Thursday, January 31, 2019
जीएसटी फेल होने के कारण
Sunday, January 27, 2019
बजट कैसा हो?
भारतीय सर्वर में हो भारत का डेटा : ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तर्ज पर विदेशी इंटरनेट कम्पनियां भारतीयों के डेटा की बन्दरबांट कर रही हैं, जिसको डिजिटल इंडिया का पर्याय बताने की नादानी हो रही है. रिजर्व बैंक द्वारा डेटा के स्थानीयकरण के बारे में अप्रैल, 2018 में नियम बनाए गए हैं, जिन्हें इंटरनेट लॉबी के दबाव की वजह से लागू नहीं किया जा रहा है. भारत में डेटा स्टोर करने का नियम बनने पर प्रति सर्वर औसतन 1,000 युवा और सामूहिक तौर पर लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा.
भारत में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति : आईटी एक्ट और 2011 के नियमों के अनुसार प्रत्येक इंटरनेट कम्पनी द्वारा शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करना ज़रूरी है और इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्त, 2013 में सरकार को आदेश भी दिया था. केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के निर्देश को दरकिनार करके व्हॉट्सऐप ने भी भारतीय कारोबार के लिए शिकायत अधिकारी को अमेरिका में बैठा दिया है. बजट सत्र में इस बारे में कानूनी बदलाव होना ज़रूरी है.
डेटा सुरक्षा कानून जल्द पारित हो : सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने सामूहिक सहमति से प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा के बारे में दो वर्ष पहले ऐतिहासिक निर्णय दिया था. पूर्ववर्ती UPA सरकार के दौर में जस्टिस एपी शाह कमेटी और अब NDA के दौर में जस्टिस श्रीकृष्णा कमेटी ने डेटा सुरक्षा के बारे में विस्तृत अनुशंसा की है. आरक्षण और तीन तलाक पर तुरन्त कानून बनाने वाली सरकार, डेटा की सुरक्षा और इस पर टैक्स की व्यवस्था बनाकर डिजिटल क्रान्ति को सही अर्थों में सुनिश्चित कर सकती है.
इनकम टैक्स और GST कानून में बदलाव हो : गोविन्दाचार्य की याचिका के बाद सरकार ने इंटरनेट कम्पनियों पर 6 फीसदी का गूगल टैक्स लगाया था पर उसके बाद गाड़ी फिर से ठप हो गई. डेटा के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारोबार और ट्रांसफर पर GST का कानून लागू कर दिया जाए तो डेटा सुरक्षा के साथ खरबों डॉलर की टैक्स आमदनी भी होगी. विदेशी इंटरनेट कम्पनियों के भारतीय ऑफिस को इनकम टैक्स कानून के तहत परमानेंट एस्टैबलिशमेंट के तौर पर मान्यता दिए जाने का कानून बनाए जाने से देश को पांच लाख करोड़ से ज्यादा की टैक्स आमदनी हो सकती है.
गांधी की 150वीं जयन्ती और विश्वगुरु का सपना : सोने की चिड़िया सा मजबूत भारत, विदेशी डिजिटल के प्लास्टिक मनी के पंखों से विश्वगुरु की ऊंची उड़ान कैसे भरेगा...? गांधी की 150वीं जयन्ती पर विश्वगुरु और आर्थिक महाशक्ति बनने के स्वप्न को साकार करने के लिए भारत का डेटा भारतीय सर्वर में आन्दोलन हेतु बजटीय प्रावधान होने चाहिए.
