Friday, November 14, 2014

सत्य मेव जयते...


कल आमिर ख़ान ने मर्द के मुद्दे पर सत्य मेव जयते रखा। उसमें मर्द की परिभाषा को बताने की कोशिश की गई। आखिर मर्द क्या है, इसकी हमें बहस करनी चाहिए। मैं भी इसपर अपने विचार रखना चाहता हूँ। मर्द शब्द, ही स्त्री का विलोम है, तो लोग इसे स्त्री का अपोजिट समझ बैठते हैं। लेकिन मेरा मानना है, कि मर्द वो होता है जो स्त्री रक्षा करे ना करे, उसे अपनी खुद की रखा करने लायक बनाए, उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दे, स्त्री को इज्जत दे, लेकिन उसे अपने से 1 % भी कम नहीं, अपने बराबर की इज्जत दे। स्त्री को बाहर निकलने दे, उसके कपड़े, उसके कैरियर, उसके सोंच, उसके खुद की जिंदगी के फैसले लेने की आजादी दे। यह स्त्री आरक्षण खत्म कर खूब खुद उन्हें, शिक्षा, समाज और राजनीति में आने दे मैने राजनीति की बात इसलिए की क्योंकि जो भी कानून बनाए जाते है, वो मर्द ही पार्लियामेंट मे बना देते हैं इसलिए महिलाओं की संख्या बढानी चाहिए राजनीति के क्षेत्र में भी हमें महिलाशक्ति के नारों और किताबी बातों से उपर उठकर सोंचना चाहिए। स्त्री को माँ, बेटी और पत्नी या बहू के फ्रेम से बाहर निकलना होगा। बेटियों को अपनी संपत्ती में हिस्सा क्यों नहीं दिया जाता है? लड़का शादी, किसी से भी करे पसंद है लेकिन बेटी की शादी जहाँ चाहेंगे, वहां करेंगे। बेटा जो करियर चाहे चुन ले बेटी को यह आजादी क्यों नहीं? पुरुष शादी ना करे तो बोलते हैं क़ि आजादी से जी रहा है स्त्री शादी ना करे तो हजार सवाल खड़े होते हैं। बेटी के भविष्य को कब तक शादी तक का ही लक्ष्य मानकर चलेंगे? कब तक अपने फैसले थोपे जाएंगे? ये जो बड़ी बड़ी बातें करने वाले आज के स्मार्ट लड़के हैं, ये कब तक लड़कियों को आइटम, पटाका, माल और ना जाने कैसे कैसे भद्दे कमेंट्स के साथ देखते रहेंगे???
पहले पैदा होते ही लड़की बेटी, बहन के फ्रेम में कैद करके रखना, फिर समाज की गंदी नजरों से बचे, फिर पत्नी, माँ और बहू के फ्रेम में कैद हो जाती है। आपको एक मजे की बात बताता हूँ क़ि लोग कहते हैं कि अगर लड़का अच्छा बनाना है तो यह मां की जिम्मेदारी है आपको अजीब नही लगा क़ि यहाँ पर भी पुरुष को सुधारने की जिम्मेदारी पुरुषों पर नहीं स्त्री पर डाली जा रही है। हो सकता है आप ऐसा ना करते हों, आप अपने को अलग मानते हों। अगर ऐसा है तो मैं आपको सलाम करता हूँ। फिर तो आप अपनी बहन को अपने घर और खेतों में हिस्सा देंगे? अच्छी बात है आप जरूर ऐसा करेंगे?
