Sunday, March 15, 2015

महाराष्ट्र सरकार का गैर लोकतांत्रिक फैसला

महाराष्ट्र में बीफ पर रोंक लगा दी गई है। मैं इसको सीधे सीधे गलत या सही ना कहकर कुछ बातों पर विस्तार पूर्वक चर्चा करना चाहता हूँ। सबसे पहली बात तो यह क़ि इसे हिन्दू धर्म की भावनाओं के साथ जोड़ा जा रहा है। हिन्दू धर्म में गाय  पूज्यनीय होती है, और उसको मारना या काटना बहुत गलत बात है। लेकिन कानून के अनुसार बीफ की परिभाषा कुछ और ही है। बीफ में बछड़े, बैल, गाय, भैंस-भैंसा या अन्य किसी बड़े जानवर (नील गाय) को काटना अपराध मान जाएगा। मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ, और शाकाहार को बहुत समर्थन करता रहा हूँ। लेकिन आप एक लोकतांत्रिक देश में यह कैसे तय कर सकते हैं क़ि किसको क्या खाना है? किसकों क्या नहीं खाना है। कल को आप बोले देंगे क़ि आपको एक टाइप की ही ड्रेस पहननी है, ऐसा तो लोकतंत्र में नहीं होता है। जो जैसा मन में आए पहने? मेरा मन है तो मैं जींस-शर्ट, लड़की का मन है तो वो भी यही पहने, उसको आपसे के क्या मतलब? अगर कोई गलत कपड़े पहनता है तो वो उसकी नैतिकता का सवाल है। किसी पर अपने विचार थोपना तो ठीक नहीं है।  आप कल को यह भी कह सकते हैं कि सबको शाकाहारी होना पड़ेगा। क्योंकि किसी भी हिन्दू धर्म ग्रंथ, गीता, रामायण, पुराण, में किसी संत या भगवान ने कभी नहीं कहा है क़ि मांस खाओ, यह कैसे शुरु हुआ उसका अलग इतिहास होगा। उसमें हम क्यों जाएँ? जब गाय की हत्या, अपराध है, तो अन्य जीवों पर भी दया करो, मुर्गी, मछली, बकरे को मारकर क्यों खाया जाए? लेकिन ऐसा मैं नहीं मानता हूँ। अगर आप इस बात पर हिन्दू धर्म का उदाहरण देते हैं, तो आपको बता दूं क़ि उसी हिन्दू धर्म में लिखा है कि जो जैसा करेगा, उसको उसके अनुसार भगवान फल देगा? तो आप (सरकार) कौन होते हैं, उनको सजा देने वाले? जो इंसान जो खाता है, उसको पूरी आजादी दी जाए। मैं यह बात तो मान सकता हूं कि हिन्दू बाहुल देश है, गाय की हत्या पर रोंक ठीक है। अगर यह बात आराम से मुस्लिमों को समझा दी जाए, तो वो मान जाएगे। आपको पता होना चाहिए क़ि देश में केवल एक राजा ऐसा था जिसने गाय हत्या पर रोंक लगाई थी, वो राम, कृष्ण, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप नहीं थे, वो था सम्राट अकबर। उससे ज्यादा सेकुलर कौन हो सकता है। इसी प्रकार अगर आपको गलत लगता है तो गाय हत्या पर रोंक लगा सकते हो। ज्यादा कड़ी सजा नहीं भी हो तो भी लोग मान जाएंगे। वो तब ज्यादा इस नियम को तोड़ेगे जब आप उनपर ताने मारेगे, रोज रैली, भाषण और राजनीति करके उनको नीचा दिखाएँगे।
लेकिन उससे ज्यादा हमें भी कुछ सवालों पर ध्यान देना होगा। क्या हम भी गाय माता को अपने फायदे के लिए प्रयोग नहीं करते हैं? जबतक गाय दूध देती है, तब तक तो रखा, नहीं तो छोड़ देते है, आप दिल्ली, मुम्बई में तो नहीं लेकिन पुणे, नागपुर, कानपुर, लखनऊ, जैसे पूरे भारत के सैकड़ों शहरों में लाखों गायों को आवारा घूमते हुए देखेगे। फिर तो उनको कोई भी खाने को कुछ नहीं देता है। पॉलिथीन की थैलियाँ कचरे से खाती हैं, और मर जाती हैं। तभी तो कसाई उनको पकड़कर काटने लगता है। उसको कसाई के हवाले करने वालो को पहले सजा होना चाहिए। गावों में जहाँ उनको खाने का चारा होता है, वहां कोई भी किसान भैंस के आगे गाय नहीं रखना चाहता है, क्योंकि गाय में फायदा कम है। जिसके खेत में फसल खाने लगती है, वो भी मारकर भगा देता है। नील गाय(जंगली गाय) को नागपुर में यही राष्ट्रवादी आर एस एस की पंचायते मारने का फरमान जारी करती हैं। क्यों ना सरकार गायों को बचाने के लिए गौशाला, चारागाह जैसी व्यवस्था करे? जो  उससे फायदा हो वही खर्चा करने की जरूरत हो बस एक बार सिस्टम बन जाए। लेकिन फिर इसपर राजनीति बंद हो जाएगी, इस डर से ऐसा नहीं करते हैं। हम किसान और हिन्दुत्व का झंडा उठाने वालों को भी गाय के प्रति सत्यता दिखानी चाहिए। उसकी सेवा क्यों नहीं करते हैं। उसके अंत समय तक, घर पर रखकर सेवा करो, मरने के लिए गालियों में मत छोड़ दो। बैल का प्रयोग ट्रैक्टर की वजह से बंद हो गया। मेरे गाँव में कम से कम 40-50 ट्रैक्टर होगे, लेकिन बैल मुस्किल से 1-2 या दो जोड़ी। ऐसे तो बैलों का जब कुछ काम नहीं है तो उनको लोग काटेगे ही। कहा जाएगे वो?
