Saturday, September 12, 2015

बिहार चुनाव में दलितों पर राजनीति

बिहार चुनाव में लगभग महीने भर का वक्त बचा है ... कायदे से तो अब तक सब तय हो जाना चाहिए था लेकिन NDA के लिए ऐसा है नहीं। चुनावी आंच पर मुद्दों की हांडी तो चढ़ा दी गई है लेकिन अभी यही नहीं तय हो पाया है कि पकेगा क्या और हांडी में क्या कितना डलेगा... मतलब बीजेपी और उसके सहयोगी दल न तो सीएम पद के उम्मीदवार का नाम तय कर पाए हैं और न ही यह कि कौन कितनी सीट पर लड़ेगा। अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है। इसको समझने के लिए आपको बिहार चुनाव का दलित फैक्टर समझना होगा... और साथ ही यह समझना होगा कि क्या महादलित महाजीत की वजह बन सकता है?

पहले बिहार चुनाव का दलित फैक्टर समझिए। बिहार की कुल आबादी में 15.9% दलित हैं। और राज्य में 18.44% वोटर दलित हैं। यानि सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यादव वोट बैंक की बराबरी का मामला बन जाता है। इसमें भी SC कोटे के वोट का 70% हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है। यानि एक प्रभावी वोट बैंक। बिहार में कुर्मी, मुसलमान और यादव वोट बैंक को अगर आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू अपने हिस्से में मान कर चल रहे हैं तो बीजेपी अगड़ी जातियों और व्यापारी वर्ग के वोट पर दांव लगाए बैठी है। ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है इस बार।

वैसे तो दलित लगभग हर चुनाव में अपना मसीहा तलाशता है। पहले कांग्रेस पर भरोसा किया, वहां मुंह की खाई तो लालू यादव की आरजेडी का दामन थामा। वहां भी बहुत कुछ नहीं मिला तो नीतीश कुमार की जेडीयू का रुख किया। नीतीश कुमार ने भी  SC कैटेगरी की 22 जातियों में से 21 को महादलित घोषित कर अपनी तरफ से कोशिशें शुरू कीं लेकिन उनके रास्ते में उनका ही प्यादा आ खड़ा हुआ। मांझी ने लगभग 8 महीने के कार्यकाल में अपना सारा फोकस कमोबेश इस बात पर रखा कि वह कैसे महादलित का चेहरा बन सके। इसी कोशिश के तहत उन्होंने कुर्सी से हटते हटते भी कई फैसले महादलितों के हक में लिए और पासवान जाति को भी महादलित की लिस्ट में शामिल कर दिया।

ऐसे में इस बार लड़ाई दिलचस्प हो गई। बीजेपी न सिर्फ मांझी को साथ लेकर एक दलित चेहरे को सम्मान देने की बात कर रही है बल्कि मांझी से कुर्सी छीने जाने को भी दलित के अपमान का मुद्दा बना रही है। इस बीच बीजेपी के लिए दिक्कत यह है कि उसे तय करना है कि उसके लिए दलित वोट ज्यादा कौन लाएगा, रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी।  बीजेपी की यह दुविधा क्यों है इसे समझाने के लिए एक और आंकड़ा आपके सामने रखते हैं...

बिहार विधानसभा में कुल आरक्षित सीटें 38 हैं। इसमें से 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें। यह याद रखिएगा कि इन चुनावों में मांझी JDU के साथ थे। अब BJP का हिसाब किताब देख लीजिए। BJP के खाते में 2005 में 12 सीटें आईं थीं और 2010 में 18,  यानि NDA गठबंधन ने पिछले चुनाव में 38 में से 37 सीटें जीती थीं। RJD को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी। 2005 में 2 सीट जीतने वाली LJP ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था।

यानि सीधे-सीधे हिसाब यह है कि बीजेपी के पास यह तय करने के लिए कोई आंकड़ा नहीं है कि JDU से अलग होने के बाद जीतन राम मांझी कितना बड़ा चेहरा बन गए हैं दलित वोट बैंक के लिए और क्या रामविलास पासवान लालू यादव से अलग होकर अपना पारंपरिक पासवान वोट बैंक फिर से हासिल कर पाएंगे। हांलाकि इस बीच यह भी याद रखिए कि दूसरे गठबंधन को भी यह तय करना है कि दलित वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए उसके पास क्या है। इसको अगर चेहरों के लिहाज से समझिए तो तस्वीर ऐसी दिखेगी..

