Friday, July 25, 2014

हमारे समाज की बदलती सामाजिक आस्थाएं


आज की बात मैं महाराष्ट्र के औरंगाबाद के आसपास विजयपुर, पिपरी, वालुज की तरफ की करना चाहूंगा। मुझे यहाँ की एक स्थानीय मराठी पत्रिका में पढने को मिला क़ि इस इलाके में एक संत बाबा खजूरे के नाम से बहुत मशहूर हैं। वो बहुत प्रसिध्द हैं इस इलाके में। इनके भक्तों के सँख्या में पिछले 3-4 सालों में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है। कुछ लोग इस बाबा को ढोंगी भी कहते हैं, लेकिन मैनें यह भी सुना कि इनके भक्तों में एक बड़ी संख्या में लोग केवल अपनी शराब की आदत छुडवाने गए थे। वो लोग जिनके परिवार शराबी होने की वजह से टूट रहे थे, वो लोग जो अपना घर, खेत सब इसी लत की वजह से बेंच रहे थे। उन्हें इस संकट से निकाला इस बाबा ने। इनकी एक बात हमें यह भी सुनने को मिली क़ि यह बाबा महिलाओं के बीच बहुत प्रसिध्द हैं, इन्हीं पीड़ित महिलाओं ने अपने पतियों को एक बार लेजाकर इस बाबा के दर्शन कराए और एक छोटी सी लोकेट टाइप ताबीज गले में बाँध दी। बस फिर क्या था इन सभी पुरुषों के ह्रदय परिवर्तन हो गया। यह एक बहुत बड़ा समाज सुधार का काम है। इसमें एक और बात ध्यान देने वाली रही है कि इन भक्तों की अधिकतम संख्या दलितों या पिछड़ों की है, जिनका मांसाहारी भोजन भी छूटता जा रहा है इनके साथ साथ बड़ी जातियों के मेल भी समाज मे एकता और सामूहिकता प्रदान कर रहे हैं  
महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके तो क्रोध की कोई सीमा थी और ही कृपा का कोई पारावार। आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे। लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है। एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है। इसपर वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है। और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं। इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, साई आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं।
मैने यह पहली तस्वीर महाराष्ट्र से इसलिए ली, क्योंकि अब मैं आधा महाराष्ट्र का भी हो चुका हूँ, तो यहाँ के बारे में लिखना भी मेरा कर्तव्य है। अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं। फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है। हाल के दौर में इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं निर्मल बाबा। किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है।परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत हैवाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है। ठीक यही बातें पूरे देश में सुनने को मिलती रही हैं। मेरे यहाँ भी इसी तरह से सच्चिदानंद, जय गुरुदेव, पटियाले वाले बाबा और ना जाने कितने अनगिनत बाबाओं की दुनियाँ हमें यहाँ मिल जाती है। बात केवल पिछड़े समाज की ही नहीं है, यहाँ मुम्बई जैसे आधुनिक शहर में भी लोकल ट्रेनों में बहुत से पोस्टर बाबा पीर बंगाली और मनमाँगी मुराद टाइप मिल जाते हैं। इसलिए इसे हम पूरे भारतीय समाज का धार्मिक बदलाव कह सकते हैं। जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं। मौजूदा दौर में आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, उनमेंशिरडीवाले साई बाबा, शिंगणा के शनिदेव, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें आती हैं। अमेरिका में भी केवल ईसाईयत के नाम पर कई पंत विकसित हो गए हैं। इसका एक कारण हमारे समाज में आए टीवी की दुनिया को भी माना जाता है। आपको भी याद होगा क़ि 70 के दशक में जय संतोषी माँ फिल्म के बाद शुक्रवार के व्रत का एक क्रेज सा हो गया था। नहीं तो इसके पहले कितने लोगों को ऐसा इतिहास पता था। उसी समय के पहले गुल्सन कुमार के भजनों के बाद माता वैष्णो के दरबार मे आई भीड़ भी इसका एक उदाहरण है। इसी कथा से प्रचलित कालभैरव के भक्तों मे भी एक बड़ी सँख्या बदलाव आया था।
आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है। मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं। उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है। इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता। लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है तथा धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है।स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है।
आज जहाँ देखो कोई ना कोई सूफ़ी संत अपनी जगह समाज के बहुसंख्यक वर्ग में बना चुका है। वैसे तो इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थेपर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है। पिछले एक दशक के भीतर देश भर में अस्सी हजार के करीब साई मंदिर अस्तित्व में गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है। अब इनकी पूजा भी हिन्दू रीति रिवाज से होने लगी है। इनकी मजारों पर तस्वीरें भी हो गई हैं, यही कारण है कि आज भी मुस्लिम इनसे दूर ही हैं। ठीक यही बात साई बाबा के बारे में कही जा सकती है। ठीक यही डर शंकराचार्य के दिल में देखा जा सकता है। वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों। हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक से समीक्षा की जा सकती है। बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने। इस बीच आधुनिक और परंपरागत आराध्यों के अनुयायियों के बीच पैदा हुई खटास किस करवट बैठेगी, यह देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा। वास्तव में आधुनिक आराध्य परंपरागत देवी-देवताओं के लिए चुनौती बन गए हैं या फिर यह उनके भक्तों में पैदा हुई असुरक्षा का नतीजा है? समय की किताब में जुड़ने वाले पन्ने ही इसका जवाब दे सकते हैं।
आज पूरे देश में एक बड़ी संख्या में हमारी मुख्यधारा से अलग भगवानों या आराध्यों की एक पूरी फ़ौज तैयार हो गई है। मैं नहीं कहता हूँ क़ि ये लोग समाज के साथ धोखा कर रहे हैं, या बहुत अच्छा कर रहे हैं। लेकिन यह एक बड़ी बहस का विषय हो सकता है। हो सकता है कि ये भी एक बड़ा ही सामाजिक कार्य या परिवर्तन कर रहे हों लेकिन एक शक की सुई तब इनपर जाती है जब आशाराम जैसे महान संतो के कुकर्मों का पता चलता है। अगर मुझे कभी मौका मिला तो इस मुद्दे पर रिसर्च करके पी। एच। डी। करना चाहूंगा। आप भी मेरी किसी बात पर कोई राय मत बनाइए, ना ही किसी संत या बाबा पर कोई टिप्पणी करिए। बस समाज में हो रहे धार्मिक परिवर्तनो को देखिए और अपनी खुद की कोई ठोस बात रखिए। हो सकता है जो रहा है वैसा ना हो। बाकी जो है, वो तो रहेगा ही।
(Special Thanks to Mr. Atul Chaurasia's report in Tehlka Hindi 15 May 2014.)

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