Monday, November 19, 2018

इंदिरा गाँधी की मौत के दिन

30 अक्तूबर 1984 की दोपहर इंदिरा गांधी ने जो चुनावी भाषण दिया, उसे हमेशा की तरह उनके सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने तैयार किया था. लेकिन अचानक उन्होंने तैयार आलेख से अलग होकर बोलना शुरू कर दिया. उनके बोलने का तेवर भी बदल गया. इंदिरा गांधी बोलीं, "मैं आज यहाँ हूँ. कल शायद यहाँ न रहूँ. मुझे चिंता नहीं मैं रहूँ या न रहूँ. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आख़िरी सांस तक ऐसा करती रहूँगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मज़बूत करने में लगेगा." कभी-कभी नियति शब्दों में ढलकर आने वाले दिनों की तरफ़ इशारा करती है. भाषण के बाद जब वो राजभवन लौटीं तो राज्यपाल बिशंभरनाथ पांडे ने कहा कि आपने हिंसक मौत का ज़िक्र कर मुझे हिलाकर रख दिया. इंदिरा गाँधी ने जवाब दिया कि वो ईमानदार और तथ्यपरक बात कह रही थीं. उस रात इंदिरा जब दिल्ली वापस लौटीं तो काफ़ी थक गई थीं. उस रात वो बहुत कम सो पाईं. सामने के कमरे में सो रहीं सोनिया गाँधी जब सुबह चार बजे अपनी दमे की दवाई लेने के लिए उठकर बाथरूम गईं तो इंदिरा उस समय जाग रही थीं. सोनिया गांधी अपनी किताब 'राजीव' में लिखती हैं कि इंदिरा भी उनके पीछे-पीछे बाथरूम में आ गईं और दवा खोजने में उनकी मदद करने लगीं. वो ये भी बोलीं कि अगर तुम्हारी तबीयत फिर बिगड़े तो मुझे आवाज़ दे देना. मैं जाग रही हूँ. सुबह साढ़े सात बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं. उस दिन उन्होंने केसरिया रंग की साड़ी पहनी थी जिसका बॉर्डर काला था. इस दिन उनका पहला अपॉएंटमेंट पीटर उस्तीनोव के साथ था जो इंदिरा गांधी पर एक डॉक्युमेंट्री बना रहे थे और एक दिन पहले उड़ीसा दौरे के दौरान भी उनको शूट कर रहे थे. दोपहर में उन्हें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन और मिज़ोरम के एक नेता से मिलना था. शाम को वो ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन को भोज देने वाली थीं. उस दिन नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, सीरियल्स, संतरे का ताज़ा जूस और अंडे लिए. नाश्ते के बाद जब मेकअप-मेन उनके चेहरे पर पाउडर और ब्लशर लगा रहे थे तो उनके डॉक्टर केपी माथुर वहाँ पहुंच गए. वो रोज़ इसी समय उन्हें देखने पहुंचते थे. उन्होंने डॉक्टर माथुर को भी अंदर बुला लिया और दोनों बातें करने लगे.
उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के ज़रूरत से ज़्यादा मेकअप करने और उनके 80 साल की उम्र में भी काले बाल होने के बारे में मज़ाक़ भी किया. नौ बजकर 10 मिनट पर जब इंदिरा गांधी बाहर आईं तो ख़ुशनुमा धूप खिली हुई थी. उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह काला छाता लिए हुए उनके बग़ल में चल रहे थे. उनसे कुछ क़दम पीछे थे आरके धवन और उनके भी पीछे थे इंदिरा गाँधी के निजी सेवक नाथू राम. सबसे पीछे थे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी सब इंस्पेक्टर रामेश्वर दयाल. इस बीच एक कर्मचारी एक टी-सेट लेकर सामने से गुज़रा जिसमें उस्तीनोव को चाय सर्व की जानी थी. इंदिरा ने उसे बुलाकर कहा कि उस्तीनोव के लिए दूसरा टी-सेट निकाला जाए. जब इंदिरा गांधी एक अकबर रोड को जोड़ने वाले विकेट गेट पर पहुंची तो वो धवन से बात कर रही थीं. धवन उन्हें बता रहे थे कि उन्होंने उनके निर्देशानुसार, यमन के दौरे पर गए राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को संदेश भिजवा दिया है कि वो सात बजे तक दिल्ली लैंड कर जाएं ताकि उनको पालम हवाई अड्डे पर रिसीव करने के बाद इंदिरा, ब्रिटेन की राजकुमारी एन को दिए जाने वाले भोज में शामिल हो सकें. अचानक वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर इंदिरा गांधी पर फ़ायर किया. गोली उनके पेट में लगी. इंदिरा ने चेहरा बचाने के लिए अपना दाहिना हाथ उठाया लेकिन तभी बेअंत ने बिल्कुल प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से दो और फ़ायर किए. ये गोलियाँ उनकी बग़ल, सीने और कमर में घुस गईं.वहाँ से पाँच फुट की दूरी पर सतवंत सिंह अपनी टॉमसन ऑटोमैटिक कारबाइन के साथ खड़ा था. इंदिरा गाँधी को गिरते हुए देख वो इतनी दहशत में आ गया कि अपनी जगह से हिला तक नहीं. तभी बेअंत ने उसे चिल्लाकर कहा गोली चलाओ. सतवंत ने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक कारबाइन की सभी पच्चीस गोलियां इंदिरा गाँधी के शरीर के अंदर डाल दीं. बेअंत सिंह का पहला फ़ायर हुए पच्चीस सेकेंड बीत चुके थे और वहाँ तैनात सुरक्षा बलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी. अभी सतवंत फ़ायर कर ही रहा था कि सबसे पहले सबसे पीछे चल रहे रामेश्वर दयाल ने आगे दौड़ना शुरू किया. लेकिन वो इंदिरा गांधी तक पहुंच पाते कि सतवंत की चलाई गोलियाँ उनकी जांघ और पैर में लगीं और वो वहीं ढेर हो गए. इंदिरा गांधी के सहायकों ने उनके क्षत-विक्षत शरीर को देखा और एक दूसरे को आदेश देने लगे. एक अकबर रोड से एक पुलिस अफ़सर दिनेश कुमार भट्ट ये देखने के लिए बाहर आए कि ये कैसा शोर मच रहा है.