क्या असर होगा प्रियंका गांधी के आने का
लेकिन इसके बावजूद प्रियंका के राजनीति में आगमन का एक अर्थ है. चाहे यह जितना भी बहसतलब हो, लेकिन भारतीय राजनीति बहुत दूर तक छवियों के आसपास घूमती रही है. नरेंद्र मोदी से लेकर लालू-मायावती तक अपनी छवि के फायदे और नुक़सान उठाते रहे हैं- राहुल भी. पिछले दिनों राहुल की एक पप्पू छवि बनाई गई. अंततः वह छवि टूट रही है. प्रियंका गांधी की भी अपनी संक्षिप्त राजनीतिक सक्रियता के दौरान एक छवि बनी है. यह आम राय है कि उनमें लोगों या कार्यकर्ताओं से घुलने-मिलने का एक सहज गुण है. पिछले चुनावों के दौरान उन्होंने इसे साबित भी किया है. दूसरी बात यह कि लोग उनमें अपनी दादी इंदिरा की छवि देखते हैं. हालांकि प्रियंका में एक तरह की मृदुता है और मानवीयता भी. अपने पिता राजीव गांधी की हत्या के गुनहगारों के प्रति उनका संवेदनशील रवैया बताता है कि वे लीक से हट कर सोचती हैं और प्रतिशोध को मूल्य नहीं मानतीं.
लेकिन सिर्फ मनुष्य होने, सहज होने या लोगों से घुल-मिल जाने से चुनाव नहीं जीते जा सकते. 2019 का संग्राम ऐसी सरलीकृत धारणाओं से जीता नहीं जाएगा. उसमें सारे समीकरण साधने की एकाग्रता और एक-एक इंच ज़मीन जीतने की युयुत्सा चाहिए होगी. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी में यह आक्रामकता, यह युयुत्सा, यह युद्ध लड़ते रहने की इच्छा दिखती है. दूसरी तरफ राहुल गांधी में अक्सर इसका अभाव दिखता है. कांग्रेस के भीतर अपने सत्तारोहण के मौक़े पर उन्हें अपनी मां की सीख याद आई कि सत्ता ज़हर होती है. बाद के कई अवसरों पर दिखा कि जब दांत भींच कर लड़ने की ज़रूरत रही, वे मुस्कुरा कर कहीं और निकल जाते रहे. प्रियंका के आगमन का यहीं से अर्थ खुलता है. अब राहुल और प्रियंका की जोड़ी कांग्रेस में उस महत्वाकांक्षा का नए सिरे से संचार कर सकती है जिसकी कमी कांग्रेस कार्यकर्ता महसूस करता रहा है. वे कांग्रेस के कुछ ठहरे हुए तालाब में एक कंकड़ की तरह हैं जिससे पैदा तरंगें दूर तक जाएंगी. इतनी भर हलचल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए चुनावों में एक बड़ा फ़र्क पैदा कर सकती है.
दूसरी बात यह कि यह समझना ज़रूरी है कि राहुल और प्रियंका की कांग्रेस पुरानी कांग्रेस से काफी भिन्न है. इस कांग्रेस में इंदिरा गांधी की लगाई हुई इमरजेंसी के प्रति एक तरह का संकोच भाव है, 1984 की हिंसा को लेकर राजीव गांधी की प्रतिक्रिया से यह कांग्रेस अलग है. यह दो शरीफ़ और सदाशयी युवाओं की कांग्रेस है जो दलितों-आदिवासियों-किसानों के प्रति ज़्यादा सदय है. मिर्चपुर की हिंसा को लेकर राहुल का रवैया हो या नियामगिरि के आदिवासियों के साथ खड़े होने का मामला- इस कांग्रेस ने अपनी भिन्नता दिखाई है.
बेशक, यह कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं है. कांग्रेस अब भी कई उन दुर्गुणों की मारी है जो बीजेपी ने उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से सीख लिए हैं. लेकिन संसदीय राजनीति की सीमाओं के भीतर एक बड़े चुनाव से पहले कांग्रेस जो बड़ा दांव खेल सकती थी, यह वह दांव ज़रूर है. क्योंकि इससे लड़ाई का मोर्चा और मैदान भी कुछ बदल जाता है. बीजेपी को अब राहुल के अलावा प्रियंका का भी मुक़ाबला करना है. दूसरे दलों को अब अपने तालमेल या मोलतोल में प्रियंका का भी खयाल रखना है. कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए यह वह बदलाव है जो उनमें एक नई स्फ़ूर्ति पैदा कर सकता है. इन सबके बावजूद यह सवाल बचा रहता है कि 2019 के चुनाव का नक्शा क्या प्रियंका की उपस्थिति से बदलेगा? इस सवाल का जवाब तो 2019 के चुनाव देंगे, लेकिन यह सवाल बताता है कि हम बहुत छोटे-छोटे संदर्भों में सोचने के आदी हो गए हैं. 2019 के नतीजे जो भी हों, उसके बाद भी प्रियंका की सक्रियता कांग्रेस के लिए ज़रूरी होगी,- और संभवतः भारतीय राजनीति को ज़्यादा संभावनापूर्ण बनाएगी.