पहले खुद को संभाला जाए, फिर दूसरे पर अंगुली उठाई जाए। अगर हम गाय का संरक्षण और सेवा खुद करेगे, तो उसको मारने वालों के वश में कुछ नही रहेगा। उनको गाय मिलेगी ही नहीं तो कैसे काटेगे? यही हिन्दुत्व है। लेकिन खुद तो गाय माँ को अपना फायदा निकाल कर छोड़ दो, उसको थोड़ा सा पानी भी नहीं पिला सकते हो। और दूसरों पर आरोप लगाकर साम्प्रदायिकता की राजनीति करो, यह तो गलत है। गाय की बात के अलावा अन्य जानवरों की बात की जाए तो उसपर रोंक लगाना बिल्कुल गलत है। यह तो जबरजस्ती वाली राजनीति हो जाएगी। मैं उपर कही गई बात को दोहराते हुए फिर कहना चाहता हूँ कि आप (सरकार) यह तय मत करे कि किसको क्या खाना है? हो सकता है क़ि आपके हिन्दुत्व वादी आका कल को देश में किसी भी प्रकार के मांस पर रोंक लगा दें। क्योकि ये लोग मोहर्रम में बकरे काटने पर रोंक की बात करते रहे हैं। अगर बकरे काटने पर रोंक लगी तो सबको समस्या होगी। वैसे आपको बता दूं कि एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 18% मुस्लिम हैं। और उन 18% में से भी 85-90% मांसाहारी हैं। बाकी के 80+% हिन्दुओं में भी लगभग 70% लोग मांसाहारी हैं। क्या आप 70 हिन्दू+1620% मुस्लिम लोगों के साथ अन्याय नहीं करेगे? अगर इन लोगों को पता होता कि आप ऐसा करेगे तो आपको कभी भी वोट नहीं देते। बहुत सारी हिन्दू जातियाँ, महाराष्ट में ही हैं जो बड़े जानवर का मांस खाती हैं। अगर बड़े का मांस बंद हुआ तो भी लोग मांस खाना तो बंद नहीं कर देगे, बाकी वैकल्पिक मांस(मुर्गी या मछली) का प्रयोग करेगे। ऐसे में अर्थशास्त्र के सीधे से नियम के अनुसार मांस की मंहगाई बहुत बढ जाएगी, जिसतक गरीब आदमी की पहुंच नहीं रह जाएगी।
इसका दूसरा पहलू भी आपको मैं बताना चाहता हूँ, सरकार ने एक तरफ तो बीफ पर रोंक लगाई दूसरी तरफ बजट में 1200 से अधिक कीमत वाले चमड़े के जूते सस्ते कर दिए हैं। आपको बता दूं कि महंगे जूते नरम चमड़े (बछड़े या गाय के चमड़े) से बनाए जाते हैं। 1200 से अधिक कीमत के जूते तो गरीब आदमी नहीं पहनता है। इसलिए यहाँ पर आप सरकार की दोहरी और गरीब विरोधी नियत को देख सकते हैं। चमड़े का व्यापार पूरे देश  के लिए बहुत अहम है, महाराष्ट में भी इसपर क्या असर पड़ेगा, इसको लेकर मैने नवभारत टाइम्स में एक रिपोर्ट पढी। जिसके अनुसार इस प्रतिबंध से लेदर उद्योग में लगे लोगों की आजीविका छिन जाने का खतरा मंडरा गया है। लोगों का मानना है कि इससे चमड़े की खाल की कीमत बढ़ जाएगी जो अप्रत्यक्ष रूप से चीनी प्रॉडक्ट्स को फायदा पहुंचाएगा। लोगों का रुझान चीन के सस्ते प्रॉडक्ट्स की ओर हो जाएगा।
महाराष्ट्र में गाय, बैल और बछड़ों को मारने पर लगे व्यापाक प्रतिबंध के कारण पहले से ही अस्तित्व संकट से जूझ रहे कोल्हापुर के लेदर मार्केट की हालत और दयनीय होने का खतरा गहरा गया है। कोल्हापुरी के नाम से मशहूर लेदर फुटवेअर के निर्माताओं पर संकट मंडराने लगा है। पिछले दशक से सामाजिक कार्यकर्ता, शैक्षणिक संस्थान, राजनीतिज्ञ और प्रशासक दम तोड़ रहे इस उद्योग में नई जान डालने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन बीफ पर महाराष्ट्र में हालिया प्रतिबंध से उन सबके प्रयासों पर पानी फिर सकता है।