कुछ अपवाद स्वरूप लड़कियां, जो इंजीनियर, डॉक्टर, वकील हैं। बड़ी बड़ी खिलाडी है, बड़ी बड़ी फिल्म एक्ट्रेस और मॉडॉल्स हैं। उनको उनके घर से अच्छी छूट और मदद मिली है इसी का नतीजा है क़ि वो आज देश में अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर रही है लेकिन उनको भी परिवार यह सम्मान उनकी शोहरत के बदले ही देता है। उसके पहले तो सफलता में योगदान दोनो (परिवार और लड़की) का रहता है। इसके बावजूद उन एक्ट्रेस और खिलाडियों को इस समाज में कभी ना कभी तो यह महसूस करके दुख होता है कि आखिर यह मेरे साथ लड़की होने के कारण हुआ। उनको बाहर निकल कर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। 
सत्यमेव जयते में आगे बात आई बॉलीवुड मे होने वाले क्रियाकलापों पर। मैं कहता हूँ क़ि जो भी दिखाया जा रहा है उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन क्या फिल्मों में वह नहीं दिखाया जाता है, जो हमारा पुरुष समाज देखना चाहता है? जब एक लड़की का आइटम Song हो सकता है, तो किसी हीरो या लड़के का क्यों नहीं? लेकिन नहीं होता है, क्योंकि फिल्में पुरुषों की इच्छा या पसंद के हिसाब से बनाई जाती हैं। कभी महिलाओं से पूछा ही नही गया होगा कि उनको क्या पसंद है। जब फिल्में आ जाती हैं तो मजबूरन उनको पसंद भी वही करना पड़ता है, और कोई विकल्प भी तो नहीं होता है। यहाँ तक कि कई सारे सास-बहू टाइप टीवी सीरियल्स भी इस मिथ्या को तोड नहीं पाते हैं(दिया और बाती, या बालिका बधू के कुछ हिस्से को इस अपवाद से दूर रखा जा सकता है) आखिर फिल्मों में भी तो स्त्री को वस्तु या चीज बनाकर तब  दिखाया है, जब हम इसे देखना चाहते हैं। हमारा पुरुष समाज यह घटिया प्रदर्शन देखना बंद करे, फिर सॅनी लियोन भारत आएंगी ही नहीं, जब कोई पसंद ही नहीं करेगा। लेकिन जब अपनी ही नजर खराब हो तो सब दिखाया जाएगा। फिर भी फिल्मों की पूरी सफलता हीरो के नाम ही लिख दी जाती है। मानता हूँ कि सलमान ख़ान बहुत फेमस है, लोग उनको ही देखने जाते हैं लेकिन लोग तभी देखने जाते हैं जब वो फिल्म में किसी स्त्री पर गाने, कमेन्ट और स्टोरी दिखाते हैं। अकेले कुछ नहीं कर सकते हैं। यहाँ पर भी स्त्री के शरीर का प्रयोग तो होगा ही? लेकिन बॉलीवुड में भी हर जगह पुरुष प्रधानता दिखती है।
इसमें मैं एक विषय और जोड़ना चाहूंगा, वो है आधुनिकता। हमारा समाज जितना भी आधुनिक हो रहा है उतना ही विकास भी हो रहा है। वो विकास सामाजिक भी है। कुछ लोग इस आधुनिकता को पीछे की तरफ ले जाने वाला कहते हैं आप बहुत सारे नेताओं और पुलिस के ऐसे बयान गूगल पर देख सकते हैं, जो यह कहते रहे हैं कि बलात्कार का एक बड़ा कारण आधुनिकता और खराब कपड़े हैं। मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानता हूँ। मैने एक रिपोर्ट पढी जिसमे पता चला कि पूरे साल में भारत में होने वाले रेप के मामलों में 37% ने साड़ी, 30% ने सलवार सूट जैसे भारतीय परिधान (कपड़े) और 25% से भी कम ने जींस या फैसनबल कपड़े पहने थे। उसमें से 7-8% ने तो कुछ भी नहीं या बहुत छोटे से कपड़ों को पहना था क्योंकि वो छोटी बच्चियाँ थी। जिनकी उम्र 5 साल से भी कम थी। तो आप किस आधार पर यह कह सकते हैं कि कपड़ों के कारण रेप होता है। हाँ यह जरूर है क़ि कुछ लोगों को यह देखना चाहिए क़ि कुछ भी जानबूझकर दिखाने की कोशिश ना हो। जब सब कोट पहन कर रहे हैं, तो लड़कियों को भी ठंड तो लगती है, उनको भी अपने को संभालना चाहिए। जैसे फिल्मों में साड़ी पहनने के बाद भी अंगप्रदर्शन दिखाने से नहीं चूकते हैं।
इसलिए आधुनिकता के कई पहलू हैं कुछ सही हैं, कुछ गलत हैं जिनपर बात होनी चाहिए। यह आधुनिकता का ही तकाजा है कि शिक्षा, स्वाश्थ्य, कानून, राजनीति और सभी जगह पर महिलाओं की संख्या उनके दम पर बढी है। आज टेक्नोलॉजी ने सोसल मीडिया पर उनको एक प्लेटफॉर्म दिया है, अपनी आवाज उठाने का  इसी सोसल मीडिया पर उनको एक बड़ा डर रहता है, अपने साथ कुछ गलत ना हो जाने का कई बार हकर्स फ़ेसबुक पर, या ईमेल से लड़कियों के फोटो और जानकारी चुराकर असलीलता के साथ पेश करते हैं जिससे उनको अपना चेहरा और जानकारी छूपानी पड़ती है ऐसा लडको के साथ क्यों नही होता है?