LJP के पास रामविलास पासवान का चेहरा है जो 4.5% पासवान वोट पर पकड़ का दावा करते हैं। मांझी जी का हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानि 'हम' के पास सिर्फ जीतन राम मांझी का ही आसरा है क्योंकि वह 5.5% मुसहर जाति के वोट पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा सत्तारूढ़ JDU में भी कई दलित चेहरे हैं। हांलाकि नीतीश कुमार दलित चेहरा तो नहीं हैं लेकिन दलितों के लिए बहुत कुछ करने का दावा करके वोट मांगते रहे हैं। उनके अलावा पार्टी में उदय नारायण चौधरी हैं, मंत्री श्याम रजक हैं और एक और चेहरा रमई राम का है।

दिक्कत सिर्फ इतनी है कि इस बार के बिहार के चुनाव में कई चेहरे जो साथ थे वे अब साथ नहीं हैं और कई चेहरे जो साथ नहीं थे वे अब साथ हैं। सच यह भी है कि दिल में दलित के लिए जगह की बात तो सब करते हैं लेकिन दलित को वह कभी नहीं मिल पाता जो उसकी चाह होती है। 1994 से 2000 के बीच तकरीबन 144 लोग मारे गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे तक थे। यह साल ऐसे थे जब लालू यादव की पार्टी सत्ता में थी। लालू कुछ नहीं कर पाए। नीतीश 2005 में सत्ता में आए तो सबसे पहले उस दास कमीशन को बिना रिपोर्ट लिए खत्म कर दिया, जो इन हत्याओं की जांच के लिए बनी थी। सबके अपने सियासी दायरे हैं और राजनीतिक जरूरतें। ऐसे में दलित वोटर भी अब राजनीतिक तौर पर पहले से ज्यादा परिपक्व है। वह खुद भी अपने हिसाब से सत्ता की गाड़ी चलाने की उम्मीदें पाले है और इसलिए इस बार यह प्रभावी दलित वोट बैंक किसके हिस्से जाएगा यह अभी कहना मुश्किल है। यानि तय नहीं है कि वोटर किसके चेहरे को दिल में बैठाएगा और किसके चेहरे को आईना दिखाएगा, लेकिन इतना तय है कि दलित वोटर अहम किरदार तो निभाएगा इस बिहार चुनाव में।

