इमरान ख़ान ने दावा किया है कि उन्हें सत्ता से बाहर निकालने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में साजिश रची गई थी. उन्होंने किसी भी नई सरकार को स्वीकार करने से इनकार किया है. पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार है कि किसी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव सफल रहा है. इसके बाद अब सोमवार को पाकिस्तान असेंबली का एक अहम सत्र होने वाला है जिसमें नया प्रधानमंत्री चुना जाना है. नए प्रधानमंत्री अगले चुनावों तक यानी अक्तूबर 2023 तक कार्यभार संभालेंगे. असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने के बाद सदन को संबोधित करते हुए पीएमएल-एन के अध्यक्ष शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि आज पाकिस्तान संविधान और क़ानून को फिर से स्थापित करना चाहता है.
पीएमएल-एन के अध्यक्ष शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा है कि हम किसी से बदला नहीं लेंगे लेकिन क़ानून अपना काम करेगा. नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने के बाद सदन को संबोधित करते हुए पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि 10 अप्रैल का ऐतिहासिक महत्व है. उन्होंने सदन को याद दिलाया कि 10 अप्रैल को ही सदन ने 1973 का संविधान पारित किया था. उन्होंने कहा, "पुराने पाकिस्तान में आपका स्वागत है!" वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल ख़ालिद जावेद ख़ान ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
वोटिंग से पहले नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असद कैसर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.असद कैसर के बाद अब पीएमएल-एन नेता अयाज़ सादिक नेशनल असेंबली के सत्र की अध्यक्षता कर रहे हैं. इसी के साथ ही पीएमएल-एन के नेता शाहबाज़ शरीफ़ का पाकिस्तान का नया पीएम बनना तय माना जा रहा है. शाहबाज़ शरीफ़ अभी पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता हैं.
पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रहे इमरान ख़ान 2018 में देश के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने और अर्थव्यवस्था में सुधार का वादा किया. लेकिन आर्थिक संकट में घिरे पाकिस्तान के लिए मुश्किलें बढ़ती गईं. बीते साल मार्च में उनकी पार्टी के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद उनके लिए एक नया राजनीतिक संघर्ष शुरू हो गया था.
माना जाता है कि इमरान ख़ान को पाक सेना का समर्थन हासिल था लेकिन अब पर्यवेक्षकों का कहना है कि सेना से उनकी दूरियां बढ़ी हैं. इमरान ख़ान बार-बार ये आरोप लगाते रहे हैं कि देश का विपक्ष विदेशी ताकतों के साथ मिल कर काम कर रहा है. उनका कहना है कि रूस और चीन के मामले में उन्होंने अमेरिका के साथ खड़े होने से इनकार कर दिया था जिसके बाद उन्हें सत्ता से निकालने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में साजिश रची जा रही थी. अमेरिका ने कहा है कि इमरान ख़ान के आरोपों में 'कोई सच्चाई' नहीं है और कहा है कि उन्होंने इसके पक्ष में कभी कोई सबूत नहीं दिया है.
ये तो हुई वहां की वर्तमान राजनीति की बात. अब हम बात करेंगे कि आखिर वहाँ लोकतंत्र होने के बावजूद कभी सेना कभी विपक्ष कभी कोई सत्ता पलट कर देता है. इसको दो तरीके से देखा जाना चाहिए। पाकिस्तान में दो तरह के प्रधानमंत्री आये, एक तो जो वोटिंग के जरिये इलेक्टेड थे दूसरे जिनको सेना ने बनाया. कुछ प्रधानमंत्री जो पार्टियों से आये वो उन पार्टियों के प्रमुख नहीं थे. उनके ऊपर कोई न कोई सुप्रीम होता था. इसलिए जब भी किसी प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र रुपए से काम करने की कोशिश की उसके काम में दखल किया गया.
इस दखल का मुख्य केंद्र होती है वहां की सेना. वहां के जानकार पत्रकार या अन्य लोग बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना हमेशा से अमेरिका की तरफ झुकाव वाली रही है. इसका कारण है सेना को अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक, हथियारों और ट्रेनिंग की मदद. इसको इससे समझिये कि पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पहली यात्रा ही अमेरिका में की थी. पकिस्तान का ज्यादातर बिजनेस वेस्टर्न देशों में होता है, वहाँ के पत्रकार नेता, सेना के लोग ज्यादातर वेस्टर्न से ही पढ़े लिखे हैं. हम आजादी के बाद 1960 के दशक में जाएँ तो देखेंगे कि वो दौर कोल्ड वार का था, और पकिस्तान मिडल ईस्ट में भौगोलिक तरीके से बहुत मुख्य जगह है. इसलिए वेस्टर्न के देशों ने उसकी मदद के बहाने प्रयोग भी किया.
अगर कोई देश पोलिटिकली स्टैब्लिश नहीं है तो आप वहां उद्योग, शिक्षा, सामाजिक माहौल ठीक रहेगा, ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं. और डेमोक्रेसी फेल होने का भी कारण है वहाँ सेना के सर्वोच्च होना. फिर मार्शल लॉ के आगे किसी संस्था का बैलेंस चेक नहीं होता है. सेना के बड़े बड़े लोग खूब पैसा कमा रहे, जमीनों पर कब्जा कर रहे, इससे वहाँ का विकास कैसे होगा?
