सरकार गिरते रुपये के संकट को बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देना चाहती. उसका तर्क है कि दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्रा भी नीचे गिर रही हैं. इसका एक आशय यह भी निकलता है कि हम अब तक उभरी हुई अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए, बल्कि दशकों से उभरती हुई अर्थव्यवस्था ही बने हुए हैं. यानी हमें मानकर चलना चाहिए कि हमारी हालत इस समय भी कच्ची गृहस्थी जैसी है. रुपये की गिरती कीमत ने हमारे सामने व्यापार घाटे की समस्या को और बढ़ा दिया है. खासतौर पर कच्चे तेल के बढ़ते दामों के कारण तेल के आयात पर खर्चा ज़्यादा हो रहा है. उस हिसाब से हम निर्यात बढ़ा नहीं पा रहे हैं. दुनिया की कोई भी या कैसी भी सरकार हो, हर संकट का यही तर्क देती है कि ऐसा तो हर जगह हो रहा है. यानी सरकारों के लिए समस्या का वैश्वीकरण करने का तरीका नया नहीं है, और मौजूदा हालात में अगर इस तर्क का इस्तेमाल करना हो, तो कम से कम यह भी साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि वे बाहरी कारण हैं कौन से... उन कारणों को बोलने-बताने में संकोच कैसा. इसका एक ही तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ रहे हैं. क्या इतना भर कहने से यह साबित किया जा सकता है कि देश में 80 से 90 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल इसलिए बिक रहा है, क्योंकि कच्चा तेल 84 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. इस तर्क में कच्चापन इसलिए है, क्योंकि अभी कुछ साल पहले ही जब कच्चे तेल का भाव 147 डॉलर हो गया था, उस समय देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम आज से बहुत कम थे. कच्चे तेल के भाव डेढ़ सौ होने के बावजूद देश के लोगों को आज से कम रेट पर डीज़ल-पेट्रोल मुहैया करा पाने के लिए क्या इंतजाम किया गया था, उसकी चर्चा ज़रूर होनी चाहिए, और उससे डीज़ल-पेट्रोल के दाम काबू करने के तरीके भी पता चलेंगे. कुछ साल पहले ही देश के हर नागरिक को समझाया गया था कि तेल महंगा होता है, तो महंगाई हर हाल में बढ़ती है. आज यह समझाया जा रहा है कि तेल के दाम बढ़ने से महंगाई नहीं बढ़ रही है. देश में महंगाई के सरकारी आंकड़े यही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि यह बात भी याद करने लायक है कि कुछ साल पहले हम सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित कर रहे थे. वह वक्त गुज़रे ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब कुछ विद्वान सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित करने के लिए एक वाक्य सुनाते थे कि झूठ के तीन रूप होते हैं, एक झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सरकारी आंकड़ा. यानी वक्त कितना बदला हुआ है कि कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल ही बंद होता जा रहा है. महंगे कच्चे तेल के कारण सरकारी तेल कंपनियों को उसी हिसाब से तेल के रेट बढ़ाने की छूट है. सरकार को, खासतौर पर राज्य सरकारों को बढ़े रेट के हिसाब से और ज़्यादा टैक्स मिलता है. एक अनुमान है कि मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में अब तक सरकारें कोई 20 लाख करोड़ रुपये पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स से वसूल चुकी हैं. इससे साबित होता है कि महंगे तेल की चिंता सरकार की चिंता तो बिल्कुल भी नहीं है. केंद्र सरकार ने भी पहले से ही तेल पर अपना टैक्स इतना खींचकर बढ़ा रखा है कि उसके ज़्यादातर खर्चे तेल पर लगे टैक्स से ही चल रहे हैं. चाहे सड़क निर्माण के 10 लाख करोड़ के ठेके हों या दूसरी योजनाओं के काम के लिए ठेके हों, सारे काम एक तरह से पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री से मिले टैक्स से ही शुरू हो पा रहे हैं. देश की मुश्किल आर्थिक परिस्थतियों में तीन रोज़ पहले ही, यानी शुक्रवार को रिज़र्व बैंक से उम्मीद लगाई जा रही थी कि वह किसी मौद्रिक उपाय का ऐलान करेगा. प्रेस कॉन्फेंस हुई, लेकिन उसने यथास्थिति का ऐलान कर दिया. गिरता हुआ शेयर बाज़ार, जो प्रेस कॉन्फ्रेस से पहले थोड़ी देर के लिए संभला हुआ दिख रहा था, वह फिर धड़ाम हो गया. उसके एक रोज़ पहले वित्तमंत्री ने डीज़ल-पेट्रोल पर वसूले जा रहे भारी-भरकम टैक्स में डेढ़ रुपये की कटौती का ऐलान किया था, हालांकि उसका कोई असर नहीं पड़ा था.