बैन पॉलिटिक्स V/S हिटलरिज्म

हमारे देश में आजकल हर चीज़ पर बैन करके ही सुशासन दिखाने की कोशिश की जा रही है।  हाल ही में महाराष्ट्र में मीट बैन को लेकर बड़ी सियासत गरमाई हुई है। जैन समुदाय के पर्यूषण पर्व के दौरान शहर में दो दिनों तक वध एवं मांस की बिक्री पर प्रतिबंध के बीएमसी के फैसले का देशभर में जबरदस्त विरोध हुआ। इस निर्णय पर विरोध का सामना कर रही बृहन्मुम्बई महानगर पालिका (बीएमसी) ने शुक्रवार को बम्बई हाई कोर्ट को बताया कि उसने अपना निर्णय वापस लेने का निर्णय किया है।बीएमसी ने अदालत को अपने निर्णय के बारे में मांस विक्रेताओं की ओर से दायर एक अर्जी की सुनवायी के दौरान सूचित किया। मांस विक्रेताओं ने मांस बिक्री पर चार दिन के प्रतिबंध को चुनौती देते हुए अर्जी दायर की थी, जिसमें राज्य सरकार का दो दिवसीय प्रतिबंध भी शामिल है। बीएमसी ने प्रतिबंध की घोषणा 13 और 18 सितम्बर के लिए की थी, सरकार ने 10 और 17 सितम्बर को इस पर प्रतिबंध लगाया है।
बीएमसी की तरफ से पेश होने वाले वरिष्ठ वकील एन।वी। वालावाल्कर ने न्यायमूर्ति अनूप वी। मेहता और न्यायमूर्ति अमजद सैयद की एक खंडपीठ को बताया कि बीएमसी ने गत एक सितम्बर वाला अपना परिपत्र वापस लेने का निर्णय किया। इसके तहत शहर में 13 और 18 सितम्बर को मटन और चिकन के लिए वध और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया था। वालावाल्कर ने कहा, 'जनहित और मुंबईवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए परिपत्र को वापस लेने का निर्णय किया गया है।' हाई कोर्ट बाम्बे मटन डीलर्स एसोसिएशन की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवायी कर रहा था। याचिका में राज्य सरकार के 10 और 17 सितम्बर को मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय को भी चुनौती दी गई थी। जब बीएमसी ने हाई कोर्ट को प्रतिबंध वापस लेने के अपने निर्णय के बारे में सूचित किया तो सभी पक्षों की दलीलों पर सुनवायी पूरी कर चुकी अदालत ने मामले की अगली सुनवायी 14 सितंबर तय की। 14 सितंबर को इस पर आदेश जारी किये जाने की संभावना है। बीजेपी हालांकि इस पूरे मामले पर सहयोगी दल की भूमिका को लेकर खिन्न थी, लेकिन परिषद के अन्य दलों के साथ उसने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। बाद में एमसीजीएम के वकील ने बम्बई हाई कोर्ट को बम्बई मटन डीलर्स एसोसिएशन द्वारा रोक के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान इस संबंध में सूचना दी।अदालत ने गुरुवार को इस आदेश को गंभीरता से लेते हुए सरकार से इस पर जवाब मांगा था। अदालत ने शुक्रवार को इस फैसले और स्थानीय निकाय के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि मुंबई जैसे शहर पर इस तरह की पाबंदियां नहीं लगाई जानी चाहिए। अदालत ने कहा, 'मुंबई के साथ एक प्रगतिवादी सोच जुड़ी हुई है। ऐसे फैसले प्रकृति से प्रतिगामी होते हैं। क्या खाना है यह एक व्यक्तिगत पसंद है। कोई इस पर बंदिश कैसे लगा सकता है?' 
इसी भावनाओं की पंक्ति में मैं आपको एक किस्सा बताना चाहता हूँ। 2012 में कर्नाटक के डिप्टी सीएम के।एस। ईश्वरप्पा गांधी जयंती के दिन मांसाहार करते पकड़े गए और कांग्रेस ने मौका भांप कर गवर्नर को याचिका दे दी कि ईश्वरप्पा को तुरंत बर्खास्त किया जाये क्योंकि उन्होंने गांधीवादी लोगों की भावनाएं आहत की हैं। 
