बाबा साहब को इस देश के लोगों ने केवल दलित मसीहा बनाकर एक फ्रेम में सेट कर दिया है. मुझे इस चीज से बहुत दिक्कत है. वो दलितों के साथ साथ पिछड़े, अल्पसंख्यक, और महिलाओं के लिए मसीहा थे. उन्होंने मजदूरों कामगारों के लिए बहुत काम किये। आप सब भूल जाये फिर भी उनको एक छात्र के तौर पर भारत के हर छात्र को फॉलो करना चाहिए. इतनी समस्याओं का सामना करते हुए अगर कोई आदमी देश का सबसे पढ़ा लिखा बन सकता है तो आप क्यों नहीं कर सकते कुछ? उनकी कानून और अर्थशास्त्र की किताबें दुनियां में पढ़ाई जाती हैं।
बाबा साहब को बचपन से ही अपनी जाति के कारण आंबेडकर को लोगों के भेदभाव का शिकार होना पड़ा. 1901 में जब वो अपने पिता से मिलने सतारा से कोरेगाँव गए तो स्टेशन से बैलगाड़ी वाले ने उन्हें ले जाने से इनकार कर दिया. दोगुने पैसे देने पर वो इस बात के लिए राज़ी हुआ कि नौ साल के आंबेडकर और उनके भाई बैलगाड़ी चलाएंगे और वो पैदल उनके साथ चलेगा.
1945 में वायसराय की काउंसिल के लेबर सदस्य के रूप में भीमराव आंबेडकर उड़ीसा (आज का ओडिशा) के पुरी में मौजूद जगन्नाथ मंदिर गए तो उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया.
उसी साल जब वो कलकत्ता (आज का कोलकाता) में मेहमान के तौर पर एक शख़्स के यहां गए तो उसके नौकरों ने ये कहते हुए उन्हें खाना परोसने से इंकार कर दिया कि वो महार जाति से हैं.
शायद यही सब कारण थे जिनकी वजह से आंबेडकर ने अपनी जवानी के दिनों में जाति व्यवस्था की वकालत करने वाली मनुस्मृति को जलाया था.
आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के संभवत: सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे. उन्होंने मुंबई के मशहूर एलफ़िस्टन कॉलेज से बीए की डिग्री ली थी. बाद में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उन्होंने पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. शुरू से ही वो पढ़ने, बागवानी करने और कुत्ते पालने के शौक़ीन थे. कहा जाता है कि उस ज़माने में उनके पास देश में क़िताबों बेहतरीन संग्रह था. उनके पास आठ हज़ार क़िताबें थीं. उनकी मौत के दिन तक ये संख्या बढ़ कर 35,000 हो चुकी थी.
उनके ऊपर सबसे अधिक असर हुआ था. पहली थी 'लाइफ़ ऑफ़ टॉलस्टाय', दूसरी विक्टर ह्यूगो की 'ले मिज़राब्ल' और तीसरी थॉमस हार्डी की 'फ़ार फ़्रॉम द मैडिंग क्राउड.' क़िताबों को लेकर उनका प्यार इस हद तक था कि वो सुबह होने तक क़िताबों में ही लीन रहते थे."
एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि आप इतना लंबे समय तक पढ़ने के बाद अपना 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन किस तरह करते हैं. उनका जवाब था कि मेरे लिए 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन का मतलब एक विषय को छोड़ दूसरे विषय की क़िताब पढ़ना."
बाबा साहब को बचपन से ही अपनी जाति के कारण आंबेडकर को लोगों के भेदभाव का शिकार होना पड़ा. 1901 में जब वो अपने पिता से मिलने सतारा से कोरेगाँव गए तो स्टेशन से बैलगाड़ी वाले ने उन्हें ले जाने से इनकार कर दिया. दोगुने पैसे देने पर वो इस बात के लिए राज़ी हुआ कि नौ साल के आंबेडकर और उनके भाई बैलगाड़ी चलाएंगे और वो पैदल उनके साथ चलेगा.
1945 में वायसराय की काउंसिल के लेबर सदस्य के रूप में भीमराव आंबेडकर उड़ीसा (आज का ओडिशा) के पुरी में मौजूद जगन्नाथ मंदिर गए तो उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया.
