इस समय हमारे भारत देश में श्रीलंका की बहुत चर्चा हो रही है। उसका कारण है वहां का आर्थिक संकट। उसकी आजादी (1948) के बाद से अबतक के सबसे बुरे आर्थिक हालत हैं। वहां लोग बुनियादी चीजों को खरीदने के लिए भटक रहे लोगों को घंटों तक लाइन में लगना पड़ रहा है और वो भी उनको एक सीमित मात्रा में मिल रहा है। इस कारण लोग सडकों पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे, सरकार के मंत्री सामूहिक रूप से इस्तीफा दे रहे हैं। पिछले हफ्ते के बाद दुकानों को बंद करना पड़ा है, क्योंकि फ्रिज, AC या पंखे नहीं चला सकते हैं। लोगों को गैस स्टेशनों पर टैंक भरवाने के लिए घंटों गर्मी में खड़ा होना पड़ रहा है, इन लोगों को संभालने के लिए गैस स्टेशनों पर सैनिकों को तैनात किया गया है। इंतज़ार करते-करते कुछ लोगों की जान भी चली गई। ब्रेड के दाम दोगुने हो गए हैं। कुछ लोगों के लिए हालात और बुरे हैं। उन्हें अपने परिवार का पेट पालने के लिए काम भी करना है और सामान लेने के लिए लाइनों में भी लगना पड़ रहा है। मिडल क्लास के जिन लोगों के पास अपनी सेविंग्स हैं वो भी परेशान हैं, उन्हें डर है कि उनकी दवाइयां या गैस ख़त्म हो सकती है। लगातार हो रहे पावर कट ने राजधानी कोलंबो को अंधेरे में धकेल दिया है। अब सवाल उठता है कि आखिर ये सब हुआ क्यों? क्या ये अचानक से सब हो गया? तो उसका जवाब है नहीं। ये सब अचानक से नहीं हुआ।
इसका पहला कारण तो है वहां पूर्व में हुआ गृह युद्ध जो दशकों तक चला। इस दौरान तत्कालीन सरकार ने बहुत से हथियार ख़रीदे। ये हथियार खरीदने में बहुत बड़ा कर्ज लेना पड़ा। आज की तारीख में श्रीलंका के ऊपर विदेशों का 12 ट्रिलियन कर्ज हो गया है, जिसका बड़ा हिस्सा हथियार खरीदने में लिया गया था। श्रीलंका में तब गृहयुद्ध हो रहा था। उसमें एक तरफ़ वहाँ की बहुसंख्यक सिंहला आबादी थी, दूसरी ओर तमिल अल्पसंख्यक। 1983 में श्रीलंका के अलगाववादी संगठन एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया जो 2009 में समाप्त हुआ। तब महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति थे।
2010 में
हुए चुनाव में और भारी
जीत के साथ दोबारा
राष्ट्रपति चुने गए। 26 साल तक चले
इस संघर्ष ने भी श्रीलंका
की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर किया।
बढ़ते
कर्ज़ के अलावा कई
दूसरी चीज़ों ने भी देश
की अर्थव्यवस्था पर चोट की।
जिनमें
भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं
से लेकर मानव निर्मित
तबाही तक शामिल है।
इसमें
रासायनिक उर्वरकों पर सरकार का
प्रतिबंध शामिल है, जिसने किसानों
की फसल को बर्बाद
कर दिया। हालत
2018 में तब और खराब
हो गए, जब राष्ट्रपति
ने प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर
दिया और उसके बाद
एक संवैधानिक संकट खड़ा हो
गया। इसके
एक साल बाद 2019 के
ईस्टर धमाकों में चर्चों और
बड़े होटलों में सैंकड़ों लोग
मारे गए। और
2020 के बाद से कोविड-19
महामारी ने प्रकोप दिखाया।
इससे
बचे खुचे टूरिज्म पर
और संकट आ गया।
2019 के चुनाव में गोटाबाया राजपक्षे