भावनाओं के कई प्रकार हैं। सिर्फ धर्म की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी, नेता, इतिहास, जाति, विचारधारा, दर्शन, फिल्मों, किताबों और कभी-कभी यूंही आहत हो जाती हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में सरकार के द्वारा जैन धर्म के धार्मिक त्यौहार पर्युषण के दौरान मीट पर बैन लगाये जाने के खिलाफ पूरे विपक्ष और उनके साथी दल शिवसेना ने भी मोर्चा संभाल लिया है। शिवसेना और मनसे वही दल हैं जो गौ-मांस पर प्रतिबन्ध लगाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी थी। देखा जाये तो हिन्दू धर्म की भावनाओं का खयाल रखते हुए गौ-मांस बंद हो सकता है तो फिर जैन धर्म के लोगों की भावनाओं के सम्मान में 4 दिन का मीट बैन तो न्यायोचित है। प्रतिबन्ध की समय सीमा भी दोनों धर्मों के लोगों की संख्या के अनुपातिक लगती है। अगर भाजपा शासित महाराष्ट्र की सरकार ऐसा नहीं करती है तो फिर तो उस पर सिर्फ हिन्दुओं के तुष्टिकरण का आरोप लगना तय है। गणेश चतुर्थी पर भी महाराष्ट्र में एक दिन के लिए मीट पर बैन लगता ही है।
ये तो राजनीतिक न्याय की बात हुई। लेकिन देश के संविधान में साफ़-साफ़ लिखा है कि आप बिना किसी खौफ के अपने-अपने धर्म का पालन कर सकें।  वहां ये बिलकुल नहीं लिखा है कि आप पूरे देश से अपने धर्म का पालन करवाएं। इस देश में नास्तिकों का भी आपकी तरह एक अल्पसंख्यक समुदाय है। इसलिए किसी भी समाज के द्वारा सरकार से इस तरह के प्रतिबन्ध का अनुरोध करना सरासर गलत है। महाराष्ट्र में ही नहीं, ये बैन कई और राज्यों में भी लगता रहा है। गुजरात में पिछले कई वर्षों से पर्युषण के दौरान ऐसा प्रतिबन्ध लगाया जाता रहा है। इसके खिलाफ 2008 में कुरैशी जमात ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली थी लेकिन मार्कण्डेय काटजू और एच. के. सेमा की बेंच ने मुग़ल बादशाह अकबर की मिसाल देते हुए अपने फैसले में कहा कि अकबर भी हफ्ते में कुछ दिन अपनी हिन्दू पत्नी और शाकाहारी हिन्दुस्तानियों के सम्मान में शाकाहार का पालन करता था और इसलिए हमें भी दूसरे लोगों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। बेशक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए लेकिन उससे पहले भावनाओं पर एक किताब छप जानी चाहिए जिसे पढ़ कर हम और आप दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सीख जाएं। फिर तो कानून की किताब भी मोटी होते रहने से बच जाएगी। अगर भावनाओं पर ही कानून बनते तो आज आपका या मेरा लिखना भी मुनासिब नहीं होता। महाराष्ट्र में मीट बैन को लेकर जो राजनीति हो रही है और जिस तरह की भाषा का इस्तमाल हो रहा है उससे लग रहा है कि एक दिन खाना बैन करने के बाद समुदायों को भी बैन किया जाएगा। फिलहाल मुंबई में कुछ समय के लिए शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ता चिकन बेचते नज़र आए। ये हिम्मत अगर किसी तथाकथित सेकुलर दल ने की होती तो चैनलों के ज़रिये प्रवक्ताओं ने धावा बोल दिया होता। अक्सर शाकाहार बनाम मांसाहार का विवाद मुस्लिम विरोध में बदल जाता है। हिंदुत्ववादी पार्टियां सभी हिन्दुओं को शाकाहारी पेंट करने लगती हैं। लेकिन शिवसेना और मनसे ने यह साफ कर दिया कि मराठी मानुष हिन्दू तो है मगर मांसाहारी है। शिवसेना के नेता टीवी पर बोल रहे हैं कि करोड़ों लोग मांसाहार करते हैं। उनके खाने के अधिकार के समर्थन में शिवसेना ने चिकन का ठेला तक लगा दिया। ऐसा करने में सेकुलर दलों के तो हाथ कांपने लगते। लेकिन शिवसेना मनसे के इस साहस में एक समस्या है। अगर ये दोनों खाने की आज़ादी की वकालत कर रही हैं तो फिर मुसलमानों और इसाइयों के खाने की आज़ादी का सवाल अलग कैसे हो जाता है। मुसलमान और ईसाई के बीफ खाने से हिन्दू आस्था को ठेस पहुंचती है तो इस लिहाज़ से मराठी मानुष, जो कि हिन्दू भी हैं, के मीट खाने से जैन समुदाय की आस्था आहत नहीं हो सकती है।