Sunday, January 13, 2019
यूपी में बुआ बबुआ का गठबंधन
उत्तर प्रदेश की दोनों पार्टियों के प्रमुखों ने आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे की 80 सीटों पर अपने गठबंधन को अंतिम रूप दे दिया है - दोनों दल 37-37 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करेंगे, तीन सीटें चौधरी अजित सिंह तथा जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के लिए छोड़ी गई हैं, और एक सीट क्षेत्रीय निषाद पार्टी के लिए तय की गई है. SP और BSP राज्य की दो लोकसभा सीटों - कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तथा UPA अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली - में प्रत्याशी खड़े नहीं करेंगी, क्योंकि कांग्रेस भले ही राज्य में बने 'मिनी-गठबंधन' का हिस्सा नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय चुनाव में उन्हीं के पास सबसे ज़्यादा मौके होंगे.
सो, इस तरह हाल ही में तीन बड़े राज्यों - राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ - में जीतने वाली कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में पूरी तरह गठबंधन से बाहर भी नहीं किया गया है. यह और कुछ नहीं, किसी भूलभुलैया जैसा है, और यही उत्तर प्रदेश की राजनीति है.
उत्तर प्रदेश पर मोदी-शाह की जोड़ी का कब्ज़ा रोकने के लक्ष्य को लेकर राहुल गांधी, मायावती और अखिलेश यादव के साथ हैं. वर्ष 2009 में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 21 लोकसभा सीटें जीती थीं. इसके बाद वर्ष 2014 में उन्होंने सिर्फ दो सीटें जीतीं और उनकी वोट हिस्सेदारी सिर्फ 7.53 फीसदी रह गई, जो मोटे तौर पर सिर्फ अगड़ी जातियों से मिले. खिलेश र मायावती के बीच गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, और मायावती के करीबी सहयोगी सतीश मिश्रा ने इस बात से इंकार किया है कि बहनजी के जन्मदिन - 15 जनवरी - को बड़ी घोषणा के लिए चुना गया है. लेकिन सूत्र इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि मंगलवार को हुई मुलाकात में सभी पहलुओं को अंतिम रूप दे दिया गया है, और इसका जश्न मनाने के लिए अखिलेश यादव ने पारम्परिक रूप से खिलाए जाने वाले 'लड्डुओं' के स्थान पर 'बुआ जी' को उनकी पसंदीदा सीताफल आइसक्रीम खिलाई. राहुल गांधी भले ही औपचारिक रूप से उत्तर प्रदेश में बने BJP-विरोधी मोर्चे का हिस्सा नहीं बने हों, लेकिन माना जा रहा है कि उन्होंने अखिलेश यादव से बात की है, ताकि ऐसी किसी योजना पर काम किया जा सके, जिसमें कांग्रेस, BJP के सवर्ण वोटों में सेंध लगा सकें, और राजनैतिक शब्दावली में कहें, तो 'वोट कटुआ' की भूमिका निभा सके.
मायावती के दलित तथा अखिलेश यादव के यादव सरीखी अन्य पिछड़ी जातियों के वोटों के एकजुट हो जाने के अलावा व्यापक रूप से फैली इस धारणा ने भी उनके पक्ष में काम किया कि इस वक्त मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठे योगी आदित्यनाथ (भगवा चोले में रहने वाले साधु) के राज में अहम प्रशासनिक और पुलिस पदों पर सवर्णों की तैनाती की गई है, जिससे छोटी जातियों को सताने वाला 'ठाकुर राज' कायम हो रहा है.
