Wednesday, March 18, 2020

क्या बर्नी सैंडर्स का खेल खत्म?

जो बाइडन मंगलवार को डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी अपने नाम पक्का कर सकते हैं.
फ़्लोरिडा, इलिनॉय और ऐरिज़ोना में भारी जीत के साथ उन्होंने अपनी 894 और 743 की बढ़त को और मज़बूत कर लिया है. इसके अलावा वो अपनी उम्मीदवारी पक्का करने के लिए 1,991 डेलिगेट्स के 'जादुई आँकड़े' के ज़्यादा क़रीब पहुंच गए हैं.
अगर ऐसा हुआ तो ये राजनीति की दुनिया में सबसे बड़ी ख़बर होगी क्योंकि इसके बाद सबकी नज़र डोनल्ड ट्रंप और जो बाइडेन के मुक़ाबले पर होगी.
इस मंगलवार को 'सुपर ट्यूज़्डे' होने वाला था क्योंकि इस दिन चार बड़े राज्यों में चुनाव होने वाले थे. लेकिन कोरोना वायरस के कहर की वजह से 136 डेलिगेट्स वाले ओहायो राज्य ने अपने यहाँ होने वाला मतदान अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है.
हालांकि कई अन्य राज्य पहले वोटिंग करा चुके हैं.
बाक़ी के तीन राज्यों इलिनॉय, फ़्लोरिडा और ऐरिज़ोना में प्राइमरी चुनाव पूर्व निर्धारित समय पर हुए. फ़्लोरिडा और ऐरिज़ोना में जबर्दस्त 'अर्ली वोटिंग' होती है यानी उस दिन होने वाले मतदान में कमी का कुल टर्नआउट पर ज़्यादा असर नहीं पड़ता.
उदाहरण के लिए, साल 2016 में ऐरिज़ोना में हुई प्राइमरी में 'अर्ली वोटिंग' डेमोक्रेटिक पार्टी को जितने वोट मिले वो कुल टर्नआउट से भी ज़्यादा थे.
दूसरी तरफ़ इलिनॉय बहुत हद तक चुनाव के दिन के टर्न-आउट पर निर्भर होता है. इस बार इलिनॉय से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं, वो बताती हैं कि आख़िरी वक़्त में पोलिंग बूथ बंद होने, चुनाव स्थल पर वॉलंटियर्स की ग़ैर-मौजूदगी, सैनिटाइज़र और अन्य ज़रूरी सामानों के अभाव की वजह से राज्य के मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी.
साल 2016 के मुक़ाबले टर्नआउट कम दर्ज किया गया. कुछ लोगों को वोटिंग बैलट के बिना ही वापय लौटा दिया गया और कुछ लोगों को लंबी क़तार और भीड़-भाड़ वाले कमरों में इंतज़ार करना पड़ा. स्थिति इतनी बिगड़ कई थी कि एक अदालत को शिकागो में वोटिंग के लिए एक घंटा अतिरिक्ट दिए जाने का आदेश देना पड़ा.
जैसे ही वोटिंग ख़त्म हुई, अमरीका के कई मीडिया संस्थानों को विजेता बताना शुरू कर दिया. हालांकि उनकी आसान जीत उन समस्याओं का हल नहीं निकाल पाएंगी जो मंगलवार को इलिनॉय में सामने आईं.
मंगलवार को जो कुछ हुआ वो बताता है कि अगर कोरोना जैसी महामारी में नेताओं ने पर्याप्त तैयारियां करनी शुरू नहीं कीं तो आगे क्या होगा.
फ़्लोरिडा: बुजुर्ग मतदाता बाइडन के पक्ष में
कोरोना वायरस की दहशत के बावजूद फ़्लोरिडा में डेमोक्रेटिक पार्टी का टर्नआउट बेहतरीन (17 लाख से ज़्यादा) था. ये टर्नआउट साल 2016 के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होने की उम्मीद जताई जा रही है.