खाने पर प्रतिबंध की राजनीति का संबंध सीधा सीधा कट्टरता से है। अगर आप कट्टरता के एक रूप को मंज़ूरी देंगे तो इसके दूसरे स्वरूप को भी मानना पड़ेगा। कट्टरता का समर्थक भी कट्टरता का शिकार हो सकता है इस मामले से साफ हो जाता है।
जैसे जब बीफ बैन को लेकर मुसलमानों और इसाइयों को टारगेट किया गया तो जैन समुदाय हमेशा हिन्दुत्व ब्रिगेड की तरफ गिन लिया जाता होगा। अब उन्हीं हिन्दुत्व पार्टियों के निशाने पर जैन गए हैं। इन दोनों मामले में एक चीज़ कॉमन है। वो ये कि मुसलमान, ईसाई और जैन तीनों अल्पसंख्यक हैं। जैन भी मुसलमानों की तरह कम से कम राजनीतिक बोलचाल में टारगेट हो रहे हैं। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी मुखपत्र सामना में लिखा है, 'जैन धर्मांध बनें। उनकी धर्मांध मानसिकता उन्हें हिंदुओं का दुश्मन बना देगी। बिलकुल वैसे ही जैसे धर्मांध मुसलमान हिंदुओं के दुश्मन बन गए। इसलिए पर्यूषण का आडंबर किया जाए। पर्यूषण में हिंसा ना करने का आग्रह करते जैन क्या इन दिनों ब्लैक मनी लेना बंद कर देंगे। मुंबई में ज़्यादातर बिल्डर जैन हैं। क्या वे अपने सौदे में पर्यूषण काल में काला धन नहीं लेंगे। हिंसा विचारों में भी होती है। याद रखें कि 92-93 के दंगों में इस जैन समाज के कारोबार की रक्षा शिवसेना ने की थी। और ये भी ना भूलें कि जैन लोगों के कारोबार को उखाड़ फेंकने में हमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए कह देता हूं कि जिसे जो खाना है, खाने दो।'
ऐसी धमकी किसी समाज को और किसी को एतराज़ तक नहीं। क्या जैन समाज के तुष्टिकरण के विरोध के नाम पर मराठी मानुष का तुष्टिकरण नहीं हो रहा है। जैसे मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर हिन्दू तुष्टिकरण होता है। जैन समाज के साम्राज्य को नष्ट करने की धमकी देने वाली शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र में बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। मोदी सरकार में शिवसेना का मंत्री है। महाराष्ट्र में शिवसेना बीजेपी से मिलकर सरकार चला रही है। हिन्दू मुस्लिम वाला मामला होता तो सेकुलर को सिकुलर बताकर ट्वीट करने वाले भाड़े के देशभक्त जाते लेकिन जैन समाज को ऐसी धमकी के बाद भी चुप्पी नज़र आती है। यह सवाल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी पूछा जाना चाहिए कि आपकी सहयोगी पार्टी जैन समाज को बर्बाद करने की धमकी दे रही है। क्या आप कोई ट्वीट करेंगे। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में पर्युषण के दौरान मीट बैन करने वाली बीजेपी मुंबई में जैन समाज के खिलाफ हो रही इन बातों को कैसे देखती है। क्या वो भी चुप है जैसे जैन चुप नज़र आते हैं। क्या इसलिए चुप है कि उसके सामाजिक नेता मुस्लिम-ईसाई विरोध की राजनीति के खिलाफ खड़े हो सके या इसलिए चुप हैं कि उनकी कोई नहीं सुनेगा। क्या इस मुल्क में हमेशा बहुसंख्यक तय करेगा। क्या तय करने की राजनीति का लाभ कभी भी अल्पसंख्यक को नहीं मिलेगा।