मुझे लगता है क़ि आधुनिक बाजारवाद भी पूरी तरह से स्त्री विरोधी है आखिर क्यों सेविंग क्रीम तक  के एडवरटाईजमेंट में भी लड़की आती है। वो खुद नहीं आती है, उसकी कोई भी गलती नहीं है। उसे जानबूझकर लाया जाता है। बिजनेसमैन को पता होता है कि लोगों को क्या पसंद है। उनको यह भी पता है क़ि जिसका एड लड़की करेगी, वो ज्यादा बिकेगा। अर्थात लाभ के लिए नहीं अपनी तो किसी और की स्त्री के शरीर को बेंचने के लिए सामने रखना हकीकत यह है कि हम सबलोग यही पसंद करते हैं इसमे हमें भी मजा आता है यही कारण है कि सनी लियोन जैसे लोगों को भारत में बड़े बड़े एड मिल रहे हैं। उनको तो कुछ नहीं लगता है, लेकिन उसका असर क्या पड़ता है? असर यह पड़ता है क़ि हर चीज को बेचने में स्त्री के शरीर को बेचने की कोशिश की जाती है। वो किसी का भी वो लेकिन है तो स्त्री ही। जब किसी गाड़ी, L.I.C., फाइनेंस या सफलता वाला एड आता है तो क्यों लड़के को दिखाया जाता है? उसमें लड़कियों को नहीं बल्कि धोनी, किसी पुरुष मॉडल या अमिताभ बच्चन को दिखाया जाता है। इसी बाजार में स्मगलिंग, शराब के धंधे, बार, पोर्नोग्राफी, औरतों की ट्रफेकिंग (बेचना या धंधा) भी स्त्री विरोध को आगे ले जा रहा है। 
विषयांतर ना करते हुए मैं फिर से सत्यमवे जयते पर आता हूँ दीपिका ने  कहा कि मर्दो को लगता है कि वो बहुत मजबूत हैं, उनको सब आता है। उनको अकेले पैसा कमाकर घर संभालना है, सब व्यवस्था देखनी है। रोना नही है। अपने को मजबूत दिखाना है। औरतों से उपर दिखाना है। उनको अपनी अंदर की कमजोरी छुपाना नहीं चाहिए। दीपिका को मर्दों की यह बात  नही पसंद है। वहां पर आई सभी एक्ट्रेस दीपिका, परणिति चोपडा और कंगना ने यही बात कही कि मर्द की क्वालिटी यह होनी चाहिए कि वह महिलाओं को बराबरी का सम्मान दे, घर में कभी यह ना कहे क़ि घर का काम, खाना बनाना या और काम महिलाओं का काम है, मुझे यह नही छूना है। अर्थात वह अपनी भावनाओं को जबरजस्ती छुपाता ना हो, केवल खुद को मजबूत दिखाने के लिए रोता ना हो, घर का काम ना करता हो, मार-धाड़ और लड़की पर कमेन्ट ना करने वाला हो। फिर लड़कों को क्यों लगता है क़ि अगर हम फिल्मी हीरो या मर्द को दर्द नहीं होता, टाइप बन जाने से लड़कियां फ़िदा हो जाएंगी? वो क्यों नहीं अपने को वैसा ही रखते है जैसा वो नैचुरैली  हैं
