Thursday, August 14, 2014

फांसी पर हो सकारात्मक बहस

कल मैने अपनी क्लास डिबेट में फांसी के विरोध में बात कर दी। इतना सुनते ही सारे के सारे स्टूडेंट्स मेरे उपर चिल्लाने लगे। मुझसे पहले 16-17 स्टूडेंट्स ने अपनी बात कही थी, जिसमें सभी ने फांसी के पक्ष में बात की थी। इसलिए उन सबका मेरे उपर गुस्सा होना लाजमी था। एक मैडम तो बोली क़ि तुम चोरों और बलात्कारियों से हमदर्दी रखते हो क्या? मैने उनसे रिक्वेस्ट की क़ि मोहतरमा मेरी बात तो सुनिए आप। मेरे 3 मिनट उन सभी ने ही खत्म कर दिए। फिर से मैडम ने मुझे 5 मिनट दिए। और मैने अपनी बात कही।

मैने अपनी बात शुरु क़ि, " मैं यहाँ पर आपको 3 बातें बताना चाहता हूँ। पहली तो यह कि फांसी लोकतंत्र के लिए एक काला दिन होता है। आप गाँधी के देश में आंख के बदले आंख के सिद्धांत पर चलेंगे तो सब एक दिन अन्धे ही हो जाएंगे।
दूसरी बात दुनिया के 210 में से लगभग 180 देशों में फांसी की सजा बिल्कुल खत्म कर दी गई है। आखिर उन देशों ने ऐसा क्यों किया? आपके यहाँ फांसी का कानून अंग्रेज़ों ने बनाया था, आज उनके खुद के देश इंग्लैंड में भी फांसी की सजा कब की खत्म कर दी गई है। यहाँ तक की अमेरिका में 1980 में प्रो। जान ने कहा कि अगर अमेरिका में बाल अपराधों पर रोंक नही लगी तो यहाँ अपराध की सुनामी जाएगी। फिर क्या था अमेरिका ने बहुत फांसी देना शुरु कर दिया। लेकिन बाल अपराध और भी बढते गए। पहले तो कोई बच्चा चोरी करता था, बाद में वो फांसी से बचने के लिए चोरी करता और घर के मालिक को भी जान से मार देता था। फिर 2005 में इनकी फांसी पर रोक लगाई गई तब से 2013 में 35% अपराधों में कमी गई।
तीसरा उदाहरण मैं आपको अरब का देना चाहता हूँ। वहां तो फांसी बहुत होती है। चोरी पर हाथ काट लेते हैं। बलात्कार पर उसकी हत्या पत्थर मार कर की जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महिला अपराध अरब देशों में ही होते हैं।
इससे आप यह तो नहीं कह सकते हैं कि फांसी से अपराधी डरने लगेगें। हमारे देश में ही निर्भया के मामले में फांसी दी गई, इसके बाद से बलात्कार के मामलों में कितनी कमी हुई है? आप हमें बताइए तो?
आप फांसी तो तब देंगे जब अपराधी अपना काम कर देगा। चोरी, मर्डर, या रेप होने के बाद फांसी देंगे, क्यों ना हम एक ऐसी व्यवस्था बना दें जहाँ पर ऐसे अपराध ही ना हों? अगर हों भी तो उन अपराधियों को मारने से कुछ नहीं होगा वो चले जाएंगे। आप उन्हें जिंदा रखिए और पूरी जिंदगी उसपर पछतावा करने दें, वो जिससे भी मिलेंगे हमेशा ऐसा ना करने की सलाह देंगे।
अभी कुछ लोग कह रहे थे कि जल्दी से जल्दी फांसी हो जाए। लेकिन आप ऐसा करके किसी अपराधी का भी एक अधिकार छीन रहे हैं। मान लीजिए किसी को चोटी अदालत से फांसी हुई तो क्या उसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार नहीं रहेगा? इसमें कम से कम एक दो साल तो लगते ही हैं। कई बार ऐसा हो जाता है कि लोग उपरी अदालत से निर्दोष छूट जाते हैं, तो क्या उनको यह अधिकार ना मिले।
अगर आप किसी की जान के बदले जान लेने का कानून रखते हैं, तो या तो आप भगवान हो या फिर आप शैतान हो अन्यथा इंसानों मे तो यह कम होता है। मैं यह भी नही कहता हूँ कि फांसी बिल्कुल खत्म कर दें, आप बहुत बड़े अपराधों पर ऐसा कर सकते हैं, जो समाज में बहुत बुरे या हीनियस माने जाते हों। भारत में इस प्रक्रिया का इस्तेमाल हो रहा है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि मेरे अनुसार ही सब अपनी राय बना लें, लेकिन कोई भी कानून एक केश को लेकर ना बनाया जाए। हम भविष्य के वकील हैं, हमें और भी इसपर बहस करनी चाहिए। लेकिन उसके पहले इसपर थोड़ा सा पढ़ना भी जरूरी है। हमें इसपर केवल भारत ही नहीं कई और देशों के कानून पढने चाहिए।
मैं अपनी बात कानून के सिद्धांत से पूरी करूंगा कि सौ आरोपी छूट जाएँ, उन्हें भगवान सजा देगा, वो कभी खुद भी अपनी गलती महसूस करेंगे। लेकिन अगर एक निर्दोष की जान कानून ने ले ली तो यह बहुत गलत होगा।