Monday, October 8, 2018
देश की इकॉनोमी गिरने के कारण कहीं हमारे इन्टरनल तो नहीं?
सरकार गिरते रुपये के संकट को बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देना चाहती. उसका तर्क है कि दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्रा भी नीचे गिर रही हैं. इसका एक आशय यह भी निकलता है कि हम अब तक उभरी हुई अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए, बल्कि दशकों से उभरती हुई अर्थव्यवस्था ही बने हुए हैं. यानी हमें मानकर चलना चाहिए कि हमारी हालत इस समय भी कच्ची गृहस्थी जैसी है. रुपये की गिरती कीमत ने हमारे सामने व्यापार घाटे की समस्या को और बढ़ा दिया है. खासतौर पर कच्चे तेल के बढ़ते दामों के कारण तेल के आयात पर खर्चा ज़्यादा हो रहा है. उस हिसाब से हम निर्यात बढ़ा नहीं पा रहे हैं. दुनिया की कोई भी या कैसी भी सरकार हो, हर संकट का यही तर्क देती है कि ऐसा तो हर जगह हो रहा है. यानी सरकारों के लिए समस्या का वैश्वीकरण करने का तरीका नया नहीं है, और मौजूदा हालात में अगर इस तर्क का इस्तेमाल करना हो, तो कम से कम यह भी साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि वे बाहरी कारण हैं कौन से... उन कारणों को बोलने-बताने में संकोच कैसा. इसका एक ही तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ रहे हैं. क्या इतना भर कहने से यह साबित किया जा सकता है कि देश में 80 से 90 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल इसलिए बिक रहा है, क्योंकि कच्चा तेल 84 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. इस तर्क में कच्चापन इसलिए है, क्योंकि अभी कुछ साल पहले ही जब कच्चे तेल का भाव 147 डॉलर हो गया था, उस समय देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम आज से बहुत कम थे. कच्चे तेल के भाव डेढ़ सौ होने के बावजूद देश के लोगों को आज से कम रेट पर डीज़ल-पेट्रोल मुहैया करा पाने के लिए क्या इंतजाम किया गया था, उसकी चर्चा ज़रूर होनी चाहिए, और उससे डीज़ल-पेट्रोल के दाम काबू करने के तरीके भी पता चलेंगे. कुछ साल पहले ही देश के हर नागरिक को समझाया गया था कि तेल महंगा होता है, तो महंगाई हर हाल में बढ़ती है. आज यह समझाया जा रहा है कि तेल के दाम बढ़ने से महंगाई नहीं बढ़ रही है. देश में महंगाई के सरकारी आंकड़े यही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि यह बात भी याद करने लायक है कि कुछ साल पहले हम सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित कर रहे थे. वह वक्त गुज़रे ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब कुछ विद्वान सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित करने के लिए एक वाक्य सुनाते थे कि झूठ के तीन रूप होते हैं, एक झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सरकारी आंकड़ा. यानी वक्त कितना बदला हुआ है कि कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल ही बंद होता जा रहा है. महंगे कच्चे तेल के कारण सरकारी तेल कंपनियों को उसी हिसाब से तेल के रेट बढ़ाने की छूट है. सरकार को, खासतौर पर राज्य सरकारों को बढ़े रेट के हिसाब से और ज़्यादा टैक्स मिलता है. एक अनुमान है कि मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में