उसी साल जब वो कलकत्ता (आज का कोलकाता) में मेहमान के तौर पर एक शख़्स के यहां गए तो उसके नौकरों ने ये कहते हुए उन्हें खाना परोसने से इंकार कर दिया कि वो महार जाति से हैं.
शायद यही सब कारण थे जिनकी वजह से आंबेडकर ने अपनी जवानी के दिनों में जाति व्यवस्था की वकालत करने वाली मनुस्मृति को जलाया था.
आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के संभवत: सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे. उन्होंने मुंबई के मशहूर एलफ़िस्टन कॉलेज से बीए की डिग्री ली थी. बाद में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उन्होंने पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. शुरू से ही वो पढ़ने, बागवानी करने और कुत्ते पालने के शौक़ीन थे. कहा जाता है कि उस ज़माने में उनके पास देश में क़िताबों बेहतरीन संग्रह था. उनके पास आठ हज़ार क़िताबें थीं. उनकी मौत के दिन तक ये संख्या बढ़ कर 35,000 हो चुकी थी.
उनके ऊपर सबसे अधिक असर हुआ था. पहली थी 'लाइफ़ ऑफ़ टॉलस्टाय', दूसरी विक्टर ह्यूगो की 'ले मिज़राब्ल' और तीसरी थॉमस हार्डी की 'फ़ार फ़्रॉम द मैडिंग क्राउड.' क़िताबों को लेकर उनका प्यार इस हद तक था कि वो सुबह होने तक क़िताबों में ही लीन रहते थे."
एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि आप इतना लंबे समय तक पढ़ने के बाद अपना 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन किस तरह करते हैं. उनका जवाब था कि मेरे लिए 'रिलैक्सेशन' यानि मनोरंजन का मतलब एक विषय को छोड़ दूसरे विषय की क़िताब पढ़ना."
आंबेडकरअपने शयनकक्ष को अपनी समाधि समझते थे. बाबासाहेब अपने बिस्तर पर अख़बार पढ़ना पसंद करते थे. एक-दो अख़बारों को पढ़ने के बाद वो बाक़ी अख़बारों को अपने साथ टॉयलेट ले जाते थे. कभी-कभी वो अख़बार और क़िताबें टॉयलेट में छोड़ देते थे. मैं उनको वहाँ से उठा कर उनकी तय जगह पर रख देता था. आंबेडकर पूरी रात पढ़ने के बाद भोर के वक्त सोने के लिए जाते थे. सिर्फ़ दो घंटे सोने के बाद वो थोड़ी कसरत करते थे. उसके बाद वो नहाने के बाद नाश्ता किया करते थे.
अख़बार पढ़ने के बाद वो अपनी कार से कोर्ट जाते थे. इस दौरान वो उन क़िताबों को पलट रहे होते थे जो उस दिन उनके पास डाक से आई होती थीं. कोर्ट समाप्त होने के बाद वो क़िताब की दुकानों का चक्कर लगाया करते थे और जब वो शाम को घर लौटते थे तो उनके हाथ में नई क़िताबों का एक बंडल हुआ करता था.
जहाँ तक बागवानी का सवाल है दिल्ली में उनसे अच्छा और देखने वाला बगीचा किसी के पास नहीं था. एक बार ब्रिटिश अख़बार डेली मेल ने भी उनके गार्डन की तारीफ़ की थी.
वो अपने कुत्तों को भी बहुत पसंद करते थे. एक बार उन्होंने बताया था कि किस तरह उनके पालतू कुत्ते की मौत हो जाने के बाद वो फूट-फूट कर रोए थे.
कभी-कभी छुट्टियों में बाबासाहेब खुद खाना भी बनाते थे और लोगों को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित करते थे.
उनको न तो नशे की किसी चीज़ का शौक था और न ही वो धूम्रपान किया करते थे. एक बार जब उन्हें खाँसी हो रही थी तो किसी ने उन्हें पान खाने का सुझाव दिया. उन्होंने अनुरोध पर पान खाया ज़रूर लेकिन अगले ही सेकेंड उसे ये कहते हुए थूक दिया कि ये बहुत कड़वा है. वो बहुत साधारण खाना खाते थे जिसमें बाजरे की एक रोटी, थोड़ा चावल, दही और मछली के तीन टुकड़े हुआ करते थे.
