि मसूद अज़हर कोई आम लड़का नहीं है बल्कि ठीक से इस्तेमाल करने पर बड़े काम कर सकता है.
अफगानिस्तान के मोर्चे पर आतंक को फंड करने में मसूद अज़हर का बड़ा योगदान रहा. अमेरिका- तालिबान की जुगलबंदी और अपने चरमराते ढांचे की वजह से सोवियत यूनियन की फौज को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा. देश में तालिबान का शासन स्थापित हो चुका था.
अफगानिस्तान में झगड़ा खत्म हुआ तो मसूद अज़हर को पाकिस्तानी कब्ज़ेवाले कश्मीर पहुंचने का फरमान जारी हुआ. उसे हरकत-उल-मुजाहिद्दीन और हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) को मिलाकर एक करने का आदेश मिला. 
उधर बाबरी विध्वंस के बाद भारत में भी तनाव था. पाकिस्तान की आईएसआई और आतंक के आकाओं को समझ आ चुका था कि भारत में चौड़ी होती सांप्रदायिक खाई के बीच फलने-फूलने का यही सही मौका है. मसूद अज़हर को सज्जाद अफगानी नाम के आतंकी से मिलने को कहा गया. अफगानी ने अफगानिस्तान में खूब नाम कमाया था. बाबरी घटना के एक महीने बाद ही दोनों की मुलाकात हुई. तय हुआ कि अज़हर भारतीय कश्मीर में जाकर काम शुरू करे. 1994 में अज़हर नकली नाम (अदम ईसा) से पुर्तगाली पासपोर्ट पर ढाका पहुंचा और वहां से दिल्ली आया. अपने वज़न के चलते अज़हर बाकी आतंकियों की तरह चुपके से एलओसी पार करके भारत में दाखिल नहीं हो सकता था इसलिए नकली पहचान के साथ वो हवाई जहाज, बस और ट्रेन में ही सफर कर रहा था.
दिल्ली में वो अशोका होटल ठहरा. जम्मू जाने से पहले वो लखनऊ और अयोध्या जाना चाहता था. उसने बाबरी तक जाने की बात खुद ही मानी. मसूद अज़हर कहता है कि उसे वो दिन आज भी याद है जब बाबरी के सामने खड़े होकर उसने गुस्से में ज़मीन को कई ठोकरें मारीं. उसने खुद से कहा, ‘ ओ बाबरी मस्जिद, हमें माफ करना. तुम हमारे सुनहरे इतिहास का हिस्सा रही और अब हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक उसी इतिहास को दोहरा नहीं लेंगे.’
श्रीनगर पहुंचकर मसूद अज़हर ने अपना काम ज़ोर शोर से शुरू कर दिया. उसकी पहली बैठक श्रीनगर से सत्तर किलोमीटर दूर अनंतनाग में हुई जहां उसे बंदूकधारी पच्चीस लोगों ने ध्यान से सुना. इसके बाद अगले दो दिन उसने घाटी में जमकर भाषण दिए. शुक्रवार को जामा मस्जिद में उसकी तकरीर का दिन तय हुआ. मसूद अज़हर की बदकिस्मती और भारतीय सुरक्षाबलों की खुशकिस्मती से रास्ते में ही उसकी कार खराब हो गई. इससे पहले कि वो ऑटोरिक्शा पकड़कर बच निकलता, अपने साथी संग धरा गया. 
एक वेब पोर्टल में छपे लेख में खुफिया ब्यूरो के पूर्व अधिकारी अविनाश मोहनानी ने मसूद अज़हर को लेकर दिलचस्प खुलासे किए हैं. मोहनानी ने मसूद अज़हर से पूछताछ में हिस्सा भी लिया था. वो लिखते हैं कि सुरक्षाबलों की पूछताछ में मसूद अज़हर जल्दी टूट गया और सज्जाद अफगानी की सच्चाई भी उजागर कर डाली जिसकी वजह से दोनों के बीच गहरी नाराज़गी हो गई.