फ़्लोरिडा में सेवानिवृत्त मतदाताओं की संख्या काफ़ी ज़्यादा है और ये वोटर जो-बाइडन के पक्ष में हैं. सेवानिवृत्त मतदाताओं ने ज़ाहिर कर दिया है कि वो बर्नी सैंडर्स के 'क्रांतिकारी उत्साह' के बजाय पूर्व उप-राष्ट्रपति बाइडन की पेंशन बढ़ाने की योजना के ज़्यादा समर्थन में हैं. केंद्रीय फ़्लोरिडा के सम्टर काउंटी में बुज़ुर्ग मतदाताओं की औसत संख्या सबसे ज़्यादा है. यहां बर्नी सैंडर्स जो बाइडन और माइकल ब्लूमबर्ग से पीछे तीसरे नंबर पर थे. ब्लूमबर्ग पहले ही चुनावी दौड़ से बाहर हो चुके हैं.
बाइडन ने फ़्लोरिडा के स्पैनिश भाषी मतदाताओं के बीच भी अच्छा प्रदर्शन किया. इस इलाक़े पर पहले के चुनावों में बर्नी सैंडर्स की पकड़ थी.
टेक्सस और नेवाडा के उलट फ़्लोरिडा के 'हिस्पैनिक्स' में ज़्यादातर लोग कैरिबियाई और दक्षिण अमरीकी इलाक़ों से ताल्लुक रखते हैं. इनमें से कई लोग अब बर्नी सैंडर्स के 'समाजवादी' तमगे से दूर भाग रहे हैं और वो इसे कई बार तानाशाही से जुड़ा एक रवैया मानते हैं.
जो बाइडन को जैसी भारी जीत मिली है, उससे उन्हें सैंडर्स के मुक़ाबले दोगुने डेलिगेट्स अकेले फ़्लोरिडा से ही मिल सकते हैं.
 कई राज्य अपने प्राइमरी चुनाव को जून तक के लिए टालने की योजना बना रहे हैं. यहां तक कि कोरोना संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए अब जुलाई में होने वाला डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन पर भी संहेद के बादल मंडरा रहे हैं.
कन्वेंशन रद्द होने का असर डेमोक्रेटिक पार्टी पर ज़रूर पड़ेगा क्योंकि यह अपने नॉमिनी को कन्वेंशन में ही सामने लाती है. आधुनिक अमरीकी राजनीति में ये बिल्कुल नया है.
आने वाले कुछ वक़्त में जो बाइडन की यह बढ़त बनी रहेगी जब तक कि सैंडर्स की किस्मत एकदम से न पलट जाए. हालांकि सैंडर्स के चाहने वालों को अब भी यह उम्मीद है कि पूरी प्रक्रिया में अगर देरी होती है तो इससे मतदाताओं को अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करने का वक़्त मिलेगा.
कुछ लोग हालिया चुनावों में बाइडेन की बढ़त धीरे-धीरे कम होने को इस बात का इशारा मानते हैं कि बर्नी सैंडर्स की वापसी होगी. ख़ासकर कोरोना जैसी महामारी के प्रसार और गिरती अर्थव्यवस्था के समय में लोगों को बर्नी सैंडर्स के प्रस्तावित सुधारों की ज़रूरत महसूस हो रही है.
सैंडर्स को इस बारे में अच्छी तरह सोचना होगा कि वो इस रेस में कैसे बने रहना चाहते हैं और क्या इसके लिए उनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं?
पिछले हफ़्ते वो छह में से पाँच चुनाव हार गए थे और मंगलवार को भी वो बुरी तरह पिछड़ गए थे. जैसे-जैसे प्राइमरी चुनाव ख़त्म हो रहे हैं, सैंडर्स के लिए वापसी की संभावनाएं भी कम होती जा रही हैं.
हो सकता है कि आने वाले वक़्त में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद सैंडर्स से विनम्रतापूर्वक रेस से बाहर होने के लिए कहें. हालांकि सैंडर्स इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे. उन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में कन्वेशंस की पूर्व संध्या से पहले अपने क़दम पीछे नहीं खींचे थे और इससे हिलरी क्लिंटन के समर्थक काफ़ी असहज भी थे.
