Thursday, February 21, 2019

कौन है जैश ए मोहम्मद?


अगर हम आपको ये बताएं कि संसद से पठानकोट एयरबेस और पुलवामा तक सुरक्षाबलों पर हमले का मास्टरमाइंड आतंक की पाठशाला का फेल छात्र है तो आप क्या कहेंगे?
आपको यकीन तो नहीं होगा लेकिन जैश ए मोहम्मद के जिस सरगना मौलाना मसूद अज़हर की तलाश दुनिया के कई देशों को है वो दरअसल खुद एक सफल लड़ाका बनने में असफल हो गया था. ये बात खुद उसी ने भारतीय जांच एजेंसियों को पूछताछ में कई साल पहले बताई थी. एक ऑनलाइन मीडिया पोर्टल के हाथ मसूद अज़हर से पूछताछ के कागज़ लगे हैं जिनसे खुलासा हुआ कि नाटे और मोटे अज़हर को आतंकी ट्रेनिंग में मिसफिट मानकर वापस घर भेज दिया गया था.
क्लासरूम से लेकर आतंक की ट्रेनिंग तक
10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में पैदा होनेवाले अज़हर मसूद को उसके हेडमास्टर पिता ने पढ़ाई के लिए कराची भेजा था. जामिया-उलूम-उल इस्लामिया में पढ़ते हुए उसने इस्लाम की तालीम ली. यहीं वो ऐसे छात्रों के संपर्क में आया जो आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के नेताओं से ज़बरदस्त प्रभावित थे. उन दिनों ये संगठन अमेरिका के संसाधनों के बूते अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन से टक्कर ले रहा था.
अज़हर ने ऊंचे नंबरों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की और हरकत उल मुजाहिद्दीन के सरगना मौलाना फज़लुर रहमान खलील से मुलाकात कर ‘जिहाद’ में शामिल होने की पेशकश रखी. अफगानिस्तान के युवर में अज़हर की तरबियत यानि ट्रेनिंग शुरू हो गई.
मसूद अज़हर का जोशोखरोश जल्द ही ठंडा पड़ने लगा. ट्रेनिंग कैंप में कई तरह के हथियारों की ट्रेनिंग कराई जा रही थी. इसके अलावा भागना-दौड़ना, छिपना और रेंगकर चलना भी अभ्यास में शामिल था. 5 फीट 3 इंच के अज़हर के लिए अच्छे खासे वज़न के साथ पानी से भरे ट्रेंच को पार करना मुश्किल हो गया. बंदूक से निशाना लगाना तो और भी ज़्यादा कठिन रहा. साथ में ट्रेनिंग वालों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे बने कि चालीस दिन की ज़रूरी ट्रेनिंग को बीच में ही छोड़कर उसने जिहादी बनने का इरादा त्याग दिया. ट्रेनर ने उसे वापस कराची भेज दिया. हताश परेशान अज़हर ने टीचर बनने में ही अपनी भलाई समझी.

मज़हब की अपनी जानकारी को मसूद अज़हर ने आतंकी गढ़ने में लगा दिया. उसने ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ नाम की पत्रिका निकाली. अफगानिस्तान में लड़ रहे ‘हरकत-उल-मुजाहिद्दीन’ पर पत्रिका में खूब लिखा गया. शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्रिका मुफ्त बंटती. पत्रिका के ज़रिए मसूद अज़हर ने मशहूर होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया. वो लोगों की नज़रों में चढ़ने लगा. हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के सरगना को भी उसमें हुनर दिखा. जल्द ही उसे एक अलग विभाग का मुखिया बना दिया गया जिसका काम पाकिस्तानी लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों का प्रचार करना तो था ही, साथ में नए लड़कों को संगठन की ओर आकर्षित करना भी था. इस काम को तब और तेज़ी मिली जब अज़हर की ज़हरीली भाषण कला का हुनर बिखरा.