उसी समय बेअंत सिंह और सतवंत सिंह दोनों ने अपने हथियार नीचे डाल दिए. बेअंत सिंह ने कहा, "हमें जो कुछ करना था हमने कर दिया. अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो." तभी नारायण सिंह ने आगे कूदकर बेअंत सिंह को ज़मीन पर पटक दिया. पास के गार्ड रूम से आईटीबीपी के जवान दौड़ते हुए आए और उन्होंने सतवंत सिंह को भी अपने घेरे में ले लिया. हालांकि, वहाँ हर समय एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी. लेकिन उस दिन उसका ड्राइवर वहाँ से नदारद था. इतने में इंदिरा के राजनीतिक सलाहकार माखनलाल फ़ोतेदार ने चिल्लाकर कार निकालने के लिए कहा. इंदिरा गाँधी को ज़मीन से आरके धवन और सुरक्षाकर्मी दिनेश भट्ट ने उठाकर सफ़ेद एंबेसडर कार की पिछली सीट पर रखा. आगे की सीट पर धवन, फ़ोतेदार और ड्राइवर बैठे. जैसे ही कार चलने लगी सोनिया गांधी नंगे पांव, अपने ड्रेसिंग गाउन में मम्मी-मम्मी चिल्लाते हुए भागती हुई आईं. इंदिरा गांधी की हालत देखकर वो उसी हाल में कार की पीछे की सीट पर बैठ गईं. उन्होंने ख़ून से लथपथ इंदिरा गांधी का सिर अपनी गोद में ले लिया.कार बहुत तेज़ी से एम्स की तरफ़ बढ़ी. चार किलोमीटर के सफ़र के दौरान कोई भी कुछ नहीं बोला. सोनिया का गाउन इंदिरा के ख़ून से भीग चुका था.कार नौ बजकर 32 मिनट पर एम्स पहुंची. वहाँ इंदिरा के रक्त ग्रुप ओ आरएच निगेटिव का पर्याप्त स्टॉक था. लेकिन एक सफ़दरजंग रोड से किसी ने भी एम्स को फ़ोन कर नहीं बताया था कि इंदिरा गांधी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में वहाँ लाया जा रहा है. इमरजेंसी वार्ड का गेट खोलने और इंदिरा को कार से उतारने में तीन मिनट लग गए. वहाँ पर एक स्ट्रेचर तक मौजूद नहीं था. किसी तरह एक पहिए वाली स्ट्रेचर का इंतेज़ाम किया गया. जब उनको कार से उतारा गया तो इंदिरा को इस हालत में देखकर वहाँ तैनात डॉक्टर घबरा गए. उन्होंने तुरंत फ़ोन कर एम्स के वरिष्ठ कार्डियॉलॉजिस्ट को इसकी सूचना दी. मिनटों में वहाँ डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गए. 
एलेक्ट्रोकार्डियाग्राम में इंदिरा के दिल की मामूली गतिविधि दिखाई दे रही थीं लेकिन नाड़ी में कोई धड़कन नहीं मिल रही थी. उनकी आँखों की पुतलियां फैली हुई थीं, जो संकेत था कि उनके दिमाग़ को क्षति पहुंची है. एक डॉक्टर ने उनके मुंह के ज़रिए उनकी साँस की नली में एक ट्यूब घुसाई ताकि फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंच सके और दिमाग़ को ज़िंदा रखा जा सके. इंदिरा को 80 बोतल ख़ून चढ़ाया गया जो उनके शरीर की सामान्य ख़ून मात्रा का पांच गुना था. डॉक्टर गुलेरिया बताते हैं, "मुझे तो देखते ही लग गया था कि वो इस दुनिया से जा चुकी हैं. उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी किया. फिर मैंने वहाँ मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या हम उन्हें मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा नहीं. फिर हम उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गए." डॉक्टरों ने उनके शरीर को हार्ट एंड लंग मशीन से जोड़ दिया जो उनके रक्त को साफ़ करने का काम करने लगी और जिसकी वजह से उनके रक्त का तापमान सामान्य 37 डिग्री से घटकर 31 डिग्री हो गया. ये साफ़ था कि इंदिरा इस दुनिया से जा चुकी थीं लेकिन तब भी उन्हें एम्स की आठवीं मंज़िल स्थित ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया. डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने उनके लीवर के दाहिने हिस्से को छलनी कर दिया था, उनकी बड़ी आंत में कम से कम बारह छेद हो गए थे और छोटी आंत को भी काफ़ी क्षति पहुंची थी. उनके एक फेफड़े में भी गोली लगी थी और रीढ़ की हड्डी भी गोलियों के असर से टूट गई थी. सिर्फ़ उनका हृदय सही सलामत था.अपने अंगरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने के लगभग चार घंटे बाद दो बजकर 23 मिनट पर इंदिरा गांधी को मृत घोषित किया गया. लेकिन सरकारी प्रचार माध्यमों ने इसकी घोषणा शाम छह बजे तक नहीं की.
इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाले इंदर मल्होत्रा बताते थे कि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गाँधी पर इस तरह का हमला हो सकता है. उन्होंने सिफ़ारिश की थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए. लेकिन जब ये फ़ाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने बहुत ग़ुस्से में उस पर तीन शब्द लिखे, "आरंट वी सेकुलर? (क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?)" उसके बाद ये तय किया गया कि एक साथ दो सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके नज़दीक ड्यूटी पर नहीं लगाया जाएगा. 31 अक्तूबर के दिन सतवंत सिंह ने बहाना किया कि उनका पेट ख़राब है. इसलिए उसे शौचालय के नज़दीक तैनात किया जाए. इस तरह बेअंत और सतवंत एक साथ तैनात हुए और उन्होंने इंदिरा गाँधी से ऑपरेशन ब्लूस्टार का बदला ले लिया.