अब तक सरकारें कोई 20 लाख करोड़ रुपये पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स से वसूल चुकी हैं. इससे साबित होता है कि महंगे तेल की चिंता सरकार की चिंता तो बिल्कुल भी नहीं है. केंद्र सरकार ने भी पहले से ही तेल पर अपना टैक्स इतना खींचकर बढ़ा रखा है कि उसके ज़्यादातर खर्चे तेल पर लगे टैक्स से ही चल रहे हैं. चाहे सड़क निर्माण के 10 लाख करोड़ के ठेके हों या दूसरी योजनाओं के काम के लिए ठेके हों, सारे काम एक तरह से पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री से मिले टैक्स से ही शुरू हो पा रहे हैं. देश की मुश्किल आर्थिक परिस्थतियों में तीन रोज़ पहले ही, यानी शुक्रवार को रिज़र्व बैंक से उम्मीद लगाई जा रही थी कि वह किसी मौद्रिक उपाय का ऐलान करेगा. प्रेस कॉन्फेंस हुई, लेकिन उसने यथास्थिति का ऐलान कर दिया. गिरता हुआ शेयर बाज़ार, जो प्रेस कॉन्फ्रेस से पहले थोड़ी देर के लिए संभला हुआ दिख रहा था, वह फिर धड़ाम हो गया. उसके एक रोज़ पहले वित्तमंत्री ने डीज़ल-पेट्रोल पर वसूले जा रहे भारी-भरकम टैक्स में डेढ़ रुपये की कटौती का ऐलान किया था, हालांकि उसका कोई असर नहीं पड़ा था.
विशाखा गाइड लाइंस
हर ऐसी कंपनी या संस्थान के हर उस कार्यालय में, जहां 10 या उससे ज़्यादा कर्मचारी हैं, एक अंदरूनी शिकायत समिति (इन्टर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी) की स्थापना करना अनिवार्य होता है.
इक की अध्यक्ष महिला ही होगी और कमेटी में अधिकांश महिलाओं को रखना भी ज़रूरी होता है. इस कमेटी में यौन शोषण के मुद्दे पर ही काम कर रही किसी बाहरी गैर-सरकारी संस्था (गो) की एक प्रतिनिधि को भी शामिल करना ज़रूरी होता है.
कंपनी या संस्थान में काम करने वाली महिलाएं किसी भी तरह की यौन हिंसा की शिकायत इक से कर सकती हैं. यह कंपनी अथवा संस्थान का उत्तरदायित्व होगा कि शिकायतकर्ता महिला पर किसी भी तरह का हमला न हो, या उस पर कोई दबाव न डाला जाए.
कमेटी को एक साल में उसके पास आई शिकायतों और की गई कार्रवाई का लेखाजोखा सरकार को रिपोर्ट के रूप में भेजना होगा. अगर कमेटी किसी को दोषी पाती है, तो उसके खिलाफ इप्सी की संबंधित धाराओं के अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जानी होगी
Sunday, October 7, 2018
किसानों की समस्या पर कितना गंभीर है सरकार?
लेकिन नाबार्ड के सर्वे में जो सबसे चौंकाने वाली बात है वह यह कि इन 87 फीसद किसानों की आय अभी 2436 रुपये के आसपास है. हम मान लें कि एक परिवार में न्यूनतम 5 लोग होंगे तो एक सदस्य के हिस्से 500 रुपये से भी कम आएगा. 500 रुपये में आप क्या-क्या कर लेंगे? दो वक्त लंच और डिनर, या सिर्फ लंच या डिनर या एक चाय/कॉफी या शायद इतना टिप ही दे दें. राजधानी कूच करने वाले किसानों की मांग है कि स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिश के अनुसार उन्हें उनकी फसल का उचित मूल्य मिले. दिल्ली में इन दिनों आलू 20-25 रुपये किलो है, लेकिन आप जानते हैं किसानों ने आलू की फसल को कितने रुपये किलो में मंडी में बेचा था? 4 से 5 रुपये...जी हां, सही पढ़ा आपने. किसानों की और क्या मांग है, फसलों की समय पर सिंचाई के लिये डीजल के दाम में कुछ कमी मिल जाए और बिजली के दाम में थोड़ी सी रियायत.