साल 1992 तक मसूद अज़हर पत्रकार के तौर पर जाना जाता था. उसका मुख्य काम ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ का प्रकाशन और अफगानिस्तान में लड़ रहे साथियों के लिए चंदा इकट्ठा करना था. कामकाज से खुश संगठन के मुखिया खलील ने मसूद अज़हर को विदेशी दौरे करने को कहा. तुरंत उसने सऊदी अरब का दौरा किया और चंद ही दिनों में तीन लाख रुपए की रकम इकट्ठा कर ली. अफ्रीका के ज़ाम्बिया में भी उसका दौरा हुआ. ब्रिटेन में उसने बर्मिंघम, नॉटिंघम, लीसेस्टर और लंदन से चंदा उगाहने की कोशिशें कीं. उसकी कोशिशों ने आतंकी जमात में उसका कद बढ़ा दिया. सरगना खलील को समझ आ चुका था कि मसूद अज़हर कोई आम लड़का नहीं है बल्कि ठीक से इस्तेमाल करने पर बड़े काम कर सकता है.
अफगानिस्तान के मोर्चे पर आतंक को फंड करने में मसूद अज़हर का बड़ा योगदान रहा. अमेरिका- तालिबान की जुगलबंदी और अपने चरमराते ढांचे की वजह से सोवियत यूनियन की फौज को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा. देश में तालिबान का शासन स्थापित हो चुका था.
अफगानिस्तान में झगड़ा खत्म हुआ तो मसूद अज़हर को पाकिस्तानी कब्ज़ेवाले कश्मीर पहुंचने का फरमान जारी हुआ. उसे हरकत-उल-मुजाहिद्दीन और हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) को मिलाकर एक करने का आदेश मिला. 
उधर बाबरी विध्वंस के बाद भारत में भी तनाव था. पाकिस्तान की आईएसआई और आतंक के आकाओं को समझ आ चुका था कि भारत में चौड़ी होती सांप्रदायिक खाई के बीच फलने-फूलने का यही सही मौका है. मसूद अज़हर को सज्जाद अफगानी नाम के आतंकी से मिलने को कहा गया. अफगानी ने अफगानिस्तान में खूब नाम कमाया था. बाबरी घटना के एक महीने बाद ही दोनों की मुलाकात हुई. तय हुआ कि अज़हर भारतीय कश्मीर में जाकर काम शुरू करे. 1994 में अज़हर नकली नाम (अदम ईसा) से पुर्तगाली पासपोर्ट पर ढाका पहुंचा और वहां से दिल्ली आया. अपने वज़न के चलते अज़हर बाकी आतंकियों की तरह चुपके से एलओसी पार करके भारत में दाखिल नहीं हो सकता था इसलिए नकली पहचान के साथ वो हवाई जहाज, बस और ट्रेन में ही सफर कर रहा था.
दिल्ली में वो अशोका होटल ठहरा. जम्मू जाने से पहले वो लखनऊ और अयोध्या जाना चाहता था. उसने बाबरी तक जाने की बात खुद ही मानी. मसूद अज़हर कहता है कि उसे वो दिन आज भी याद है जब बाबरी के सामने खड़े होकर उसने गुस्से में ज़मीन को कई ठोकरें मारीं. उसने खुद से कहा, ‘ ओ बाबरी मस्जिद, हमें माफ करना. तुम हमारे सुनहरे इतिहास का हिस्सा रही और अब हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक उसी इतिहास को दोहरा नहीं लेंगे.’
श्रीनगर पहुंचकर मसूद अज़हर ने अपना काम ज़ोर शोर से शुरू कर दिया. उसकी पहली बैठक श्रीनगर से सत्तर किलोमीटर दूर अनंतनाग में हुई जहां उसे बंदूकधारी पच्चीस लोगों ने ध्यान से सुना. इसके बाद अगले दो दिन उसने घाटी में जमकर भाषण दिए. शुक्रवार को जामा मस्जिद में उसकी तकरीर का दिन तय हुआ. मसूद अज़हर की बदकिस्मती और भारतीय सुरक्षाबलों की खुशकिस्मती से रास्ते में ही उसकी कार खराब हो गई. इससे पहले कि वो ऑटोरिक्शा पकड़कर बच निकलता, अपने साथी संग धरा गया. 
एक वेब पोर्टल में छपे लेख में खुफिया ब्यूरो के पूर्व अधिकारी अविनाश मोहनानी ने मसूद अज़हर को लेकर दिलचस्प खुलासे किए हैं. मोहनानी ने मसूद अज़हर से पूछताछ में हिस्सा भी लिया था. वो लिखते हैं कि सुरक्षाबलों की पूछताछ में मसूद अज़हर जल्दी टूट गया और सज्जाद अफगानी की सच्चाई भी उजागर कर डाली जिसकी वजह से दोनों के बीच गहरी नाराज़गी हो गई.