बर्नी सैंडर्स को अब ये तय करना होगा कि उन्होंने जो आंदोलन शुरू किया है, उसे जारी रखने के लिए अभी क्या करना सबसे अच्छा होगा.
क्या इस दौड़ में बने रहना उन्हें उनके उठाए मुद्दों पर बात करने के लिए बड़ा मंच और वापसी का वक़्त देगा? या फिर लड़ाई में बने रहने से उनका नुक़सान होगा?

Sunday, March 8, 2020

महिला दिवस की शुभकामनाएं

*महिलाओं का सम्मान केवल एक दिन ही करना है या रोज?
*या फिर कल से उनपर " घुटनों में अकल" जैसे घटिया जोक भी शेयर करना है?
*या फिर आदमी की गलती पर भी औरतों को ही गाली देना है? कभी माँ बहन की बजाय बाप भाई की गाली सुनी है?
*कहीं उनके बारे में दोस्तों से बात करने के लिए बाजारू कोड वर्ड "आइटम, माल, तो नहीं बुलाना है?
*Mothers Day पर माँ का ही सम्मान करना है या हर लडकी का?
*क्या शाॅपिंग या restaurant में extra discount से ही women empowerment हो जाता है?
*क्या आपको पता है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है. इसकी शुरुआत  साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी. इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए.
*क्या आपको पता है कि भारत में सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा, और अंबेडकर ने वोटिंग से लेकर संपत्ति के अधिकार तक में बडी भूमिका निभाई है?
*क्या आपको पता है कि पहले औरतों को ब्रेस्ट टैक्स देना पडता था, फिर करथॅला नाम की जगह पर नेंगाली नाम की महिला ने 1803 में आंदोलन करते हुए अपनी जान दी तब वो टैक्स हटा?
 * क्या आप जानते हैं कि बहुत पढे लिखे समाज में भी पीरियड्स को आज भी अशुद्ध मानते हैं। शहरों में भी उनको भगवान के मंदिर, और गांवो में तो रसोई में जाने से रोका जाता है? क्या ये समाज का दोगलापन नहीं है?
*क्या आपको पता है कि आप जिस भारत माता की जय बोलते हो वो कोई पोस्टर में साडी पहने सजी देवी नहीं, वो कोई भी महिला साडी, बुरका, जींस किसी भी कपडे में, काली, गोरी, सांवली, किसी भी भाषा की, नीता अंबानी, दीपिका पादुकोण या कोई मजदूरी करने वाली महिला भी हो सकती है।
वैसे मैं ये सब याद दिला रहा था, कि अगर हम सब अपने अपने स्तर पर ही सुधार कर लें तो सब सही हो जाए।
और अंत में आप सबको महिला दिवस की शुभकामनाएं। 😊

Saturday, March 7, 2020

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया

दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका और उस पर राज करने वाला व्यक्ति सबसे ताकतवर माना जाता है. ऐसे में अमेरिका का राष्ट्रपति कौन बनता है दुनिया इस पर कड़ी निगाह रखती है. वहां अभी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है और 3 नवंबर को अमेरिका की जनता अपने नए नेता के लिए मतदान डालेगी.
भारत की तरह ही अमेरिका भी एक लोकतांत्रिक देश है ऐसे में वोटिंग बहुत अहम है. लेकिन भारत से इतर वहां की प्रक्रिया थोड़ी कठिन और लंबी है. ऐसे में अमेरिका में चुनाव किस तरह होते हैं, वहां की प्रणाली क्या है और एक अमेरिकी व्यक्ति अपने राष्ट्रपति को किस तरह चुनता है यहां आसान भाषा में समझें.
कौन बन सकता है अमेरिका का राष्ट्रपति?