BJP की दिक्कतों को दोबाला करने वाले कारणों में नाराज़ सहयोगी - अपना दल - शामिल है, जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीती थीं. अपना दल का कहना है कि वे इस बार कहीं ज़्यादा सीटों के हकदार हैं, और वे BJP द्वारा दरकिनार किया जाना सहन नहीं करेंगे, जिसने अब तक उसके नेताओं को उचित सम्मान नहीं दिया है.
हिन्दू वोटों को एकजुट करने तथा अगड़ी जातियों के वोटों को पूरी तरह BJP के पक्ष में करने की कोशिशों के तहत पार्टी के वैचारिक संरक्षक कहे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने शर्त रखी कि उसके बड़े कार्यकर्ता समूह व ज़मीनी समर्थन के बदले पार्टी चुनाव के लिए गोवर्द्धन झड़पिया को राज्य का प्रभारी नियुक्त करे. झड़पिया दक्षिणपंथी विचारों के लिए जाने जाते हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा BJP प्रमुख अमित शाह के कड़े आलोचक रहे हैं. वह वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान राज्य के गृह राज्यमंत्री भी थे.
योगी आदित्यनाथ तथा अमित शाह अपने भाषणों में अखिलेश यादव और मायावती के गठजोड़ को लेकर निंदात्मक रहे हैं, लेकिन RSS का दखल दिखाता है कि गठजोड़ को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है.
मायावती स्वभाव से हठी मानी जाती हैं, और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों में CBI केसों का सामना करने की वजह से वह संभवतः कुछ दबाव में भी हैं, इसलिए वह इस बारे में सावधानी बरत रही हैं कि वह कब और कैसे अपनी योजनाओं को सार्वजनिक करें. उधर, अखिलेश इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि कितना कुछ दांव पर है, सो, उन्हें भी इस रवैये से कोई परेशानी नहीं है. इस वक्त, जब पूरा देश चुनाव की तारीखों की घोषणा का इंतज़ार कर रहा है, अहम योजनाएं तैयार कर ली गई हैं. लेकिन याद रहे, अक्सर सिर्फ एक फोन कॉल से सभी योजनाएं बदल जाया करती हैं.
किन सवर्णों को आरक्षण का लाभ?
आरक्षण का अगर खुलकर किसी ने विरोध नहीं किया, तो उसके पीछे पिछड़े वोट खो देने का डर था, लेकिन आरक्षण के सवाल पर भारतीय समाज किस कदर बंटा रहा, यह विश्वनाथ प्रताप सिंह को लेकर भारतीय समाज की बंटी हुई राय बताती है. मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल के अपने फैसले के साथ वीपी सिंह एक वर्ग के लिए बिल्कुल मसीहा हो बैठे, तो दूसरे के लिए बिल्कुल खलनायक.
लेकिन आरक्षण की राजनीति सारी अनिच्छाओं और दुविधाओं से ज़्यादा ताकतवर निकली. आने वाले वर्षों में आरक्षण के दायरे से बाहर खड़ी जातियां आरक्षण की मांग करती रहीं, जो इन वर्षों में कुछ और तेज़ और आक्रामक हो गई. गूजरों और जाटों से शुरू होकर अब यह मांग पटेलों और मराठों तक जा पहुंची है और उनके लिए राज्यों के स्तर पर आरक्षण के प्रावधान किए जाते रहे हैं.
दिलचस्प यह है कि यह राजनीति उस दौर में सबसे ज़्यादा परवान चढ़ रही है, जब आरक्षण के विरोध में दलीलें बड़ी होती जा रही हैं. यह बार-बार कहा जा रहा है कि आरक्षण के फायदे इच्छित वर्गों तक नहीं जा रहे हैं. किसी न किसी ढंग से मलाईदार तबका इसका फायदा उठा ले रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि जब सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं, तब इस आरक्षण का क्या मतलब है?
