कल हमारे
देश के
कानून मंत्री
रविशंकर प्रसाद
ने लोकसभा
में एन
जे ए
सी एक्ट
पेश किया,
और जबरजस्त
भाषण भी
दिया। कानून
मंत्री इसे
ऐतिहासिक बता
रहे हैं।
यह बिल
हाईकोर्ट और
सुप्रीम कोर्ट
के जजों
की नियुक्ति
के लिए
एक आयोग
बनाने को
लेकर किया
जा रहा
है। रविशंकर
प्रसाद के
अनुसार 1950 से 1993 तक पूरा सिस्टम
सही चला
था। उसके
बाद से
बहुत सारी
गडबाईयां सामने
आई हैं।
ऐसा कानून
मंत्री कह
रहे हैं।
वो कहते
हैं कि
वी आर
कृष्णनन, एच
आर खन्ना,
वी वी
एन बोस
और बीजन
मुखर्जी जैसे
महान जज
सुप्रीम कोर्ट
तक नहीं
पहुच पाए
हैं। कानून
मंत्री अपने
स्पीच में
कहते हैं
क़ि जबलपुर
हाईकोर्ट के
चीफ जस्टिस
जेपी सिंह
जिनकी कानून
की किताब
पूरे विश्व
में मशहूर
है वो
कभी भी
सुप्रीम कोर्ट
नहीं पहुंचे
यह दुखद
है। लेकिन
क्या कानून
मंत्री यह
भी बाताएंगे
कि 1993 के
बाद से
कोई ईमानदार
और अच्छा
जज ही
नहीं बना।
वो कैसे
भूल सकते
हैं क़ि
कितने भ्रष्टाचार
के मामलों
में नेता,
और बड़े
लोगों को
जेल भेजने
का सिलसिला
भी इसी
कॉलेजियँ सिस्टम
से ही
चला था।
2012 में रिटायर
होने वाले
जस्टिस एस।
एच। कपाडिया
के समय
दुनिया की
मशहूर पत्रिका
फोर्ब्स ने
लिखा था
क़ि न्याय
का राही
या सिपाही
आज जा
रहा है।
द हिन्दू
अखबार ने
लिखा था
क़ि भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने
वाली लड़ाई
में कपाडिया
साहब के
योगदान को
याद किया
जाएगा। वो
न्याय के
लिए जीने
मरने वाले
जज थे।इसमें
राजू राम
चन्द्रन, फलियस
नरीमन और
उपेन्द्र बकसी
के नाम
भी लिए
जा सकते
हैं। लेकिन
आज आप
यह भी
नहीं भूल
सकते कि
राजनीति की
तरह ही
जजों में
भी एक
परिवारवाद आ गया है। आज
मैं कितने
वकीलों को
जानता हूँ
जो केवल
अपने पुरखों
की विरासत
के दम
पर 15-15 20-20 लाख रुपए रोज कमाते
हैं। फिर
उन्हें जज
बनने की
किया अवश्यकता
होगी? और
कितने सारे
अच्छे वकील
हैं, जो
ईमानदारी से
काम करते
हैं लेकिन
कभी भी
ज़िला अदालतों
में भी
जज नहीं
बन पाते
हैं। इसमें
आप सरकारी
वकीलों की
नियुक्ति को
भी राजनीति
और परिवारवाद
से कैसे
अलग कर
सकते हैं।
सरकार भी
इसमें मनमानी
करती रही
है।
अगर इसका
ठीक से
अध्ययन करें
तो पाते
हैं क़ि
लेकिन 1993 में कोलेजियैम बनने के
बाद से
इसमे बहुत
बदलाव आए
हैं। अगर
सही से
देखा जाए
तो 1993 से
पहले जब
सरकार जजो
की नियुक्ति
करती थी
तो इसमे
दो तीन
बातें गलत
थी, पहली
तो इसका
कोई सिस्टम
नहीं था।
दूसरा केवल
चीफ जस्टिस
से ही
सरकार राय
लेती थी,
और इसमें
कोई खुलाशा
नही होता
था। तीसरी
सबसे बड़ी
गलती थी
क़ि सरकारें
अपने हिसाब
से ही
जजों की
नियुक्तियाँ करती थी। जिससे न्यायपालिका
का राजनीतिकरण
होने लगा
था। 1993 में
कोलेजियैम बनाने के बाद से
इसका राजनीतिकीकरण
तो रुका
लेकिन सिस्टम
अभी भी
वैसा का
वैसा ही
रह गया।
इसमें कोई
भी फुलटाइम
बॉडी होती
तो कोई
बात होती
लेकिन अकेले
ही जजों
की एक
कमेटी नें
भी इसमें
परिवारवाद और सिफारिस प्रणाली लगा
दी। इसके
लिए आप
जस्टिस काटजू
के ब्लॉग
पर देख
सकते हैं।
इसमें कोई
भी पारदर्शिता
नही आ
पाई।
इस आयोग
को एक
संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा। ताकि
सरकार इसमे
कोई फेर
बदल ना
कर सके।
इस आयोग
में 6 सदस्य
रखने की
बात की
गई है।
इसके मुखिया
सुप्रीम कोर्ट
के चीफ
जस्टिस, सरकार
की तरफ
से कानून
मंत्री, सुप्रीम
कोर्ट के
अन्य 2 जज
और दो
वरिष्टतम
नागरिक होगे।
इन दो
सदस्यों में
एक नेता
विपक्ष या
लोकसभा में
सबसे बड़े
विपक्षी दल
के नेता
होगा। सबसे
महत्वपूर्ण बात है क़ि इसी
जगह से
कांग्रेस की