इस सबके बीच अज़हर के लिए जो सबसे अच्छी बात थी वो ये कि उस वक्त तक भारतीय एजेंसियों को अंदाज़ा नहीं था कि उनके हाथ कितनी बड़ी चिड़िया लगी है. तब यही माना गया कि रास्ते से भटका एक नौजवान आतंकी हाथ लगा है. 
मोहनानी बताते हैं कि अज़हर ने उनसे पूछताछ के दौरान मारपीट की शिकायत की थी । उसने कहा था कि उसे कभी उसके पिता ने थप्पड़ नहीं मारा, जबकि पूछताछ के दौरान सवाल पूछे बगैर ही सेना के जवान ने उसे तमाचा जड़ दिया था।
गिरफ्तारी में आए मसूद अज़हर से एजेंसियों ने लंबी पूछताछ की. शातिर मसूद अज़हर ने खुद को एक ऐसा पत्रकार दिखाया जिसका सिर्फ रुझान आतंकवाद की तरफ था. अलग-अलग अफसरों ने उससे सवाल-जवाब किए मगर उसने अपनी गहराई किसी को नापने नहीं दी. उसकी चालाकी इसी से समझिए कि कश्मीर की काउंटर इंटेलिजेंस विंग के अफसर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि, ‘मसूद अज़हर खुद कश्मीर में होनेवाले हिंसक गतिविधियों में शामिल नहीं है.’
उधर मसूद अज़हर के गिरफ्त में आते ही सीमापार हंगामा मच गया. कुछ ही महीनों बाद जून 1994 में हरकत उल अंसार ने दो ब्रिटिश नागरिकों को पहलगाम के पास अगवा कर लिया. संगठन ने उनकी रिहाई के बदले मसूद अज़हर की रिहाई मांगी लेकिन असफल रहे. 
एक बार फिर मसूद अज़हर को छुड़ाने की कोशिशें शुरू हुईं. इस बार लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में पढ़े ओमर शेख को भारत भेजा गया. शेख का जन्म और पढ़ाई इंग्लैंड में हुए थे ऐसे में उस पर किसी का शक होना मुश्किल था. उसे निर्देश दिया गया कि भारत जाकर विदेशी नागरिकों को अगवा करे और बदले में अज़हर को छुड़ा लाए.  उसने भारत आकर एक अमेरिकी और तीन ब्रिटिश पर्यटकों से दोस्ती गांठी और उन्हें धोखे से बाहरी दिल्ली के एक घर में बंधक बना लिया. पुलिस की मुस्तैदी से उसका प्लान फेल हो गया. बाद में यही ओमर शेख पाकिस्तान में वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की बहुचर्चित हत्या में भी शामिल रहा और फिलहाल पाकिस्तानी जेल में है.
साल 1995 में हरकत-उल-अंसार नाम के आतंकी संगठन के एक फ्रंट अल फरान ने फिर से पांच विदेशियों को पकड़ लिया. उनकी मांग में भी मसूद अज़हर की रिहाई टॉप पर थी. हालांकि पूर्व खुफिया अधिकारी मोहनने बताते हैं कि मसूद अज़हर अल फरान से इस बात पर बेहद नाराज़ था कि उसकी रिहाई के साथ अल फरान ने हूजी के चीफ कमांडर मंज़ूर लंगरयार की रिहाई भी मांगी है. अज़हर का मानना था कि ऐसा करके अपहरणकर्ताओं ने उसका कद लंगरयार के बराबर कर दिया जबकि वो लंगरयार को खुद से बहुत छोटा समझता था.
अब भारतीय एजेंसियों को अंदाज़ा होने लगा कि उनके हाथ जो लगा है वो कोई आम आतंकी नहीं है. अब तक पाकिस्तानी उच्चायोग भी अज़हर को पत्रकार होने के आधार पर छुड़ाने में जुट गया था. 
