Monday, October 8, 2018

विशाखा गाइड लाइंस

कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के चलते सोशल मीडिया पर आजकल एक बार फिर #Mएटू हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, और एक के बाद एक कई महिलाओं और लड़कियों ने अपने खिलाफ हुई हरकतों पर ज़ुबान खोली है. इसी संदर्भ में हाल ही कॉमेडी कलेक्टिव ऑयिब के पूर्व-कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती पर भी आरोप लगाए गए, और ऑयिब ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. इनमें से लगभग सभी के साथ उनके कार्यस्थल पर गलत व्यवहार किया गया, सो, इन हरकतों के खिलाफ मुल्क में मौजूद सख्त कानूनों का ज़िक्र होना स्वाभाविक है. हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले इस तरह के अत्याचार के विरुद्ध कड़ा कानून सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के रूप में पहले से मौजूद है, जिन्हें 'विशाखा गाइडलाइन्स'  के रूप में जाना जाता है.
दरअसल, कुछ दशक पहले राजस्थान में हुए भंवरी देवी गैंगरेप केस के बाद महिलाओं के प्रति अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली संस्था विशाखा ने जो पेटिशन दायर की थी, उसी के मद्देनज़र साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिए ये दिशानिर्देश जारी किए थे, और सरकार से आवश्यक कानून बनाने के लिए कहा था. 'विशाखा गाइडलाइन्स' जारी होने के बाद वर्ष 2012 में भी एक अन्य याचिका पर सुनवाई के दौरान नियामक संस्थाओं से यौन हिंसा से निपटने के लिए समितियों का गठन करने को कहा था, और उसी के बाद केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2013 में 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वीमन एट वर्कप्लेस एक्ट' को मंज़ूरी दी थी. 'विशाखा गाइडलाइन्स'   के तहत किसी को भी गलत तरीके से छूना या छूने की कोशिश करना, गलत तरीके से देखना या घूरना, यौन संबंध स्थापित करने के लिए कहना या इससे मिलती-जुलती टिप्पणी करना, यौन इशारे करना, महिलाओं को अश्लील चुटकुले सुनाना या भेजना, महिलाओं को पोर्न फिल्में या क्लिप दिखाना - सभी यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है.
क्या हैं विशाखा गाइडलाइन

    हर ऐसी कंपनी या संस्थान के हर उस कार्यालय  में, जहां 10 या उससे ज़्यादा कर्मचारी हैं, एक अंदरूनी शिकायत समिति (इन्टर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी) की स्थापना करना अनिवार्य होता है.
    इक की अध्यक्ष महिला ही होगी और कमेटी में अधिकांश महिलाओं को रखना भी ज़रूरी होता है. इस कमेटी में यौन शोषण के मुद्दे पर ही काम कर रही किसी बाहरी गैर-सरकारी संस्था (गो) की एक प्रतिनिधि को भी शामिल करना ज़रूरी होता है.
    कंपनी या संस्थान में काम करने वाली महिलाएं किसी भी तरह की यौन हिंसा की शिकायत इक से कर सकती हैं. यह कंपनी अथवा संस्थान का उत्तरदायित्व होगा कि शिकायतकर्ता महिला पर किसी भी तरह का हमला न हो, या उस पर कोई दबाव न डाला जाए.
    कमेटी को एक साल में उसके पास आई शिकायतों और की गई कार्रवाई का लेखाजोखा सरकार को रिपोर्ट के रूप में भेजना होगा. अगर कमेटी किसी को दोषी पाती है, तो उसके खिलाफ इप्सी की संबंधित धाराओं के अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जानी होगी

Sunday, October 7, 2018

किसानों की समस्या पर कितना गंभीर है सरकार?