इस सबके बीच अज़हर के लिए जो सबसे अच्छी बात थी वो ये कि उस वक्त तक भारतीय एजेंसियों को अंदाज़ा नहीं था कि उनके हाथ कितनी बड़ी चिड़िया लगी है. तब यही माना गया कि रास्ते से भटका एक नौजवान आतंकी हाथ लगा है. 
मोहनानी बताते हैं कि अज़हर ने उनसे पूछताछ के दौरान मारपीट की शिकायत की थी । उसने कहा था कि उसे कभी उसके पिता ने थप्पड़ नहीं मारा, जबकि पूछताछ के दौरान सवाल पूछे बगैर ही सेना के जवान ने उसे तमाचा जड़ दिया था।
गिरफ्तारी में आए मसूद अज़हर से एजेंसियों ने लंबी पूछताछ की. शातिर मसूद अज़हर ने खुद को एक ऐसा पत्रकार दिखाया जिसका सिर्फ रुझान आतंकवाद की तरफ था. अलग-अलग अफसरों ने उससे सवाल-जवाब किए मगर उसने अपनी गहराई किसी को नापने नहीं दी. उसकी चालाकी इसी से समझिए कि कश्मीर की काउंटर इंटेलिजेंस विंग के अफसर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि, ‘मसूद अज़हर खुद कश्मीर में होनेवाले हिंसक गतिविधियों में शामिल नहीं है.’
उधर मसूद अज़हर के गिरफ्त में आते ही सीमापार हंगामा मच गया. कुछ ही महीनों बाद जून 1994 में हरकत उल अंसार ने दो ब्रिटिश नागरिकों को पहलगाम के पास अगवा कर लिया. संगठन ने उनकी रिहाई के बदले मसूद अज़हर की रिहाई मांगी लेकिन असफल रहे. 
एक बार फिर मसूद अज़हर को छुड़ाने की कोशिशें शुरू हुईं. इस बार लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में पढ़े ओमर शेख को भारत भेजा गया. शेख का जन्म और पढ़ाई इंग्लैंड में हुए थे ऐसे में उस पर किसी का शक होना मुश्किल था. उसे निर्देश दिया गया कि भारत जाकर विदेशी नागरिकों को अगवा करे और बदले में अज़हर को छुड़ा लाए.  उसने भारत आकर एक अमेरिकी और तीन ब्रिटिश पर्यटकों से दोस्ती गांठी और उन्हें धोखे से बाहरी दिल्ली के एक घर में बंधक बना लिया. पुलिस की मुस्तैदी से उसका प्लान फेल हो गया. बाद में यही ओमर शेख पाकिस्तान में वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की बहुचर्चित हत्या में भी शामिल रहा और फिलहाल पाकिस्तानी जेल में है.
साल 1995 में हरकत-उल-अंसार नाम के आतंकी संगठन के एक फ्रंट अल फरान ने फिर से पांच विदेशियों को पकड़ लिया. उनकी मांग में भी मसूद अज़हर की रिहाई टॉप पर थी. हालांकि पूर्व खुफिया अधिकारी मोहनने बताते हैं कि मसूद अज़हर अल फरान से इस बात पर बेहद नाराज़ था कि उसकी रिहाई के साथ अल फरान ने हूजी के चीफ कमांडर मंज़ूर लंगरयार की रिहाई भी मांगी है. अज़हर का मानना था कि ऐसा करके अपहरणकर्ताओं ने उसका कद लंगरयार के बराबर कर दिया जबकि वो लंगरयार को खुद से बहुत छोटा समझता था.
अब भारतीय एजेंसियों को अंदाज़ा होने लगा कि उनके हाथ जो लगा है वो कोई आम आतंकी नहीं है. अब तक पाकिस्तानी उच्चायोग भी अज़हर को पत्रकार होने के आधार पर छुड़ाने में जुट गया था. 
