कल सुबह से
बहुत सी खबरें
आ रही थी,
क़ि देश के
कई राज्यों के
राज्यपालों ने इस्तीफा
दे दिया है।
कई टीवी चैनलों
पर ब्रेकिंग न्यूज
के साथ एक्सपर्ट
बहस भी होने
लगी। कानून का
छात्र होने के
नाते मेरा भी
मन इस बहस
में कूदने का
हुआ। हमें राज्यपाल
पर बहस करने
से पहले उसके
संवैधानिक पद और
स्थिति को समझना
बहुत जरूरी है।
राज्यपाल को कुछ
लोग निराधार बता
रहे हैं। अगर
राज्यपाल को वर्तमान
स्थिति से हटा
दिया जाए तो
राज्य शब्द ही
अधूरा रह जाएगा।
क्योंकि राज्य की कार्यपालिका
की शक्तियाँ राज्यपाल
में ही निहित
होती हैं। केन्द्र
में राष्टपति के पद
के बराबर राज्यपाल
होता है। मुख्यमंत्री
की नियुक्ति, मंत्रिमण्डल
को अपदस्थ करना
और राष्ट्रपति को
आपातकाल में स्थिति
में परामर्श देना
राज्यपाल का कार्य
होता है। इनसे
भी प्रमुख कार्य
है राज्य में
केन्द्र की तरफ
से सम्बन्ध रखने
वाला प्रतिनिधित्व।
अनुच्छेद 156 के तहत इसे राष्ट्रपति नामांकित करता है। वस्तुतः वह अब राष्ट्रपति नहीं केन्द्र सरकार (वो भी प्रधानमंत्री का रिमोट जिसके पास हो।) की मर्जी से चलता है। आज इसी कारण से राज्यपाल को अभिकर्ता (एजेंट) कहा जाने लगा है।इसकी नियुक्ति सम्बंधी अनुच्छेद 156 की पहली लाइन ही यह कहती है कि It is the pleaser of precident। अर्थात राष्ट्रपति के प्रसाद स्वरूप। और राष्ट्रपति तो केंद्रसरकार का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। क्योंकि उसकी भी अपनी सीमित शक्तियाँ होती हैं। इस विषय में हरगोविन्द बनाम रघुकुल 1979 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का पद केन्द्रीय सरकार के अधीन नियुक्त पद नहीं है। यह स्वतंत्र संवैधानिक पद है। यह केन्द्रीय सरकार के अधीन या नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता है।
लेकिन फिर भी राज्यपाल अपनी स्वामिभक्ति करते अक्सर देखे जाते हैं। वे केन्द्र सरकार का भला करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं। जहाँ राज्य और केन्द्र में भिन्न-भिन्न दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ तो सरकार गिराने जैसी बातें इतिहास में भरी पड़ी हैं। रोमेश भंडारी बनाम कल्याण सिंह सरकार उत्तर प्रदेश का मामला इसमें सभी को याद होगा। 21/02/1998 को राज्यपाल भंडारी को पता चला कि कल्याण सिंह की सरकार के कई विधायक बागी हो चुके हैं, सो उन्होंने रात में कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को बुला कर कल्याण सिंह सरकार को गिरा कर पाल की सरकार बनवा दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया जिसमें कहा गया कि किसी भी सरकार को तब तक नहीं गिराया जा सकता जब तक कि वह दल अपना बहुमत विधानसभा में हासिल करने में असफल ना हो जाए। इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल किया गया।
इसी तरह से हरियाणा की लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री देवीलाल की इच्छा के विरुद्ध व़हाँ राज्यपाल हरीलाल बरारी का उपयुक्त उदाहरण है। आप गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को ही ले लीजिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी को नाकों चने चबवा दिए थे। तमिलनाडु के के मुख्यमंत्री एम। जी। रामचंद्रन की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री पद पर एम। आर। जानकी की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद में राज्यपाल सुंदरलाल खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा था।
