सबसे पहले
तो आप्स
अभी से
इस बात
के लिए
में माफी
मँगता हूँ
कि यह
लेख लिखने
के बाद
भी मैं
ब्लॉग पर
कई दिन
बाद डाल
पाया। हमारे
देश में
अभी तक
हिन्दी बनाम
अंग्रेज़ी को लेकर एक बड़ा
आन्दोलन चल
रहा था।
लेकिन सच
तो इससे
भी अलग
है मीडिया
ने भले
बताया हो
लेकिन यह
आन्दोलन हिन्दी
नहीं पूरे
देश की
स्थानीय भाषाओं
के लिए
हो रहा
है। मीडिया
तो केवल
2-4 मिनट की
खबर के
बाद कुछ
दिखता ही
नहीं है
क्योंकि इसमें
कोई टी
आर पी
नहीं है।
हो सकता
है इसमें
सरकार का
डर भी
हो।
मैं इस
मुद्दे की
तकनीकी पर
ना जाकर
कुछ सार्थक
प्रश्न आपके
सामने रखना
चाहता हूँ।
आखिर आप अंग्रेज़ी अनिवार्य तो
इसलिए बना
रहे हैं
क्योंकि आप
अपने देश
को अधिक
पढ़ा लिखा
और इटेलिजेंट
देखना चाहते
हैं। जैसा
आप कहते
हैं। यह
होना भी
चाहिए क्योंकि
आज लगभग
75 प्रतिशत सरकारी कार्य अंग्रेज़ी में
ही हो
रहे हैं।
आपका कम्प्यूटर,
मोबाइल या
किसी भी
टेक्नोलॉजी का हर कार्य अंग्रेज़ी
में ही
होता है।
इसके लिए
जरूरी है
क़ि हम
अंग्रेज़ी सीखें। लेकिन जब आप
अंग्रेज़ी
को
अनिवार्य बनाते हैं तो बात दूसरी
हो
जाती है। अगर आप देखें तो कितने प्रतिशत जनसंख्या आज होगी जो अंग्रेज़ी जानती है। शायद पूरे देश में 10 % के आस
पास। अगर इस परीक्षा की बात करें तो आप वैसे भी अंग्रेज़ी का एक पेपर तो लेते ही हैं 100 अंक का।
जब
परीक्षार्थी उसमें पास होगा तभी तो आगे जाएगा। और तभी वो आपका कम्प्यूटर और ओफ़िस का कार्य अभी तक करता रहा है। मैं नहीं कह रहा हूँ क़ि जो आदमी अंग्रेज़ी अच्छी जानता है वो हिन्दी या हिन्दुस्तानी समाज मेन्न काम नहीं कर सकता लेकिन अगर वो स्थानीय भाषा नहीं जानता है तो क्या करेगा। मान लीजिए किसी को बहुत अंग्रेज़ी आती है और वो थोड़ी बहुत हिन्दी भी बोल लेता है अगर उसकी ड्यूटी महाराष्ट्र के
या बंगाल
के
किसी गाँव मे लगा दी जाए तो क्या करेगा। वहाँ तो उसे कुछ दिन बाद भाषा सीखनी ही पड़ती है। तो फिर अग्रेजी अनिवार्य क्यों? क्यों नहीं
आप
सभी ट्रेनिंग के हिसाब से 3-4 महीने का
एक
अंग्रेज़ी सीखने का ट्रेनिंग । लगा देते हैं। अब मुद्दे का तीसरा पक्ष भी
आता है
क़ि अगर यह परीक्षा अंग्रेज़ी में अनिवार्य कर दी गई तो इंग्लिश मीडियम अर्थात पैसे वालों के बच्चों से गरीबों के बच्चे, जो हिन्दी,
मराठी, कन्नड़ और तेलगू मीडियम मे पढ़ें हैं वो पिछड़ जाएंगे। यहाँ पर बात हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी की नहीं कर रहा हूँ। सभी भारतीय भाषाओं के अस्तित्व की बात है। मैं यह भी नहीं कहता हूँ क़ि हिन्दी बोलने वाले लोगबहुत देशभक्त होते हैं और सब या अंग्रेज़ी वाले कम। यहाँ पर अब बात भाषाओं से उपर उठकर आर्थिक हालातों पर भी जाती है। आप दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढने वाले बच्चे का कम्पीटीशन बुंदेलखंड, विदर्भ और
तेलंगाना के गरीब गाँव के किसानों के बच्चों से कैसे करवा सकते हैं। यहाँ पर एक स्थानीय भाषा क्या सभी की वही दशा है। बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात,
महाराष्ट्र या बिहार के किसी भी गाँव या कस्बे में आप जाकर देखिए जितने भी बड़े घरों के बच्चे होते हैं, वही इंग्लिश