जून 1999 में मसूद अज़हर के साथी सज्जाद अफगानी ने कई दूसरे आतंकियों के साथ मिलकर जम्मू जेल में सुरंग खोद डाली. मसूद अज़हर भी सुरंग में घुसा लेकिन छह फीट अंदर जाने के बाद उसे अहसास हो गया कि मोटापे के चलते वो और भीतर घुस नहीं सकेगा. वो निराश होकर लौट आया. इस बीच दूसरे आतंकियों के साथ भाग निकलने की कोशिश में अफगानी को गोली लग गई और वो मारा गया.
अफगानी की मौत का समाचार पाकिस्तानी एजेंसियों के लिए बुरी खबर के साथ-साथ खतरे की घंटी भी था. उन्हें लगा कि अगर अफगानी मारा जा सकता है तो नंबर मसूद अज़हर का भी लग सकता है.
इसके बाद अज़हर के साथियों ने और गंभीरता से उसे छुड़ाने की साज़िशें रचनी शुरू कर दीं. इसी साज़िश का हिस्सा था इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 का अपहरण. काठमांडू से उड़ा ये जहाज दिल्ली पहुंचनेवाला था, लेकिन सफर के बीच में हरकत- उल-मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने उस पर कब्ज़ा जमा लिया. अमृतसर, लाहौर और दुबई से होते हुए आखिरकार हवाई जहाज अफगानिस्तान के कंधार में उतरा जहां आतंकियों के पुराने साथी तालिबान की हुकूमत थी. 
सात दिनों तक बंधक कांड चलता रहा. अपहरणकर्ताओं ने मौलाना मसूद अज़हर, मुश्ताक अहमद ज़रगर और ओमर शेख की रिहाई मांगी. आखिरकार वाजपेयी सरकार झुकी और तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह और इंटेलीजेंस ब्यूरो चीफ अजीत डोभाल तीनों आतंकियों को लेकर कंधार पहुंचे.
रिहाई के बाद मसूद अज़हर और ओमर शेख तालिबान कमांडर मुल्ला उमर से मुलाकात करने पहुंचे. अल कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन भी वहां मौजूद था. सभी ने रिहाई का जश्न मनाया. हफ्ते भर बाद अज़हर पाकिस्तान में दाखिल हुआ. रिहाई के ठीक महीने भर बाद मसूद अज़हर ने जैश-ए-मोहम्मद के गठन का एलान किया. उसने इस मौके पर दस हजार हथियारबंद अनुयायियों को कराची की मस्जिद में संबोधित किया.
मौलाना मसूद अज़हर ने संगठन के लिए फंड इकट्ठा करने की भूमिका चुनी, ज़रगर ने कश्मीरी युवकों को भर्ती करने का काम संभाला और ओमर शेख को हथियारों की ट्रेनिंग का ज़िम्मा सौंपा गया.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व अधिकारी अविनाश मोहनानी ने अज़हर से लंबी पूछताछ की थी। वो बताते हैं कि मसूद अज़हर अपने संगठन से इस बात को लेकर बेहद नाराज़ था कि उसे कश्मीर के बारे में गलत जानकारियां मुहैया कराई गईं. पहली बार कश्मीर जाने से पहले उसे बताया गया था कि घाटी में हालात अफगानिस्तान जैसे हैं जहां तालिबान ने एक अच्छे खासे इलाके को अपने कब्ज़े में ले रखा था. अज़हर ने कहा कि कश्मीर से पाकिस्तान लौटनेवाले आतंकियों ने उसे जैसी रिपोर्ट दी वो उस पर भरोसा करके कश्मीर पहुंचा लेकिन उसने पाया कि आतंकी तो वहां सुरक्षाबलों से जान बचाते फिर रहे थे. वो अपनी गिरफ्तारी की बड़ी वजह उन गलत इनपुट्स को भी मानता था जिन्हें सच जानकर वो बड़े ही आराम से कश्मीर पहुंचा था.