घर पर काम में आंबेडकर की मदद करने के लिए सुदामा नाम के एक व्यक्ति रखा गया था. एक दिन सुदामा जब देर रात फ़िल्म देख कर लौटे तो उन्होंने सोचा कि उनके घर के अंदर घुसने से बाबासाहेब के काम में विघ्न पड़ेगा. उन्हें पता था कि बाबासाहेब क़िताब पढ़ने में तल्लीन होंगे.
वो दरवाज़े के बाहर ही ज़मीन पर सो गए. आधी रात के बाद जब आंबेडकर ताज़ी हवा लेने बाहर निकले तो उन्होंने दरवाज़े के बाहर सुदामा को सोते हुए पाया. वो बिना आवाज़ किए अंदर चले गए. जब अगले दिन सुबह सुदामा की नींद खुली तो उन्होंने पाया कि बाबासाहेब ने उनके ऊपर अपना ओवरकोट डाल दिया है.
31 मार्च 1950 को मशहूर उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला के बड़े भाई जुगल किशोर बिड़ला आंबेडकर से मिलने उनके निवासस्थान पर आए. कुछ दिनों पहले बाबासाहेब ने मद्रास में पेरियार की उपस्थिति में हज़ारों लोगों के सामने भगवतगीता की आलोचना की थी.
बिड़ला ने उनसे सवाल किया आपने गीता की आलोचना क्यों की जो कि हिंदुओं की सबसे जानीमानी धार्मिक क़िताब है? उनको इसकी आलोचना करने के बजाए हिंदू धर्म को मज़बूत करना चाहिए.
जहां तक छुआछूत को दूर करने की बात है तो वो इसके लिए दस लाख रुपए देने के लिए तैयार हैं. इसका जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा, मैं अपने आप को किसी को बेचने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ. मैंने गीता की इसलिए आलोचना की थी, क्योंकि इसमें समाज को बांटने की शिक्षा दी गई है.
अख़बार पढ़ने के बाद वो अपनी कार से कोर्ट जाते थे. इस दौरान वो उन क़िताबों को पलट रहे होते थे जो उस दिन उनके पास डाक से आई होती थीं. कोर्ट समाप्त होने के बाद वो क़िताब की दुकानों का चक्कर लगाया करते थे और जब वो शाम को घर लौटते थे तो उनके हाथ में नई क़िताबों का एक बंडल हुआ करता था.
जहाँ तक बागवानी का सवाल है दिल्ली में उनसे अच्छा और देखने वाला बगीचा किसी के पास नहीं था. एक बार ब्रिटिश अख़बार डेली मेल ने भी उनके गार्डन की तारीफ़ की थी.
वो अपने कुत्तों को भी बहुत पसंद करते थे. एक बार उन्होंने बताया था कि किस तरह उनके पालतू कुत्ते की मौत हो जाने के बाद वो फूट-फूट कर रोए थे.
कभी-कभी छुट्टियों में बाबासाहेब खुद खाना भी बनाते थे और लोगों को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित करते थे.
उनको न तो नशे की किसी चीज़ का शौक था और न ही वो धूम्रपान किया करते थे. एक बार जब उन्हें खाँसी हो रही थी तो किसी ने उन्हें पान खाने का सुझाव दिया. उन्होंने अनुरोध पर पान खाया ज़रूर लेकिन अगले ही सेकेंड उसे ये कहते हुए थूक दिया कि ये बहुत कड़वा है. वो बहुत साधारण खाना खाते थे जिसमें बाजरे की एक रोटी, थोड़ा चावल, दही और मछली के तीन टुकड़े हुआ करते थे.
घर पर काम में आंबेडकर की मदद करने के लिए सुदामा नाम के एक व्यक्ति रखा गया था. एक दिन सुदामा जब देर रात फ़िल्म देख कर लौटे तो उन्होंने सोचा कि उनके घर के अंदर घुसने से बाबासाहेब के काम में विघ्न पड़ेगा. उन्हें पता था कि बाबासाहेब क़िताब पढ़ने में तल्लीन होंगे.