अमेरिकी संविधान के आर्टिकल 2 के सेक्शन 1 में वहां के राष्ट्रपति चुनाव की जानकारी विस्तृत रूप से दी गई है. इसमें तीन प्रमुख बातों का ध्यान दिया गया है जिसके तहत अमेरिकी चुनाव की नींव पड़ती है अगर कोई व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बनना चाहता है तो तीन शर्तों को पूरा करना जरूरी है.
1. चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति पैदाइशी अमेरिकी होना चाहिए.
2. उसकी उम्र कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए.
3. चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति कम से कम 14 बरस तक अमेरिका में रहा होना चाहिए.
अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया
कैसे शुरू होती है चुनावी प्रक्रिया?
कहा जाता है कि  अमेरिका में दो पार्टी का सिस्टम है, लेकिन थे सच नही है। यहां और भी दल हैं जो चुनाव लड़ते हैं लेकिन उनको कभी सफलता नहीं मिली इसलिए दो दल ही मुख्य हैं, पहला रिपब्लिकन और दूसरा डेमोक्रेट्स. दोनों पार्टियों को अपनी-अपनी तरफ से किसी एक व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना होता है जिसे जनता वोट देती है. इसे सीधा सीधा चुनाव भी नहीं कह सकते यहां भी जनता इलेक्टर्स को वोट देती है जो राष्ट्रपति चुनते हैं। लेकिन इस उम्मीदवार को चुनने से पहले भी एक लंबी प्रक्रिया है क्योंकि राष्ट्रपति तो हर कोई बनना चाहता है लेकिन कोई उम्मीदवार कैसे बनेगा इसका चयन भी जनता या पार्टी के समर्थक करते हैं.
पार्टी का उम्मीदवार तय करने के लिए दो तरह से चुनाव किए जाते हैं पहला प्राइमरी और दूसरा कॉकसस. इसमें पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए खड़ा हो सकता है, उसे सिर्फ अपने समर्थकों का साथ चाहिए होता है.
अगर प्राइमरी चुनाव के बात करें तो यह राज्य सरकारों के अंतर्गत कराए जाते हैं जोकि खुले और बंद रूप से भी कराए जा सकते हैं. यानी अगर राज्य सरकार चुनती है कि खुले रूप से चुनाव करेगी तो उसमें पार्टी के समर्थक के साथ-साथ आम जनता भी मतदान कर सकती है. वहीं अगर बंद रूप से मतदान होता है तो सिर्फ पार्टी से जुड़े समर्थक ही उम्मीदवार के लिए वोटिंग करते हैं.
जबकि कॉकसस सिस्टम की बात करें तो यह चुनाव पार्टी की तरफ से ही कराए जाते हैं इसमें पार्टी के समर्थक एक जगह इकट्ठे होते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करते हैं. राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए खड़े हो रहे व्यक्ति की बात सुनते हैं उसके बाद उसी सभा में हाथ खड़े कर एक उम्मीदवार को समर्थन दे दिया जाता है हालांकि ऐसा बहुत ही कम राज्यों में होता है.
अमेरिकी चुनावी सिस्टम में एक पेच ये भी है कि वहां पर एक वोटर को चुनाव से पहले कुछ समय के लिए एक पार्टी के लिए रजिस्टर करना पड़ता है तभी वह इस तरह के प्राइमरी या कॉकसस चुनावों में हिस्सा ले सकता है।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, दोनों पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए एक संख्या की जरूरत होती है वह संख्या जो प्राइमरी और कॉकसस के चुनावों में जरूरी होती है. उदाहरण के तौर पर अगर एक पार्टी की तरफ से 10 लोग राष्ट्रपति पद की रेस में है तो उन्हें हर राज्य में होने वाले प्राइमरी या कॉकसस चुनाव में सबसे अधिक डेलिगेट्स का समर्थन हासिल करना होगा, अंत में इन्हीं डेलिगेट्स की संख्या के आधार पर नेशनल कन्वेंशन की ओर बढ़ा जाता है.