Sunday, November 18, 2018

क्यों नहीं थम रहा सबरीमाला विवाद

कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी केरल के सबरीमला मंदिर के बाहर विरोध प्रदर्शन जारी हैं. शुक्रवार और शनिवार को सबरीमला मंदिर के बाहर तनाव की स्थिति रही. यहाँ वो महिलाएं पहुंचने की कोशिश कर रही हैं जिन्होंने ये दृढ़ संकल्प किया है कि वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद मंदिर परिसर में दाखिल होकर रहेंगी. जबकि दूसरी तरफ़ श्रद्धालुओं का एक बड़ा समूह है. इसमें महिलाएं भी शामिल हैं. वो हर संभव कोशिश कर रही हैं कि उनके भगवान से जुड़ी पुरानी परंपराओं की अखंडता बनी रहे. ये सारा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले से शुरू हुआ है जिसमें कोर्ट ने 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने की बात कही है. जबकि मंदिर के जो नियम हैं वो इसके विपरीत हैं. मंदिर के संचालक भगवान अयप्पा का हवाला देकर कहते हैं कि वो ब्रह्मचारी थे, इसलिए जिन महिलाओं को मासिक धर्म होता है, वो मंदिर में दाखिल नहीं हो सकतीं. जब सुप्रीम कोर्ट ये कह रहा है कि महिलाओं को सबरीमला मंदिर में दाख़िल होने का पूरा अधिकार है, तो क्यों शहरी महिलाओं का एक बड़ा समूह कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी खड़ा है? दक्षिण भारत में सबरीमला मंदिर की बड़ी मान्यता है. लोग जाति, लिंग और भाषा का विचार किये बिना सबरीमला मंदिर के दर्शन करने पहुँचते हैं. हर साल लाखों की संख्या में आदिवासी समूह के लोग, मुसलमान और ईसाई भी इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर में दाखिल होने से 41 दिन पहले से खाने-पीने से जुड़े तमाम सख़्त नियमों का श्रद्धालुओं को पालन करना पड़ता है. इसके बाद पश्चिमी घाट के घने जंगल से गुज़रने वाले कठिन रास्ते से होकर श्रद्धालु नंगे पाँव सबरीमला मंदिर तक पहुँचते हैं. सबरीमला मंदिर के दर्शन करने के लिए जो नियम बनाये गए हैं वो वाक़ई बहुत कठिन हैं. इसलिए बहुत से श्रद्धालु कहते भी हैं कि ये पूरी प्रक्रिया महिलाओं के लिए बहुत ज़्यादा मुश्किल है. शायद यही वजह भी रही है कि श्रद्धालु परिवारों में से घर के मर्द इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं. लेकिन मासिक धर्म जिन महिलाओं को होता है वो महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, इसे लेकर सबसे ज़्यादा विवाद था. सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने इस बंदिश को भी ख़त्म कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये भेदभाव है इसलिए उम्र और लिंग के आधार पर किसी को मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता. सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच में इंदू मल्होत्रा अकेली ऐसी जज थीं जिन्होंने कहा कि सबरीमला पर बहुमत के फ़ैसले से वो सहमत नहीं हैं. उनकी राय थी कि ये एक धार्मिक मामला है. इससे लोगों की धार्मिक भावना जुड़ी है. इसलिए कोर्ट को इसमें दख़ल नहीं देना चाहिए. जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी राय पेश करते हुए कहा था कि धर्म के मामलों में तर्कसंगतता के विचारों को शामिल नहीं किया जा सकता. उनका तो ये भी कहना था कि जब तक भगवान अयप्पा को मानने वाले समुदाय में से कोई पीड़ित आकर न कहे, कोर्ट को इसपर सुनवाई नहीं करनी चाहिए. बहरहाल, सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक प्रगतिशील क़दम के रूप में सेलिब्रेट किया गया. केरल के लगभग सभी कस्बों में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये. इसके बाद दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई समेत यूके, अमरीका और कनाडा में भी सबरीमला मंदिर को लेकर प्रदर्शन हुए. भारत के अग्रणी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने नब्ज़ को एकदम सही वक़्त पर पकड़ा. पहले तो वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के पक्ष में ही थे. लेकिन अचानक उन्होंने अपनी राय बदल ली और कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के समर्थन में खड़े होने को उत्सुक दिखे. केरल में ऐसे कई विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं जिनमें स्थानीय लोगों के साथ न सिर्फ़ भाजपा, बल्कि कांग्रेस के नेता भी दिखाई दिये. लेकिन इस बात को समझना होगा कि केरल ऐसा राज्य नहीं है जहाँ महिलाओं के पास अपनी बात रखने का अधिकार न हो. इतिहास इस बात का गवाह है कि केरल के समाज का एक बड़ा हिस्सा मातृप्रधान है जहाँ महिलाओं ने सदियों तक विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर नियंत्रण रखा. केरल भारत में 'सर्वोच्च साक्षरता दर' वाला राज्य भी है और केरल के सामाजिक संकेतक विकसित देशों के समान हैं. विरोध प्रदर्शन कर रही केरल की महिलाओं का मानना है कि किसी ने भी उनके नज़रिये की परवाह नहीं की. ये महिलाएं महसूस करती हैं कि जो महिलाएं कथित तौर पर महिलावादी हैं और जिन महिलाओं के पास असामान्य अधिकार हैं, वो उनपर 'आज़ादी' का विचार थोप रही हैं जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं है. अंजलि जॉर्ज नाम की एक महिला ने ही सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया है और महिलाओं पर लगे बैन को सही माना है. उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन का नज़रिया औपनिवेशिक था, इसीलिए वो सबरीमला मंदिर पर बन रही स्थिति का सही जायज़ा नहीं ले पाये. वो कहती हैं, "प्रशासन ने ये बहुत बड़ी ग़लती की है. मैं ऐसा इसलिए कह सकती हूँ क्योंकि लोगों के मन में सबरीमला मामले के बाद ये बात घर कर जाएगी कि सिस्टम उनकी धार्मिक आस्था और परंपराओं की सुरक्षा करने में अक्षम है." हिंदू धर्म सांस्कृतिक प्रथाओं, परंपराओं और पूजा की विभिन्न प्रणालियों का समावेश है. इसमें भारी विविधता है. मसलन, जिस भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं का जाना वर्जित है. जो भगवान महिला श्रद्धालुओं को अपने पास नहीं देखना चाहते, उनका विवाहित रूप एक अन्य मंदिर में महिलाओं और पुरुषों, दोनों के द्वारा पूजा जाता है. और ऐसा भी नहीं है कि मंदिरों में सिर्फ़ महिलाओं के प्रवेश पर शर्तें लगाई गई हैं. पूर्वोत्तर राज्य असम में भी कामाख्या देवी के मंदिर में पुरुषों का प्रवेश कुछ वक़्त के लिए बंद कर दिया जाता है. वहाँ स्थानीय मान्यता है कि देवी कामाख्या उन दिनों मासिक धर्म में होती हैं इसलिए पुरुषों को उनके मंदिर में नहीं जाने दिया जाता. कहा जाता है कि भारत में करोड़ों देवी-देवता हैं. देश में लाखों मंदिर हैं और शायद दर्जन भर मंदिरों में ही लिंग-आधारित प्रवेश प्रतिबंधित है. ऐसे में समानता को आधार बनाकर इस समाज में एक तरह से कृत्रिम एकरूपता नहीं बनाई जा सकती. इससे हमारे समाज की विविधता और कई पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का नुकसान होगा. सच्चाई ये भी है कि किसी भी वास्तविक हितधारक से ये समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की गई कि असल में मंदिर की परंपराएं क्या हैं. सुधार के नाम पर स्थानीय परंपराओं को दबाकर आधुनिकता को लोगों पर थोपा जा रहा है. इसके लिए चाहे वो लोग अब कोर्ट के आदेश का हवाला दें या राज्य की पुलिस की मदद लें. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से एक और परेशान करने वाला सवाल खड़ा होता है और वो सवाल ये है कि धर्म और भारत देश के बीच रिश्ता क्या है? धार्मिक संस्थानों को व्यवस्थित करने में सरकार अब ज़्यादा लिप्त है और देश की न्यायपालिका ये बताने में जुटी है कि सही धार्मिक परंपरा क्या होनी चाहिए. नामी वकील फ़ली नरीमन और राजीव धवन इस मामले में कुछ गंभीर आरोप लगा चुके हैं कि न्यायाधीशों ने ये निर्धारित करना अपना अधिकार मान लिया है कि कौन से धार्मिक विश्वास और सिद्धांत 'आवश्यक' हैं. सबरीमला मंदिर का विवाद इन्हीं सबके बीच खड़ा किया गया एक विवाद है जो हमारे समाज के कठोर विरोधाभासों को सामने लाता है. इसमें एक तरफ हैं महानगरीय अभिजात्य वर्ग के लोग जो महिलाओं की कथित आज़ादी का जश्न मना रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ हैं ज़मीन से जुड़ी लाखों महिला श्रद्धालु जिन्हें महसूस हो रहा है कि उनकी आवाज़ की आज के भारत में कोई सुनवाई नहीं हो रही.