जिसको भी मेरी इस बात पर मजाक करने का मन हो। मुझे पुरानी सोंच का कहने का मन हो, वो दिल्ली, मुम्बई और कानपुर जैसे शहरों से, और फ़ेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सएप जैसे नकाबों से बाहर निकलकर देखे। , यूपी, हरियाणा, महाराष्ट्र या आंध्रप्रदेश के गांवों मे जाओ फिर देखो कितनी  खेत में काम करने वाली महिलाएँ सोसल मीडिया पर हैं। उनको कितने समानता के अधिकार दिए जा चुके हैं? और कोई बाहरी नहीं उनके अपने परिवार से असमानता निकलती है, वही जाकर आगे बढ़ती जाती है। उदाहरण के लिए किसी के दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की। आखिर क्या कारण है क़ि लड़की हमेशा ही बाहर निकलने में, स्कूल जाने में, और अपने करियर या पढ़ाई को लेकर उतनी आज़ाद नहीं होती है, जितना कि लड़का। इसका मतलब हुआ कि उनकी परवरिश में कुछ कुछ ना कुछ तो भेद या अंतर तो रखा गया होगा। क्योंकि भगवान ने तो दोनो को एक जैसा ही भेजा था। आज भी बड़े से बड़े पढ़े-लिखे लोग पहला बच्चा होने के टाइम यह नहीं कहते हैं क़ि लड़की हो तो अच्छा रहेगा। जब हो जाए लड़की तब तो प्यार से रखते हैं, सब करेंगे लेकिन अगर लड़का होता तो ज्यादा ही खुशी होती है। आप इसे इतिहास और समाज के कुतर्कों के साथ जोड़कर मेरा तो मुंह 10 मिनट के लिए बंद करा सकते है, लेकिन घर जाकर सोंचेंगे तो यही सवाल आप खुद से पूंछते नजर आएंगे। यह जो असमानता का सिलसिला चला रहा है इसके जिम्मेदार केवल आप और हम या आपके पिता जी या दादा जी नही हैं। इसके जिम्मेदार हमारे हजारो साल पुराने पूर्वज, यहाँ तक क़ि जो भगवान की श्रेणी में आने वाले राजा महाराजा थे, उनके बाद नेता, कानून, फिर हम और पूरा समाज है। इससे कोई अपने को अलग नही कर सकता है। यह एक पुरुषवादी सत्ता का ही नतीजा है कि जहाँ भी महिलानों को सत्ता मे लाया गया वो खुद ही महिलाओं की दुश्मन एक तानाशाही तरीके से बन गईं। आप इंदिरा गाँधी, को छोड़ दें तो जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी और सोनया गाँधी ने आजतक कुछ नहीं किया और उल्टा कई बार महिला विरोधी पुरुषों को बचाया। प्रतिभा पाटील जब राष्ट्रपति थी, तब उन्होंने 30 उन लोगों की फांसी की सजा माफ की, जो बलात्कार के दोषी थे, और सुप्रीम कोर्ट से सजा पाकर आए थे। इसका छोटा सा एक उदाहरण आप अपने आस-पास के घरों मे देख सकते हैं, जब एक महिला घर की प्रमुख  या सीधे शब्दों मे कहें तो सीनियर या सास बन जाती है, तो वह भी महिलाओं की ही दुश्मन बन जाती है। ठीक वैसे ही फैसले लेने लगती है, जैसे पुरुषवादी व्यवस्था में होते हैं। इसपर चुप तो नहीं रहा जा सकता है, आप भी चर्चा करते रहिए, लेकिन केवल किताबों, सोसल मीडिया और टीवी की बहस तक नही, बल्कि अपने आप से भी सवाल  पूछते रहिए। तब इस 60 साल पुराने लोकतंत्र में 50% आबादी को आजादी मिलेगी, देखते हैं, ऐसा कब होगा? इंतजार है। औरतों को बराबरी चाहिए ना बराबरी से कम ना बराबरी से ज्यादा। 

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