2020 में डेमोक्रेट्स के कुल डेलिगेट्स की संख्या 3979 है और जीतने के लिए 1991 की जरूरत है, जबकि रिपब्लिकन के कुल डेलिगेट्स की संख्या 2550 है और उम्मीदवार बनने के लिए 1276 की जरूरत है.
नेशनल कन्वेंशन और उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार
एक बार जब प्राइमरी इलेक्शन खत्म हो जाता है तो यह तस्वीर साफ हो जाती है कि दोनों पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन बनेगा. लेकिन इसका आधिकारिक ऐलान नेशनल कन्वेंशन में होता है, डेमोक्रेट्स का नेशनल कन्वेंशन हमेशा जुलाई में होता है और रिपब्लिकन पार्टी का अगस्त के महीने में.
यहां पर पार्टी की सर्वोच्च टीम उम्मीदवार का ऐलान करती है, फिर राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपने समर्थकों के सामने एक भाषण देते हुए उम्मीदवारी को स्वीकार करता है और इसके साथ अपनी मर्जी से चुने हुए उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का ऐलान करता है. और यहां से अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की असली प्रक्रिया शुरू होती है जब पार्टी की ओर से चुना गया राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार पूरे देश में प्रचार करने के लिए निकलता है.
अमेरिकी जनता हमेशा नवंबर के पहले सप्ताह में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान करती है लेकिन यह मतदान सीधे उम्मीदवार के लिए नहीं किया जाता है. अमेरिकी जनता सबसे पहले स्थानीय तौर पर एक इलेक्टर का चुनाव करती है यह अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का प्रतिनिधि होता है.
इसके समूह को इलेक्टोरल कॉलेज कहा जाता है जिसमें कुल 538 सदस्य होते हैं जो अलग-अलग राज्यों से आते हैं. जनता सीधे तौर पर इन्हीं सदस्यों को चुनती है जो आगे जाकर राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं. जब अमेरिकी जनता एक बार अपने इलेक्टर को वोट दे देती है तो उसका राष्ट्रपति पद के चुनाव में कोई हाथ नहीं रहता है. सिर्फ यह इलेक्टर पर निर्भर करता है कि वह किसी राष्ट्रपति बनाना चाहता है.
राष्ट्रपति बनने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 270 से अधिक इलेक्टर्स के समर्थन की जरूरत होती है. जिसके पास 270 से अधिक का आंकड़ा होता है वह व्यक्ति 20 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेता है.
अमेरिका भी भारत की तरह कई राज्यों का एक देश है. हर राज्य के पास सीटों की अपनी एक ताकत है जो प्राइमरी और बाद में फाइनल चुनाव में अपना किरदार निभाती है. कुछ राज्य ऐसे हैं जो अकेले दम पर पूरा चुनाव ही बदल सकते हैं जैसे कि भारत में उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनाव के लिहाज से सबसे अहम राज्य है.
प्राइमरी चुनाव के हिसाब से अमेरिका में सबसे ताकतवर राज्य कैलिफोर्निया है जिसके पास 415 डेलीगेट्स है, इसके बाद टेक्सस 228 और फिर नॉर्थ कैरोलिना 110 के आंकड़े के साथ आता है.
हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए हिसाब थोड़ा अलग भी हो सकता है क्योंकि तब डेलिगेट्स नहीं इलेक्टर तवज्जो रखते हैं लेकिन उनकी संख्या भी राज्यों के साइज के आधार पर ही होती है ऐसे में किसी उम्मीदवार का राज्य राज्य जीत हासिल करना भी काफी अहम माना जाता है.
अमेरिकी चुनाव का एक सबसे बड़ा हिस्सा है टीवी डिबेट्स. चुनाव प्रचार के दौरान भले ही सभी उम्मीदवार अलग-अलग इलाके में जाकर रैलियां करते हो लेकिन टीवी डिबेट्स ही वह असली मुद्दा है जिनके आधार पर अधिकतर वोटर प्रभावित होते हैं. यह डिबेट्स भी दो तरह की होती हैं पहली प्राइमरी लेवल की डिबेट जो पार्टी के कैंडिडेट के बीच में होती है और दूसरी प्रेसिडेंशियल डिबेट जो दोनों पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच में होती है.