मध्यप्रदेश में चल रही सियासत

जिन पांच राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम) में महीनेभर के भीतर चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्य प्रदेश की स्थिति सबसे दिलचस्प है. चार-पांच महीनों पहले तक यहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने कोई चुनौती नज़र नहीं आ रही थी. कांग्रेस का संगठन जीर्ण-शीर्ण था और माली हालत ख़स्ता. फिर हालात बदले. कांग्रेस का नेतृत्व बदला. मंदसौर में किसानों का आंदोलन हिंसक हुआ और पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत भी. कर्मचारियों की नाराज़गी बढ़ने की ख़बरें लगातार आने लगीं. अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर किए जाने और फिर बाद में उसे उसके पुराने स्वरूप में लाने की दिल्ली की दिग्भ्रमित सी कोशिशों ने जातीय बुखार का पारा चढ़ाया. तब भाजपा की हालत कमजोर लगने लगी. उस वक़्त तो बातें यहां तक होने लगीं कि कांग्रेस इस बार बड़े बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में लौट सकती है.
लेकिन दोनों पार्टियाें के प्रत्याशियों की घोषणा होते-होते हालात फिर बदल गए. प्रदेश की राजनीति समझने वालों की मानें तो अब हालात 19-20 के हो गए हैं. पलड़ा किसी भी तरफ झुक सकता है. और इस नज़दीकी संघर्ष की स्थिति निर्मित करने में भाजपा के साथ कांग्रेस भी बराबर भी ज़िम्मेदार है. कैसे? यही जानने की कोशिश करते हैं. राज्य चुनाव के मुहाने पर है. मतदान की तारीख़ नज़दीक है. लेकिन 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस अब तक अपने अंतर्विरोधों में उलझी दिख रही है. इसके कई उदाहरण हैं. मसलन एक नवंबर को ही ख़बर आई कि पार्टी प्रत्याशी तय करने के लिए दिल्ली में हुई बैठक के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की समन्वय समिति के मुखिया दिग्विजय सिंह और चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया आपस में उलझ गए. वह भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने. बाद में अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली और अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की पहल पर मामला सुलटा. दो दिन बाद मालूम हुआ कि मालवा और ग्वालियर-चंबल की क़रीब एक दर्ज़न सीटों पर प्रत्याशियों के नामों को लेकर दोनों में मतभेद थे. वैसे बताया जाता है कि राहुल गांधी ने अपने स्तर पर दोनों को समझाया और बात आगे बढ़ी.
लेकिन बढ़ी कैसे, वह देखिए. कांग्रेस हमेशा से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार के ख़िलाफ़ मुखर रही है. उनके कथित भ्रष्टाचार के मामले उठाती रही है. इस क्रम में शिवराज के साले संजय सिंह मसानी को भी कई बार कांग्रेस ने निशाना बनाया. लेकिन इन्हीं संजय सिंह को तीन नवंबर को कांग्रेस में शामिल कर लिया गया. संजय मूल रूप से गोंदिया, महाराष्ट्र के कारोबारी हैं. इस हिसाब से कमलनाथ के छिंदवाड़ा के नज़दीकी हुए. लेकिन बताया जाता है कि वे एक-डेढ़ साल से बारासिवनी में सक्रिय थे. यहां से भाजपा का टिकट मांग रहे थे. पार्टी ने उनकी बात नहीं सुनी तो उन्होंने कांग्रेस का रुख़ कर लिया. उनका यह क़दम बनता भी है. लेकिन कांग्रेस की क्या मज़बूरी या ज़रूरत थी कि उन्हें न सिर्फ शामिल किया बल्कि बारासिवनी से ही टिकट भी दिया? इस सवाल का ज़वाब अब तक कांग्रेस के रणनीतिकार दिग्विजय सिंह भी नहीं ढूंढ पाए हैं. होशंगाबाद से भाजपा के पूर्व दिग्गज सरताज सिंह भी कांग्रेस का टिकट पाने में सफल रहे. ऐसे ही जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रमुख हीरालाल अलावा को भी पार्टी ने मनावर ने अपना प्रत्याशी बना दिया. इस तरह के तमाम फैसलों पर कांग्रेस के भीतर से असंतोष की आवाज़ें उठ रही हैं.
यही आलम मुद्दों के मोर्चे पर है. सत्ताधारी भाजपा और मीडिया ने कांग्रेस को थाली में सजाकर मुद्दे दिए हैं. फिर चाहे वह व्यापम और ई-टेंडरिंग जैसे बड़े घोटालों का मामला हो या रेत के अवैध खनन का. किसान अांदोलनों के हिंसक दमन से उपजा असंतोष हो या आर्थिक मोर्चे और आधारभूत ढांचा (ख़ासतौर पर सड़कों के मामले में) क्षेत्र में कमतर प्रदर्शन का. कांग्रेस किसी भी मसले पर कोई लहर नहीं खड़ी कर पाई. उल्टा कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में भी जो मुद्दे शामिल किए गए वे ‘राम वन गमन पथ’, ‘गौशाला निर्माण’, ‘गौमूत्र के कारोबार’, ‘आध्यात्मिक विभाग’ स्थापित करने आदि के थे. कांग्रेस के 112 पेज के इस ‘वचन पत्र’ में और भी तमाम बातें थीं. लेकिन चर्चा इन्हीं सब चीजों की ज़्यादा होनी थी, जो हुई भी. इसके बाद भाजपा को यह कहने का मौका भी मिल गया कि विपक्ष मुद्दाविहीन है इसलिए उसने ‘80 फ़ीसदी तक हमारे मुद्दों और नीतियों की नक़ल कर ली.’
इतना ही नहीं कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध का शग़ूफ़ा भी छोड़ा गया. और अगले ही दिन स्पष्टीकरण आ गया कि ऐसी कोई बात कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ में नहीं है. शायद कांग्रेस के रणनीतिकारों को जल्द यह अहसास हो गया कि आरएसएस पर प्रतिबंध की बात से भाजपा का जो कार्यकर्ता अपनी ही सरकार से नाराज़ है, वह वापस अपनी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो सकता है. ऐसे और भी अंतर्विरोध हैं, जो कांग्रेस पर भारी पड़ सकते हैं.
दूसरी तरफ भाजपा है जो शिवराज पर ‘विश्वास की अति’ पर खड़ी दिखती है. और ख़ुद शिवराज ‘आत्मविश्वास के अतिरेक’ पर सवार नज़र आते हैं. इसकी भी मिसालें देखिए. भाजपा ने एक नवंबर को मध्य प्रदेश के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. इसमें 177 नाम थे. बाद में एक एक हटा लिया और रह गए 176. इनमें 70 फ़ीसदी तक वही चेहरे थे जो 2013 में चुनाव लड़े थे. यह सूची देखने के बाद सत्याग्रह ने प्रदेश भाजपा के एक पुराने पदाधिकारी से प्रतिक्रिया ली. उनका ज़वाब था, ‘लगता है अब चलाचली की बेला है.’
रदेश की राजनीति के जानकार भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की राजनीति पर नजर रखने वाले एक पत्रकार ने सत्याग्रह से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी ने बड़ा जोख़िम लिया है. इस सूची से एक बात और साफ है कि भाजपा में प्रदेश से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है.’ यह बात भाजपा प्रत्याशियों की बाद में आई सूचियों से भी साबित हुई. इन सभी में एक बड़ा संकेत यह था कि पार्टी ने शिवराज पर लगभग आंख बंद कर भरोसा किया है, इसलिए उनके सुझाए नामों को ही बिना किसी हीला-हवाली के हरी झंडी दे दी गई है.
ज़ाहिर तौर पर इससे शिवराज का मनोबल भी सातवें आसमान पर है. उन्होंने इस बार एक-एक कर अपने लगभग सभी प्रतिस्पर्धियाें को जगह दिखा दी. उदाहरण इसके भी हैं. राज्य में शिवराज के सबसे बड़े दो प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं- केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय. शिवराज के सामने इन दोनों की ही नहीं चली. तोमर के बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे को तो टिकट ही नहीं दिया गया. विजयवर्गीय के पुत्र आकाश को टिकट मिला लेकिन इंदौर-3 से जो लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के असर वाला क्षेत्र है. यहां से सुमित्रा महाजन ख़ुद अपने बेटे मंदार के लिए टिकट मांग रही थीं. लेकिन मंदार को भी टिकट नहीं मिला. जबकि कैलाश अपने बेटे के लिए इंदौर-2 से टिकट चाहते थे. साथ ही अपने लिए भी महू से. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के विश्वस्त होने के बावज़ूद कैलाश सिर्फ़ आकाश को टिकट दिला पाए. वह भी जहां से शिवराज की मंशा के अनुरूप पार्टी ने दिया.
बात इतनी ही नहीं थी. थावरचंद गहलोत प्रदेश में अनुसूचित जाति वर्ग का जाना-माना चेहरा हैं. उनके बेटे जीतेंद्र को टिकट मिला, लेकिन निकट सहयोगी सतीश मालवीय का पत्ता कट गया. पत्ता पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का भी कटा, तमाम दबाव बनाने के बावज़ूद. बाबूलाल की जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को भोपाल की गोविंदपुरा सीट से टिकट दिया गया. वह भी आख़िरी मौके पर, जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे गौरीशंकर शेजवार को भी सिर्फ़ बेटे के टिकट से ही संतोष करना पड़ा. उनकी सांची विधानसभा सीट से अब उनके पुत्र मुदित शेजवार पार्टी उम्मीदवार हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और शिवराज के मुखर आलोचक रहे सरताज सिंह को तो टिकट के लिए पार्टी ही छोड़नी पड़ी. वे आंसू बहाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए.
कमाल की बात है कि शिवराज पर पार्टी के ‘विश्वास की अति’ और शिवराज के ‘आत्मविश्वास का अतिरेक’ तब दिख रहा है जब लगातार उल्टी ख़बरें भी आ रही हैं. मसलन- अपने गृहनगर बुधनी की जो सुरक्षित शिवराज ने इस बार अपने लिए तलाशी है उस पर प्रचार की शुरूआत में ही उनकी पत्नी साधना सिंह को जनता के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है. इस पूरे इलाके में सड़कों की स्थिति जर्जर है जबकि शिवराज प्रदेश में ‘अमेरिका से बेहतर’ सड़कें होने का दावा करते हैं. वे 13 साल से और उनकी पार्टी 15 सालाें से राज्य की सत्ता में है, लेकिन बुधनी के लोग पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में उनकी नाराज़गी स्वाभाविक है.