में कोई राज्यपाल के पद के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ। इसमें बहुत सुधारों की जरूरत है। जिसे सरकारिया कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है। सरकारिया कमीशन का कहना था कि इस संवैधानिक पद पर कोई प्रतिष्ठावान व्यक्ति ही बिठाया जाना चाहिए। उसने कम से कम कानून की डिग्री तो ली ही हो। इसके लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज भी बहुत उपयुक्त हो सकते हैं। वह व्यक्ति राज्य के बाहर का होना चाहिए। उसे राजनीति की समझ हो लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षी ना हो। अगर वो पहले राजनेता रह चुका हो तो बाद में वह किसी भी प्रकार की राजनीति में नहीं जाना चाहिए।
लेकिन हमारे राज्यपालों का इतिहास उठकर देखा जाए तो एन डी तिवारी, मोती लाल वोहरा और राजस्थान के पूर्व गवर्नर बसंत दादा पाटील जैसे लोगों ने हमेशा ही इस पद की गरिमा को तार-तार किया है। हाल ही शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर रात 4 बजे बिठा दिया गया था।
ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल राज्य सरकार पर अपना रौब ही झाडता है। वह कोई भी कार्य मंत्री परिषद की सहमति के बिना नहीं कर सकता है। और मंत्रिपरिषद राज्य सरकार या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है तो इसमें राज्यपाल कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसी के उलट जरूरत पड़ने पर राज्यपाल की शक्ति को लेकर एक और जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने एम पी। पुलिस एस्टबलिशमेंट बनाम एम पी राज्य के मामले में 2005 में दिया था। जिसमें कहा गया था कि अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार या किसी आपराधिक षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है तो राज्यपाल स्ववीकानुसार उसपर अभियोग चलाने के आदेश दे सकता है।
उपर्युक्त बातों से सिध्द होता है कि राज्यपाल का पद कोई फालतू या बेकार नहीं होता है बस जरूरत है इसमें कुछ बदलाव करने की। हमारी राजनैतिक जॅमाट फिलहाल तो ऐसा कोई भी बदलाव करने के मूड़ में नहीं दिख रही है। सुना तो यहाँ तक है कि आत राज्यपालों को हटाकर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को इस जगह पर कट-पेस्ट किया जाएगा। अगर ऐसा होगा तो हमें और भी टकरावों को देखने के लिए तैयार रहना होगा। अगर कोई राज्यपाल इस्तीफा ना देने पर अड जाए तो क्या होगा? मुझे नहीं पता? लेकिन जो होगा मजेदार होगा। इस मुद्दे पर राज्यपालों को हटाने के तरीकों पर मैने कई संविधान विषेशग्यों से बात की तो पता चला कि तरीका तो सही है, लेकिन मंशा नहीं। राज्यपाल को हटाने के लिए कोई कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कारण होना भी जरूरी है। मतलब अगर राज्यपाल केन्द्र के फैसले को चुनौती दे तो कोई कारण बताया जा सके। लेकिन फिलहाल तो कोई पर्याप्त कारण नहीं मिल रहे हैं। ऐसे तो वही बातें भविष्य में भी देखने को मिल सकती हैं।
अनुच्छेद 156 के तहत इसे राष्ट्रपति नामांकित करता है। वस्तुतः वह अब राष्ट्रपति नहीं केन्द्र सरकार (वो भी प्रधानमंत्री का रिमोट जिसके पास हो।) की मर्जी से चलता है। आज इसी कारण से राज्यपाल को अभिकर्ता (एजेंट) कहा जाने लगा है।इसकी नियुक्ति सम्बंधी अनुच्छेद 156 की पहली लाइन ही यह कहती है कि It is the pleaser of precident। अर्थात राष्ट्रपति के प्रसाद स्वरूप। और राष्ट्रपति तो केंद्रसरकार का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। क्योंकि उसकी भी अपनी सीमित शक्तियाँ होती हैं। इस विषय में हरगोविन्द बनाम रघुकुल 1979 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का पद केन्द्रीय सरकार के अधीन नियुक्त पद नहीं है। यह स्वतंत्र संवैधानिक पद है। यह केन्द्रीय सरकार के अधीन या नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता है।
