हांगकांग आंदोलन की चर्चाएं तो हम अपने फेसबुक फ्रेंड समर अनार्य से सुनते आ रहे थे लेकिन ठीक से पता तब चला जब रवीश कुमार ने इस आंदोलन को टेक्निकली बताया। असल में 150 साल तक हांग कांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था. 1984 में ब्रिटेन और चीन के बीच एक डील हुई कि 1997 से हांग कांग चीन का हिस्सा बनेगा लेकिन उससे पहले 50 साल तक वहां एक मुल्क, दो सिस्टम लागू होगा. 2047 में हांगकांग का चीन में पूर्ण विलय हो जाएगा. तब तक के लिए हांग कांग के पास रक्षा और विदेश मामलों को छोड़ सारे अधिकार रहने थे.
हांगकांग में चीन के हस्तक्षेप के कारण कई कानून ऐसे बन गए जो वहां के लोगों को पसंद नहीं आए. उनका कहना है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होता जा रहा है. इसके खिलाफ भी हमेशा प्रदर्शन हुए मगर उन्हें दबाया जाता रहा. हांगकांग के पास अभिव्यक्ति की आज़ादी है, जमा होने की आज़ादी है, अपना लीगल सिस्टम है. आर्थिक नीति भी अपनी है. मगर पिछले दिनों यहां एक कानून बनता है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे अपराध में पकड़ा जाता है जिस पर हांग कांग के कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती तो उन्हें चीन भेज दिया जाएगा. जून से ही इस कानून के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे. लोगों का कहना था कि अगर यह क़ानून बन गया तो चीन इसे विरोधियों और आलोचकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है. रवीश कुमार ने बताया कि हांगकांग के आंदोलनकारियों ने आंदोलन का तरीका ही बदल कर रख दिया है. उनकी तैयारी, उनके कपड़े और टेक्नालजी का इस्तमाल बता रहा है कि भविष्य का आंदोलन कितना मुश्किल हो जाएगा. हांग कांग के आंदोलनकारियों ने जो तरीका निकाला है क्या वो आज की सरकारों पर दबाव डालने के लिए पर्याप्त है, याद रखिए, सरकारों के पास टेक्नालजी के कारण लाखों की भीड़ पर नियंत्रण करने का तरीका है. वो चाहे तो लाखों लोगों का नेटवर्क गायब कर सकती है, कुछ हज़ार का और किसी एक का भी नेटवर्क समाप्त कर सकती है. आप अचानक दुनिया से लेकर अपने आस पास से कट जाएंगे. इसलिए कहा कि लोकतंत्र के हर छात्र को हांग कांग के प्रदर्शन का अध्ययन करना चाहिए, हांग कांग के लिए नहीं, अपने भविष्य के लिए. जैसे वहां की पुलिस जब आंदोलनकारियों से मुकाबला करने आती है तो उसके पास एक हाई डेफिनिशन कैमरा होता है जो झट से चेहरे की तस्वीर लेता है और सारा रिकॉर्ड बाहर कर देता है. इसकी मदद से लोगों की पहचान कर उनको पकड़कर जेल में डाला जा सकता है या प्रताड़ित कर तोड़ दिया जायेगा. मगर प्रदर्शनकारियों ने इसका भी जवाब निकाला है. जब वे