Friday, November 16, 2018

राजस्थान में सचिन या गहलोत?

राजस्थान में खुद को सत्ता के करीब पा रही कांग्रेस किसी तरह का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं. सचिन पायलट और अशोक गहलोत की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही पार्टी ने अब बीच का रास्ता निकाला है. मध्य प्रदेश के उलट राजस्थान में इन दोनों ही नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए कह दिया गया है. जल्दी ही उनके चुनाव क्षेत्रों का ऐलान भी कर दिया जाएगा. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो ये दोनों ही नेता मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में रहेंगे. यानी जो भी घमासान होना है वो चुनाव नतीजे आने के बाद ही होगा. पर एक कोशिश उम्मीदवारों की सूची को लेकर चल रहे घमासान को रोकने की भी दिखती है जो अलग-अलग गुटों के दावेदारों के बीच कुछ इस तरह फंसी है कि अभी तक बाहर ही नहीं आ सकी है. माना जा रहा है कि प्रदेश के सभी ताकतवर नेता अपने-अपने समर्थकों को अधिक से अधिक टिकट दिलवाने में लगे हैं ताकि चुनाव बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी करते समय अपने पक्ष में अधिक विधायकों का समर्थन दिखाया जा सके. इसीलिए बड़ा सवाल यही है कि गहलोत और पायलट को चुनाव लड़ाने से कांग्रेस के लिए राजस्थान में बात सुलझी है या फिर उलझी है? पायलट की सीट पर कौन रहेगा और को पायलट कौन होगा? यह सवाल पूछने पर गहलोत झल्ला जाते हैं. वे कहते हैं कि मीडिया बार-बार यह सवाल पूछती है. लेकिन इंदिरा गांधी के जमाने से ही और आजादी के बाद से ही आज तक कभी भी राजस्थान में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का नाम घोषित नहीं किया गया.
लेकिन और दिनों के मुकाबले आज गहलोत अधिक आत्मविश्वास से भरे नज़र आए. उनकी बॉडी लैंग्वेज और बगल में बैठे सचिन पायलट से उनकी गर्मजोशी यह दिखा रही है कि शायद फिलहाल दावेदारी के मुद्दे को किनारे कर चुनाव जीतने पर फोकस लगाने का फैसला किया गया है. उन्हें इस बात का एहसास है कि मीडिया के एक हिस्से में बार-बार उनके और सचिन के बीच टकराव को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता रहा है. इसे राजस्थान कांग्रेस में फूट और गुटबाजी के तौर पर भी पेश किया जाता है. वैसे राहुल गांधी ने ये कोशिश की है कि दोनों को एक साथ रखा और दिखाया जाए. इसीलिए उनके हर राजस्थान दौरे में ये दोनों नेता एक साथ दिखते हैं. अलग से भी उनकी कुछ तस्वीरें बार-बार सामने आती हैं यह दिखाने के लिए कि सब साथ-साथ हैं. आज दोनों नेताओं के चुनाव लड़ने का ऐलान भी हो गया. दोनों नेताओं के चुनाव लड़ने का यह फैसला उस दिन घोषित हुआ जिस दिन कांग्रेस ने राजस्थान में बीजेपी का एक बड़ा विकेट गिराया है. दौसा से बीजेपी के सांसद और पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा आज बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हो गए. यह किरोड़ीमल मीणा के बीजेपी के दोबारा साथ आने और उन्हें राज्यसभा भेजने की बीजेपी की रणनीति का जवाब है. हरीश मीणा के भाई और पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा कांग्रेस में ताकतवर नेता हैं. हरीश मीणा पिछले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में आए थे और अब विधानसभा चुनाव से पहले घर वापसी कर गए.
बीजेपी के मौजूदा सांसद को तोड़ लेने की खुशी छुपाए नहीं छुपी. गहलोत ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से पूछा कि राजस्थान में मिशन 180 का क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ कि अब बीजेपी का कोई नेता इस मिशन की बात नहीं कर रहा है? उन्होंने कहा कि इनका ग्राफ नीचे आ रहा है. एनडीए और मोदी का ग्राफ नीचे आ रहा है. दो लोग राज कर रहे हैं. शाह ने कहा था कि मिशन 180. अब क्या हुआ. अब कोई बीजेपी नेता राजस्थान में मिशन 180 की बात क्यों नहीं कर रहा. राजस्थान में कांग्रेस वसुंधरा सरकार की नाकामियों को मुद्दा बना रही है. उसकी कोशिश रोजगार, महंगाई, किसानों की आत्महत्या, रफाल, सीबीआई का दुरुपयोग जैसे मुद्दों को तूल देने की है. उसका आरोप है कि अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ही बीजेपी और संघ परिवार राम मंदिर का मुद्दा उठा रहे हैं. गहलोत का कहना है कि अचानक राम मंदिर का मुद्दा छेड़ दिया गया है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में कहा ये आरएसएस का नहीं बल्कि वीएचपी का मुद्दा है. फिर 15 दिन बाद कहा कानून बनाओ, फिर 15 दिन बाद कहा आंदोलन करेंगे. पूरा देश देख रहा है कि ये क्या हो रहा है. चुनाव आते ही राम मंदिर पर आ गए. तो साफ है कि राजस्थान में कांग्रेस के तेवर न सिर्फ आक्रामक हैं बल्कि वो एकजुट दिखने की कोशिश भी कर रही है. पर क्या वाकई ऐसा है? इसके जवाब के लिए 11 दिसंबर तक इंतजार करना होगा.