Wednesday, August 13, 2014

जजों की नियुक्ति पर सवाल

कल हमारे देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में एन जे सी एक्ट पेश किया, और जबरजस्त भाषण भी दिया। कानून मंत्री इसे ऐतिहासिक बता रहे हैं। यह बिल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए एक आयोग बनाने को लेकर किया जा रहा है। रविशंकर प्रसाद के अनुसार 1950 से 1993 तक पूरा सिस्टम सही चला था। उसके बाद से बहुत सारी गडबाईयां सामने आई हैं। ऐसा कानून मंत्री कह रहे हैं। वो कहते हैं कि वी आर कृष्णनन, एच आर खन्ना, वी वी एन बोस और बीजन मुखर्जी जैसे महान जज सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुच पाए हैं। कानून मंत्री अपने स्पीच में कहते हैं क़ि जबलपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जेपी सिंह जिनकी कानून की किताब पूरे विश्व में मशहूर है वो कभी भी सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंचे यह दुखद है। लेकिन क्या कानून मंत्री यह भी बाताएंगे कि 1993 के बाद से कोई ईमानदार और अच्छा जज ही नहीं बना। वो कैसे भूल सकते हैं क़ि कितने भ्रष्टाचार के मामलों में नेता, और बड़े लोगों को जेल भेजने का सिलसिला भी इसी कॉलेजियँ सिस्टम से ही चला था। 2012 में रिटायर होने वाले जस्टिस एस। एच। कपाडिया के समय दुनिया की मशहूर पत्रिका फोर्ब्स ने लिखा था क़ि न्याय का राही या सिपाही आज जा रहा है। हिन्दू अखबार ने लिखा था क़ि  भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाली लड़ाई में कपाडिया साहब के योगदान को याद किया जाएगा। वो न्याय के लिए जीने मरने वाले जज थे।इसमें राजू राम चन्द्रन, फलियस नरीमन और उपेन्द्र बकसी के नाम भी लिए जा सकते हैं। लेकिन आज आप यह भी नहीं भूल सकते कि राजनीति की तरह ही जजों में भी एक परिवारवाद गया है। आज मैं कितने वकीलों को जानता हूँ जो केवल अपने पुरखों की विरासत के दम पर 15-15 20-20 लाख रुपए रोज कमाते हैं। फिर उन्हें जज बनने की किया अवश्यकता होगी? और कितने सारे अच्छे वकील हैं, जो ईमानदारी से काम करते हैं लेकिन कभी भी ज़िला अदालतों में भी जज नहीं बन पाते हैं। इसमें आप सरकारी वकीलों की नियुक्ति को भी राजनीति और परिवारवाद से कैसे अलग कर सकते हैं। सरकार भी इसमें मनमानी करती रही है।
अगर इसका ठीक से अध्ययन करें तो पाते हैं क़ि लेकिन 1993 में कोलेजियैम बनने के बाद से इसमे बहुत बदलाव आए हैं। अगर सही से देखा जाए तो 1993 से पहले जब सरकार जजो की नियुक्ति करती थी तो इसमे दो तीन बातें गलत थी, पहली तो इसका कोई सिस्टम नहीं था। दूसरा केवल चीफ जस्टिस से ही सरकार राय लेती थी, और इसमें कोई खुलाशा नही होता था। तीसरी सबसे बड़ी गलती थी क़ि सरकारें अपने हिसाब से ही जजों की नियुक्तियाँ करती थी। जिससे न्यायपालिका का राजनीतिकरण होने लगा था। 1993 में कोलेजियैम बनाने के बाद से इसका राजनीतिकीकरण तो रुका लेकिन सिस्टम अभी भी वैसा का वैसा ही रह गया। इसमें कोई भी फुलटाइम बॉडी होती तो कोई बात होती लेकिन अकेले ही जजों की एक कमेटी नें भी इसमें परिवारवाद और सिफारिस प्रणाली लगा दी। इसके लिए आप जस्टिस काटजू के ब्लॉग पर देख सकते हैं। इसमें कोई भी पारदर्शिता नही पाई।