जून 1999 में मसूद अज़हर के साथी सज्जाद अफगानी ने कई दूसरे आतंकियों के साथ मिलकर जम्मू जेल में सुरंग खोद डाली. मसूद अज़हर भी सुरंग में घुसा लेकिन छह फीट अंदर जाने के बाद उसे अहसास हो गया कि मोटापे के चलते वो और भीतर घुस नहीं सकेगा. वो निराश होकर लौट आया. इस बीच दूसरे आतंकियों के साथ भाग निकलने की कोशिश में अफगानी को गोली लग गई और वो मारा गया.
अफगानी की मौत का समाचार पाकिस्तानी एजेंसियों के लिए बुरी खबर के साथ-साथ खतरे की घंटी भी था. उन्हें लगा कि अगर अफगानी मारा जा सकता है तो नंबर मसूद अज़हर का भी लग सकता है.
इसके बाद अज़हर के साथियों ने और गंभीरता से उसे छुड़ाने की साज़िशें रचनी शुरू कर दीं. इसी साज़िश का हिस्सा था इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 का अपहरण. काठमांडू से उड़ा ये जहाज दिल्ली पहुंचनेवाला था, लेकिन सफर के बीच में हरकत- उल-मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने उस पर कब्ज़ा जमा लिया. अमृतसर, लाहौर और दुबई से होते हुए आखिरकार हवाई जहाज अफगानिस्तान के कंधार में उतरा जहां आतंकियों के पुराने साथी तालिबान की हुकूमत थी. 
सात दिनों तक बंधक कांड चलता रहा. अपहरणकर्ताओं ने मौलाना मसूद अज़हर, मुश्ताक अहमद ज़रगर और ओमर शेख की रिहाई मांगी. आखिरकार वाजपेयी सरकार झुकी और तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह और इंटेलीजेंस ब्यूरो चीफ अजीत डोभाल तीनों आतंकियों को लेकर कंधार पहुंचे.
रिहाई के बाद मसूद अज़हर और ओमर शेख तालिबान कमांडर मुल्ला उमर से मुलाकात करने पहुंचे. अल कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन भी वहां मौजूद था. सभी ने रिहाई का जश्न मनाया. हफ्ते भर बाद अज़हर पाकिस्तान में दाखिल हुआ. रिहाई के ठीक महीने भर बाद मसूद अज़हर ने जैश-ए-मोहम्मद के गठन का एलान किया. उसने इस मौके पर दस हजार हथियारबंद अनुयायियों को कराची की मस्जिद में संबोधित किया.
मौलाना मसूद अज़हर ने संगठन के लिए फंड इकट्ठा करने की भूमिका चुनी, ज़रगर ने कश्मीरी युवकों को भर्ती करने का काम संभाला और ओमर शेख को हथियारों की ट्रेनिंग का ज़िम्मा सौंपा गया.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व अधिकारी अविनाश मोहनानी ने अज़हर से लंबी पूछताछ की थी। वो बताते हैं कि मसूद अज़हर अपने संगठन से इस बात को लेकर बेहद नाराज़ था कि उसे कश्मीर के बारे में गलत जानकारियां मुहैया कराई गईं. पहली बार कश्मीर जाने से पहले उसे बताया गया था कि घाटी में हालात अफगानिस्तान जैसे हैं जहां तालिबान ने एक अच्छे खासे इलाके को अपने कब्ज़े में ले रखा था. अज़हर ने कहा कि कश्मीर से पाकिस्तान लौटनेवाले आतंकियों ने उसे जैसी रिपोर्ट दी वो उस पर भरोसा करके कश्मीर पहुंचा लेकिन उसने पाया कि आतंकी तो वहां सुरक्षाबलों से जान बचाते फिर रहे थे. वो अपनी गिरफ्तारी की बड़ी वजह उन गलत इनपुट्स को भी मानता था जिन्हें सच जानकर वो बड़े ही आराम से कश्मीर पहुंचा था.

अगर हम आपको ये बताएं कि संसद से पठानकोट एयरबेस और पुलवामा तक सुरक्षाबलों पर हमले का मास्टरमाइंड आतंक की पाठशाला का फेल छात्र है तो आप क्या कहेंगे?