छत्तीसगढ़ चुनाव

छत्तीसगढ़ में एक चरण के चुनाव के बाद बसपा नेता मायावती ने यह साफ किया है कि उनकी पार्टी चुनाव के बाद बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर रखेगी. हालांकि उनके ही सहयोगी अजीत जोगी ने एक दिन पहले यह पूछे जाने पर कि क्या जरूरत पड़ी जो बीजेपी को अपना सर्मथन दे सकते हैं. इस पर उन्होंने कहा था कि राजनीति में कुछ भी संभव है मगर बाद में वे अपने बयान से पलट गए. जाहिर है मायावती चुनाव परिणाम से पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहती है. जाहिर है इन चुनावों का 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी काफी असर पड़ने वाला है. सभी पार्टियों को पता है कि अभी तक छत्तीसगढ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जीत का अंतर एक फीसदी से भी कम होता है. ऐसे में यहां एक-एक वोट कीमती होता है.
ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में बसपा पहली बार लड़ रही हो. वहां उसके पास 4 से 5 फीसदी वोट है और एक दो विधायक भी चुने जाते रहे हैं. मगर इस बार अजित जोगी से गठबंधन करके मायावती ने एक बड़ा दांव खेला है. जानकार मानते हैं कि मायावती और अजित जोगी की जोड़ी एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी है जो एक दोधारी तलवार की तरह है, जिससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों को नुकसान पहुंचेगा. ऐसा नहीं है कि मायावती और जोगी की जोड़ी केवल कांग्रेस का वोट काटेगी, बल्कि यह भी कहा जा रहा है कि वह उन हिस्सों में ज्यादा मजबूत दिख रही है जहां बीजेपी मजबूत है. मगर यह भी तय है कि कांग्रेस को अधिक नुकसान हो सकता है. अजित जोगी कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनकी पत्नी रेणु जोगी ने चुनाव घोषणा के बाद कांग्रेस विधायक पद से इस्तीफा दिया है और अब बसपा जोगी  गठबंधन की उम्मीदवार हैं. यानि बसपा के 4 फीसदी वोट और जोगी का अपना व्यक्तित्व जितना अधिक वोट खींचेगा कांग्रेस बीजेपी उतनी ही मुश्किल में रहेगी. कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि पार्टी को बसपा के साथ गठबंधन कर लेना चाहिए था, क्योंकि गठबंधन ना करने से भी पार्टी सरकार बनाने नहीं जा रही थी और यदि कांग्रेस-बसपा गठबंधन हो जाता तो बसपा के 4 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस के पास बीजेपी से ज्यादा वोट होते. छत्तीसगढ़ में बीजेपी के पास 41.04 फीसदी, कांग्रेस के पास 40.04 और बीएसपी के पास 4.27 फीसदी वोट है. इस गणित के आधार पर यदि मायावती को कुछ सीटें यदि अधिक देना भी पड़ता तो कांग्रेस को वह करना चाहिए था मगर कहते हैं ना गठबंधन करना कांग्रेस के डीएनए में नहीं है और इसी का फायदा बीजेपी लगातार उठा रही है. दूसरा इन राज्यों में बसपा से गठबंधन करने का फायदा कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी होता. यदि बसपा इन विधानसभा में अच्छा नहीं करती तो वह लोकसभा चुनाव में भी अधिक सीट मांगने की हालत में नहीं होती. ऐसे में लगता है कांग्रेस का अति आत्मविश्वास कहीं उसे भारी न पड़ जाए या फिर रमन सिंह के इतने सालों के शासन के बाद जो ऊब पैदा होती है जनता में उस पर कांग्रेस को भरोसा है. नतीजा चाहे जो भी हो बसपा जोगी ने एक साथ आकर छत्तीसगढ़ चुनाव को त्रिकोणीय और दिलचस्प बना दिया है.

Thursday, October 25, 2018

सीबीआई में चल रही उठापटक क्या है?

सीबीआई के डायरेक्टर रहे आलोक वर्मा की छुट्टी. वही आलोक वर्मा जिनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'ब्लू-आइड बॉय' बताए जाने वाले राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ साज़िश और भ्रष्टाचार के मामले में केस दर्ज हुआ था और मामले की जांच हो रही थी. राकेश अस्थाना हाल तक सीबीआई में नंबर टू पर थे. प्रेस-कांफ्रेस के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जब सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे थे तो इसकी जांच के लिए किसी तीसरे आदमी की ज़रूरत थी. अरुण जेटली ने ये बात उनसे सीबीआई में अचानक से किए गए बदलावों पर किए गए सवालों के जवाब में कही थी. मगर ये तो एक सरकारी जवाब सा है. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके अरुण शौरी और एडवोकेट प्रशांत भूषण रफ़ाल सौदे में हुए कथित घोटाले की बात लेकर सीबीआई गए थे, और उनकी मुलाक़ात आलोक वर्मा से हुई. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ सरकार आलोक वर्मा और अरुण शौरी-प्रशांत भूषण के बीच हुई मुलाक़ात को लेकर ख़ुश नहीं थी और हुकूमत के एक सीनियर अधिकारी का कहना था कि एजेंसी के चीफ़ का राजनीतिज्ञों से मिलना आम बात नहीं है. लेकिन सीबीआई के पूर्व निदेशक डीआर कार्तिकेयन कहते हैं कि कोई भी अधिकारी किसी से मिलने से कैसे मना कर सकता है? डीआर कार्तिकेयन के मुताबिक़, "वो किसी से भी मिलने को ग़लत नहीं समझते बशर्ते कि ये बार-बार न हो और सबसे बेहतर तो ये होगा कि एजेंसी प्रमुख ऐसी मुलाक़ातों में अपने साथ किसी सीनियर अधिकारी को भी बैठक में रहने को कहें." प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और वाजपेयी सरकार के एक अन्य पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा भारत और फ्रांस के बीच हुए राफेल विमान सौदे में कथित घोटाले और प्राइवेट कंपनी रिलायंस को कथित तौर पर फायदा पहुंचाने का इलज़ाम लगाते रहे हैं और बार-बार इसमें जांच की मांग उठाते रहे हैं. कांग्रेस भी रफ़ाल सौदे पर भारतीय जनता पार्टी पर लगातार दबाव बनाए हुए है और कई बार तो बात यहां तक हो रही है कि रफ़ाल सौदा मोदी सरकार के लिए राजीव गांधी के बोफोर्स जैसा बनता जा रहा है. साल 1984 में भारी मतों से सत्ता में आए 'मिस्टर क्लीन' यानी राजीव गांधी को अगले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था जिसकी एक बड़ी वजह बोफोर्स तोप सौदे में हुआ कथित घोटाला बताया गया था. अरुण शौरी ने बीबीसी से कहा कि ये एक ऐसी आंधी है जिसमें बीजेपी दब जाएगी. उन्होंने ये भी कहा कि इस पूरे मामले ने मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हाल में कई विश्लेषकों ने कहा है कि मोदी जो सत्ता में कंट्रोल और दृढ़ नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, वो सीबीआई के मामले में कमज़ोर दिखाई देते हैं और ये पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. आनेवाले दिनों में चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और बीजेपी जिन कुछ मुद्दों पर जनता से वोट मांगती रही है उसमें मोदी का दृढ़-नेतृत्व भी शामिल रहा है. 
स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई, प्रधानमंत्री ने वर्मा को सोमवार को मुलाक़ात के लिए बुलाया, मंगलवार को अस्थाना दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गए जिसने उनकी गिरफ्तारी पर चंद दिनों के लिए रोक तो लगा दी लेकिन उनके ख़िलाफ़ जांच को ये कहते हुए रोकने से मना कर दिया कि उन पर लगे आरोप गंभीर हैं. अस्थाना ने भी कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए एक ख़त में वर्मा पर रिश्वतख़ोरी और दूसरे कई तरह के आरोप लगाए थे.सीबीआई के कई जानकार इशारों में कहते हैं कि राकेश अस्थाना ने ये ख़त किसी की शह पर लिखे थे क्योंकि हुकूमत को ये डर सताने लगा था कि आलोक वर्मा राफेल सौदे पर सीबीआई जांच न शुरू करवा दें. मोदी-शाह के क़रीबी मानेजाने वाले अस्थाना को इस काम में लगाया गया लेकिन जब वर्मा के ख़िलाफ़ जाल बुना जा रहा था तो सीबीआई के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर ख़ुद उस जाल में उलझते चले गए. मगर वर्मा और अस्थाना के बीच की रस्साकशी कोई नई थी और वो तबसे जारी थी जब अस्थाना को हुकूमत ने स्पेशल डायरेक्टर के पद पर नियुक्त करने की शुरुआत की थी जिसका विरोध आलोक वर्मा की तरफ से ये कहते हुए हुआ था कि अस्थाना के खिलाफ कई मामलों में जांच जारी है तो उन्हें जांच एजेंसी में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए. दोनों के बीच का ये तनाव आगे के दिनों में और आगे भी बढ़ा जो आख़िरकार अदालत तक जा पहुंचा. मंगलार को अस्थाना मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी आदेश दिया था कि इस मामले में यथास्थिति बरक़रार रखी जाए. अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या सीबीआई हेडक्वॉर्टर में मंगलवार आधी रात के वक़्त जो कुछ हुआ वो हाईकोर्ट के उस हुक्म का उल्लंघन तो नहीं जिसमें अदालत ने यथास्थिति क़ायम रखने को कहा था. नए डायरेक्टर ने चार्ज लेने के बाद कई अधिकारियों का तबादला कर दिया है. इनमें वो भी शामिल हैं जो राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ हो रही जांच में शामिल थे. आलोक वर्मा ने अपने खिलाफ़ की गई कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है जिसकी सुनवाई अदालत शुक्रवार को करेगी. वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि सीबीआई में किया गया बदलाव सुप्रीम कोर्ट के उस हुक्म के खिलाफ़ है जिसमें निदेशक की बहाली में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का होना ज़रूरी है.