क्यों अलग छिटक रहीं हैं माया?
1998 में बीएसपी को 11 सीटें मिली थीं जो 2003 में घट कर 2 रह गईं. मगर जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तब उन्हें 7 सीटें मिली थीं यानी तब मुख्यमंत्री होने के कारण उनके पास सारे संसाधन मौजूद थे, यानी धन, बल और वो तमाम चीजें जो चुनाव में एक पार्टी को चाहिए होती हैं. मगर फिर 2013 में उनकी सीट घट कर 4 रह गई. ऐसे में यदि वो कांग्रेस से 50 सीटें मांगती हैं तो उन्हें वो सीट मिलना असंभव जैसी बात है. यही वजह है कि राहुल मध्यप्रदेश कांग्रेस के निर्णय को सही करार दे रहे हैं.
गाँधी के कुछ अनकहे पहलू
Sunday, September 30, 2018
497 खत्म होने पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराना क़ानून रद्द करके महिलाओं की यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. दरअसल इसकी व्याख्या ही ग़लत की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. और कुछ लोगों को ये फ़ैसला केवल पति पत्नी के संबंधों के खुलेपन पर कुछ जोक्स बनाने भर का अवसर भर लग सकता है. लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है. क्योंकि इस फैसले का वास्ता स्त्री की आजादी और उसकी यौनिक आज़ादी से भी है. सुप्रीम कोर्ट ने संभवतः पहली बार इतने स्पष्ट ढंग से रेखांकित किया है कि देह स्त्री की संपत्ति है और उसे इसके बारे में फैसला करने का अधिकार है. हालांकि स्त्री की यौनिक आजादी का जिक्र छिड़ते ही कुछ लोग इस तरह बोल पड़ते हैं जैसे यह विमर्श चलाने वाले या स्त्री के लिए यौनिक आजादी की मांग करने वाले लोग विवाहेतर संबंधों का लाइसेंस मांग रहे हैं. जबकि बात बात ये है कि पुरुष की तरह स्त्री भी स्वाधीन है, शादी उसे सामाजिक और नैतिक बंधन में बांधती जरूर है, लेकिन दोनों का एक स्वायत्त व्यक्तित्व भी है. पहले यह स्वायत्तता सिर्फ़ पुरुष को हासिल थी.
अब तो नहीं, लेकिन अतीत में विवाहित पुरुषों का वेश्यागमन भी सामाजिक तौर पर स्वीकृत था, बल्कि जिन जमींदार घरों में पुरुष इससे बचते थे, वहां उनकी मर्दानगी पर सवाल उठते थे. सुप्रीम कोर्ट ने दरअसल इस मर्दानगी की अवधारणा को भी झटका दिया है. क्योंकि इसी अवधारणा के तहत मर्द औरत को अपनी संपत्ति समझता रहा है. वह चाहे तो औरत घर में रहेगी, वह चाहे तो दफ़्तर जाएगी- वह उसकी दी हुई आज़ादी का उपभोग करेगी और उसके लिए उसकी कृतज्ञ होगी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने अपने लेख में एक बहुत बढ़िया उदाहरण देकर बताया है, जिसका ज़िक्र मैं भी करना चाहूँगा, " कुछ दिन पहले आई एक फिल्म 'दिल धड़कने दो' में प्रियंका चोपड़ा शादी के बावजूद बच्चा नहीं चाहती, वह उस शादी से अलग होना चाहती है- उसका यह फ़ैसला किसी को समझ में नहीं आता- उसके मां-पिता को भी नहीं. इसके ठीक पहले प्रियंका चोपड़ा का पति राहुल बोस बहुत गरूर से बताता है कि उसने प्रियंका को काम करने की पूरी आज़ादी दी है. इस पर प्रियंका का दोस्त फ़रहान अख्तर सवाल उठाता है कि उसे अपनी आज़ादी के लिए तुम्हारे आदेश की ज़रूरत क्या है."