अगर हम आपको ये बताएं कि संसद से पठानकोट एयरबेस और पुलवामा तक सुरक्षाबलों पर हमले का मास्टरमाइंड आतंक की पाठशाला का फेल छात्र है तो आप क्या कहेंगे?
आपको यकीन तो नहीं होगा लेकिन जैश ए मोहम्मद के जिस सरगना मौलाना मसूद अज़हर की तलाश दुनिया के कई देशों को है वो दरअसल खुद एक सफल लड़ाका बनने में असफल हो गया था. ये बात खुद उसी ने भारतीय जांच एजेंसियों को पूछताछ में कई साल पहले बताई थी. एक ऑनलाइन मीडिया पोर्टल के हाथ मसूद अज़हर से पूछताछ के कागज़ लगे हैं जिनसे खुलासा हुआ कि नाटे और मोटे अज़हर को आतंकी ट्रेनिंग में मिसफिट मानकर वापस घर भेज दिया गया था.
10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में पैदा होनेवाले अज़हर मसूद को उसके हेडमास्टर पिता ने पढ़ाई के लिए कराची भेजा था. जामिया-उलूम-उल इस्लामिया में पढ़ते हुए उसने इस्लाम की तालीम ली. यहीं वो ऐसे छात्रों के संपर्क में आया जो आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के नेताओं से ज़बरदस्त प्रभावित थे. उन दिनों ये संगठन अमेरिका के संसाधनों के बूते अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन से टक्कर ले रहा था. 
अज़हर ने ऊंचे नंबरों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की और हरकत उल मुजाहिद्दीन के सरगना मौलाना फज़लुर रहमान खलील से मुलाकात कर ‘जिहाद’ में शामिल होने की पेशकश रखी. अफगानिस्तान के युवर में अज़हर की तरबियत यानि ट्रेनिंग शुरू हो गई.

मसूद अज़हर का जोशोखरोश जल्द ही ठंडा पड़ने लगा. ट्रेनिंग कैंप में कई तरह के हथियारों की ट्रेनिंग कराई जा रही थी. इसके अलावा भागना-दौड़ना, छिपना और रेंगकर चलना भी अभ्यास में शामिल था. 5 फीट 3 इंच के अज़हर के लिए अच्छे खासे वज़न के साथ पानी से भरे ट्रेंच को पार करना मुश्किल हो गया. बंदूक से निशाना लगाना तो और भी ज़्यादा कठिन रहा. साथ में ट्रेनिंग वालों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे बने कि चालीस दिन की ज़रूरी ट्रेनिंग को बीच में ही छोड़कर उसने जिहादी बनने का इरादा त्याग दिया. ट्रेनर ने उसे वापस कराची भेज दिया. हताश परेशान अज़हर ने टीचर बनने में ही अपनी भलाई समझी.

मज़हब की अपनी जानकारी को मसूद अज़हर ने आतंकी गढ़ने में लगा दिया. उसने ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ नाम की पत्रिका निकाली. अफगानिस्तान में लड़ रहे ‘हरकत-उल-मुजाहिद्दीन’ पर पत्रिका में खूब लिखा गया. शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्रिका मुफ्त बंटती. पत्रिका के ज़रिए मसूद अज़हर ने मशहूर होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया. वो लोगों की नज़रों में चढ़ने लगा. हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के सरगना को भी उसमें हुनर दिखा. जल्द ही उसे एक अलग विभाग का मुखिया बना दिया गया जिसका काम पाकिस्तानी लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों का प्रचार करना तो था ही, साथ में नए लड़कों को संगठन की ओर आकर्षित करना भी था. इस काम को तब और तेज़ी मिली जब अज़हर की ज़हरीली भाषण कला का हुनर बिखरा.