नाबार्ड यानी राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक ने जनवरी से जून 2017 के बीच एक सर्वे किया. इस सर्वे के मुताबिक देश के 87 फीसद किसानों के पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है. अगर आपका खेती-किसानी से थोड़ा सा भी साबका रहा है/होगा, तो समझ सकते हैं कि दो एकड़ जमीन कितनी होती है और इसमें क्या उपजाकर कितना कमाया जा सकता है. नहीं तो गूगल कर सकते हैं. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (.) ने साल 2012-13 में इसी तरह का एक सर्वे किया था. इसके मुताबिक तब 86.5 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर या इससे कम जमीन थी. यानी सूरत अभी भी बदली नहीं है.
लेकिन नाबार्ड के सर्वे में जो सबसे चौंकाने वाली बात है वह यह कि इन 87 फीसद किसानों की आय अभी 2436 रुपये के आसपास है. हम मान लें कि एक परिवार में न्यूनतम 5 लोग होंगे तो एक सदस्य के हिस्से 500 रुपये से भी कम आएगा.  500 रुपये में आप क्या-क्या कर लेंगे? दो वक्त लंच और डिनर, या सिर्फ लंच या डिनर या एक चाय/कॉफी या शायद इतना टिप ही दे दें. राजधानी कूच करने वाले किसानों की मांग है कि स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिश के अनुसार उन्हें उनकी फसल का उचित मूल्य मिले. दिल्ली में इन दिनों आलू 20-25 रुपये किलो है, लेकिन आप जानते हैं किसानों ने आलू की फसल को कितने रुपये किलो में मंडी में बेचा था? 4 से 5 रुपये...जी हां, सही पढ़ा आपने. किसानों की और क्या मांग है, फसलों की समय पर सिंचाई के लिये डीजल के दाम में कुछ कमी मिल जाए और बिजली के दाम में थोड़ी सी रियायत.
गन्ना  पैदा करने वाले किसान अपनी फसल की बकाया राशि के लिए चक्कर काट रहे हैं? गन्ना किसानों का 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है. यूं तो सरकार ने गन्ना किसानों के लिए 'स्पेशल पैकेज' की घोषणा की है, लेकिन किसानों तक यह पैकेज कैसे और किस रूप में आता है यह शायद किसी से छिपा नहीं है! चाहें तो इसे भी गूगल कर सकते हैं. हां...किसानों ने एक और 'बहुत बड़ी मांग' कर दी. विपरीत परिस्थितियों का सामना करने वाले किसान की सामाजिक सुरक्षा. सर्दी के दिनों में जब हम/आप, हाकिम-हुक्काम और हुजूरे आला मुलायम रजाई में दुबके रहते हैं तब कोई किसान कड़ाके की ठंड में गेहूं की फसल में पानी दे रहा होता है. और ऐसी ही किसी रात ठंड की वजह से उसकी जान चली जाती है.  2436 रुपये कमाने वाले उसके परिवार को क्या कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए? इन दिनों मक्का पकने को है और धान में बालियां लगनी शुरू हो गई हैं. जिस किसान को हाथ में फावड़ा, दरांती, खुरपी और कुदाल लिये खेतों में होना चाहिए था, वह अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आया, लेकिन आपने क्या किया? जिस शरीर से मिट्टी की सौंधी खुशबू लिपटी होनी चाहिए थी, उसको लहू से रंग दिया. किसी किसान के सिर में चोट आई, तो किसी का हाथ-पैर टूटा! क्या उनकी बात सुनी नहीं जा सकती थी? क्या उनकी मांग वाकई इतनी बड़ी थी? चंद दिनों में चुनाव आने वाले हैं. याद रखिये, 'दिल्ली का रास्ता' किसानों के दर से होकर ही गुजरता है और आपको उसके दर पर जाना ही पड़ेगा. लेकिन किस मुंह से जाएंगे? कल किसानों पर जो लाठियां चटकाई गई हैं, उसके निशान इतने जल्दी नहीं मिटने वाले हैं. हवा-हवाई दावों और वादों से तो कतई नहीं. याद रखियेगा. 

क्यों अलग छिटक रहीं हैं माया?