पुलिस के करीब जाते हैं तो लेज़र चलाते रहते हैं. हरे और नीले रंग के लेज़र की किरणें कैमरे को कंफ्यूज़ कर देती हैं. कैमरे का लेंस ख़राब हो जाता है. तस्वीर साफ नहीं होती है. यहाँ के प्रदर्शन में एक वीडियो ने खूब चर्चा हासिल की जब लाखों की भीड़ के बीच से एक एम्बुलेंस बहुत आसानी से निकल गई. प्रदर्शनकारियों की इस तैयारी से दुनिया हैरान हो गई है कि यह कैसे संभव हो सकता है. पुलिस की नज़र से बचने के लिए प्रदर्शनकारी टेलीग्राम का इस्तमाल कर रहे हैं जिसमें सुरक्षा एजेंसिया हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं. इनकी तैयारी इतनी बढ़िया है कि भीड़ की वजह से आम लोगों को कोई असुविधा नहीं हो सकती है. अगर किसी को कोई सामान चाहिए तो वो हाथ के इशारे से बता दे तुरंत उसको वो सामान मिल जायेगा. पैलेट गन और रबर बुलेट से बचाने के लिए कचरे के टिन या घरेलू सामान से ढाल बना लेते हैं. तो अब पुलिस के पास ही कांच की ढाल नहीं है बल्कि प्रदर्शनकारियों के पास भी है. प्रदर्शनकारी भी पुलिस की तरह सभी लिबास से सुसज्जित हैं ताकि चोट कम से कम लगे. आंसू गैस बुझाने की भी कई लोगों को ट्रेनिंग दी गई है. आंसू गैस गिरता है और फिर उसे ट्रैफिक कोन से ढंक दिया जाता है या उसके फटने से पहले पानी डाल देते हैं. यह भी नियम है कि किसी जगह पर ज़्यादा देर तक नहीं रहना है. उसके लिए भी अलग से निर्देश हैं. जिसका इशारा होते ही भीड़ पल भर में छंट जाती है. पानी की तरह आना है और गुज़र जाना है. चेहरा पहचान में न आए इसलिए प्रदर्शनकारियों ने अपना चेहरा ढंक लिया है. ऑटोमेटिक इंटेलिजेंस के इस्तमाल से चेहरे की पहचान हो जाती है इसलिए बचने के लिए चेहरे पर मास्क लगा लेते हैं. यहां तक कि सीसीटीवी कैमरे को पेंट से पोत दिया गया है. दर्शनकारी अपना नाम नहीं बताते हैं. इनका कोई नेता नहीं जिसे पुलिस गिरफ्तार कर आंदोलन को बेकार कर दे. लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले मेट्रो ट्रेन में एक ही तरफ का टोकन लेते हैं. ताकि पता न चले कि कहां से कौन कहां गया था. ये लोग क्रेडिट कार्ड का भी इस्तमाल नहीं करते हैं. जहां प्रदर्शन करते हैं वहां न तो सेल्फी लेते हैं और न फोटो लेते हैं. ऐसे सिम का इस्तमाल करते हैं जिसे एक बार इस्तमाल करने के बाद फेंका जा सकता है. आंदोलन में शामिल लोगों ने अपने स्मार्टफोन से सभी प्रकार के ऐप डिलिट कर दिए हैं. चीनी सोशल मीडिया वीबो और वी चैट का इस्तमाल नहीं कर रहे हैं. आपस में बातचीत के लिए नए कोड का इस्तमाल हो रहा है. रैली की जगह पिकनिक का इस्तमाल करते हैं. मोबाइल सर्विस बंद हो जाने के कारण अपना एक ऐप बनाया है जिसके ज़रिए लोकल लेवल पर बातचीत हो जाती है.