लेकिन फिर भी राज्यपाल अपनी स्वामिभक्ति करते अक्सर देखे जाते हैं। वे केन्द्र सरकार का भला करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं। जहाँ राज्य और केन्द्र में भिन्न-भिन्न दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ तो सरकार गिराने जैसी बातें इतिहास में भरी पड़ी हैं। रोमेश भंडारी बनाम कल्याण सिंह सरकार उत्तर प्रदेश का मामला इसमें सभी को याद होगा। 21/02/1998 को राज्यपाल भंडारी को पता चला कि कल्याण सिंह की सरकार के कई विधायक बागी हो चुके हैं, सो उन्होंने रात में कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को बुला कर कल्याण सिंह सरकार को गिरा कर पाल की सरकार बनवा दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया जिसमें कहा गया कि किसी भी सरकार को तब तक नहीं गिराया जा सकता जब तक कि वह दल अपना बहुमत विधानसभा में हासिल करने में असफल ना हो जाए। इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल किया गया।
इसी तरह से हरियाणा की लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री देवीलाल की इच्छा के विरुद्ध व़हाँ राज्यपाल हरीलाल बरारी का उपयुक्त उदाहरण है। आप गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को ही ले लीजिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी को नाकों चने चबवा दिए थे। तमिलनाडु के के मुख्यमंत्री एम। जी। रामचंद्रन की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री पद पर एम। आर। जानकी की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद में राज्यपाल सुंदरलाल खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा था।
में कोई राज्यपाल के पद के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ। इसमें बहुत सुधारों की जरूरत है। जिसे सरकारिया कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है। सरकारिया कमीशन का कहना था कि इस संवैधानिक पद पर कोई प्रतिष्ठावान व्यक्ति ही बिठाया जाना चाहिए। उसने कम से कम कानून की डिग्री तो ली ही हो। इसके लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज भी बहुत उपयुक्त हो सकते हैं। वह व्यक्ति राज्य के बाहर का होना चाहिए। उसे राजनीति की समझ हो लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षी ना हो। अगर वो पहले राजनेता रह चुका हो तो बाद में वह किसी भी प्रकार की राजनीति में नहीं जाना चाहिए।
लेकिन हमारे राज्यपालों का इतिहास उठकर देखा जाए तो एन डी तिवारी, मोती लाल वोहरा और राजस्थान के पूर्व गवर्नर बसंत दादा पाटील जैसे लोगों ने हमेशा ही इस पद की गरिमा को तार-तार किया है। हाल ही शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर रात 4 बजे बिठा दिया गया था।
ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल राज्य सरकार पर अपना रौब ही झाडता है। वह कोई भी कार्य मंत्री परिषद की सहमति के बिना नहीं कर सकता है। और मंत्रिपरिषद राज्य सरकार या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है तो इसमें राज्यपाल कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसी के उलट जरूरत पड़ने पर राज्यपाल की शक्ति को लेकर एक और जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने एम पी। पुलिस एस्टबलिशमेंट बनाम एम पी राज्य के मामले में 2005 में दिया था। जिसमें कहा गया था कि अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार या किसी आपराधिक षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है तो राज्यपाल स्ववीकानुसार उसपर अभियोग चलाने के आदेश दे सकता है।