मध्य प्रदेश में मायावती ने 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी साथ ही छत्तीसगढ़ में मायावती ने अजित जोगी से हाथ मिलाया है. इस पर कई लोगों को काफी आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो गया और लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि विपक्ष का महागठबंधन टूट गया, यह गठबंधन नहीं लठबंधन है. दरअसल दिक्कत ये है कि लोग जल्दबाजी में राय बना लेते हैं बिना हालात का आकलन किए हुए. इस सब के बीच राहुल गांधी का एक बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि बीएसपी नेता मायावती का मध्यप्रदेश में गठबंधन ना करने से कांग्रेस पर कोई असर नहीं पड़ेगा मगर कांग्रेस अध्यक्ष ने ये जरूर कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वो जरूर महागठबंधन का हिस्सा होंगी. राहुल ने कहा कि राज्य और केन्द्र में गठबंधन काफी अलग अलग चीज है. उन्होंने कहा कि राज्यों में गठबंधन के मामले में हम काफी लचीला रुख रखते हैं मगर मायावती ने बातचीत से पहले ही अपने पत्ते खोल दिए. लगता है इस बार राहुल गांधी अपना होमवर्क अच्छी तरह करके आए थे.
मध्यप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष पहले ही साफ कर चुके हैं कि किन वजहों से मध्यप्रदेश में बीएसपी से गठबंधन नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि हम मायावती को 12 से 15 सीटें देने के लिए तैयार थे मगर वो 50 सीटें मांग रही थीं. अब जरा एक नजर आंकड़ों पर डालते हैं कि आखिरकार मध्यप्रदेश की हालत क्या है.
1998 में बीएसपी को 11 सीटें मिली थीं जो 2003 में घट कर 2 रह गईं. मगर जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तब उन्हें 7 सीटें मिली थीं यानी तब मुख्यमंत्री होने के कारण उनके पास सारे संसाधन मौजूद थे, यानी धन, बल और वो तमाम चीजें जो चुनाव में एक पार्टी को चाहिए होती हैं. मगर फिर 2013 में उनकी सीट घट कर 4 रह गई. ऐसे में यदि वो कांग्रेस से 50 सीटें मांगती हैं तो उन्हें वो सीट मिलना असंभव जैसी बात है. यही वजह है कि राहुल मध्यप्रदेश कांग्रेस के निर्णय को सही करार दे रहे हैं.
वैसे कुछ अन्‍य आंकड़ों पर नजर डालें तो आप को लगेगा कि कहीं कांग्रेस गलती तो नहीं कर रही है. बीजेपी को मध्यप्रदेश में 44.88 फीसदी वोट मिले तो कांग्रेस को 36.38 फीसदी और वहीं बीएसपी को 6.42 फीसदी वोट मिले हैं. अब बात करते हैं राजस्थान की. बीएसपी को 1998 में 2, 2003 में भी 2 सीट मिली मगर जब 2008 में मायावती मुख्यमंत्री थीं तब उसे 6 सीटें मिली थीं. मगर बाद में इन सभी 6 विधायकों ने कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार को सर्मथन दे दिया था और उनका कांग्रेस में विलय हो गया था. जबकि 2013 में बीएसपी को केवल 3 सीटें मिली थी और सबसे मजेदार बात है कि बीएसपी ने कभी भी अपनी सीट दुबारा नहीं जीती, हर बार उसने नई सीट पर जीत दर्ज की, यानी राजस्थान में बीएसपी की सफलता में उसके उम्मीदवार की निजी लोकप्रियता का ज्यादा हाथ रहता है.
राजस्‍थान में बीजेपी को 45.17 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 33.07 फीसदी और बीएसपी को 3.37 फीसदी. यही वजह है कि कांग्रेस ने बीएसपी को चारा नहीं डाला. लगे हाथ छत्तीसगढ़ की भी बात कर लेते हैं. यहां हमेशा टक्कर कांटे की होती है. बीजेपी को यहां 49 सीटें मिली हैं और कांग्रेस को 39 सीटें मगर यदि वोटों के प्रतिशत को देखें तो बीजेपी को 41.18 फीसदी वोट मिले तो कांग्रेस को 40.43 फीसदी यानी वोटों का अंतर एक फीसदी के आसपास है जबकि छत्तीसगढ़ में बीएसपी के पास 1 सीट है और उसे 4.29 फीसदी वोट मिले हैं यानी कांग्रेस यदि यहां बीएसपी के साथ जाती तो जीत से कोई नहीं रोक सकता था मगर मायावती ने अजित जोगी को क्यों चुना यह कहना मुशिकल है. खैर आंकड़े जो भी कहें, इन तीनों राज्यों के चुनाव दिलचस्प होने वाले हैं. आंकड़े भी चौंकाने वाले होंगे जो 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भी एजेंडा तय करेंगे.

