आम आदमी
पार्टी में इस
समय चल रहा
संघर्ष एक हद
तक जा चुका
है। उसमें यह
लड़ाई विचारधारा और
नैतिकता बनाम ईमादारी+व्यवहारिक राजनीति के
बीच चल रही
है। इसप्रकार से
देखा जाए तो
आप पाते हैं
क़ि इस दल
में शुरु से
तीन तरह के
लोग थे। पहले
थे जो जिंदगी
भर से समाज
सेवा करते आए
हैं। वो किसी
भी कीमत पर
समझौता नहीं कर
सकते हैं। इस
पंक्ति में मेधा
पटकर, अन्ना, कैप्टन
गोपीनाथ, योगेन्द्र यादव और
प्रशांत भूषण हैं।
ये लोग ऐसे
हैं जो राजनीति
में सत्ता या
पद नहीं चाहते
हैं, लेकिन बदलाव
करना चाहते हैं।
इनकी आवाज पूरी
तरह से उठनी
चाहिए। ये लोग
अन्य दलों में
कभी भी सामिल
नहीं हो सकते
हैं। लेकिन आप
में अपने विचारों
को दबता देख
दूर हो गए।
दरअसल व्यवहारिक राजनीति
में यह संभव
भी नहीं है।
अगर आप यहाँ
पूरी तरह से
नैतिक बनकर आते
हैं तो पागल
समझे जाएंगे। ऐसा
अरविन्द के इस्तीफे
के समय हो
चुका है। राजनीति
में कुछ बातें
घर मे होनी
चाहिए, हर बात
को आप पब्लिक
प्लेस पर नहीं
कह सकते हैं,
यही काम इसमें
भारी पड रहा
है। इसमें दूसरे
तरह के जो
लोग हैं, वो
किसी ना किसी
जगह अपनी अच्छी
जिंदगी जी रहे
थे, लेकिन अन्ना
आन्दोलन के समय
एक जोश में
आकर राजनीति मे
उतारने का फैसला
किया। इसमें अरविन्द,
मनीष, कुमार, आशीष,
दिलीप और आशुतोष
जैसे हजारों कार्यकर्ता
हैं, जो विदेशों
तक से बड़ी
बड़ी नौकरियाँ छोड़कर
आ गए। इनकी
मंशा या ईमानदारी
पर आप सवाल
तो नहीं उठा
सकते हो। लेकिन
यह जरूर है
कि इनमें अन्य
दलों को हराने
के लिए एक
समझौते वाली राजनीति
करने का मूड
दिखता है। ये
पूरी तरह से
राजनीतिक हैं, इसलिए
इनसे कुछ गलतियाँ
संभव हैं, लेकिन
इनकी नियत पर
सवाल नहीं खड़े
हो सकते हैं।
असली लड़ाई इनके
और ऊपर वाली
कैटेगरी के लोगों
के बीच ही
है। ये लोग
अरविन्द के घोर
समर्थक हैं, पार्टी
के भीतर या
बाहर जहाँ कहीं
भी अरविन्द के
खिलाफ आवाज उठेगी,
ये उसको आप
का आडवानी बनाने
की कोशिशें करने
लगेगें।
इसमें जो तीसरी
श्रेणी के लोग
हैं उनमें कुछ
ऐसे लोग आते
हैं, जो आप
को एक ऐसी
नई पार्टी देखकर
उसमें शामिल हुए
थे, जिसमें नएपन
के कारण बड़े
पद की लालसा
थी। आप देखेंगे
कि साजिया, बिन्नी,
आश्विनी जैसे कई
नेता आए और
दूसरे दलों में
शामिल हो गए।
या तो वो
इस साफ जगह
घुटन महसूस कर
रहे होंगे या
उनको यहाँ पर
भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखा
होगा।
मैं अभी
तक आम आदमी
पार्टी को को
राजनैतिक दल मानने
को तैयार नहीं
हूँ। क्योंकि राजनैतिक
दल इसके जैसे
तो नहीं होते
हैं। आप देख
लीजिए कांग्रेस, सपा,
शिवसेना, राजद और
अकाली दल में
जहाँ एक ही
परिवार का शासन
है, वहीं भाजपा,
बसपा, डीएमके, त्रणमूल,
जेडीयू जैसे दलों
में उसके सुप्रिमों
से हटकर किसी
की भी बोलने
की दम नहीं
होती है। इस
घोर राजनीतिक देश
में इस परम्परा
से हटकर एक
बार कोशिश 70 के
दशक में हुई
थी, जब जेपी
आन्दोलन से एक
पार्टी निकली और पूरी
तरह से साफ,
ईमानदार राजनीति की कोशिश
की गई, लेकिन
उसका नतीजा यह
है कि कुछ
सालों में ही
ऐसा बिखराव हुआ
जो आज अखिलेश
और नीतीश जैसे
नेता जनता दल
परिवार की एकजुटता
के नाम पर
समेट रहे हैं।
उसी का पार्ट-2
अन्ना आन्दोलन से
निकली आम आदमी
पार्टी में देखने
को मिल रहा
है। ठीक उसी
तरह के टकराव
हो रहे हैं।
इसमें भी कोई
अलग दल बन
जाए तो आपको
सरप्राइज नहीं होना
चाहिए। क्योंकि इसके वैचारिक
नेताओं वाले दल
में प्रशांत, योगेन्द्र
का समर्थन, प्रो।
आनंद कुमार, और
कुमार विश्वास जैसे
बड़े नेताओं ने
किया था। और
योगेन्द्र पहले ही
कह चुके हैं क़ि
हम
जैसे लोगो के लिए और किसी भी पार्टी में जगह नहीं है। हम यही पर लड़ेगे और अपने अंदर
सुधार करेगे। अगर कोई राजनैतिक दल जैसी कोई बात आगे बढ़ती है तो इसका मतलब होगा क़ि
40% कार्यकर्ता इन नेताओं (कुमार विश्वास) के साथ जा सकते हैं। खैर यह तो अभी भविष्य
के गर्भ में छुपा है। लेकिन यह लड़ाई यहीं नहीं थमने वाली है इसके कुछ बड़े निष्कर्ष
निकलेंगे। यह अच्छी बात भी है कि इस माहौल में एक दल है जो चर्चा सार्वजनिक कर रहा
है, अन्यथा हमने देश की राजनीति देखी है, जहाँ लोकतंत्र और चर्चा के नाम पर कैसा खेल
खेला जा सकता है। हो सकता है कि ये आम आदमी पार्टी वाले नौसिखिए हों और उनको राजनीति
ना आती हो लेकिन उनकी नियत पर आप सवाल नहीं उठा सकते हैं, कम से कम एक को दूसरे का
जवाब मिल रहा है, जो पत्रों के माध्यम से हम सब को देखने को मिल रहा है।
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