कल मैने
अपनी क्लास
डिबेट में
फांसी के
विरोध में
बात कर
दी। इतना
सुनते ही
सारे के
सारे स्टूडेंट्स
मेरे उपर
चिल्लाने लगे।
मुझसे पहले
16-17 स्टूडेंट्स ने अपनी
बात कही
थी, जिसमें
सभी ने
फांसी के
पक्ष में
बात की
थी। इसलिए
उन सबका
मेरे उपर
गुस्सा होना
लाजमी था।
एक मैडम
तो बोली
क़ि तुम
चोरों और
बलात्कारियों से हमदर्दी रखते हो
क्या? मैने
उनसे रिक्वेस्ट
की क़ि
मोहतरमा मेरी
बात तो
सुनिए आप।
मेरे 3 मिनट
उन सभी
ने ही
खत्म कर
दिए। फिर
से मैडम
ने मुझे
5 मिनट दिए।
और मैने
अपनी बात
कही।
मैने अपनी बात शुरु क़ि, " मैं यहाँ पर आपको 3 बातें बताना चाहता हूँ। पहली तो यह कि फांसी लोकतंत्र के लिए एक काला दिन होता है। आप गाँधी के देश में आंख के बदले आंख के सिद्धांत पर चलेंगे तो सब एक दिन अन्धे ही हो जाएंगे।
दूसरी बात दुनिया के 210 में से लगभग 180 देशों में फांसी की सजा बिल्कुल खत्म कर दी गई है। आखिर उन देशों ने ऐसा क्यों किया? आपके यहाँ फांसी का कानून अंग्रेज़ों ने बनाया था, आज उनके खुद के देश इंग्लैंड में भी फांसी की सजा कब की खत्म कर दी गई है। यहाँ तक की अमेरिका में 1980 में प्रो। जान ने कहा कि अगर अमेरिका में बाल अपराधों पर रोंक नही लगी तो यहाँ अपराध की सुनामी आ जाएगी। फिर क्या था अमेरिका ने बहुत फांसी देना शुरु कर दिया। लेकिन बाल अपराध और भी बढते गए। पहले तो कोई बच्चा चोरी करता था, बाद में वो फांसी से बचने के लिए चोरी करता और घर के मालिक को भी जान से मार देता था। फिर 2005 में इनकी फांसी पर रोक लगाई गई तब से 2013 में 35% अपराधों में कमी आ गई।
तीसरा उदाहरण मैं आपको अरब का देना चाहता हूँ। वहां तो फांसी बहुत होती है। चोरी पर हाथ काट लेते हैं। बलात्कार पर उसकी हत्या पत्थर मार कर की जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महिला अपराध अरब देशों में ही होते हैं।
इससे आप यह तो नहीं कह सकते हैं कि फांसी से अपराधी डरने लगेगें। हमारे देश में ही निर्भया के मामले में फांसी दी गई, इसके बाद से बलात्कार के मामलों में कितनी कमी हुई है? आप हमें बताइए तो?
आप फांसी तो तब देंगे जब अपराधी अपना काम कर देगा। चोरी, मर्डर, या रेप होने के बाद फांसी देंगे, क्यों ना हम एक ऐसी व्यवस्था बना दें जहाँ पर ऐसे अपराध ही ना हों? अगर हों भी तो उन अपराधियों को मारने से कुछ नहीं होगा वो चले जाएंगे। आप उन्हें जिंदा रखिए और पूरी जिंदगी उसपर पछतावा करने दें, वो जिससे भी मिलेंगे हमेशा ऐसा ना करने की सलाह देंगे।
अभी कुछ लोग कह रहे थे कि जल्दी से जल्दी फांसी हो जाए। लेकिन आप ऐसा करके किसी अपराधी का भी एक अधिकार छीन रहे हैं। मान लीजिए किसी को चोटी अदालत से फांसी हुई तो क्या उसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार नहीं रहेगा? इसमें कम से कम एक दो साल तो लगते ही हैं। कई बार ऐसा हो जाता है कि लोग उपरी अदालत से निर्दोष छूट जाते हैं, तो क्या उनको यह अधिकार ना मिले।
अगर आप किसी की जान के बदले जान लेने का कानून रखते हैं, तो या तो आप भगवान हो या फिर आप शैतान हो अन्यथा इंसानों मे तो यह कम होता है। मैं यह भी नही कहता हूँ कि फांसी बिल्कुल खत्म कर दें, आप बहुत बड़े अपराधों पर ऐसा कर सकते हैं, जो समाज में बहुत बुरे या हीनियस माने जाते हों। भारत में इस प्रक्रिया का इस्तेमाल हो रहा है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि मेरे अनुसार ही सब अपनी राय बना लें, लेकिन कोई भी कानून एक केश को लेकर ना बनाया जाए। हम भविष्य के वकील हैं, हमें और भी इसपर बहस करनी चाहिए। लेकिन उसके पहले इसपर थोड़ा सा पढ़ना भी जरूरी है। हमें इसपर केवल भारत ही नहीं कई और देशों के कानून पढने चाहिए।