साल 1992 तक मसूद अज़हर पत्रकार के तौर पर जाना जाता था. उसका मुख्य काम ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ का प्रकाशन और अफगानिस्तान में लड़ रहे साथियों के लिए चंदा इकट्ठा करना था. कामकाज से खुश संगठन के मुखिया खलील ने मसूद अज़हर को विदेशी दौरे करने को कहा. तुरंत उसने सऊदी अरब का दौरा किया और चंद ही दिनों में तीन लाख रुपए की रकम इकट्ठा कर ली. अफ्रीका के ज़ाम्बिया में भी उसका दौरा हुआ. ब्रिटेन में उसने बर्मिंघम, नॉटिंघम, लीसेस्टर और लंदन से चंदा उगाहने की कोशिशें कीं. उसकी कोशिशों ने आतंकी जमात में उसका कद बढ़ा दिया. सरगना खलील को समझ आ चुका था कि मसूद अज़हर कोई आम लड़का नहीं है बल्कि ठीक से इस्तेमाल करने पर बड़े काम कर सकता है.

सउदी के प्रिंस भारत में

क्या आपको पता है कि मोदी जी जिस शख़्स से एयरपोर्ट पर इतनी गर्मजोशी से गले मिले वो है कौन?
ये साहब मुहम्मद बिन सलमान हैं। इन्हें दुनिया MBS के नाम से जानती है। सऊदी अरब के शासक हैं। इनका देश वहाबी इस्लाम को मानता है और उसे पूरी दुनिया में फैलाने के लिए इन्होंने अरबों डॉलर ख़र्च किए हैं। मेरे ख़याल से वहाबी इस्लाम सबसे वाह्यात रूप है इस्लाम का। सबसे कंज़रवेटिव। सबसे ख़तरनाक।
इनके पैसे से पाकिस्तान में चलने वाले सैकड़ों मदरसों की फ़ंडिंग होती है और उन मदरसों में से अधिकतर हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ जेहादी तैयार करते हैं। ये बात सब जानते हैं।
ये शख़्स पत्रकार जमाल खशोगी का हत्यारा है। इसी के इशारे पर इस्तांबुल के सऊदी दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी को मारकर उनके शरीर को एसिड में गलाकर नाले में बहा दिया गया था। खशोगी की हत्या में इस आदमी मे कैसी बर्बरता की थी ये गूगल पर सर्च कर लीजिए। रूह न काँप जाए तो कहिएगा। पिछले साल दो अक्टूबर को हुआ था ये। बापू के जन्मदिन के दिन। इस वजह से पूरा अमेरिका पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सऊदी अरब पर चढ़ बैठा था। सीआइए की रिपोर्ट भी यही कहती है कि पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या सीधे-सीधे MBS के कहने पर की गयी थी।
और अगर आपको अब भी सब ठीक लग रहा हो तो दो-चार बातें बता दूँ। ये शख़्स पाकिस्तान के इतने प्रिय हैं कि इनको रिसीव करने इमरान खान और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष क़मर जावेद बाजवा एयरपोर्ट गए थे। इमरान खान खुद ड्राइव करके उनको पीएम हाउस ले गए थे।
दो दिन पहले पाकिस्तान में दिया गया इनका बयान सुन लीजिए। पाकिस्तान को बीस बिलियन डॉलर की मदद देने वाले इस शख़्स ने पुलवामा हमले की साज़िश रचने वाले मौलाना मसूद अज़हर के संदर्भ में कहा था कि यूएन में आतंकवादियों की लिस्टिंग को लेकर राजनीति हो रही है। मतलब ये कि भारत मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी बताने के मामले में राजनीति कर रहा है। आज के माहौल में मेरे देश के मुँह पर ऐसा तमाचा किसी ने नहीं मारा।
इन्होंने ये भी कहा था कि जिस खुलेपन से इमरान खान भारत के साथ बातचीत करने की कोशिश कर रहे हैं वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।