की पार्टी एसएलपीपी ने चुनाव में
दो बड़े वादे किए
थे, कि वो टैक्स
में कटौती करेगी, और किसानों को
राहत देगी। फिर
अर्थव्यवस्था को संभालने के
लिए राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने टैक्स में
कटौती की की, लेकिन
ये कदम उल्टा पड़
गया और सरकार के
रेवेन्यू पर बुरा असर
पड़ा। जब देश के
पास पैसे का संकट
है तब इस तरह
के फैसले लेना अर्थव्यवस्था को
और नीचे की तरफ
ले गया। उन्होंने
एक फैसला लिया कि अब
यहाँ केवल ऑर्गेनिक फार्मिंग
ही होगी। जबकि
बिना तैयारी के ये फैसला
उत्पादन को एकदम कम
कर देगा। फ़ूड
क्राइसेस का इस फैसले
का बड़ा कारण है।
श्रीलंका मुख्य तौर पर चाय,
रबड़ और कपड़ों जैसे
उत्पादों का निर्यात करता
है, जिससे उसे विदेशी मुद्रा
की कमाई होती है।
इन
पैसों से वो अपने
ज़रूरत की चीज़ें आयात
करता है जिनमें खाने-पीने के सामान
शामिल हैं। यहाँ
की इकोनॉमी का सबसे मजबूत
स्तम्भ है टूरिज्म। लेकिन
आर्थिक संकटों के चलते रेटिंग
एजेंसियों ने श्रीलंका को
लगभग डिफ़ॉल्ट स्तर पर डाउनग्रेड
कर दिया, जिसका मतलब कि देश
ने विदेशी बाज़ारों तक पहुंच खो
दी। इसक
बाद लोगों ने यहां आना
बंद कर दिया। देश के कर्ज
को चुकाने के लिए सरकार
ने विदेशी मुद्रा भण्डार को खर्चा करना
चालू किया, जिसके बाद ये भण्डार
घटकर 2। 2 बिलियन डॉलर
हो गया, जो 2018 में
6। 9 बिलियन डॉलर था। इससे ईंधन और
अन्य ज़रूरी चीज़ों के आयात पर
असर पड़ा और कीमतें
बढ़ गईं।
इन सब कारणों के
आलावा सरकार ने मार्च में
श्रीलंकाई रुपया को फ्लोट किया
मतलब इसकी क़ीमत विदेशी
मुद्रा बाज़ारों की मांग (डिमांड)
और आपूर्ति (सप्लाई) के आधार पर
तय की जाने लगी।
फिर
अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले
रुपये की गिरावट ने
आम श्रीलंकाई लोगों के लिए हालात
और ख़राब कर दिए। परेशान लोग सड़कों पर
उतर चुके हैं, वो
राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से गद्दी छोड़ने
की माँग कर रहे
हैं, वो नारे लगा
रहे हैं - 'गो गोटाबाया गो'। पिछले
सप्ताह प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में
राष्ट्रपति के घर के
बाहर धरना दिया, और
इसके अगले ही दिन
शुक्रवार की रात को
राष्ट्रपति राजपक्षे ने देश में
आपातकाल लगा दिया। शनिवार को सरकार ने
पूरे देश में सोमवार
सुबह तक कर्फ़्यू लगा
दिया, लेकिन इसके बाद भी
रविवार को प्रदर्शन हुए,
और इसके बाद वहाँ
सरकार के सभी 26 मंत्रियों
ने इस्तीफ़ा दे दिया - सिवाय
प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई
और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के।
सरकार को लगे इस
बड़े झटके के बाद
सोमवार को राष्ट्रपति ने
एक फेरबदल करने का प्रयास
किया, उन्हें उम्मीद थी कि ये
कदम विपक्ष को शांत कर
देगा। एक
वित्त मंत्री समेत चार मंत्रियों
को अस्थायी रूप से सरकार
चलाने के लिए नियुक्त
किया गया, जबकि "कैबिनेट
की पूर्ण नियुक्त होने तक" देश
को चलाने के लिए कई
अन्य नियुक्तियां भी की गईं।
लेकिन
एक दिन बाद ही,
अस्थायी वित्त मंत्री ने पद छोड़