मीडियम में पढ़ते हैं। यह एक विचारधारा का मामला हो जाता है। यहाँ एक पूंजीवाद आ जाता है।और अंग्रेज़ों की फूट डालने की नीति का काम आज अंग्रेज़ी कर रही है। तमिल को हिन्दी से, मराठी को
हिन्दी से, बंगाली को
हिन्दी से लड़ाया जाता है। फिर अकेले अकेले यह सभी भाषाएँ अंग्रेज़ी से लडती हैं। जबकि जरूरत है सभी भारतीय भाषाओं को एक साथ अंग्रेज़ी से मिलकर लड़ने की। बात केवल अंग्रेज़ी से लड़ने तक नहीं रुकेगी इसे पूँजीवादी सोंच के खिलाफ भी इसी तरह मिलकर लड़ने की जरूरत है। अगर आप चाहते हैं कि हमारा देश भी अमेरिका और रूस की तरह तरक्की करके इंग्लिश मीडियम बने तो आप देश को 10 साल का
समय दीजिए। पूरे देश में एक ही शिक्षा व्यवस्था लागू कर दीजिए। जिस स्कूल में एक अरबपति और सांसद के बच्चे पढने जाएंगे उसी में एक चपरासी और किसान के बच्चे भी जाएँ, फिर आप
2025 या 2030 में कम्पटीशन करवा लेना। हम तैयार हैं।
अगर हम फिर से छात्रों के आन्दोलन की बात करें तो जिस तरह से मोदी सरकार ने छात्रों पर पुलिस की लाठियाँ चलवाई हैं वो अच्छे दिनों के संकेत तो नहीं हैं। मोदी जी क्यों भूल रहे हैं कि इसी हिन्दी के दम पर आपने यूपी और बिहार का दिल जीता था। क्या आपकी अंग्रेज़ी और गुजराती को ये लोग पसंद करते? नहीं।।।।फिर क्यों आप इनपर जुल्म करवा रहे हैं। मुझे यह भी पता है कि इसमें अन्य राजनैतिक दल भी मंडल की तरह इस मुद्दे पर छात्रों के आन्दोलन पर अपनी राजीनितिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। लेकिन सरकार का रवैया भी इंदिरा गाँधी की तानाशाही जैसा होता जा रहा था। परीक्षा की तिथि को पास आते देख संसद में सरकार ने जीतेन्द्र सिंह की अगुवाई में एक कमेटी बनकर एक टॅमप्रेरी समाधान तो निकल लिया है, लेकिन आगे इसका क्या फायदा होगा यह कहा नहीं जा सकता है। यह केवल एक साल के लिये ही है। इसमे छात्रों को बेवकूफ बनाकर पूरी के चक्कर में आधी ही पकड़ा दी गई है। लेकिन यह युवा शक्ति जिसे उपर ले जाती है उसे जल्दी ही नीचे भी फेंक देती है। यह मोदी जी को भूलना नहीं चाहिए।
अगर हम फिर से छात्रों के आन्दोलन की बात करें तो जिस तरह से मोदी सरकार ने छात्रों पर पुलिस की लाठियाँ चलवाई हैं वो अच्छे दिनों के संकेत तो नहीं हैं। मोदी जी क्यों भूल रहे हैं कि इसी हिन्दी के दम पर आपने यूपी और बिहार का दिल जीता था। क्या आपकी अंग्रेज़ी और गुजराती को ये लोग पसंद करते? नहीं।।।।फिर क्यों आप इनपर जुल्म करवा रहे हैं। मुझे यह भी पता है कि इसमें अन्य राजनैतिक दल भी मंडल की तरह इस मुद्दे पर छात्रों के आन्दोलन पर अपनी राजीनितिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। लेकिन सरकार का रवैया भी इंदिरा गाँधी की तानाशाही जैसा होता जा रहा था। परीक्षा की तिथि को पास आते देख संसद में सरकार ने जीतेन्द्र सिंह की अगुवाई में एक कमेटी बनकर एक टॅमप्रेरी समाधान तो निकल लिया है, लेकिन आगे इसका क्या फायदा होगा यह कहा नहीं जा सकता है। यह केवल एक साल के लिये ही है। इसमे छात्रों को बेवकूफ बनाकर पूरी के चक्कर में आधी ही पकड़ा दी गई है। लेकिन यह युवा शक्ति जिसे उपर ले जाती है उसे जल्दी ही नीचे भी फेंक देती है। यह मोदी जी को भूलना नहीं चाहिए।
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