मोदीजी के समर्थकों , अगली बार मुसलमानों को गाली देने से पहले दस बार ये फोटो देखना। मोदी के साथ गले मिलने वाला ये शख़्स जिस देश का मुखिया है उससे कट्टर इस्लाम कहीं फ़ॉलो नहीं होता।
दोनों तस्वीरों मे दो दिन का फर्क है बस।

Friday, February 8, 2019

जिन राज्यो में बीजेपी की मुश्किल

यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लोकसभा की 145 सीटें हैं। ये वो बड़े राज्य हैं जहां बीजेपी अपने बूते पर चुनाव मैदान में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का माद्दा रखती है। पिछले चुनाव में इन राज्यों से बीजेपी ने अपने खाते में 133 सीटें हासिल की थीं। सहयोगी दलों को लेकर यह संख्या 135 थी। अगर महाराष्ट्र और बिहार को भी जोड़ लें, जहां बीजपी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर शानदार प्रदर्शन किया था, तो इन 6 राज्यों की कुल 238 सीटों में से बीजेपी के पास 178 और सहयोगी दलों के साथ मिलकर 205 सीटें हैं। सवाल यही है कि इन छह राज्यों में क्या बीजेपी अपने बूते या फिर सहयोगी दलों के दम पर यह चमत्कारिक प्रदर्शन दोहरा पाएगी? अगर नहीं, तो सत्ता में वापसी का मार्ग मिलना मुश्किल ही नहीं, असम्भव लगता है।
1- उत्तर प्रदेश:  देश का सबसे बड़ा सूबा है। यहां बीजेपी को 80 में से 71 सीटें और उसके सहयोगी दलों को 2 यानी एनडीए को 73 सीटें मिली थीं। यूपी देश में महाराष्ट्र के बाद दूसरा ऐसा राज्य है जहां चतुष्कोणीय मुकाबला होता है। बीजेपी के लिए फर्क ये है कि महाराष्ट्र में उसके साथ सहयोगी शिवसेना रही है, जबकि यूपी में उसे अपना दल सरीखे बहुत छोटी एक-दुक्का पार्टियों को छोड़ दें तो अकेले ही चुनाव लड़ना पड़ता है। बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश में 42.63 प्रतिशत वोट मिले थे।
एसपी, बीएसपी और कांग्रेस के मुकाबले यह फर्क इतना बड़ा था कि बीजेपी की एकतरफा और जबरदस्त जीत हुई थी। मगर, 2019 में एसपी और बीएसपी मिलकर चुनाव लड़ने वाले हैं। उस स्थिति में अगर एसपी को मिले 22.35 प्रतिशत और बीएसपी को मिले 19.77 प्रतिशत वोटों को जोड़कर देखें तो यह 41.12 प्रतिशत हो जाता है। हालांकि तब भी डेढ फीसदी वोट से बीजेपी आगे रहती है। मगर, सीटों के हिसाब से इससे बीजेपी के प्रदर्शन में जबरदस्त गिरावट आना तय है। एसपी और बीएसपी के साथ आने के बाद का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि बीजेपी गोरखपुर और फूलपुर जैसी सीटें भी हार जाती हैं जहां बीजपी को 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। अगर कांग्रेस के साथ भी एसपी-बीएसपी का तालमेल हो जाता है तो उनके वोटों में 7.53 प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो जाएगी। इसका मतलब ये होगा कि एसपी-बीएसपी-कांग्रेस के पास 48.68 फीसदी वोट होंगे।
हालांकि कहा जाता है कि राजनीति में 2+2 हमेशा 4 नहीं हुआ करते। मगर, यह बात भी उतनी ही सही है कि राजनीति में हमेशा 2+2 जुड़कर 3 भी नहीं होते। यह 6 भी हो सकता है। ये नतीजे पूरी तरह से जनता की सोच पर निर्भर करता है कि वह गठबंधन को किस नजरिए से देखती है।