मैं अपनी बात कानून के सिद्धांत से पूरी करूंगा कि सौ आरोपी छूट जाएँ, उन्हें भगवान सजा देगा, वो कभी खुद भी अपनी गलती महसूस करेंगे। लेकिन अगर एक निर्दोष की जान कानून ने ले ली तो यह बहुत गलत होगा।
मैने अपनी बात शुरु क़ि, " मैं यहाँ पर आपको 3 बातें बताना चाहता हूँ। पहली तो यह कि फांसी लोकतंत्र के लिए एक काला दिन होता है। आप गाँधी के देश में आंख के बदले आंख के सिद्धांत पर चलेंगे तो सब एक दिन अन्धे ही हो जाएंगे।
दूसरी बात दुनिया के 210 में से लगभग 180 देशों में फांसी की सजा बिल्कुल खत्म कर दी गई है। आखिर उन देशों ने ऐसा क्यों किया? आपके यहाँ फांसी का कानून अंग्रेज़ों ने बनाया था, आज उनके खुद के देश इंग्लैंड में भी फांसी की सजा कब की खत्म कर दी गई है। यहाँ तक की अमेरिका में 1980 में प्रो। जान ने कहा कि अगर अमेरिका में बाल अपराधों पर रोंक नही लगी तो यहाँ अपराध की सुनामी आ जाएगी। फिर क्या था अमेरिका ने बहुत फांसी देना शुरु कर दिया। लेकिन बाल अपराध और भी बढते गए। पहले तो कोई बच्चा चोरी करता था, बाद में वो फांसी से बचने के लिए चोरी करता और घर के मालिक को भी जान से मार देता था। फिर 2005 में इनकी फांसी पर रोक लगाई गई तब से 2013 में 35% अपराधों में कमी आ गई।
तीसरा उदाहरण मैं आपको अरब का देना चाहता हूँ। वहां तो फांसी बहुत होती है। चोरी पर हाथ काट लेते हैं। बलात्कार पर उसकी हत्या पत्थर मार कर की जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महिला अपराध अरब देशों में ही होते हैं।
इससे आप यह तो नहीं कह सकते हैं कि फांसी से अपराधी डरने लगेगें। हमारे देश में ही निर्भया के मामले में फांसी दी गई, इसके बाद से बलात्कार के मामलों में कितनी कमी हुई है? आप हमें बताइए तो?
आप फांसी तो तब देंगे जब अपराधी अपना काम कर देगा। चोरी, मर्डर, या रेप होने के बाद फांसी देंगे, क्यों ना हम एक ऐसी व्यवस्था बना दें जहाँ पर ऐसे अपराध ही ना हों? अगर हों भी तो उन अपराधियों को मारने से कुछ नहीं होगा वो चले जाएंगे। आप उन्हें जिंदा रखिए और पूरी जिंदगी उसपर पछतावा करने दें, वो जिससे भी मिलेंगे हमेशा ऐसा ना करने की सलाह देंगे।
अभी कुछ लोग कह रहे थे कि जल्दी से जल्दी फांसी हो जाए। लेकिन आप ऐसा करके किसी अपराधी का भी एक अधिकार छीन रहे हैं। मान लीजिए किसी को चोटी अदालत से फांसी हुई तो क्या उसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार नहीं रहेगा? इसमें कम से कम एक दो साल तो लगते ही हैं। कई बार ऐसा हो जाता है कि लोग उपरी अदालत से निर्दोष छूट जाते हैं, तो क्या उनको यह अधिकार ना मिले।
अगर आप किसी की जान के बदले जान लेने का कानून रखते हैं, तो या तो आप भगवान हो या फिर आप शैतान हो अन्यथा इंसानों मे तो यह कम होता है। मैं यह भी नही कहता हूँ कि फांसी बिल्कुल खत्म कर दें, आप बहुत बड़े अपराधों पर ऐसा कर सकते हैं, जो समाज में बहुत बुरे या हीनियस माने जाते हों। भारत में इस प्रक्रिया का इस्तेमाल हो रहा है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि मेरे अनुसार ही सब अपनी राय बना लें, लेकिन कोई भी कानून एक केश को लेकर ना बनाया जाए। हम भविष्य के वकील हैं, हमें और भी इसपर बहस करनी चाहिए। लेकिन उसके पहले इसपर थोड़ा सा पढ़ना भी जरूरी है। हमें इसपर केवल भारत ही नहीं कई और देशों के कानून पढने चाहिए।
मैं अपनी बात कानून के सिद्धांत से पूरी करूंगा कि सौ आरोपी छूट जाएँ, उन्हें भगवान सजा देगा, वो कभी खुद भी अपनी गलती महसूस करेंगे। लेकिन अगर एक निर्दोष की जान कानून ने ले ली तो यह बहुत गलत होगा।
No comments:
Post a Comment