गाँधी के कुछ अनकहे पहलू

महात्मा गांधी का देहावसान होने पर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जनरल सी मार्शल ने कहा था - 'महात्मा गांधी आज सारी मानवता के प्रतिनिधि बन गए हैं. यह वह व्यक्तित्व है जिसने सत्य और विनम्रता को साम्राज्यों से भी ज्यादा शक्तिशाली बनाया.'  वास्तव में आज जब महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे हो रहे हैं, तब भी क्या उनके बाद कोई ऐसा इंसान हुआ जिसे समूची मानवता का प्रतिनिधि समझा जा सके? गांधीवाद की राह पर चलने वाले, गांधी के आदर्शों का अनुसरण करने वाले तो बहुत हैं लेकिन कोई गांधी नहीं हुआ. वह गांधी जो समाज के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने में भी कतई संकोच नहीं करता था. जो विदेशी हुकूमत के खिलाफ अपने नैतिक बल, अकाट्य तर्कों के आधार पर ताजिंदगी संघर्ष करता रहा और इसके साथ भेदभाव, जात-पात, सामाजिक वैमनस्यता, साम्प्रदायिकता, कुरूढ़ियों आदि के खिलाफ भी अलख जगाता रहा.     
उच्च आदर्श स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को विस्मृत नहीं किया जा सकता. भारतीय जनमानस के अहसास गांधी के साथ काफी गहरे जुड़े हैं. गांधी वास्तव में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक जीवन दर्शन है जो भारतीय समाज की जीवन शैली में रच-बस गया है. इसके पीछे सहिष्णुता को लेकर वह सामाजिक स्वीकार्यता है जिसका दायरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहता बल्कि वैश्विक हो जाता है. गांधी दर्शन ने समूचे विश्व को प्रभावित किया है. गांधी का चिंतन किसी क्षेत्रीय सीमा से नहीं बंधा क्योंकि वह मानव मात्र के लिए है, वह मानव जो दुनिया के किसी भी कोने का हो सकता है.
गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसके प्रभाव से कोई जुदा नहीं हो सका, यहां तक कि गांधी की आलोचना करने वाले भी. गांधी प्रतीकों में सामने आए हैं और समाज के अंतर्मन में बैठे हैं. गांधी की टोपी आजादी के आंदोलन में भारतीय अस्मिता की प्रतीक बनी. यह वह टोपी है जो कभी खत्म नहीं होती, जिसका असर खत्म नहीं होता. गांधी के प्रबल आलोचक भी, जिन पर गांधी की हत्या का दाग है, गांधी टोपी को अपनाए हैं, भले ही टोपी को बदले हुए रंग में अपनाया गया. आखिर कैसे अनदेखा कर दें वे गांधी को, गांधी उस व्यक्तित्व का नाम है जो उच्च आदर्शों के साथ अडिग है. गांधी उस पुरातन भारतीय परंपरा के ध्वजवाहक हैं जिसकी आत्मा में सामाजिक समरसता कूट-कूटकर भरी है. समय गुजर गया है, गांधी की कांग्रेस अब नहीं है लेकिन टोपी मौजूद है. यह टोपी फिर-फिर अपना असर दिखाती है. यह बात अलग है कि इस टोपी को धारण कर लेने वाले न तो गांधी हो जाते हैं न ही ऐसे अधिकतर लोग उन आदर्शों को अंगीकार करते हैं, जो गांधी ने दिए हैं. इसका उपयोग अस्त्र की तरह भी हुआ क्योंकि इस प्रतीक के आगे सब बौने हो जाते हैं. अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में गांधी टोपी ने ऐसा असर दिखाया कि आगे जाकर एक राजनीतिक पार्टी और फिर पूरी सरकार ही टोपी वाली बन गई. 