हांगकांग में चीन के हस्तक्षेप के कारण कई कानून ऐसे बन गए जो वहां के लोगों को पसंद नहीं आए. उनका कहना है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होता जा रहा है. इसके खिलाफ भी हमेशा प्रदर्शन हुए मगर उन्हें दबाया जाता रहा. हांगकांग के पास अभिव्यक्ति की आज़ादी है, जमा होने की आज़ादी है, अपना लीगल सिस्टम है. आर्थिक नीति भी अपनी है. मगर पिछले दिनों यहां एक कानून बनता है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे अपराध में पकड़ा जाता है जिस पर हांग कांग के कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती तो उन्हें चीन भेज दिया जाएगा. जून से ही इस कानून के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे. लोगों का कहना था कि अगर यह क़ानून बन गया तो चीन इसे विरोधियों और आलोचकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है. रवीश कुमार ने बताया कि हांगकांग के आंदोलनकारियों ने आंदोलन का तरीका ही बदल कर रख दिया है. उनकी तैयारी, उनके कपड़े और टेक्नालजी का इस्तमाल बता रहा है कि भविष्य का आंदोलन कितना मुश्किल हो जाएगा. हांग कांग के आंदोलनकारियों ने जो तरीका निकाला है क्या वो आज की सरकारों पर दबाव डालने के लिए पर्याप्त है, याद रखिए, सरकारों के पास टेक्नालजी के कारण लाखों की भीड़ पर नियंत्रण करने का तरीका है. वो चाहे तो लाखों लोगों का नेटवर्क गायब कर सकती है, कुछ हज़ार का और किसी एक का भी नेटवर्क समाप्त कर सकती है. आप अचानक दुनिया से लेकर अपने आस पास से कट जाएंगे. इसलिए कहा कि लोकतंत्र के हर छात्र को हांग कांग के प्रदर्शन का अध्ययन करना चाहिए, हांग कांग के लिए नहीं, अपने भविष्य के लिए. जैसे वहां की पुलिस जब आंदोलनकारियों से मुकाबला करने आती है तो उसके पास एक हाई डेफिनिशन कैमरा होता है जो झट से चेहरे की तस्वीर लेता है और सारा रिकॉर्ड बाहर कर देता है. इसकी मदद से लोगों की पहचान कर उनको पकड़कर जेल में डाला जा सकता है या प्रताड़ित कर तोड़ दिया जायेगा. मगर प्रदर्शनकारियों ने इसका भी जवाब निकाला है. जब वे पुलिस के करीब जाते हैं तो लेज़र चलाते रहते हैं. हरे और नीले रंग के लेज़र की किरणें कैमरे को कंफ्यूज़ कर देती हैं. कैमरे का लेंस ख़राब हो जाता है. तस्वीर साफ नहीं होती है. यहाँ के प्रदर्शन में एक वीडियो ने खूब चर्चा हासिल की जब लाखों की भीड़ के बीच से एक एम्बुलेंस बहुत आसानी से निकल गई. प्रदर्शनकारियों की इस तैयारी से दुनिया हैरान हो गई है कि यह कैसे संभव हो सकता है. पुलिस की नज़र से बचने के लिए प्रदर्शनकारी टेलीग्राम का इस्तमाल कर रहे हैं जिसमें सुरक्षा एजेंसिया हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं. इनकी तैयारी इतनी बढ़िया है कि भीड़ की वजह से आम लोगों को कोई असुविधा नहीं हो सकती है. अगर किसी को कोई सामान चाहिए तो वो हाथ के इशारे से बता दे तुरंत उसको वो सामान मिल जायेगा. पैलेट गन और रबर बुलेट से बचाने के लिए कचरे के टिन या घरेलू सामान से ढाल बना लेते हैं. तो अब पुलिस के पास ही कांच की ढाल नहीं है बल्कि प्रदर्शनकारियों के पास भी है. प्रदर्शनकारी भी पुलिस की तरह सभी लिबास से सुसज्जित हैं ताकि चोट कम से कम लगे. आंसू गैस बुझाने की भी कई लोगों को ट्रेनिंग दी गई है. आंसू गैस गिरता है और फिर उसे ट्रैफिक कोन से ढंक दिया जाता है या उसके