दिया। ये
फेरबदल पार्टी को आगे होने
वाले नुक़सान से नहीं बचा
सका। कई
सहयोगी दलों ने सरकार
से समर्थन वापस ले लिया,
जिसके बाद सत्तारूढ़ श्रीलंका
पीपुल्स फ्रंट गठबंधन को मंगलवार तक
41 सीटों का नुक़सान हुआ।
गठबंधन
के पास सिर्फ 104 सीटें
बची थीं, जिसके बाद
उसने बहुमत खो दिया।
श्रीलंका अब आईएमएफ से
वित्तीय सहायता मांग रहा है
और मदद करने में
सक्षम क्षेत्रीय शक्तियों का रुख कर
रहा है। श्रीलंका
ने चीन और भारत
से भी मदद मांगी
है। भारत
पहले ही मार्च में
1 बिलियन डॉलर की क्रेडिट
लाइन जारी कर चुका
है - लेकिन कुछ विश्लेषकों ने
चेतावनी दी कि ये
सहायता संकट को हल
करने के बजाए इसे
खींच सकती है। श्रीलंका के केंद्रीय बैंक
के अनुसार, नेशनल कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन सितंबर में 6। 2% से
फरवरी में 17। 5% यानी लगभग
तीन गुना हो गई
है। और
श्रीलंका को इस साल
के बाक़ी वक़्त में लगभग 4 बिलियन
डॉलर का कर्ज़ चुकाना
है, जिसमें 1 बिलियन डॉलर का अंतरराष्ट्रीय
सॉवरेन बॉन्ड भी शामिल है
जो जुलाई में मैच्योर होता
है।
अब बात अंदरूनी राजनीति
पर, यहाँ पहले सिंघला
बनाम तमिल लड़ाई थी,
फिर सिंघला बनाम मुस्लिम हो
गई। वहां
एक सेंट्रल Constitution सिस्टम है। मतलब
पूरे देश के फैसले
सिंघला मैजोरिटी सरकार लेती है। जिसमें बौद्ध साधु बहुत दखल
रखते हैं। राजनितिक
परिवारों ने भी देश
को बहुत बर्बाद किया
है, पहले भण्डार नायके
और अबराजपक्षे परिवार। और नए विकल्प
आये नहीं हैं। नार्थ श्रीलंका में तमिल/मुस्लिम
इतने बड़े संख्या में
हैं लेकिन इतने नहीं हैं
जो कोई बदलाव ला
सकते हैं। उनके
पोलिटिकल राइट्स से लेकर नागरिकता
तक पर बहुत दबा
कर रखा जाता है।
लेकिन
अब जब बहुसंख्यक लोगों
ने लोगों ने भी इस
राजनीती को झेला है
तो शायद कुछ समझ
में आये। ये हर जगह
के बहुसंख्यक या अति राष्ट्रवादी
लोगों को समझना चाहिए
कि राष्ट्रवाद या अपने धर्म
को महान बनाने की
बातें करने वाले किसी
भी नेता को इतना
भी अँधा होकर सपोर्ट
न किया जाए कि
हालत यहां तक आ
जाएँ।
भारत के नजरिये से देखा जाए तो भारत ने मदद की है लेकिन वहां के तमिल श्रीलंकन जो भारत से जुड़ाव महसूस करते हैं वो भारत के रवैये पर ठगा सा महसूस करते हैं। लेकिन भारत पिछले दो दशक से श्रीलंका के साथ अपने सम्बन्ध चीन को रोकने के नजरिये से ही रख रहा है। भारत को पता है कि जो कर्ज दिया जा रहा है वो मिलने वाला नहीं है, ऐसा कई अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टें कहती हैं, लेकिन फिर भी रणनीतिक तौर पर करोडो डॉलर दिया जा रहा है। श्रीलंका भी भारत की तरफ फिर से वापस आ रहा है। पिछले प्रधानमंत्री भारत के पक्ष के थे लेकिन राजपक्षे खासकर गोटाबाया चीन की तरफ हाथ बढ़ाते दिखते थे लेकिन इस समय उनकी मजबूरी भी हो गई है भारत की तरफ बढ़ना। इसके अलावा भारत के लिए रेफ्यूजी क्राइसिस भी बढ़ेगा। भारत शायद आईएमएफ के आलावा अन्य संस्थाओं से कर्ज चुकाने की समय सीमा को बढ़ाने की भी मदद कर सकता है।
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