इस आयोग को एक संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा। ताकि सरकार इसमे कोई फेर बदल ना कर सके। इस आयोग में 6 सदस्य रखने की बात की गई है। इसके मुखिया सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, सरकार की तरफ से कानून मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के अन्य 2 जज और दो वरिष्टतम नागरिक होगे। इन दो सदस्यों में एक नेता विपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात है क़ि इसी जगह से कांग्रेस की मुख्य विपक्षी दल वाली दिक्कत दूर हो जाती है। ऐसा ही आप चुनाव आयोग और लोकपाल की नियुक्ति के समय भी मान सकते हैं। जब इसके सदस्यों की नियुक्ति होगी तब भी एक कमेटी बनाई जाएगी जिसकी अध्यक्षता भी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ही करेंगे। और आयोग का प्रस्ताव भी इस कमेटी को स्वीकार करना पड़ेगा।
इस कानून के अनुसार अगर 6 में से दो सदस्य किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी से असहमत हैं तो यह नियुक्ति नहीं होगी। राष्ट्रपति प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए भेज तो सकता है लेकिन अगर पैनल ने उसे फिर से सहमति के साथ पास कर दिया तो राष्ट्रपति कुछ नहीं कर सकता है। उस यह फैसला मानना होगा। जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जज की बात हो तो सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ट जज ही चीफ जस्टिस बनेगा परन्तु वह इस मीटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा।अभी के कानून के मुताबिक अगर यह आयोग बनाया जाता है तो मोटा मोटी मुझे भी इसमें 1-2 खामियां नजर आती हैं। जैसे पारदर्शिता की बात की जाए तो अभी भी स्थिति वैसी की वैसे है। आप कह नहीं सकते हैं क़ि भविष्य में इसके उम्मीदवारों और उनके चयन या निष्काषन का कुछ पता चल सकता है। इसमें कुछ हद तक सरकार का बोलबाला कहा जा सकता है।  सरकर के लिए वीटो है, ऐसा हम कह सकते हैं। कमेटी जिसे जज नियुक्त करेगी, उसे सरकार वापस भेज सकती है। 6 में से सभी को सहमत होना आवाश्यक बताया गया है। अगर केवल कानून मंत्री भी अड जाए तो कोई भी नियुक्ति रुकवाई जा सकती है। 
मैं अभी कानून के मामले में बच्चा हूँ और जजों की नियुक्ति पर कुछ लिखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। लेकिन जबसे काटजू साहब ने आवाज उठा दी है तब से एक डर सा लगा रहता है अपने वकालत के भविष्य पर। सही बात है क़ि हम अभी से किसी बड़े कानूनी ख़ानदान की तरफ़ नजर लगाए बैठे हैं, बाद में बहुत मेहनत के बाद भी क्या होगा? किसी को पता नहीं है। चलिए ठीक है अभी से इस नए कानून पर कोई राय बनाना ठीक नहीं है। लेकिन इसपर बहुत पढ़ने की जरूरत है। तब कहीं जाकर हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगे। 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...