Friday, August 15, 2014

प्रधानमंत्री के भाषण पर दो शब्द....


आज मैने प्रधानमंत्री का पूरा भाषण दो बार ध्यान से सुना उसके बाद उसका विश्लेषण किया तो पाया क़ि कुछ बहादुरी दिखाने के अलावा उनके भाषण में क्या नया था। केवल सुरक्षा के घेरे से बाहर जाना ही बहादुरी नहीं है। 1 महीने से तैयारी चल रही थी, सुरक्षा की फिर भी मोदी जी के पास हजारों कमांडो थे। फिर उसमें क्या डरना था। इतनी सुरक्षा के बीच मोदी जी से मिलने बच्चे आए थे। उनसे मिलने में कौन सा अलग कर दिया। इसके पहले आप राजीव गाँधी को किंतनी बार जनता के बीच सड़कों पर देख सकते थे, राहुल गाँधी को भी कई बार मैने रैली में जनता में जाते देखा है, जो मोदी में कभी नही दिखता है। मैं यह मानता हूँ क़ि अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों से ठीक संवाद था यह। मनमोहन से तो 100 गुना अच्छा था। मैं एक वक्ता के रूप में उनके भाषण को 10 में से 10 नंबर देता हूँ। क्योकि बहुत सालों बाद किसी पी एम ने जोरदार भाषण दिया। वो भी बिना लिखा हुआ। वो बोलने में तो पहले से ही बहुत अच्छे हैं। जैसा हम देखते रहे हैं। अगर उनके भाषण के तथ्यों पर बात की जाए तो मोदी जी के भाषण में कुछ भी नया नहीं था। सबकुछ वैसा ही जैसे वादे अन्य प्रधानमंत्री करते रहे हैं। आज वो इतना सब बोल रहे थे। लेकिन उसके पहले देश में कितना सब हो गया, मोदीजी कुछ नहीं बोले। उन्होने विकास के वादों को फिर से दोहराया। आज मोदीजी ने गावों में शौचालय बनाने पर बहुत जोर देते हुए, बहुत लम्बा चौड़ा भाषण दे डाला। लेकिन गुजरात सरकार की ही एक रिपोर्ट में मैने अभी देखा कि गुजरात के 67 % गावों में शौचालय की नहीं बने हैं। अहमदाबाद और सूरत में भी 35 % घर इसी तरह के हैं। तो क्या देश में भी ऐसा ही विकास होगा। मोदी जी ने किसानों और गरीबों की बात की जो पिछले 68 सालों से हो रही थी। इसमे से कई योजनाएँ तो कांग्रेस सरकार और राज्य सरकारों द्वारा पहले से ही चल रही हैं। हम इन वादों पर भी आपको सही मानते हैं क्योकि आपको अभी समय ही कहाँ मिला है? हमला तो इन वादों पर 15 अगस्त 2015 को करेंगे। आज अगर भाषण का ऑपरेशन किया जाए तो 5 बातें जो देश में चुनावों के समय चलाई गई थी, वो आज उनके भाषण से पूरी तरह गायब थी। मंहगाई, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, कालाधन और पाकिस्तान या चीन से बदला.
लेकिन यह मोदी जी की फेंकने की कला का ही नमूना था क़ि इन चीजों का कहीं पर भी जिक्र तक नहीं आया। साम्प्रदायिकता पर कुछ शब्द बोले लेकिन, प्रवीण तोगाडिया, शहरनपुर, मेरठ और संघ या अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनो द्वारा फैलाई जा रही नफरत पर कुछ क्यों नहीं बोले? आज उनकी हिन्दी भी बहुत गजब की थी , लेकिन पिछले दिनों हिन्दी के लिए लड़ने वाले छात्रों पर लाठियाँ चल रही थी तो वो क्यों नहीं बोले और फिर आज भी नहीं बोले। देश में मंहगाई का तो इतना बोलबाला है क़ि गरीब आदमी मरने की