फटने से पहले पानी डाल देते हैं. यह भी नियम है कि किसी जगह पर ज़्यादा देर तक नहीं रहना है. उसके लिए भी अलग से निर्देश हैं. जिसका इशारा होते ही भीड़ पल भर में छंट जाती है. पानी की तरह आना है और गुज़र जाना है. चेहरा पहचान में न आए इसलिए प्रदर्शनकारियों ने अपना चेहरा ढंक लिया है. ऑटोमेटिक इंटेलिजेंस के इस्तमाल से चेहरे की पहचान हो जाती है इसलिए बचने के लिए चेहरे पर मास्क लगा लेते हैं. यहां तक कि सीसीटीवी कैमरे को पेंट से पोत दिया गया है. दर्शनकारी अपना नाम नहीं बताते हैं. इनका कोई नेता नहीं जिसे पुलिस गिरफ्तार कर आंदोलन को बेकार कर दे. लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले मेट्रो ट्रेन में एक ही तरफ का टोकन लेते हैं. ताकि पता न चले कि कहां से कौन कहां गया था. ये लोग क्रेडिट कार्ड का भी इस्तमाल नहीं करते हैं. जहां प्रदर्शन करते हैं वहां न तो सेल्फी लेते हैं और न फोटो लेते हैं. ऐसे सिम का इस्तमाल करते हैं जिसे एक बार इस्तमाल करने के बाद फेंका जा सकता है. आंदोलन में शामिल लोगों ने अपने स्मार्टफोन से सभी प्रकार के ऐप डिलिट कर दिए हैं. चीनी सोशल मीडिया वीबो और वी चैट का इस्तमाल नहीं कर रहे हैं. आपस में बातचीत के लिए नए कोड का इस्तमाल हो रहा है. रैली की जगह पिकनिक का इस्तमाल करते हैं. मोबाइल सर्विस बंद हो जाने के कारण अपना एक ऐप बनाया है जिसके ज़रिए लोकल लेवल पर बातचीत हो जाती है.
चीन की सरकार ने प्रदर्शनकारियों की निंदा की है और यह भी कहा है कि वह चुप नहीं बैठेगा. ऐसे में इस बात को लेकर चर्चा होने लगी है कि क्या चीन अपना धैर्य खोकर सीधे हॉन्ग कॉन्ग में दख़ल दे सकता है? सवाल ये भी हैं कि हॉन्ग कॉन्ग में हस्तक्षेप करने के लिए चीन के पास क्या विकल्प हैं और क्या वो वहां अपनी सेना भेज सकता है? साल 1997 में जब हॉन्ग कॉन्ग को चीन के हवाले किया गया था तब से हॉन्ग कॉन्ग का संविधान इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट है कि चीन की सेना कब यहां हस्तक्षेप कर सकती है. 'एक देश-दो प्रणालियां' के तहत विशेष दर्जा रखने वाले हॉन्ग कॉन्ग में चीनी सेना सिर्फ़ तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब हॉन्ग कॉन्ग की सरकार इसके लिए अनुरोध करे या फिर क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए और आपदा के समय सेना की ज़रूरत हो. मगर विश्लेषकों का मानना है कि यह बात कल्पना से भी परे है कि चीन की सेना हॉन्ग कॉन्ग में देखने को मिलेगी. अगर चीनी सेना हॉन्ग कॉन्ग में विरोध कर रहे लोगों को रोकने के लिए आती है तो यह हॉन्ग कॉन्ग के लिए विनाशकारी होगा. भले ही सेना घातक बल प्रयोग न करे मगर उसके आने के कारण अर्थव्यवस्था के अस्थिर होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय नाराज़गी भी बढ़ेगी. चीन को सौंपे जाने के बाद से ही हॉन्ग कॉन्ग आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत
रहा है. मगर अब चीन के शंघाई और शेनज़ेन जैसे शहरों ने भी तेज़ी से तरक्की
की है. अगर हॉन्ग कॉन्ग चीनी शासन को चुनौती देता रहेगा तो सरकार
निवेश और व्यापार का रुख़ हॉन्ग कॉन्ग के बजाय अपने अन्य हिस्सों की ओर
मोड़ सकती है.इससे हॉन्ग कॉन्ग की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होगी जिससे बिजिंग पर उसकी निर्भरता बढ़ेगी.
No comments:
Post a Comment