खादी को आप सिर्फ कपड़ा नहीं कह सकते, यह भारतीय अस्मिता की प्रतीक है. खादी वास्तव में हमारी खुद्दारी है. यह ऐसा प्रतीक है जो भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है. गांधी के सिद्धांतों के अनुसार पराधीनता में वह सब कुछ शामिल है जिसके लिए हम विदेशों पर निर्भर हों. विदेशी वस्तुओं को अपनाने का अर्थ अपने देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है. गांधी ने हमेशा बकरी का दूध पिया. वे हमेशा गौ-पालन को प्रोत्साहित करते रहे. गांधी की ग्राम स्वराज्य की अवधारणा में खेती-बाड़ी से साथ-साथ मवेशी पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है. कहने को भले ही खादी को सिर्फ एक कपड़ा मान लें या बकरी को सिर्फ एक मवेशी, लेकिन यह वे प्रतीक हैं जो संदेश देते हैं कि जब गांव आत्मनिर्भर होंगे तभी सही मायने में देश का विकास हो सकेगा.   
गांधी के आदर्श प्रतीकों के जरिए हमारे समाज में अनजाने ही कैसे पीढ़ियों में हस्तांतरित होते रहते हैं इसका एक उदाहरण देता हूं. कुछ साल पहले मैं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में था. मेरा छोटा बेटा उस समय करीब छह साल का था. एक दिन वह स्कूल से लौटा और अपनी यूनिफार्म उतारी. इसके बाद उसने बजाय दूसरे कपड़े पहनने के वहां रखी एक सफेद चादर आधी नीचे लपेटी और बाकी ऊपर से कंधे पर डाल ली. मैंने पूछा यह क्या हो रहा है? वह पहले कुछ नहीं बोला. मैंने फिर पूछा कि यह चादर ऐसी क्यों लपेट ली. उसने कहा, गांधी जी ऐसे ही पहनते हैं. मैंने पूछा तुमने कहां देखा? उसने कहा स्कूल में लगी तस्वीर में...मैंने पूछा इससे क्या होता है? उसने कहा एक ही कपड़ा पहनना पड़ता है. फिर मैंने पूछा कि इससे क्या फायदा, क्यों एक ही कपड़ा पहना जाए? उसने ऐसी बात कही कि मैं हतप्रभ रह गया. उसने कहा- एक ही कपड़े से काम चलता है तो दूसरे की क्या जरूरत? मैंने पूछा कि क्या यह तुम्हें तुम्हारी टीचर ने बताया...उसने कहा नहीं. मैं सोच में पड़ गया कि पहली कक्षा में तो गांधी जी के बारे में शायद कुछ पढ़ाया भी नहीं जाता, फिर कैसे यह ऐसी बात कर रहा है? जब मैंने फिर पूछा तो उसने कहा...वह तो गांधी जी की फोटो में ही दिख रहा है कि वे एक ही कपड़ा पहने हैं. गांधी के आदर्श प्रतीक रूप में कुछ इसी तरह आ जाते हैं. गांधी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहते हैं. 
गांधी को अपना समझना आसान है क्योंकि वे हमेशा हमारे आसपास के आम इंसान बने रहे हैं. अपनी जरूरतें न्यूनतम करके जीवन यापन का उनका सिद्धांत आडंबरों से दूर सात्विक जीवन की ओर ले जाता है. वास्तव में सत्य की कसौटी पर परखें तो आडंबरों को हमेशा निरर्थक ही पाएंगे. 
गांधी ने कहा था किसी के साथ ऐसा व्यवहार न करें जैसे व्यवहार की आप किसी से अपेक्षा नहीं करते. किसी को कष्ट पहुंचाने से पहले सोच लें, कोई आपको भी चोट पहुंचा सकता है. गांधी के विचारों को जरूर ही पढ़ा जाना चाहिए लेकिन गांधी के बारे में सिर्फ पढ़-लिख लेने से वे हमारे जीवन में नहीं आ जाते, उन्हें महसूस करना होता है. गांधी के आदर्शों को पहनने, ओढ़ने और बिछाने की जरूरत है.  महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था - 'आने वाली पीढ़ियों को यह मुश्किल से विश्वास होगा कि हाड़-मांस का कोई ऐसा भी मानव धरती पर जन्मा था.' वास्तव में जिस तरह जाति-धर्म को लेकर विद्वेष का माहौल बनता जा रहा है, जिस तरह से जाति और धर्म आधारित वोटों की राजनीति होने लगी है.. जिस तरह समाज में विदेशी वस्तुओं और विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है... तो क्या कुछ और साल बाद इसी देश में गांधी के जन्म लेने पर कोई विश्वास कर पाएगा?