पर्युषण पर्व आठ से दस दिनों तक चलने वाला पर्व है। कहीं दो दिन का मीट बैन है तो कहीं चार दिन तो कहीं आठ दिन। चिकन, मटन पर बैन है, मछली पर बैन नहीं। उत्तर भारत में नवरात्र और सावन के महीने में बड़ी संख्या में लोग मांसाहार बंद कर देते हैं। बिहार में छठ के दौरान मांसाहार बंद हो जाता है लेकिन कोई बैन नहीं करता। इस तरह की मांग की भी अपनी एक समस्या है। अब यह बात निकल कर रही है कि मुंबई छह में जहां गुजराती, मारवाड़ी और जैन समाज के प्रभावशाली लोगों का बहुमत है वहां एक भी दुकान मांसाहार का नहीं है। यह अपने आप हो गया या किसी मांसाहारी रेस्त्रां को खुलने नहीं दिया गया। दरअसल सब अपनी अपनी कट्टरता के मारे हैं। लेकिन मांसाहार पर बैन कोई नई बात नहीं है। गणेश चतुर्थी के दिन भी मांसाहार पर रोक होती है। इस तरह सूची लंबी हो सकती है। मनसे ने तो प्रस्ताव पास किया था कि जो बिल्डर किसी मांसाहारी को फ्लैट नहीं बेचेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
इस बीच यह मामला मुंबई हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। शुक्रवार को भी इस पर सुनवाई होगी। अदालत ने अपनी शुरूआती टिप्पणी में कहा है कि जैन पर्व के लिए जानवरों को मारने और मीट बेचने पर चार दिन की पाबंदी मुबई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहर के लिए व्यावहारिक नहीं है। मीट पर ऐसी सीधी पाबंदी कोई फॉर्मूला नहीं हो सकती। मारने और मीट बेचने पर पाबंदी है। अन्य स्रोतों का क्या? बाज़ार में पहले से मौजूद पैकेज्ड मीट का क्या होगा?
उद्धव ठाकरे जी ने जैन समाज का जो चित्रण किया है उससे उन्हें भी समस्या होनी चाहिए। सभी को तो होनी ही चाहिए। लेकिन मुंबई में ज्यादातर बिल्डर जैन हैं और वे काला धन लेते हैं ये अच्छा नहीं हो रहा है। क्या किसी भी समाज को बुरा कह देना सही है, किसी को गद्दार, किसी को दंगाई, किसी को बीमारी वाला तो किसी को पाकिस्तान भेजने की बात करके कोई भी निकल जाता है, और हमारे देश की सरकार सोती रहती है. हमारे प्रधानमंत्रीजी ने लाल किले से कहा था क़ि सांप्रदायिकता जहर है, अगले 10-15 सालों तक ऐसा कुछ भी होना ही नहीं चाहिए क्या अब प्रधानमंत्री या सरकार उद्धव ठाकरे के खिलाफ कुछ कार्यवाही करेंगे पहले जब मुंबई से यूपी वालों को निकालने की बात होती थी, तो सब खुश थे, आज सबको क्यों बुरा लग रहा है दरअसल यह बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की मानसिकता ही जहर है, यह आज मुस्लिमों को पाकिस्तान भेज रहे हैं, कल सिखों को, फिर जैन फिर हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बोलने लग जाएँगे। इसको रोंकेने के लिए सरकार को मजबूती से कदम उठाने चाहिए. उनको सज़ा मिलनी चाहिए चाहे फिर ओवैसी हों, कोई गिलानी हो या फिर तोगड़िया, वरुण गाँधी, गिरिराज या साक्षी महाराज या फिर भाजपा का कोई सहयोगी

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...