मजे की बात तो यह है कि कोल्हापुर को लेदर उद्योग में जान डालने की बात हर नेता करता है लेकिन इसकी दुर्दशा के प्रति सभी उदासीन है। पिछले साल लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोल्हापुर के हाथ-पैर मार रहे लेदर व्यापार के प्रति सहानुभूति प्रकट की थी। उन्होंने कहा था, 'आज पूरे देश को कोल्हापुर की चप्पल की जरूरत है, ताकि पूरा देश तेज गति से चले।' लेकिन, उनकी ही सरकार के दौरान इस तरह का प्रतिबंध दुर्भाग्यपूर्ण है।

अनुमान के मुताबिक, हर साल पूरे राज्य में करीब 3,00,000 बछड़ों को काटा जाता है और उनकी खाल (चमड़ी) को लेदर के सामान तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, गौहत्या पर प्रतिबंध होने के कारण चमड़े की खाल उपलब्ध नहीं हो पाएगी। मुंबई का धरावी इलाका लेदर प्रॉडक्ट्स बिजनस का बहुत बड़ा गढ़ हैं, अब वहां के व्यापारियों को इस साल बहुत ही खराब मौसम जाने का भय सता रहा है। इससे खाल की कीमत दोगुन हो जाएगी जिसका फायदा चीन के कृत्रिम लेदर और कृत्रिम सामग्री को मिलेगा। करीब 15,000-20,000 छोटी कारोबारी इकाइयां इस व्यापार में लगी हुई हैं जो बैग, वैलट, जूते और अन्य लेदर प्रॉडक्ट बनाते हैं। चमड़े की कीमत में इजाफे से उनका जीवन-यापन कठिन हो जाएगा।