Sunday, September 30, 2018

497 खत्म होने पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने  158 साल पुराना क़ानून रद्द करके महिलाओं की यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. दरअसल इसकी व्याख्या ही ग़लत की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. और कुछ लोगों को ये फ़ैसला केवल पति पत्नी के संबंधों के खुलेपन पर कुछ जोक्स बनाने भर का अवसर भर लग सकता है. लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है. क्योंकि इस फैसले का वास्ता स्त्री की आजादी और उसकी यौनिक आज़ादी से भी है. सुप्रीम कोर्ट ने संभवतः पहली बार इतने स्पष्ट ढंग से रेखांकित किया है कि देह स्त्री की संपत्ति है और उसे इसके बारे में फैसला करने का अधिकार है. हालांकि स्त्री की यौनिक आजादी का जिक्र छिड़ते ही कुछ लोग इस तरह बोल पड़ते हैं जैसे यह विमर्श चलाने वाले या स्त्री के लिए यौनिक आजादी की मांग करने वाले लोग विवाहेतर संबंधों का लाइसेंस मांग रहे हैं. जबकि बात बात ये है कि पुरुष की तरह स्त्री भी स्वाधीन है, शादी उसे सामाजिक और नैतिक बंधन में बांधती जरूर है, लेकिन दोनों का एक स्वायत्त व्यक्तित्व भी है. पहले यह स्वायत्तता सिर्फ़ पुरुष को हासिल थी.
अब तो नहीं, लेकिन अतीत में विवाहित पुरुषों का वेश्यागमन भी सामाजिक तौर पर स्वीकृत था, बल्कि जिन जमींदार घरों में पुरुष इससे बचते थे, वहां उनकी मर्दानगी पर सवाल उठते थे. सुप्रीम कोर्ट ने दरअसल इस मर्दानगी की अवधारणा को भी झटका दिया है. क्योंकि इसी अवधारणा के तहत मर्द औरत को अपनी संपत्ति समझता रहा है. वह चाहे तो औरत घर में रहेगी, वह चाहे तो दफ़्तर जाएगी- वह उसकी दी हुई आज़ादी का उपभोग करेगी और उसके लिए उसकी कृतज्ञ होगी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने अपने लेख में एक बहुत बढ़िया उदाहरण देकर बताया है, जिसका ज़िक्र मैं भी करना चाहूँगा, " कुछ दिन पहले आई एक फिल्म 'दिल धड़कने दो' में प्रियंका चोपड़ा शादी के बावजूद बच्चा नहीं चाहती, वह उस शादी से अलग होना चाहती है- उसका यह फ़ैसला किसी को समझ में नहीं आता- उसके मां-पिता को भी नहीं. इसके ठीक पहले प्रियंका चोपड़ा का पति राहुल बोस बहुत गरूर से बताता है कि उसने प्रियंका को काम करने की पूरी आज़ादी दी है. इस पर प्रियंका का दोस्त फ़रहान अख्तर सवाल उठाता है कि उसे अपनी आज़ादी के लिए तुम्हारे आदेश की ज़रूरत क्या है."
कहने का मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री की आज़ादी के कई रूपों पर पहले से बहस चलती रही है. लैंगिक समानता और यौनिक आज़ादी के जिन दो मोर्चों पर स्त्री लगातार संघर्षरत रही है और जिसकी वजह से लगातार पिटती रही है, उसमें धीरे-धीरे उसे जीत मिलती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्त्री को पारिवारिक संपत्ति का अधिकार देकर उसकी लैंगिक बराबरी का रास्ता बनाया और अब डेढ़ सौ साल पुराना क़ानून रद्द  करके उसकी यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. क्या तमाम क़ानूनी व्यवस्थाओं और अधिकारों के बावजूद स्त्री को वो आज़ादी और समानता मिल पाई है, जो सरकारी एडवरटाइजिंग में दिखाई देती है? भले शत प्रतिशत सच न हो लेकिन कह सकते हैं पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक बदलाव हुए हैं, पढ़ाई में, नौकरियों में, खेलों और तमाम क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी भी बढ़ी है और स्वीकृति भी.
लेकिन कुछ कड़वी सच्चाइयां इन सारे प्रयासों पर पानी फेर देती हैं.  एक तो यह कि सारे कानून मिलकर भी स्त्री को उसकी संवैधानिक हैसियत नहीं दिला पाए हैं. बहुत सख्त दहेज कानून के बावजूद दहेज के मामलों में कमी नहीं आई. घरेलू हिंसा विरोधी कानून के बावजूद घरों में औरतों की पिटाई नहीं रुकी है. ओफिसेज में यौन उत्पीड़न रोकने का कानून बना, लेकिन वो सब बहुत जगहों पर हो रहा है. बलात्कार पर फांसी तक की सज़ा  होने लदी लेकिन दिल दहला देने वाली बलात्कार या छेड़खानी की वारदाते आय दिन होती रहती हैं.  इस सबमें क़ानून के डर से अगर कुछ नहीं बदल रहा तो इसका मतलब है हमारा समाज इस बदलाव को लेकर तैयार नहीं है? अभी भी अधिकतम प्रगतिशाली लोग भी बाहर तो बड़े भाषण देते हैं लेकिन निजी जीवन में महिलाओं को बराबरी पर खड़ा करने में असुविधाजनक महसूस करते हैं. बेटी, पत्नी या बहन के पुरुष दोस्तों पर संदेह की नज़र लगाकर रखते हैं. किसी भी आदमी की अगर प्रगतिशाली सोच देखनी है तो खुद ही विचार करके देख ले क़ि मान लो कल को हमारी बेटी प्रेम विवाह करना चाहे तो आप क्या करोगे? बस ईमानदारी से खुद के ही दिल को जवाब दे लो, और जो सच है उस हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कीजिए. असल में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक ग़लत संदेश भी समाज में बड़ी आसानी से भेजा जा सकता है क़ि अदालत ने विवाहेतर संबंधों की छूट दी है. जबकि अदालत ने ऐसा कुछ नहीं किया है. अदालत ने बस ऐसे किसी संबंध को जुर्म माने जाने से इनकार किया है. उसने वह धारा 497 हटा दी है जिसके तहत कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ किसी और के संबंध को लेकर उस पुरुष पर मुकदमा कर सकता था. जबकि इस फ़ैसले के पहले भी ऐसे मामले तो सामने आते ही थे, और ना इस फ़ैसले के बाद सब ऐसा करने को उत्साहित घूमेंगे. बस इस फ़ैसले से ये साफ हो गया है कि महिला का शरीर उसके पति की संपत्ति नहीं है. जो लोग इस फ़ैसले को वेस्टर्न कल्चर का असर बताते हुए विवाह संस्था के लिए खतरनाक मान रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि विवाह संबंध को सबसे ज्यादा खतरा रिश्तों की असमानता से है. अगर विवाह संस्था में दोनों बराबर न हों और स्त्री को पुरुष की संपत्ति बने रहना है तो फिर इस संस्था के होने का मतलब नहीं है. दो बालिग लोगों का विवाह तभी सार्थक है जब दोनों के भीतर आपसी बराबरी और भरोसे का रिश्ता हो. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बस इस बात को सुनिश्चित करता है.