मुख्य विपक्षी
दल वाली
दिक्कत दूर
हो जाती
है। ऐसा
ही आप
चुनाव आयोग
और लोकपाल
की नियुक्ति
के समय
भी मान
सकते हैं।
जब इसके
सदस्यों की
नियुक्ति होगी
तब भी
एक कमेटी
बनाई जाएगी
जिसकी अध्यक्षता
भी सुप्रीम
कोर्ट के
चीफ जस्टिस
ही करेंगे।
और आयोग
का प्रस्ताव
भी इस
कमेटी को
स्वीकार करना
पड़ेगा।
इस कानून के अनुसार अगर 6 में से दो सदस्य किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी से असहमत हैं तो यह नियुक्ति नहीं होगी। राष्ट्रपति प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए भेज तो सकता है लेकिन अगर पैनल ने उसे फिर से सहमति के साथ पास कर दिया तो राष्ट्रपति कुछ नहीं कर सकता है। उस यह फैसला मानना होगा। जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जज की बात हो तो सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ट जज ही चीफ जस्टिस बनेगा परन्तु वह इस मीटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा।अभी के कानून के मुताबिक अगर यह आयोग बनाया जाता है तो मोटा मोटी मुझे भी इसमें 1-2 खामियां नजर आती हैं। जैसे पारदर्शिता की बात की जाए तो अभी भी स्थिति वैसी की वैसे है। आप कह नहीं सकते हैं क़ि भविष्य में इसके उम्मीदवारों और उनके चयन या निष्काषन का कुछ पता चल सकता है। इसमें कुछ हद तक सरकार का बोलबाला कहा जा सकता है। सरकर के लिए वीटो है, ऐसा हम कह सकते हैं। कमेटी जिसे जज नियुक्त करेगी, उसे सरकार वापस भेज सकती है। 6 में से सभी को सहमत होना आवाश्यक बताया गया है। अगर केवल कानून मंत्री भी अड जाए तो कोई भी नियुक्ति रुकवाई जा सकती है।
इस कानून के अनुसार अगर 6 में से दो सदस्य किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी से असहमत हैं तो यह नियुक्ति नहीं होगी। राष्ट्रपति प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए भेज तो सकता है लेकिन अगर पैनल ने उसे फिर से सहमति के साथ पास कर दिया तो राष्ट्रपति कुछ नहीं कर सकता है। उस यह फैसला मानना होगा। जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जज की बात हो तो सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ट जज ही चीफ जस्टिस बनेगा परन्तु वह इस मीटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा।अभी के कानून के मुताबिक अगर यह आयोग बनाया जाता है तो मोटा मोटी मुझे भी इसमें 1-2 खामियां नजर आती हैं। जैसे पारदर्शिता की बात की जाए तो अभी भी स्थिति वैसी की वैसे है। आप कह नहीं सकते हैं क़ि भविष्य में इसके उम्मीदवारों और उनके चयन या निष्काषन का कुछ पता चल सकता है। इसमें कुछ हद तक सरकार का बोलबाला कहा जा सकता है। सरकर के लिए वीटो है, ऐसा हम कह सकते हैं। कमेटी जिसे जज नियुक्त करेगी, उसे सरकार वापस भेज सकती है। 6 में से सभी को सहमत होना आवाश्यक बताया गया है। अगर केवल कानून मंत्री भी अड जाए तो कोई भी नियुक्ति रुकवाई जा सकती है।
मैं अभी
कानून के
मामले में
बच्चा हूँ
और जजों
की नियुक्ति
पर कुछ
लिखने की
गुस्ताखी कर
रहा हूँ।
लेकिन जबसे
काटजू साहब
ने आवाज
उठा दी
है तब
से एक
डर सा
लगा रहता
है अपने
वकालत के
भविष्य पर।
सही बात
है क़ि
हम अभी
से किसी
बड़े कानूनी
ख़ानदान की
तरफ़ नजर
लगाए बैठे
हैं, बाद
में बहुत
मेहनत के
बाद भी
क्या होगा?
किसी को
पता नहीं
है। चलिए
ठीक है
अभी से
इस नए
कानून पर
कोई राय
बनाना ठीक
नहीं है।
लेकिन इसपर
बहुत पढ़ने
की जरूरत
है। तब
कहीं जाकर
हम किसी
निष्कर्ष पर
पहुंचेगे।
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