अब इन सारे तर्कों के समानांतर सरकार ने आरक्षण के दरवाज़े सामान्य श्रेणी के लोगों के लिए भी खोल दिए हैं. ज़ाहिर है, यह 2019 से पहले उन सवर्णों को लुभाने की कोशिश है, जो हाल के दिनों में BJP सरकारों के खिलाफ आंदोलन और वोट करते नज़र आए. ख़ास बात यह भी है कि इस 10 फीसदी आरक्षण का जो आर्थिक आधार सरकार ने बनाया है, उसमें मोटे तौर पर पूरा मध्य वर्ग शामिल हो सकता है. 'Times of India' की रिपोर्ट बताती है कि सरकार द्वारा तय आर्थिक कसौटियों के आधार पर देश की 95 फीसदी आबादी अब आरक्षण के दायरे में आ जाएगी.
दरअसल यह गरीबों को दिया जाने वाला आरक्षण नहीं है. अगर होता, तो उसके लिए गरीबी रेखा के आसपास की कोई कसौटी नियत की जाती. यह अगड़ों को आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण है. जो लोग महीने में 65,000 रुपये कमाते हैं, वे इस आरक्षण का लाभ ले सकते हैं. ज़ाहिर है, इन्हें गरीब मानना गरीबों का अपमान करना है. सवाल है, क्या सरकार यह बात नहीं समझती है...? दरअसल, यहां भारतीय गरीबी का एक और पेच खुलता है. भारत के ज़्यादातर गरीब पिछड़े, दलित-आदिवासी और मुसलमान हैं. अगर गरीबी रेखा कसौटी बनी होती, तो वहां भी यही लोग मिलते, इसलिए इन्हें आरक्षण से बाहर कर अगड़ों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया.
लेकिन आरक्षण का यह शोशा क्या अपनी नाकामी छिपाने की सरकार की कोशिश है...? क्योंकि यहां भी वही सवाल उठ रहे हैं, जो पहले से आरक्षण विरोधी पूछते रहे हैं. जब सरकारी नौकरियां बची ही नहीं हैं, तो आरक्षण के वास्तविक फायदे किसे मिलेंगे...? लेकिन फिर जो समुदाय - पटेल, मराठा, जाट, गूजर - आरक्षण मांगते रहे हैं, वे क्यों मांगते रहे हैं...? क्योंकि आरक्षण के सैद्धांतिक विरोध की राजनीति को इन्हीं पार्टियों ने दो तरह से इस्तेमाल किया. आरक्षितों को बताया कि तुम्हारे लिए तो नौकरियां ही नहीं हैं, जो आरक्षण है, वह बस झुनझुना है, जबकि आरक्षण के दायरे से बाहर खड़े लोगों को बताया कि तुम्हारे हिस्से की नौकरियां आरक्षण वाले ले जा रहे हैं.
दरअसल यह समाज में घटती नौकरियां और बढ़ती बेरोज़गारी है, जो अलग-अलग समुदायों को इस छीना-झपटी के लिए मजबूर कर रही है. पहले खेती या जमींदारी या कारोबार पर निर्भर जातियां भी अलग-अलग वजहों से आर्थिक संकट की चपेट में हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें सरकारी नौकरी मिलेगी, तो उनके दिन सुधरेंगे. जिन लोगों को अपने लिए पिछड़ा कहा जाना अपनी मूंछ नीची करने के बराबर लगता था. वे सब पिछड़ी पहचान के लिए उतारू हैं - बिना यह जाने कि इससे भी नौकरी नहीं मिलेगी...? यानी सरकार नौकरियां नहीं दे पा रही, रोज़गार के नए इंतज़ाम नहीं कर पा रही, लेकिन आरक्षण दे रही है. देखने लायक बात यह है कि मायावती और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता भी इस सवर्ण आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह वह झुनझुना है, जो बजना नहीं है.