Wednesday, September 26, 2018

आधार हो गया निराधार

शीर्ष अदालत की संवैधानिक बेंच ने बहुमत से कहा कि आधार नंबर संवैधानिक रूप से वैध है. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने इससे अलग राय जताते हुए आधार को असंवैधानिक क़रार दिया. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार एक्ट को धन विधेयक की तरह पास करना संविधान के साथ धोखा है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वो जस्टिस सीकरी के सुनाए फ़ैसले से अलग राय रखते हैं. उन्होंने कहा कि आधार एक्ट को राज्यसभा से बचने के लिए धन विधेयक की तरह पास करना संविधान से धोखा है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 110 का उल्लंघन है. अनुच्छेद 110 ख़ास तौर पर धन विधेयक के संबंध में ही है और आधार क़ानून को भी इसी तर्ज़ पर पास किया गया था. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वर्तमान रूप में आधार एक्ट संवैधानिक नहीं हो सकता. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि मोबाइल हमारे वक़्त में जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया है और इसे आधार से जोड़ दिया गया. ऐसा करने से निजता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता को ख़तरा है. उन्होंने कहा कि वो मोबाइल से आधार नंबर को डीलिंक करने के पक्ष में हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्डरिंग एक्ट के संबंध में कहा कि यह क़ानून मानकर क्यों चल रहा है कि सभी बैंक खाताधारक धांधली करने वाले हैं. उन्होंने कहा कि यह मानकर चलना कि बैंक में खाता खोलने वाला हर व्यक्ति संभावित आतंकी या धांधली करने वाला है, यह अपने आप में क्रूरता है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि डेटा के संग्रह से नागरिकों की व्यक्तिगत प्रोफ़ाइलिंग का भी ख़तरा है. इसके ज़रिए किसी को भी निशाना बनाया जा सकता है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार नंबर सूचना की निजता, स्वाधीनता और डेटा सुरक्षा के ख़िलाफ़ है. इस तरह के उल्लंघन यूआईडीएआई स्टोर से भी सामने आए हैं. उन्होंने इसे निजता के अधिकार के ख़िलाफ़ भी बताया. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इससे संवेदनशील डेटा के दुरुपयोग होने की आशंका है और थर्ड पार्टी के लिए यह आसान है. उन्होंने कहा कि निजी कारोबारी भी बिना सहमति या अनुमति के व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग कर सकते हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार प्रोग्राम समाधान तलाशने में नाकाम रहा है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि आधार के बिना कल्याणकारी योजनाओं से महरूम करना नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि यूआईडीएआई के पास लोगों के डेटा की सुरक्षा के लिए कोई जवाबदेही नहीं है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि डेटा की सुरक्षा के लिए किसी भी तरह की मशीनरी का न होना ख़तरनाक है. उन्होंने कहा कि अभी तक आधार के बिना भारत में रहना असंभव था, लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था.