सोच रहा है। कोई लगाम नही लगी इस मंहगाई की आग पर। आज कालाधन लाने के लिए सरकार पता नहीं क्या कर रही है? बाबा रामदेव तो किसी गुफा मे एकांतवास पर चले गए हैं, उन्हें तो पता ही नही है क़ि काले धन पर भाजपा के एक नेता संसद मे बोल चुके हैं क़ि यह काम नहीं हो सकता है। पाकिस्तान पिछले दो महीने में 40 बार सीमा पार से गोलाबारी कर चुका है लेकिन मोदी जी केवल कश्मीर में भाषण तो देकर आते हैं लेकिन जनता को यह क्यों नहीं बताते हैं क़ि नवाज सरीफ से मोदी जी की माँ को सॉल और साडी भेजने का सिलसिला कैसे रुक गया? यह देश के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा है?
भ्रष्टाचार पर भी कोई बड़ा कदम तो नहीं उठाया गया है अभी तक। आप मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का व्यापम घोटाले को कैसे भूल सकते हैं। उसपर मोदीजी ने क्या किया? यह भी तो बात होनी चाहिए। आज पूरे देश में आराजकता का माहौल है। मोदी जी केन्द्र और राज्य के सम्बंधों या फ़ेडरल स्ट्रक्चर भी बहुत बात की। लेकिन आप फ़ेडरल ढाँचे की पहली सीढ़ी राज्यपालों को कैसे भूल सकते हैं। आप राज्यपालों को किस तरह से राजीनितिक रूप से हटाकर और अपने नेताओं को जिस तरह से बिठा रहे हैं वह तो कांग्रेस से अलग नहीं है। इससे तो 2010 के सुप्रीम कोर्ट को भी चुनौती मिल रही है। आज पूरे देश में भाजपा नेताओं को राज्यपाल बनकर राज्य सरकारों पर दबाव बनाया जा रहा है। तो यह फर्जी भाषण क्यों?
एक बात से उन्होंने मेरा दिल जीत लिया यह कहकर कि लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए लोग लड़कों से कुछ नहीं पूछते हैं, लेकिन बच्चियों पर 10 सवाल कर देते हैंमैं यह सुनकर बहुत खुश हो गया लेकिन 4-5 लोगों को भारत रत्न देने के लिए सूत्रों के अनुसार जो लिस्ट बनाई गई है, उसमें  लेकिन किसी भी महिला का नाम नहीं है कुछ नहीं तो सुषमा स्वराज को ही दे दीजिए अन्यथा एक पूरी लिस्ट पड़ी है देश की महान महिलाओं की सबसे पहले तो आप भेदभाव खत्म करिए फिर जनता को भी बताइए
अगर उनके भाषण से एक और बात मैं वकालत का स्टूडेंट होने के नाते निकालूं तो पहले तो मोदी जी बोलते थे क़ि हम 100 नए स्मार्ट सिटी बनाएँगे मैने तो तब भी पूछा था कि वो जगह कहाँ से आएगी? आप आदर्श गाँव क्यों नहीं बनाते हैं अब वो बोले क़ि हम आदर्श गाँव भी बनाएँगेबहुत अच्छी बात है लेकिन आप यूपी के अम्बेडकर और लोहिया ग्रामसभाओं से कुछ क्यों नहीं सीखते हैं? जाकर देखिए मन खुश हो जाएगा लेकिन मोदीजी तो यही नहीं तय कर पा रहे हैं कि उन्हें शहर बनाने हैं या गाँव? यह बात एक विरोधाभाषी लग रही हैआप नए शहर तो गाँव तोड़कर या जंगल कटकर बनाएँगे तो आप गाँव या जंगल की रक्षा कैसे करेंगे?
आपको तो कुछ नया आयाम लिखना चाहिए था। मैं नहीं कहता हूँ कि आप अभी सबकुछ कर दीजिए लेकिन आपकी मंशा तो अभी से दिख गई है। बातें बहुत हैं और समय कम। लेकिन अभी नहीं कुछ समय मोदी जी को देने के बाद..........
जय हिन्द।।।।।।।।।