Thursday, October 11, 2018

छे ग्वेरा की कहानी

एर्नेस्तो ‘चे’ गेवारा. वह शख्स जो कुछ लोगों के लिए हीरो था तो कुछ के लिए हत्यारा. उस पर आरोप लगता था कि वह तीसरा विश्वयुद्ध करवाना चाहता है. अमेरिका और अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज उसे ख़त्म करना चाहती थीं, हालांकि उसकी मौत आज भी एक रहस्य है. उसके शव को और भी रहस्यमय तरीके से किसी अनजान जगह पर दफ़नाया गया था. पर जिस व्यक्ति का नामोनिशान अमेरिका और पूंजीवादी ताक़तें मिटा देना चाहती थीं, वह आज एक किंवदंती बन चुका है. अर्जेंटीना में जन्मे एर्नेस्तो गेवारा ने क्यूबा की क्रांति में अहम योगदान दिया था. गेवारा ने ग़ैर साम्राज्यवादी और ग़ैर-पूंजीवादी समाज की कल्पना की थी. इसमें हर कोई बराबर का भागीदार था. उनके इस सपने ने जाने कितने ही युवाओं को सशस्त्र क्रांति की राह पर चलने की प्रेरणा दी. गेवारा की असल ज़िंदगी वहां से शुरू होती है जब उन्होंने अपने दोस्त, अल्बेर्तो ग्रेनादो के साथ दक्षिण अमेरिका को जानने के लिए तकरीबन दस हज़ार किलोमीटर की यात्रा की. तब उनकी उम्र तकरीबन 23 साल थी. मोटरसाइकल पर की गई यही यात्रा उनकी जिंदगी का वह महत्वपूर्ण पड़ाव थी जिसने उन्हें हमेशा के लिए बदल दिया. इस दौरान उन्होंने दक्षिण अमेरिका के लोगों को जीने के लिए विषम परिस्थितियों से जूझते हुए देखा. उन्होंने देखा कि कैसे पूंजीवाद ने लोगों को अपने अस्तित्व से अलग कर दिया था. कैसे कुष्ठ रोग से मर रहे मरीज़ों को समाज से अलग-थलग दिया गया था. कैसे खदानों में काम करने वाले मजदूरों का शोषण किया जा रहा था. कैसे समाजवादियों को ख़त्म किया जा रहा था और कैसे पंद्रहवीं शताब्दी की महान ‘इंका सभ्यता’ से जुड़े लोगों को हाशिये पर धकेला जा रहा था. गेवारा ने इस पूरे वृतांत को ‘मोटरसाइकिल डायरीज’ नाम से संस्मरण में कलमबद्ध किया है. इसके अंत में उन्होंने ग़रीब और हाशिये पर धकेले जा चुके लोगों के लिए जीवनभर लड़ने की कसम भी उठाई थी. 
1953 में गेवारा अपने शहर ब्यूनस आयर्स लौट आए. कुछ ही वक्त में उनकी पढ़ाई पूरी हो गई और वे डॉ एर्नेस्तो गेवारा बन गए. लेकिन उनका इरादा डॉक्टरी करने का नहीं था. वे पहले ही दुनिया और समाज को बदलने की कसम खा चुके थे. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्हें एक बड़ी जंग लड़नी थी. यह जंग या क्रांति पूंजीवाद के ख़िलाफ़ थी जो अमेरिकी समाज का आधार था. गेवारा जिस व्यवस्था के प्रशंसक थे, कुछ-कुछ वैसी ही व्यवस्था पड़ोसी देश ग्वाटेमाला में तैयार हो रही थी. उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद निश्चय किया कि वे वहां जाकर इस व्यवस्था को करीब से देखेंगे.
ग्वाटेमाला में तब समाजवादी सरकार हुआ करती थी और जहां राष्ट्रपति जैकब अर्बेंज गुजमान बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम लागू कर रहे थे. इन कार्यक्रमों का शिकार अमेरिका की एक बड़ी कंपनी – यूनाइटेड फ्रूट कंपनी भी हुई जिसके पास वहां लाखों एकड़ जमीन थी. इन कार्यक्रमों से अमेरिका के और भी कारोबारी हित प्रभावित हो रहे थे तो आखिरकार अमेरिकी सरकार और सीआईए ने यहां गुजमान सरकार का तख्ता पलट करवा दिया. गेवारा उस समय ग्वाटेमाला में ही थे और गुजमान का समर्थन कर रहे थे. लेकिन तख्तापलट के बाद पकड़े और मारे जाने के डर से वे मैक्सिको आ गए.
ग्वाटेमाला में सरकार के तख्तापलट ने गेवारा के मन में क्रांति की आग और अमेरिका विरोध को और भड़का दिया. लेकिन वे तुरंत कुछ करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए मैक्सिको पहुंचकर उन्होंने एक अस्पताल में नौकरी कर ली. इसी दौरान उनकी मुलाकात क्यूबा से निर्वासित फिदेल कास्त्रो और उनके भाई राउल कास्त्रो से हुई. इस मुलाकात के बाद गेवारा के लिए आगे का रास्ता बिलकुल स्पष्ट हो गया था. उन्होंने तय कर लिया था कि अब उनका लक्ष्य क्यूबा की अमेरिका समर्थित तानाशाही सरकार को हटाना है. इसके बाद वे फिदेल के साथ क्यूबा की क्रांति के अगुवा नेता बन गए.
क्यूबा की क्रांति के दौरान गेवारा की दिलेरी ने बाकी विद्रोहियों के ज़ेहन पर गहरी छाप छोड़ी थी; डॉक्टर की हैसियत से और विद्रोही की हैसियत से भी. इसी संघर्ष ने उन्हें एर्नेस्तो गेवारा से चे गेवारा बना दिया. स्पेनिश में चे का मतलब होता है- दोस्त. चे गेवारा की जीवनी लिखने वाले अमेरिकी पत्रकार जॉन ली एंडरसन के मुताबिक़ ‘गेवारा की ख़ुद को मिटाकर क्रांति को जिंदा रखने की ज़िद ने विद्रोहियों के बीच उन्हें सबसे ऊंचा मुक़ाम दिलाया था. पंद्रह-सोलह साल के विद्रोहियों के लिए तो चे ‘सबकुछ’ हो गए थे - महान नायक, क्रान्तिकारी और किंवदंती.’
दूसरी तरफ सीआईए क्यूबा की बातिस्ता सरकार के सैनिकों को कास्त्रो के विद्रोह के ख़िलाफ़ हथियार और प्रशिक्षण दे रही थी. इसकी वजह यह थी कि अमेरिकियों का बेहिसाब पैसा क्यूबा के तेल और अन्य व्यवसायों में लगा हुआ था. उनके लिए क्यूबा ड्रग्स, वेश्यावृति और जुए का सबसे मुख्य स्थान भी था. इसके बावजूद कास्त्रो के विद्रोही जीत रहे थे. इस जीत के पीछे स्थानीय लोगों का समर्थन एक वजह थी और इस समर्थन के पीछे चे की प्रेरणा की भी अहम भूमिका थी. धीरे-धीरे यह विद्रोह क्यूबा में प्रांत दर प्रांत फैलता जा रहा था. जनवरी 1959 में मुश्किल से 500 विद्रोहियों ने बतिस्ता सरकार का तख्तापलट कर दिया. फ़िदेल कास्त्रो ने सत्ता में आते ही चुनावों का वादा किया, जो कभी पूरा नहीं हुआ. चे के विचारों से प्रभावित होकर फिदेल ने क्यूबा में मार्क्सवादी व्यवस्था को लागू किया था. क्यूबा क्रांति के संस्मरणों पर भी चे गेवारा ने क़िताब लिखी है. फ़िदेल की सरकार में गेवारा को उद्योग मंत्रालय मिला और वे ‘बैंक ऑफ़ क्यूबा’ के अध्यक्ष बनाये गए. चे की ‘नई दुनिया’ अब आकार लेने लगी थी. बतौर मंत्री उन्होंने कभी भी सत्ता को नहीं जिया. एंडरसन बताते हैं कि उनका परिवार उस समय पर भी बसों से सफ़र किया करता था और वे सप्ताह में एक दिन खुद श्रमदान भी करते. सत्याग्रह में ही 12 जून को प्रकाशित लेख ‘मार्क्स ख़ुद कितने मार्क्सवादी थे’ पढ़कर और चे गेवारा को जानकर लगता है कि शायद चे गेवारा ही अकेले सच्चे मार्क्सवादी रहे हैं. 