उपर्युक्त बातों से सिध्द होता है कि राज्यपाल का पद कोई फालतू या बेकार नहीं होता है बस जरूरत है इसमें कुछ बदलाव करने की। हमारी राजनैतिक जॅमाट फिलहाल तो ऐसा कोई भी बदलाव करने के मूड़ में नहीं दिख रही है। सुना तो यहाँ तक है कि आत राज्यपालों को हटाकर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को इस जगह पर कट-पेस्ट किया जाएगा। अगर ऐसा होगा तो हमें और भी टकरावों को देखने के लिए तैयार रहना होगा। अगर कोई राज्यपाल इस्तीफा ना देने पर अड जाए तो क्या होगा? मुझे नहीं पता? लेकिन जो होगा मजेदार होगा। इस मुद्दे पर राज्यपालों को हटाने के तरीकों पर मैने कई संविधान विषेशग्यों से बात की तो पता चला कि तरीका तो सही है, लेकिन मंशा नहीं। राज्यपाल को हटाने के लिए कोई कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कारण होना भी जरूरी है। मतलब अगर राज्यपाल केन्द्र के फैसले को चुनौती दे तो कोई कारण बताया जा सके। लेकिन फिलहाल तो कोई पर्याप्त कारण नहीं मिल रहे हैं। ऐसे तो वही बातें भविष्य में भी देखने को मिल सकती हैं।
कल सुबह से बहुत सी खबरें आ रही थी, क़ि देश के कई राज्यों के राज्यपालों ने इस्तीफा दे दिया है. कई टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के साथ एक्सपर्ट बहस भी होने लगी. कानून का छात्र होने के नाते मेरा भी मन इस बहस में कूदने का हुआ. हमें राज्यपाल पर बहस करने से पहले उसके संवैधानिक पद और स्थिति को समझना बहुत जरूरी है. राज्यपाल को कुछ लोग निराधार बता रहे हैं. अगर राज्यपाल को वर्तमान स्थिति से हटा दिया जाए तो राज्य शब्द ही अधूरा रह जाएगा. क्योंकि राज्य की कार्यपालिका की शक्तियाँ राज्यपाल में ही निहित होती हैं. केन्द्र में राष्टपति के पद के बराबर राज्यपाल होता है. मुख्यमंत्री की नियुक्ति, मंत्रिमण्डल को अपदस्थ करना और राष्ट्रपति को आपातकाल में स्थिति में परामर्श देना राज्यपाल का कार्य होता है. इनसे भी प्रमुख कार्य है राज्य में केन्द्र की तरफ से सम्बन्ध रखने वाला प्रतिनिधित्व.
अनुच्छेद 156 के तहत इसे राष्ट्रपति नामांकित करता है. वस्तुतः वह अब राष्ट्रपति नहीं केन्द्र सरकार (वो भी प्रधानमंत्री का रिमोट जिसके पास हो.) की मर्जी से चलता है. आज इसी कारण से राज्यपाल को अभिकर्ता (एजेंट) कहा जाने लगा है.इसकी नियुक्ति सम्बंधी अनुच्छेद 156 की पहली लाइन ही यह कहती है कि It is the pleaser of precident. अर्थात राष्ट्रपति के प्रसाद स्वरूप. और राष्ट्रपति तो केंद्रसरकार का ही एक हिस्सा माना जा सकता है. क्योंकि उसकी भी अपनी सीमित शक्तियाँ होती हैं. इस विषय में हरगोविन्द बनाम रघुकुल 1979 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल का पद केन्द्रीय सरकार के अधीन नियुक्त पद नहीं है. यह स्वतंत्र संवैधानिक पद है. यह केन्द्रीय सरकार के अधीन या नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता है.
लेकिन फिर भी राज्यपाल अपनी स्वामिभक्ति करते अक्सर देखे जाते हैं. वे केन्द्र सरकार का भला करना ही अपना परम कर्तव्य मानते हैं. जहाँ राज्य और केन्द्र में भिन्न-भिन्न दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ तो सरकार गिराने जैसी बातें इतिहास में भरी पड़ी हैं. रोमेश भंडारी बनाम कल्याण सिंह सरकार उत्तर प्रदेश का मामला इसमें सभी को याद होगा. 21/02/1998 को राज्यपाल भंडारी को पता चला कि कल्याण सिंह की सरकार के कई विधायक बागी हो चुके हैं, सो उन्होंने रात में कांग्रेस नेता जगदम्बिका पाल को बुला कर कल्याण सिंह सरकार को गिरा कर पाल की सरकार बनवा दी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया जिसमें कहा गया कि किसी भी सरकार को तब तक नहीं गिराया जा सकता जब तक कि वह दल अपना बहुमत विधानसभा में हासिल करने में असफल ना हो जाए. इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल किया गया.