कहने का मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री की आज़ादी के कई रूपों पर पहले से बहस चलती रही है. लैंगिक समानता और यौनिक आज़ादी के जिन दो मोर्चों पर स्त्री लगातार संघर्षरत रही है और जिसकी वजह से लगातार पिटती रही है, उसमें धीरे-धीरे उसे जीत मिलती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्त्री को पारिवारिक संपत्ति का अधिकार देकर उसकी लैंगिक बराबरी का रास्ता बनाया और अब डेढ़ सौ साल पुराना क़ानून रद्द करके उसकी यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. क्या तमाम क़ानूनी व्यवस्थाओं और अधिकारों के बावजूद स्त्री को वो आज़ादी और समानता मिल पाई है, जो सरकारी एडवरटाइजिंग में दिखाई देती है? भले शत प्रतिशत सच न हो लेकिन कह सकते हैं पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक बदलाव हुए हैं, पढ़ाई में, नौकरियों में, खेलों और तमाम क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी भी बढ़ी है और स्वीकृति भी.
लेकिन कुछ कड़वी सच्चाइयां इन सारे प्रयासों पर पानी फेर देती हैं. एक तो यह कि सारे कानून मिलकर भी स्त्री को उसकी संवैधानिक हैसियत नहीं दिला पाए हैं. बहुत सख्त दहेज कानून के बावजूद दहेज के मामलों में कमी नहीं आई. घरेलू हिंसा विरोधी कानून के बावजूद घरों में औरतों की पिटाई नहीं रुकी है. ओफिसेज में यौन उत्पीड़न रोकने का कानून बना, लेकिन वो सब बहुत जगहों पर हो रहा है. बलात्कार पर फांसी तक की सज़ा होने लदी लेकिन दिल दहला देने वाली बलात्कार या छेड़खानी की वारदाते आय दिन होती रहती हैं. इस सबमें क़ानून के डर से अगर कुछ नहीं बदल रहा तो इसका मतलब है हमारा समाज इस बदलाव को लेकर तैयार नहीं है? अभी भी अधिकतम प्रगतिशाली लोग भी बाहर तो बड़े भाषण देते हैं लेकिन निजी जीवन में महिलाओं को बराबरी पर खड़ा करने में असुविधाजनक महसूस करते हैं. बेटी, पत्नी या बहन के पुरुष दोस्तों पर संदेह की नज़र लगाकर रखते हैं. किसी भी आदमी की अगर प्रगतिशाली सोच देखनी है तो खुद ही विचार करके देख ले क़ि मान लो कल को हमारी बेटी प्रेम विवाह करना चाहे तो आप क्या करोगे? बस ईमानदारी से खुद के ही दिल को जवाब दे लो, और जो सच है उस हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कीजिए. असल में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक ग़लत संदेश भी समाज में बड़ी आसानी से भेजा जा सकता है क़ि अदालत ने विवाहेतर संबंधों की छूट दी है. जबकि अदालत ने ऐसा कुछ नहीं किया है. अदालत ने बस ऐसे किसी संबंध को जुर्म माने जाने से इनकार किया है. उसने वह धारा 497 हटा दी है जिसके तहत कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ किसी और के संबंध को लेकर उस पुरुष पर मुकदमा कर सकता था. जबकि इस फ़ैसले के पहले भी ऐसे मामले तो सामने आते ही थे, और ना इस फ़ैसले के बाद सब ऐसा करने को उत्साहित घूमेंगे. बस इस फ़ैसले से ये साफ हो गया है कि महिला का शरीर उसके पति की संपत्ति नहीं है. जो लोग इस फ़ैसले को वेस्टर्न कल्चर का असर बताते हुए विवाह संस्था के लिए खतरनाक मान रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि विवाह संबंध को सबसे ज्यादा खतरा रिश्तों की असमानता से है. अगर विवाह संस्था में दोनों बराबर न हों और स्त्री को पुरुष की संपत्ति बने रहना है तो फिर इस संस्था के होने का मतलब नहीं है. दो बालिग लोगों का विवाह तभी सार्थक है जब दोनों के भीतर आपसी बराबरी और भरोसे का रिश्ता हो. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बस इस बात को सुनिश्चित करता है.
Wednesday, September 26, 2018
आधार हो गया निराधार
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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