यह सभी डिबेट्स किसी ना किसी अमेरिकी न्यूज़ चैनल के जरिए आयोजित की जाती हैं. हर डिबेट का एक अलग मुद्दा होता है जो कई चरणों तक चलता है. प्राइमरी चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार 1-1 मसले पर अपनी बात रखते हैं और जनता को लुभाने की कोशिश करते हैं. इसी तरह राष्ट्रपति चुनाव के डिबेट्स में दोनों पार्टी के उम्मीदवार अलग-अलग न्यूज़ चैनल पर जाकर डिबेट में हिस्सा लेते हैं.
प्रक्रिया जारी है और हर किसी की नजर है डोनाल्ड ट्रंप पर, क्या कोई ट्रंप को इस चुनाव में टक्कर दे पाएगा. अभी तक प्राइमरी चुनाव चल रहे हैं ऐसे में यह तय नहीं हुआ है कि डेमोक्रेट्स की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा लेकिन रेस जारी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के कैंडिडेट के चुनाव की प्रक्रिया में 4 मार्च  #SuperTuesday को हुई वोटिंग जो बाइडेन के कैम्पेन के लिए शानदार वापसी साबित हुई. उन्होंने 14 में से 9 राज्य जीत कर बढत बना ली है। 
दूसरी तरफ़ अब तक आगे चल रहे बर्नी सैंडर्स उनसे पिछड रहे हैं, बर्नी सैंडर्स ने अभी तक तीन राज्य जीते हैं और कैलिफ़ोर्निया में वे आगे चल रहे हैं. जो बाइडेन ने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी बर्नी सैंडर्स से टेक्सास जैसा अहम राज्य क़रीबी फ़ासले से जीत लिया.
हालांकि चुनावी पूर्वानुमानों में टेक्सास के बारे में कहा जा रहा था कि ये बर्नी सैंडर्स के खाते में जा सकता है. बर्नी सैंडर्स के खाते में कैलिफ़ोर्निया की बढ़त के अलावा कोरोराडो, उताह और वर्मोंट जैसे राज्य हैं. वे वर्मोंट से ही सिनेट में चुने जाते रहे हैं. 
इस कैम्पेन के लिए अपनी जेब से 500 मिलियन डॉलर से भी ज़्यादा की रक़म ख़र्च कर देने वाले न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर माइकल ब्लूमबर्ग एक भी राज्य जीत पाने में नाकाम रहे. उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 1991 डेलीगेट्स चाहिए होंगे. सुपर ट्यूजडे को हुई वोटिंग से 1300 से ज़्यादा डेलीगेट्स का फ़ैसला हो गया है.
अभी तक की जो तस्वीर हैं, उसमें जो बाइडेन के खाते में 643 डेलीगेट्स हैं जबकि बर्नी सैंडर्स के खाते में 566 डेलिगेट्स हैं। बर्नी सैंडर्स 2016 में हिलेरी क्लिंटन से पिछड़ गए थे लेकिन वे पूरी तरह डेमोक्रेट्स नहीं माने जाते हैं. बर्नी सैंडर्स सीनेट में इंडिपेंडेंट उम्मीदवार के तौर पर बैठते हैं. वे एक तरह से लेफ्ट विंगर माने जाते हैं. जबकि जो बाइडन बराक ओबामा के समय उप राष्ट्रपति थे। मैं इसबार के अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया सहित हर डिबेट को फाॅलो कर रहा हूँ, मुझे लगता है कि बर्नी सैंडर्स की विचारधारा आज के दौर में अमेरिका जैसे देश में तो बहुत जरूरी है। वो आम आदमी, लेबर क्लास, प्रवासियों, युद्ध और सेकुलरिज्म पर बहुत साफ राय रखते हैं।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...