Monday, September 24, 2018

मोदी जी को मँहगा न पड़ जाए राफ़ेल

पूर्व फ़्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का चौंकाने वाला बयान आया है. ओलांद ने कहा और दोहराया भी है कि करोड़ों के रफ़ाएल सौदे में अनिल अंबानी को भारत सरकार ने ऑफ़सेट पार्टनर के तौर पर फ्रांस पर 'थोपा' था. इससे मोदी सरकार के उस दावे की हवा निकल गई जिसमें कहा गया था कि 'इस समझौते में पार्टनर चुनने में सरकार का कोई हाथ नहीं था और इसे विमान बनाने वाली कंपनी दसो एविएशन ने ही चुना था.' सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) में शामिल मोदी सरकार के शीर्ष मंत्रियों जैसे कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस बात को दोहराया था. सीतारमण ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत सरकार को यह तक पता नहीं था कि दसो ने किस कंपनी को पार्टनर चुना है. यह दावा अविश्वसनीय है क्योंकि कैबिनेट में उनके सहयोगी नितिन गडकरी ने ही नागपुर में अंबानी की फ़ैक्ट्री का उद्घाटन किया था. मगर फिर भी मोदी सरकार की ओर से अविश्वसनीय दावे और 'जुमले' पेश किए जाते रहे. पिछले हफ़्ते ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया कि अरबों खरबों के बक़ायेदार विजय माल्या का यह कहना 'तथ्यात्मक रूप से' ग़लत है कि वह भागने से पहले उनसे मिले थे क्योंकि उन्होंने कभी माल्या को अपॉइंटमेंट नहीं दिया था. मगर मीटिंग हुई, माल्या भागे भी लेकिन हमारे वित्त मंत्री बचने के लिए बेहद कमज़ोर क़ानूनी तर्क दे रहे थे. इस स्कैंडल की जड़ में मोदी द्वारा करोड़ों डॉलर के जेटों की ख़रीद है, जिसके लिए स्पष्ट तौर पर ज़रूरी मंज़ूरी नहीं थी और ऊपर से अनिल अंबानी उनके साथ थे, जिन्होंने कुछ ही दिन पहले रक्षा निर्माण की कंपनी का पंजीकरण करवाया था. मोदी ने पेरिस में इस समझौते का एलान किया था और उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर तक इससे हैरान रह गए थे.
भारतीय सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी रक्षा कंपनियों में गिनी जाने वाली दसो को हाल ही में पैदा हुई एक कंपनी से हाथ मिलाने को कहा, जो अभी तक कुछ साबित नहीं कर पाई है. इस काम के लिए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. दसो ने भी बिना कोई सवाल पूछे ऐसा ही किया. अक्सर मुदों पर डटे नहीं रहने वाले कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार अपने दावे पर डटे हुए हैं कि रफ़ाएल सौदे में पार्टनर चुना जाना घोटाला है. मोदी सरकार बिना किसी दमदार बचाव के घोटाले के आरोपों से इनकार कर रही है. सीतारमण ने पहले दावा किया कि वह जेट विमानों की क़ीमत बताएंगी मगर बाद में रहस्यमय 'गोपनीयता की शर्त' का हवाला देते हुए मुकर गईं. इस बीच मोदी सरकार  ने मीडिया में बिना जांच के ही मोदी सरकार को यह तक कहते हुए क्लीन चिट दे दी कि 'इस समझौते में भ्रष्टाचार नहीं बल्कि बेवकूफ़ी है.' वर्तमान सरकार का महिमामंडन करने में लगे भारतीय मीडिया के एक धड़े द्वारा नज़रअंदाज करने के बावजूद इस घोटाले ने मोदी सरकार को ज़ोरदार झटका दिया है. मोदी की चुप्पी से उनको कोई फ़ायदा नहीं मिलने वाला. अनिल अंबानी विपक्ष के नेताओं और मीडिया के उन लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का मामला दर्ज कर रहे हैं जो यह सवाल उठा रहे हैं कि यह डील उन्हें सौंप दी गई जिनके पास रक्षा के क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं है. अंबानी ने स्वतंत्र मीडिया से इस तरह के 'आरोप लगाना बंद करने और इससे बचने' को भी कहा है.
इस बात पर ग़ौर करें कि केंद्र तो पहले ही सरकारी स्वामित्व वाले हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के दावों को दरकिनार कर चुका है, जो इस तरह के ऑफ़सेट एग्रीमेंट के लिए उच्चस्तरीय रक्षा निर्माण में एक ट्रैक रिकॉर्ड रखता है. ख़ुद ही मनमाने तरीके से निर्णय लिया है तो इससे होने वाला नुक़सान भी उनके अपने व्यक्तित्व पर भी असर डालेगा. विपक्ष  का कहना है कि रफ़ाएल डील आने वाले आम चुनावों में बड़ा मुद्दा होगा. राहुल गांधी ने भी अपने संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही है. उन्होंने कहा कि 'मोदी और अनिल अंबानी ने साथ मिलकर भारतीय सुरक्षाबलों पर 130 हज़ार करोड़ रुपये की सर्जिकल स्ट्राइक की है. मोदी जी आपने हमारे शहीद सैनिकों के ख़ून का अपमान किया है. आपको शर्म आनी चाहिए. आपने भारत की आत्मा के साथ धोखा किया है.' इससे ये भी संकेत मिलता है कि विपक्ष किस तरह पीएम मोदी पर आरोप लगाएगा. उम्मीद है कि जल्द ही ओलांद के बयान की ख़बर पर फ़्रांसीसी मीडिया में फ़ॉलोअप आएगा. अब तक तो यही लग रहा है कि बोफ़ोर्स के पुराने भूत की तरह ही एक बार फिर एक रक्षा सौदा एक और प्रधानमंत्री का खेल बिगाड़ सकता है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...