चूकि बीजेपी के पास 80 में से 71 सीटे हैं इसलिए विरोधी दलों के एकजुट होने का असर उस पर पड़ेगा। मगर, क्या यह बीजेपी के ख़िलाफ़ रिवर्स स्वीप होगा, यही बड़ा सवाल है। अगर बीजेपी यूपी में विरोधी गठबंधन के सामने धराशायी होती है तो टैली इतनी बड़ी है कि बीजेपी अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति तो छोड़िए, सहयोगी दलों के साथ मिलकर भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रह पाएगी।
2- बिहार:  बीजेपी के लिए सकारात्मक सिर्फ बिहार में हुआ है जहां विगत चुनाव में 16 फीसदी वोट लाने वाली जेडीयू अब एनडीआ का हिस्सा है। हालांकि 3 लोकसभा सीटें हासिल करने वाली आरएलएसपी उससे छिटक भी चुकी है। फिर भी, बीजेपी फायदे में है। हालांकि विगत चुनाव के मुकाबले विरोधी भी महागठबंधन बनाकर सामने हैं। बिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधे मुकाबले की स्थिति बनने पर कांटे की टक्कर होगी, फिर भी एनडीए के लिए 40 में से 31 सीटें निकालने का करिश्मा कर पाना मुश्किल लगता है। सीटें घटेंगी, ये तय है।
3- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को लें, तो यहां बीजेपी के पास 65 लोकसभा सीटों में से 62 सीटें हैं। यानी 2019 में इन प्रदेशों में भी बीजेपी को पाने के लिए कुछ भी नहीं है और खोने के लिए तो सारी दुनिया है। विधानसभा चुनावों में बीजेपी तीनों राज्य गंवा चुकी है। हालांकि बीजेपी के लिए संतोष की बात यही है कि मध्यप्रदेश में उसके वोट कांग्रेस से मामूली रूप से ज्यादा हैं। मगर, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी के वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है।
बीजेपी के लिए चाहे जितना सकारात्मक सोच लिया जाए और यह मान लिया जाए कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव का स्वभाव अलग-अलग होता है, फिर भी इन राज्यों में बीजेपी को लोकसभा चुनाव वाला प्रदर्शन बरकरार रखने के लिए नाकों चने चबाने होंगे।
4- महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना जिस तरह से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आक्रामक रहे हैं, उसे देखते हुए तालमेल होना ही मुश्किल लगता है। शिवसेना महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका मान रही है और यह भूमिका उसे मिलने से रही। अगर ये तालमेल नहीं हुआ, तब तो बीजेपी को 23 और शिवसेना को 18 सीटें दोबारा मिल पाने की बात महज कल्पना ही होगी। तालमेल होता भी है, तो यह देखना जरूरी होगा कि कांग्रेस और एनसीपी के बीच किस हद तक तालमेल हो पाता है। अब तक की ख़बरों के अनुसार इन दोनों दलों के बीच 20-20 सीटों पर सहमति बन चुकी है। महज 8 सीटों पर तनातनी बरकरार है।
जिस तरह से महाराष्ट्र में यूपीए एकजुट है और एनडीए में गलतफहमी बरकरार है उसे देखते हुए ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि एनडीए के लिए अपना वर्तमान प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा। राज्य और केंद्र सरकार के लिए एंटी इनकम्बेन्सी का सामना भी अलग से करना होगा।
जिन 6 राज्यों ने बीजेपी और एनडीए को सत्ता में पहुंचाया था, वहां वह अपनी वर्तमान स्थिति को बचाती हुई नहीं दिख रही है। सीटों की संख्या इतनी बड़ी है कि इसकी भरपाई कहीं और से होना नामुमकिन है। ऐसे में सिर्फ इन छह राज्यों में सम्भावनाओं के आधार पर ही ये कहा जा सकता है कि 2019 में बीजेपी के लिए डगर मुश्किल है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...