Wednesday, March 11, 2015

आप का अंतर्कलह



आम आदमी पार्टी में इस समय चल रहा संघर्ष एक हद तक जा चुका है। उसमें यह लड़ाई विचारधारा और नैतिकता बनाम ईमादारी+व्यवहारिक राजनीति के बीच चल रही है। इसप्रकार से देखा जाए तो आप पाते हैं क़ि इस दल में शुरु से तीन तरह के लोग थे। पहले थे जो जिंदगी भर से समाज सेवा करते आए हैं। वो किसी भी कीमत पर समझौता नहीं कर सकते हैं। इस पंक्ति में मेधा पटकर, अन्ना, कैप्टन गोपीनाथ, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण हैं। ये लोग ऐसे हैं जो राजनीति में सत्ता या पद नहीं चाहते हैं, लेकिन बदलाव करना चाहते हैं। इनकी आवाज पूरी तरह से उठनी चाहिए। ये लोग अन्य दलों में कभी भी सामिल नहीं हो सकते हैं। लेकिन आप में अपने विचारों को दबता देख दूर हो गए। दरअसल व्यवहारिक राजनीति में यह संभव भी नहीं है। अगर आप यहाँ पूरी तरह से नैतिक बनकर आते हैं तो पागल समझे जाएंगे। ऐसा अरविन्द के इस्तीफे के समय हो चुका है। राजनीति में कुछ बातें घर मे होनी चाहिए, हर बात को आप पब्लिक प्लेस पर नहीं कह सकते हैं, यही काम इसमें भारी पड रहा है। इसमें दूसरे तरह के जो लोग हैं, वो किसी ना किसी जगह अपनी अच्छी जिंदगी जी रहे थे, लेकिन अन्ना आन्दोलन के समय एक जोश में आकर राजनीति मे उतारने का फैसला किया। इसमें अरविन्द, मनीष, कुमार, आशीष, दिलीप और आशुतोष जैसे हजारों कार्यकर्ता हैं, जो विदेशों तक से बड़ी बड़ी नौकरियाँ छोड़कर गए। इनकी मंशा या ईमानदारी पर आप सवाल तो नहीं उठा सकते हो। लेकिन यह जरूर है कि इनमें अन्य दलों को हराने के लिए एक समझौते वाली राजनीति करने का मूड दिखता है। ये पूरी तरह से राजनीतिक हैं, इसलिए इनसे कुछ गलतियाँ संभव हैं, लेकिन इनकी नियत पर सवाल नहीं खड़े हो सकते हैं। असली लड़ाई इनके और ऊपर वाली कैटेगरी के लोगों के बीच ही है। ये लोग अरविन्द के घोर समर्थक हैं, पार्टी के भीतर या बाहर जहाँ कहीं भी अरविन्द के खिलाफ आवाज उठेगी, ये उसको आप का आडवानी बनाने की कोशिशें करने लगेगें।
इसमें जो तीसरी श्रेणी के लोग हैं उनमें कुछ ऐसे लोग आते हैं, जो आप को एक ऐसी नई पार्टी देखकर उसमें शामिल हुए थे, जिसमें नएपन के कारण बड़े पद की लालसा थी। आप देखेंगे कि साजिया, बिन्नी, आश्विनी जैसे कई नेता आए और दूसरे दलों में शामिल हो गए। या तो वो इस साफ जगह घुटन महसूस कर रहे होंगे या उनको यहाँ पर भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखा होगा।
मैं अभी तक आम आदमी पार्टी को को राजनैतिक दल मानने को तैयार नहीं हूँ। क्योंकि राजनैतिक दल इसके जैसे तो नहीं होते हैं। आप देख लीजिए कांग्रेस, सपा, शिवसेना, राजद और अकाली दल में जहाँ एक ही परिवार का शासन है, वहीं भाजपा, बसपा, डीएमके, त्रणमूल, जेडीयू जैसे दलों में उसके सुप्रिमों से हटकर किसी की भी बोलने की दम नहीं होती है। इस घोर राजनीतिक देश में इस परम्परा से हटकर एक बार कोशिश 70 के दशक में हुई थी, जब जेपी आन्दोलन से एक पार्टी निकली और पूरी तरह से साफ, ईमानदार राजनीति की कोशिश की गई, लेकिन उसका नतीजा यह है कि कुछ सालों में ही ऐसा बिखराव हुआ जो आज अखिलेश और नीतीश जैसे नेता जनता दल परिवार की एकजुटता के नाम पर समेट रहे हैं। उसी का पार्ट-2 अन्ना आन्दोलन से निकली आम आदमी पार्टी में देखने को मिल रहा है। ठीक उसी तरह के टकराव हो रहे हैं। इसमें भी कोई अलग दल बन जाए तो आपको सरप्राइज नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसके वैचारिक नेताओं वाले दल में प्रशांत, योगेन्द्र का समर्थन, प्रो। आनंद कुमार, और कुमार विश्वास जैसे बड़े नेताओं ने किया था। और योगेन्द्र पहले ही कह चुके हैं क़ि  हम जैसे लोगो के लिए और किसी भी पार्टी में जगह नहीं है। हम यही पर लड़ेगे और अपने अंदर सुधार करेगे। अगर कोई राजनैतिक दल जैसी कोई बात आगे बढ़ती है तो इसका मतलब होगा क़ि 40% कार्यकर्ता इन नेताओं (कुमार विश्वास) के साथ जा सकते हैं। खैर यह तो अभी भविष्य के गर्भ में छुपा है। लेकिन यह लड़ाई यहीं नहीं थमने वाली है इसके कुछ बड़े निष्कर्ष निकलेंगे। यह अच्छी बात भी है कि इस माहौल में एक दल है जो चर्चा सार्वजनिक कर रहा है, अन्यथा हमने देश की राजनीति देखी है, जहाँ लोकतंत्र और चर्चा के नाम पर कैसा खेल खेला जा सकता है। हो सकता है कि ये आम आदमी पार्टी वाले नौसिखिए हों और उनको राजनीति ना आती हो लेकिन उनकी नियत पर आप सवाल नहीं उठा सकते हैं, कम से कम एक को दूसरे का जवाब मिल रहा है, जो पत्रों के माध्यम से हम सब को देखने को मिल रहा है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...