तो फिर इस आर्थिक आरक्षण से क्या मिलेगा...? बस, यह संतोष कि इससे आरक्षण की मूल अवधारणा ही चौपट हो जाती है. आरक्षण नौकरियों में अवसर या गरीबी दूर करने का उपक्रम नहीं था, वह उस ऐतिहासिक अन्याय से पैदा फासले को पाटने की कोशिश था, जिसने कई तबकों को सामाजिक तौर पर बहुत पीछे छोड़ दिया था. यह आरक्षण न होता, तो सार्वजनिक जीवन में दलितों-आदिवासियों या पिछड़ों की वह प्रबल उपस्थिति न होती, जो आज दिखाई पड़ती है. वरना वर्चस्वशाली तबकों ने अपनी ओर से सामाजिक-आर्थिक समानता की किसी भी कोशिश को नाकाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. दरअसल, जो लोग अब बता रहे हैं कि आरक्षण की जगह शिक्षा और अवसरों में सबको बराबरी का अवसर दिया जाता, तो अच्छा होता, वे भूल जाते हैं कि सरकार और प्रशासन के स्तर पर उन्हीं के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने लगातार इस बराबरी को स्थगित किया.
दरअसल, आरक्षण सिर्फ नौकरियों में अवसर का मामला नहीं है, देश के संसाधनों में हिस्सेदारी का भी मामला है. धीरे-धीरे ये संसाधन ज़्यादातर निजी क्षेत्र में जा रहे हैं. इस निजी क्षेत्र की संरचना को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे कि वहां भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक वैविध्य का ज़रा भी प्रतिनिधित्व नहीं होता है - उल्टे वहां भारत की सामाजिक संरचना में व्याप्त आर्थिक गैरबराबरी बहुत बेशर्मी के साथ जमी हुई दिखाई पड़ती है. लगभग तमाम दफ़्तरों में ऊंचे और मलाईदार ओहदों पर सामान्य श्रेणी के लोग बैठे हैं, जबकि उन्हीं दफ्तरों में जो निचली श्रेणी के काम हैं - चाहे वह झाड़ू-पोछा लगाने का हो, चाय पिलाने का हो, बाथरूम साफ़ रखने का हो - यह सब बिना आरक्षण के पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के हिस्से चले आते हैं.
निजी क्षेत्र में आरक्षण या सामाजिक वैविध्य के सिद्धांत को जगह दिलाने की मांग बरसों पुरानी है, लेकिन सरकार यह काम नहीं कर रही. निजी क्षेत्र को हर तरह की छूट हासिल है - आरक्षण से भी, श्रम कानूनों से भी, कर्मचारियों के हितों के लिए लागू की जाने वाली योजनाओं से भी, काम के घंटों से भी, और तो और भ्रष्टाचार से भी. लेकिन इन सबको दुरुस्त करने की जगह सरकार सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण को ऐतिहासिक फैसला बताने में लगी है. बेशक, यह ऐतिहासिक है - इस मायने में कि इससे बराबरी का आगे बढ़ने वाला रास्ता नहीं खुलता, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय और गैरबराबरी की वह गली खुलती है, जिसने अब तक वंचित तबकों को वंचित रखा है.
आर्थिक आरक्षण की असलियत
आर्थिक आरक्षण पर केवल लालू प्रसाद की आरजेडी और ओवैसी की पार्टी ने सरकार के खिलाफ मतलब संविधान के मूल्यों के साथ खडे दिखे। बाकी सब तो सवर्ण वोट न खिसक जाये, इस डर से बोलने की हिम्मत भी नहीं कर पाए। और तो और दलित राजनीति करने का दावा करने वाले पासवान, अठावले जैसे जोकर और मायावती भी बोलने की हिम्मत न कर पाए।
भारत में आर्थिक आधार पर सरकारी साहयता पहले से ही मौजूद थी, मनरेगा और अन्त्योदय इसके उदाहरण हैं। संविधान सभा की बहसों को देखिए उसमें किस तरह से आर्थिक आरक्षण को नकार दिया गया था। यहाँ आरक्षण केवल सामाजिक न्याय और बराबरी के लिए दिया जाएगा तय हुआ।