Thursday, August 14, 2014

CSAT में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा


सबसे पहले तो आप्स अभी से इस बात के लिए में माफी मँगता हूँ कि यह लेख लिखने के बाद भी मैं ब्लॉग पर कई दिन बाद डाल पाया। हमारे देश में अभी तक हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी को लेकर एक बड़ा आन्दोलन चल रहा था। लेकिन सच तो इससे भी अलग है मीडिया ने भले बताया हो लेकिन यह आन्दोलन हिन्दी नहीं पूरे देश की स्थानीय भाषाओं के लिए हो रहा है। मीडिया तो केवल 2-4 मिनट की खबर के बाद कुछ दिखता ही नहीं है क्योंकि इसमें कोई टी आर पी नहीं है। हो सकता है इसमें सरकार का डर भी हो।
मैं इस मुद्दे की तकनीकी पर ना जाकर कुछ सार्थक प्रश्न आपके सामने रखना चाहता हूँ। आखिर  आप अंग्रेज़ी अनिवार्य तो इसलिए बना रहे हैं क्योंकि आप अपने देश को अधिक पढ़ा लिखा और इटेलिजेंट देखना चाहते हैं। जैसा आप कहते हैं। यह होना भी चाहिए क्योंकि आज लगभग 75 प्रतिशत सरकारी कार्य अंग्रेज़ी में ही हो रहे हैं। आपका कम्प्यूटर, मोबाइल या किसी भी टेक्नोलॉजी का हर कार्य अंग्रेज़ी में ही होता है। इसके लिए जरूरी है क़ि हम अंग्रेज़ी सीखें। लेकिन जब आप अंग्रेज़ी को अनिवार्य बनाते हैं तो  बात दूसरी हो जाती है। अगर आप देखें तो कितने प्रतिशत जनसंख्या आज होगी जो अंग्रेज़ी जानती है। शायद पूरे देश में 10 % के आस पास। अगर इस परीक्षा की बात करें तो आप वैसे भी अंग्रेज़ी का एक पेपर तो लेते ही हैं 100 अंक का। जब परीक्षार्थी उसमें पास होगा तभी तो आगे जाएगा। और तभी वो आपका कम्प्यूटर और ओफ़िस का कार्य अभी तक करता रहा है। मैं नहीं कह रहा हूँ क़ि जो आदमी अंग्रेज़ी अच्छी जानता है वो हिन्दी या हिन्दुस्तानी समाज मेन्न काम नहीं कर सकता लेकिन अगर वो स्थानीय भाषा नहीं जानता है तो क्या करेगा। मान लीजिए किसी को बहुत अंग्रेज़ी आती है और वो थोड़ी बहुत हिन्दी भी बोल लेता है अगर उसकी ड्यूटी महाराष्ट्र के या बंगाल के किसी गाँव मे लगा दी जाए तो क्या करेगा। वहाँ तो उसे कुछ दिन बाद भाषा सीखनी ही पड़ती है। तो फिर अग्रेजी अनिवार्य क्यों? क्यों नहीं आप सभी ट्रेनिंग के हिसाब से 3-4 महीने का एक अंग्रेज़ी सीखने का ट्रेनिंग लगा देते हैं। अब मुद्दे का तीसरा पक्ष भी आता है क़ि अगर यह परीक्षा अंग्रेज़ी में अनिवार्य कर दी गई तो इंग्लिश मीडियम अर्थात पैसे वालों के बच्चों से गरीबों के बच्चे, जो हिन्दी, मराठी, कन्नड़ और तेलगू मीडियम मे पढ़ें हैं वो पिछड़ जाएंगे। यहाँ पर बात हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी की नहीं कर रहा हूँ। सभी भारतीय भाषाओं के अस्तित्व की बात है। मैं यह भी नहीं कहता हूँ क़ि हिन्दी बोलने वाले लोगबहुत देशभक्त होते हैं और सब या अंग्रेज़ी वाले कम। यहाँ पर अब बात भाषाओं से उपर उठकर आर्थिक हालातों पर भी जाती है। आप दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढने वाले बच्चे का कम्पीटीशन बुंदेलखंड, विदर्भ और तेलंगाना के गरीब गाँव के किसानों के बच्चों से कैसे करवा सकते हैं। यहाँ पर एक स्थानीय भाषा क्या सभी की वही दशा है। बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र या बिहार के किसी भी गाँव या कस्बे में आप जाकर देखिए जितने भी बड़े घरों के बच्चे होते हैं, वही इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं। यह एक विचारधारा का मामला हो जाता है। यहाँ एक पूंजीवाद जाता है।और अंग्रेज़ों की फूट डालने की नीति का काम आज अंग्रेज़ी कर रही है। तमिल को हिन्दी से, मराठी को हिन्दी से, बंगाली को हिन्दी से लड़ाया जाता है। फिर अकेले अकेले यह सभी भाषाएँ अंग्रेज़ी से लडती हैं। जबकि जरूरत है सभी भारतीय भाषाओं को एक साथ अंग्रेज़ी से मिलकर लड़ने की। बात केवल अंग्रेज़ी से लड़ने तक नहीं रुकेगी इसे पूँजीवादी सोंच के खिलाफ भी इसी तरह मिलकर लड़ने की जरूरत है। अगर आप चाहते हैं कि हमारा देश भी अमेरिका और रूस की तरह तरक्की करके इंग्लिश मीडियम बने तो आप देश को 10 साल का समय दीजिए। पूरे देश में एक ही शिक्षा व्यवस्था लागू कर दीजिए। जिस स्कूल में एक अरबपति और सांसद के बच्चे पढने जाएंगे उसी में एक चपरासी और किसान के बच्चे भी जाएँ, फिर आप  2025 या 2030 में कम्पटीशन करवा लेना। हम तैयार हैं।
अगर हम फिर से छात्रों के आन्दोलन की बात करें तो जिस तरह से मोदी सरकार ने छात्रों पर पुलिस की लाठियाँ चलवाई हैं वो अच्छे दिनों के संकेत तो नहीं हैं। मोदी जी क्यों भूल रहे हैं कि इसी हिन्दी के दम पर आपने यूपी और बिहार का दिल जीता था। क्या आपकी अंग्रेज़ी और गुजराती को ये लोग पसंद करते? नहीं।।।।फिर क्यों आप इनपर जुल्म करवा रहे हैं। मुझे यह भी पता है कि इसमें अन्य राजनैतिक दल भी मंडल की तरह इस मुद्दे पर छात्रों के आन्दोलन पर अपनी राजीनितिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। लेकिन सरकार का रवैया भी इंदिरा गाँधी की तानाशाही जैसा होता जा रहा था। परीक्षा की तिथि को पास आते देख संसद में सरकार ने जीतेन्द्र सिंह की अगुवाई में एक कमेटी बनकर एक टॅमप्रेरी समाधान तो निकल लिया है, लेकिन आगे इसका क्या फायदा होगा यह कहा नहीं जा सकता है। यह केवल एक साल के लिये ही है। इसमे छात्रों को बेवकूफ बनाकर पूरी के चक्कर में आधी ही पकड़ा दी गई है। लेकिन यह युवा शक्ति जिसे उपर ले जाती है उसे जल्दी ही नीचे भी फेंक देती है। यह मोदी जी को भूलना नहीं चाहिए।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...