पाकिस्तान में क्षेत्रवाद एक बड़ा मसला है। वहां पंजाबी आबादी बड़ी संख्या में है, जिनका आर्मी और ब्यूरोक्रेसी में 70% दबदबा है। दूसरी तरफ बलूचिस्तान हिस्टोरिकली बहुत महत्वपूर्ण है, जिसको पंजाबी डोमिनेंस का बड़ा नुकसान हुआ है। सिंध में पंजाबी सिंधी का बड़ा मसला रहा है, जिसमें भुट्टो परिवार को बहुत दबाया गया विभिन्न सरकारों द्वारा। इसी सिंध में कराची शहर में भारत से गए मुहाजिरों के साथ भी खूब अन्याय हुआ है। खैबरपख्तून में अफगानिस्तान जैसे मसलों के अलावा पेशावर में हथियारों की मंडी होना।
पीओके में भी पाकिस्तान अपनी अलग तरह की राजनीति में फंसा रहता है।
इमरान खान के आने से लोगों को लगा कि बदलाव होगा लेकिन उनकी सरकार में बैठे मंत्री ही तो नवाज शरीफ की सरकार में लूट कर रहे थे। यही लोग जो हमेशा से ईश निंदा जैसे कानूनों के आरोप में विरोधियों अल्पसंख्यकों को फंसाकर उनको चौराहों पर फांसी दिलाते थे, वही आज कर रहे हैं।
कुछ लोग वहां डेमोक्रेसी फेल होने का कारण समझते हैं कि पाकिस्तान वेस्टर्न डेमोक्रेसी और इस्लामिक स्टेट के बीच फंसा है, जबकि मुझे ऐसा लगता है कि तुर्की जैसे बहुत से देश हैं जो वेस्टर्न डेमोक्रेसी के साथ साथ इस्लामिक प्रभाव भी अच्छे से चला रहे हैं। पाकिस्तान में दिक्कत ये है कि इस्लाम में भी बहुसंख्यकवाद है। दो तरह के इस्लाम नहीं चल सकते फिर। मतलब पार्लियामेंट या इस्लाम दोनों ही ठीक से प्रैक्टिस में नहीं लाए जाते।
भारत और पाकिस्तान में एक बड़ा फर्क है। भारत अपनी आजादी के बाद से आजतक विदेशनीति पर अपनी स्वतंत्र रूप से चलने वाली नीति प्रयोग करता है। बीच बीच में कुछ गड़बड़ाते हैं लेकिन चीन, अमेरिका से लेकर रूस यूक्रेन तक पर अपने तरीके से बात करता है।
पाकिस्तान में उसकी अंदरूनी राजनीति मतलब नेशन बिल्डिंग और विदेशनीति करने का एक ही समय आया। भारत में काश्मीर में सेख अब्दुल्ला, साउथ में द्रविड़ आंदोलन, पूर्वोत्तर में हुए आंदोलन हर जगह भारत ने सफलता पूर्वक इन सबको हैंडल किया और भारत में संप्रभुता को बनाए रखा। हमारे यहां कितनी भी राजनीति हो जाए, सरकारें बने बिगड़े लेकिन उसका स्तर इतना नहीं है कि रोजाना संसद में लात घूंसे चलने लगें। कभी किसी विधानसभा में कुछ होता है तो हमारे लिए बहुत शॉकिंग होता है जबकि पाकिस्तान में ये सब आम बातें हैं। पाकिस्तान के मुकाबले यहां आर्थिक तौर पर मजबूती है। भले यहां आर्थिक विसमता है लेकिन आर्थिक रिसोर्सेज बहुत सारे हैं जिससे सब ठीक ठाक चलता रहता है। मतलब भारत के पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ है। अभी एक दिन इमरान खान भी ये बात भारत के विषय में अपने भाषण में कह रहे थे।
दूसरी तरफ पाकिस्तान में रूलिंग एलीट मतलब पंजाबी सिंधी लोगों ने हर तरह से फायदा उठाया जिसकी वजह से मिलिट्री देश की सर्वोच्च संस्था बन गई। फिर उस आर्मी ने भारत, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के खिलाफ जिस आतंकवाद को फॉरेन पॉलिसी, इस्लाम, न्याय समझकर बढ़ाया उसकी सबसे बड़ा भुक्तभोगी है पाकिस्तान की जनता। जिस तरह पाकिस्तान टेरर फैक्ट्री और हथियारों की स्मगलिंग का अड्डा है, उसी तरह सबसे दुनियां का सबसे ज्यादा आतंक का शिकार देश भी है। और जो आतंकी लोग हैं वो बन गए वहां के बिजनेसमैन। अजहर मसूद जैसे लोगों को चीन की परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए पैसा मिलने लगा। तहरीक ए तालिबान लब्बैक जैसे संगठन आए जिनसे इमरान खान राजनीतिक समझौते करने लगे।
पाकिस्तान के लीडरशिप, आर्मी के लोगों और एलिट क्लास ने इसकी आड़ में खूब फायदा उठाया। वो अमेरिका के खिलाफ माहोल को भुनाते भी हैं और पैसा भी निकाल लेते हैं। जैसा फिलहाल इमरान खान कर रहे हैं। दूसरी तरफ अभी अमेरिका का स्टैंड इससे समझिए कि बराक ओबामा के समय जो बाइडन उप राष्ट्रपति थे वो आज राष्ट्रपति हैं। जो हमेशा से कहते आए हैं कि न्यूक्लियर हथियार आतंकी लोगों के हाथ नहीं लगने चाहिए।
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