बेहतर होता कि सरकार आकड़े सामने रखे कि कितने ब्राह्मण और ठाकुर या बनिये गरीब हैं? कितनों को समाज में जाति की वजह से बेइज्जत होना पडा है? और माफ करिये एक सच और कह दूँ, कि इनकी जो शुरूआती संपति और जमींदारी है न? वो भी बडी जाति का होने की वजह से ही मिली थी। क्योंकि भगवान के यहाँ से तो सब एक जैसे आए थे कोई 20 -25 बीघा जमीन तो न लाया था? और सबसे प्रमुख कितने प्रतिशत सवर्ण पहले से ही नौकरियों में हैं? आप इसके नतीजे देखकर बात नहीं करेंगे इसपर।
जो भी ओबीसी और दलित आरक्षण की वजह से नौकरी पाए भी तो वो भी चतुर्थ श्रेणी में आए। बडे पदों पर अभी भी सवर्ण ही भरे पडे हैं।
यहाँ आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व का मामला है। बडा आरक्षण का शौक है तो क्यों नहीं "जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी" सिद्धांत लागू करवा देते हैं? पता चल जाएगा कि 70-75% तो दलित ओबीसी का ही है, बाकी सवर्ण ले जाएँ अपनी जनसंख्या के हिसाब से।
आपने कितने गरीब सवर्णों को देखा है? असल में तो एक दो प्रतिशत अपवाद छोडकर सब अच्छी पोजीशन में हैं। केवल हिन्दी फिल्मों और कहानियों में ही ब्राह्मण गरीब हुआ करता था क्योंकि कहानियां केवल उनपर ही बन सकती हैं। कभी एक गरीब नाई था, एक गरीब दलित था, एक गरीब आदिवासी था, सुना आपने किसी कहानी में? क्योंकि ये कहानी की नहीं बल्कि सच्चाई की गरीबी होती है। जाकर गावों में देखिए गाँव के बाहर कौन सी जाति के लोग बसाए गये? फिर अपने पूर्वजों से उसका कारण भी पूछो। मनरेगा या आपके खेतो में काम करने वाले अधिकतर मजदूर किस जाति के हैं? किस जाति के बच्चे और महिलाएं मजदूरी करते हैं? सरकारी स्कूलों में मिड डे मील खाने वाले बच्चे किस जाति के हैं? ठीक से आकड़े सामने रखो फिर बताओ गरीबी कहाँ है? और आरक्षण किसे चाहिए?
और सुनो अगर आरक्षण ही खत्म करना है तो पहले सम्पत्ति का विकेंद्रीकरण कीजिए। शिक्षा का निजीकरण खतम करके सबको बराबर का मौका दो। फिर दस साल बाद धीरे धीरे जातियों को प्रमोट करो। जैसे ओबीसी से कुछ को लिखित में अपने तथाकथित उच्च वर्ग में होने का सर्टिफ़िकेट दो। जैसे यूपी में यादव और कुर्मी। इसके बाद कुछ कुछ सुधार कर पाई जातियों जाटव, धोबी आदि को ओबीसी में डालो और कुछ आदिवासी जन जातियों को एस सी में शिफ्ट करो। इसके अलावा अंतर्जातीय विवाह करने वालों को सरकारी सुरक्षा और नौकरी दो। तब जाकर जाति खत्म होगी और जब जाति खतम होगी तब आरक्षण खत्म होगा। और मुझे पता है जाति खत्म होने का नाम सुनते ही आप चिढ रहे मुझपर बस यहीं आप गलत हो। ये समाज की हकीकत है कि "जाति कभी नहीं जाती।"
Saturday, December 29, 2018
मजदूरों की चिंता किसे?
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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बडा अशोभनीय सा है किसी लडकी के लिए ऐसे लिखना या बोलना। लेकिन ट्विटर पर देखते हुए पक गया था। सो आज इसकी खोज करते करते एक मित्र ने ये कहान...
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पिछले हफ्ते ढाका में हुए आतंकी हमले के बाद एक बार फिर से इस्लाम को लेकर सब लोग आपस में शक जैसी स्थिति उत्पन्न करने लगे हैं, इस बहस का मुख...
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कल डोनल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन के बीच में अमेरिकन प्रेसीडेंसियल डिबेट को सुनकर मेरे मन में एक ख़याल आया कि क्या भारत में भी ऐसा होना च...