वो दरवाज़े के बाहर ही ज़मीन पर सो गए. आधी रात के बाद जब आंबेडकर ताज़ी हवा लेने बाहर निकले तो उन्होंने दरवाज़े के बाहर सुदामा को सोते हुए पाया. वो बिना आवाज़ किए अंदर चले गए. जब अगले दिन सुबह सुदामा की नींद खुली तो उन्होंने पाया कि बाबासाहेब ने उनके ऊपर अपना ओवरकोट डाल दिया है.
31 मार्च 1950 को मशहूर उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला के बड़े भाई जुगल किशोर बिड़ला आंबेडकर से मिलने उनके निवासस्थान पर आए. कुछ दिनों पहले बाबासाहेब ने मद्रास में पेरियार की उपस्थिति में हज़ारों लोगों के सामने भगवतगीता की आलोचना की थी.
बिड़ला ने उनसे सवाल किया आपने गीता की आलोचना क्यों की जो कि हिंदुओं की सबसे जानीमानी धार्मिक क़िताब है? उनको इसकी आलोचना करने के बजाए हिंदू धर्म को मज़बूत करना चाहिए.
जहां तक छुआछूत को दूर करने की बात है तो वो इसके लिए दस लाख रुपए देने के लिए तैयार हैं. इसका जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा, मैं अपने आप को किसी को बेचने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ. मैंने गीता की इसलिए आलोचना की थी, क्योंकि इसमें समाज को बांटने की शिक्षा दी गई है.
बाबासाहेब अक्सर नीला सूट पहना करते थे लेकिन कुछ ख़ास मौकों पर वो अचकन, चूड़ीदार पजामा और काले जूते निकालते थे. लेकिन, जब भी वो वायसराय से मिले जाते थे, वो हमेशा भारतीय कपड़े ही पहनते थे. घर पर वो साधारण कपड़े पहना करते थे. गर्मी में वो चार हाथ की लुंगी कमर में लपेट लेते थे. उसके ऊपर वो घुटनों तक का कुर्ता पहनते थे. विदेश में रहने के दौरान से ही वो नाश्ते में दो टोस्ट, अंडे और चाय लिया करते थे. जब वो नाश्ता करते थे तो बाईं तरफ़ उनके अख़बार खुले रहते थे. उनके हाथ में एक लाल पेंसिल रहती थी जिससे वो अख़बारों की मुख्य ख़बरों पर निशान लगाया करते थे.
बाबासाहेब मौज-मस्ती के लिए कभी बाहर नहीं जाते थे. हाँलाकि, वो जिमखाना क्लब के सदस्य थे लेकिन वो शायद ही वहां गए हों. जब भी वो कार से अपने घर लौटते थे तो वो सीधे अपनी पढ़ने की मेज़ पर जाते थे. उनके पास अपने कपड़े बदलने का भी समय नहीं रहता था.
जब भी कोई उन्हें बाहर खाने पर ले जाना चाहता था, उनका जवाब होता था अगर तुम मुझे दावत ही देना चाहते हो, तो मेरे लिए घर पर ही खाना ले आओ. मैं घर से बाहर जाने वाला नहीं. बाहर जाने, वापस आने और व्यर्थ की बातों में मेरा कम से कम एक घंटा बरबाद होगा. इस समय का इस्तेमाल मैं कुछ बेहतर काम के लिए करना चाहूँगा.
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबासाहेब ने वायलिन सीखना शुरू किया था.
बाबासाहेब मौज-मस्ती के लिए कभी बाहर नहीं जाते थे. हाँलाकि, वो जिमखाना क्लब के सदस्य थे लेकिन वो शायद ही वहां गए हों. जब भी वो कार से अपने घर लौटते थे तो वो सीधे अपनी पढ़ने की मेज़ पर जाते थे. उनके पास अपने कपड़े बदलने का भी समय नहीं रहता था.
जब भी कोई उन्हें बाहर खाने पर ले जाना चाहता था, उनका जवाब होता था अगर तुम मुझे दावत ही देना चाहते हो, तो मेरे लिए घर पर ही खाना ले आओ. मैं घर से बाहर जाने वाला नहीं. बाहर जाने, वापस आने और व्यर्थ की बातों में मेरा कम से कम एक घंटा बरबाद होगा. इस समय का इस्तेमाल मैं कुछ बेहतर काम के लिए करना चाहूँगा.
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबासाहेब ने वायलिन सीखना शुरू किया था.