इसी तरह से हरियाणा की लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री देवीलाल की इच्छा के विरुद्ध व़हाँ राज्यपाल हरीलाल बरारी का उपयुक्त उदाहरण है. आप गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को ही ले लीजिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदी को नाकों चने चबवा दिए थे. तमिलनाडु के के मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री पद पर एम. आर. जानकी की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद में राज्यपाल सुंदरलाल खुराना को त्यागपत्र देना पड़ा था.
में कोई राज्यपाल के पद के खिलाफ नहीं बोल रहा हूँ. इसमें बहुत सुधारों की जरूरत है. जिसे सरकारिया कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है. सरकारिया कमीशन का कहना था कि इस संवैधानिक पद पर कोई प्रतिष्ठावान व्यक्ति ही बिठाया जाना चाहिए. उसने कम से कम कानून की डिग्री तो ली ही हो. इसके लिए हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज भी बहुत उपयुक्त हो सकते हैं. वह व्यक्ति राज्य के बाहर का होना चाहिए. उसे राजनीति की समझ हो लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षी ना हो. अगर वो पहले राजनेता रह चुका हो तो बाद में वह किसी भी प्रकार की राजनीति में नहीं जाना चाहिए.
लेकिन हमारे राज्यपालों का इतिहास उठकर देखा जाए तो एन डी तिवारी, मोती लाल वोहरा और राजस्थान के पूर्व गवर्नर बसंत दादा पाटील जैसे लोगों ने हमेशा ही इस पद की गरिमा को तार-तार किया है. हाल ही शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर रात 4 बजे बिठा दिया गया था.
ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल राज्य सरकार पर अपना रौब ही झाडता है. वह कोई भी कार्य मंत्री परिषद की सहमति के बिना नहीं कर सकता है. और मंत्रिपरिषद राज्य सरकार या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है तो इसमें राज्यपाल कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकता है. इसी के उलट जरूरत पड़ने पर राज्यपाल की शक्ति को लेकर एक और जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने एम पी. पुलिस एस्टबलिशमेंट बनाम एम पी राज्य के मामले में 2005 में दिया था. जिसमें कहा गया था कि अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार या किसी आपराधिक षड्यंत्र में लिप्त पाया जाता है तो राज्यपाल स्ववीकानुसार उसपर अभियोग चलाने के आदेश दे सकता है.
उपर्युक्त बातों से सिध्द होता है कि राज्यपाल का पद कोई फालतू या बेकार नहीं होता है बस जरूरत है इसमें कुछ बदलाव करने की. हमारी राजनैतिक जॅमाट फिलहाल तो ऐसा कोई भी बदलाव करने के मूड़ में नहीं दिख रही है. सुना तो यहाँ तक है कि आत राज्यपालों को हटाकर भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को इस जगह पर कट-पेस्ट किया जाएगा. अगर ऐसा होगा तो हमें और भी टकरावों को देखने के लिए तैयार रहना होगा. अगर कोई राज्यपाल इस्तीफा ना देने पर अड जाए तो क्या होगा? मुझे नहीं पता? लेकिन जो होगा मजेदार होगा. इस मुद्दे पर राज्यपालों को हटाने के तरीकों पर मैने कई संविधान विषेशग्यों से बात की तो पता चला कि तरीका तो सही है, लेकिन मंशा नहीं. राज्यपाल को हटाने के लिए कोई कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कारण होना भी जरूरी है. मतलब अगर राज्यपाल केन्द्र के फैसले को चुनौती दे तो कोई कारण बताया जा सके. लेकिन फिलहाल तो कोई पर्याप्त कारण नहीं मिल रहे हैं. ऐसे तो वही बातें भविष्य में भी देखने को मिल सकती हैं.
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