आपको यकीन तो नहीं होगा लेकिन जैश ए मोहम्मद के जिस सरगना मौलाना मसूद अज़हर की तलाश दुनिया के कई देशों को है वो दरअसल खुद एक सफल लड़ाका बनने में असफल हो गया था. ये बात खुद उसी ने भारतीय जांच एजेंसियों को पूछताछ में कई साल पहले बताई थी. एक ऑनलाइन मीडिया पोर्टल के हाथ मसूद अज़हर से पूछताछ के कागज़ लगे हैं जिनसे खुलासा हुआ कि नाटे और मोटे अज़हर को आतंकी ट्रेनिंग में मिसफिट मानकर वापस घर भेज दिया गया था.
10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में पैदा होनेवाले अज़हर मसूद को उसके हेडमास्टर पिता ने पढ़ाई के लिए कराची भेजा था. जामिया-उलूम-उल इस्लामिया में पढ़ते हुए उसने इस्लाम की तालीम ली. यहीं वो ऐसे छात्रों के संपर्क में आया जो आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के नेताओं से ज़बरदस्त प्रभावित थे. उन दिनों ये संगठन अमेरिका के संसाधनों के बूते अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन से टक्कर ले रहा था. 
अज़हर ने ऊंचे नंबरों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की और हरकत उल मुजाहिद्दीन के सरगना मौलाना फज़लुर रहमान खलील से मुलाकात कर ‘जिहाद’ में शामिल होने की पेशकश रखी. अफगानिस्तान के युवर में अज़हर की तरबियत यानि ट्रेनिंग शुरू हो गई.

मसूद अज़हर का जोशोखरोश जल्द ही ठंडा पड़ने लगा. ट्रेनिंग कैंप में कई तरह के हथियारों की ट्रेनिंग कराई जा रही थी. इसके अलावा भागना-दौड़ना, छिपना और रेंगकर चलना भी अभ्यास में शामिल था. 5 फीट 3 इंच के अज़हर के लिए अच्छे खासे वज़न के साथ पानी से भरे ट्रेंच को पार करना मुश्किल हो गया. बंदूक से निशाना लगाना तो और भी ज़्यादा कठिन रहा. साथ में ट्रेनिंग वालों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे बने कि चालीस दिन की ज़रूरी ट्रेनिंग को बीच में ही छोड़कर उसने जिहादी बनने का इरादा त्याग दिया. ट्रेनर ने उसे वापस कराची भेज दिया. हताश परेशान अज़हर ने टीचर बनने में ही अपनी भलाई समझी.

मज़हब की अपनी जानकारी को मसूद अज़हर ने आतंकी गढ़ने में लगा दिया. उसने ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ नाम की पत्रिका निकाली. अफगानिस्तान में लड़ रहे ‘हरकत-उल-मुजाहिद्दीन’ पर पत्रिका में खूब लिखा गया. शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्रिका मुफ्त बंटती. पत्रिका के ज़रिए मसूद अज़हर ने मशहूर होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया. वो लोगों की नज़रों में चढ़ने लगा. हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के सरगना को भी उसमें हुनर दिखा. जल्द ही उसे एक अलग विभाग का मुखिया बना दिया गया जिसका काम पाकिस्तानी लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों का प्रचार करना तो था ही, साथ में नए लड़कों को संगठन की ओर आकर्षित करना भी था. इस काम को तब और तेज़ी मिली जब अज़हर की ज़हरीली भाषण कला का हुनर बिखरा.
साल 1992 तक मसूद अज़हर पत्रकार के तौर पर जाना जाता था. उसका मुख्य काम ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ का प्रकाशन और अफगानिस्तान में लड़ रहे साथियों के लिए चंदा इकट्ठा करना था. कामकाज से खुश संगठन के मुखिया खलील ने मसूद अज़हर को विदेशी दौरे करने को कहा. तुरंत उसने सऊदी अरब का दौरा किया और चंद ही दिनों में तीन लाख रुपए की रकम इकट्ठा कर ली. अफ्रीका के ज़ाम्बिया में भी उसका दौरा हुआ. ब्रिटेन में उसने बर्मिंघम, नॉटिंघम, लीसेस्टर और लंदन से चंदा उगाहने की कोशिशें कीं. उसकी कोशिशों ने आतंकी जमात में उसका कद बढ़ा दिया. सरगना खलील को समझ आ चुका था कि मसूद अज़हर कोई आम लड़का नहीं है बल्कि ठीक से इस्तेमाल करने पर बड़े काम कर सकता है.

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...