1959 में क्यूबा के उद्योग मंत्री के रूप में वे भारत भी आये थे. कहा जाता है कि उन्होंने नेहरू से क्यूबा की चीनी ख़रीदकर अपरोक्ष रूप से समाजवाद को फ़ैलाने का अनुरोध किया था. क्यूबा क्रांति के बाद चे ने पूरे लैटिन अमेरिका के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य को बदलने का संकल्प लिया. इसका मतलब था हर देश में विद्रोह फैलाना. और जाहिर है कि इसके लिए खूंनी क्रांति को ही जरिया बनाया जाना था. चे और कास्त्रो ने कई राजनैतिक विद्रोहियों का क़त्ल किया था. चे पर इल्ज़ाम लगा कि उन्होंने कई बेगुनाह भी मारे. हालांकि एंडरसन बेगुनाहों की हत्या की बात नकारते हैं. चे क्यूबा को रूस के नज़दीक ले गए. सोवियत रूस के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव के बेटे सर्गेई एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है’ वाले फ़लसफ़े पर उनके पिता ने क्यूबा को सहयोग देने का फ़ैसला किया था. जानकारों के मुताबिक ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के दौरान चे चाहते थे कि रूस अमेरिका पर परमाणु बम गिराए पर लेकिन बाद में रूस के अमेरिका से हाथ मिलाने पर उन्हें धक्का लगा था. अब चे गेवारा चीन की तरफ झुकने लगे थे. इधर फिदेल कास्त्रो रूस के साथ ही रहना चाहते थे. लिहाज़ा, दोनों में वैचारिक मतभेद उभरने लगे. इसको देखते हुए चे ने क्यूबा छोड़ कर कांगो में क्रांति लाने का मन बनाया जो नाकाम रही. कांगो में रहने के दौरान ही उन्होंने फ़िदेल कास्त्रो को ख़त लिखकर सरकार में अपना मंत्री पद और इस देश की नागरिकता छोड़ने के फैसले से अवगत कराया. हालांकि कांगो में विफल होने पर फ़िदेल ने उन्हें दोबारा क्यूबा लौटने का सुझाव दिया जिसे चे ने ठुकरा दिया. उसके बाद वे बोलीविया में सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश में नौ अक्टूबर, 1967 को बोलीवियाई सेना और सीआईए के हाथों मारे गए. विश्वभर का युवा आज चे के चेहरे के तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनना फैशन समझता है. हाथ में बड़ा सा सिगार, बिखरे हुए बाल, सिर पर टोपी, फौजी वर्दी सबको लुभाती है. जिस तरह से वे जिए और जैसे मरे उसने उन्हें पूरी दुनिया में ‘सत्ताविरोधी संघर्ष’ का प्रतीक बना दिया है.
कुछ अर्थों में चे गेवारा की यात्रा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक महात्मा गांधी से भी मिलती है. दोनों एक मध्यवर्गीय परिवार से थे. दोनों ने ऊंची तालीम हासिल की और दोनों के सपनों की परिणति बराबरी और इंसाफ वाली एक व्यवस्था थी. चे गेवारा की तरह गांधी ने भी अपने अस्तित्व को एक यात्रा के जरिये खोजा था. लेकिन ऐसी यात्रा के बीच जहां चे गेवारा पिस्तौल उठा लेते हैं, वहीं चौरीचौरा में हिंसा के बाद गांधी असहयोग आंदोलन को बंद करते वक़्त दलील देते हैं कि ‘हिंसा से प्राप्त हुई आजादी का कोई मोल नहीं है.’ गांधी साधन और साध्य की एकता में यकीन करते थे. उनका विश्वास हिंसा के बजाय प्रेम से हृदय परिवर्तन में था. शायद इसीलिए बहुत से लोग मानते हैं कि भारतीयों में ही नहीं पूरे विश्व की बड़ी आबादी के के डीएनए में ‘चेवाद’ से ज़्यादा ‘गांधीवाद’ है. और शायद रहेगा भी.
याद कीजिये रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ का वह दृश्य जिसमें गांधी दक्षिण अफ्रीका में ‘परमिट’ को जलाते हैं. गांधी अपने परमिट को आग के हवाले करते हैं और अंग्रेज़ सिपाही उनके हाथ पर लाठी मारकर उन्हें ख़बरदार कर देता है. अब जब तय है कि दोबारा ऐसा करने पर लाठी पड़ेगी, गांधी एक और परमिट उठाते हैं और जलती हुई आग में डाल देते हैं. उन्हें दोबारा लाठी पड़ती है. कुल मिलाकर गांधी समाज में व्याप्त अंतर को खत्म करने का बीड़ा उठाते हैं पर वे हथियार नहीं उठाते.
जहां चे गेवारा आज़ाद प्रेस जैसी किसी भी बात को मानने से इंकार कर देते हैं, गांधी ‘यंग इंडिया’, या ‘हरिजन’ जैसे अखबार निकालकर समाज तक पहुंचते हैं. जहां चे पूरे विश्व में समान विचारधारा के लिए हिंसक हो उठते हैं, वहीं गांधी अध्यात्म के रास्ते भारत में विविध विचारधाराओं को समेटने का प्रयास करते नज़र आते हैं. एक तरह से मार्क्सवाद समाज की विचारधारा को पलटने की कोशिश करता है. वहीं गांधीवाद समाज के अन्दर पनप रहीं विचारधाराओं को अध्यात्म से साधने की कोशिश है. और गांधी की राह चले नेल्सन मंडेला से लेकर मार्टिन लूथर किंग के संघर्षों का हासिल बताता है कि यह रास्ता मुश्किल सही, पर कारगर है. जों ली एंडरसन चे और गांधी की लोकप्रियता के अंतर को भौतिक स्तर पर समझाते हैं. उनके मुताबिक़ चे पूरे ऊंचे कद के ख़ूबसूरत इंसान थे वहीं गांधी छोटे कद के थे और चश्मा लगाते थे. कहा जा सकता है कि चे की क्रांति को समझने के लिए सिर्फ़ पिस्तौल थाम लीजिए वही काफी है. लेकिन गांधी की विचारधारा समझने के लिए अध्यात्म थामना होगा. इसलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा था- ‘आने वाली पीढ़ियां ताज्जुब करेंगी कि हाड़-मांस का एक ऐसा इंसान इस धरती पर कभी चला था.’

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...