Thursday, November 27, 2014

कानून मे भी बदलाव की जरूरत है।


 हमारा देश 21वीं शदी में आ गया है, पूरा समाज बदल रहा है लेकिन समाज को न्याय दिलाने वाले कुछ कानून ऐसे हैं, जो ब्रिटिश विरासत की देन हैं, और आज भी हमारे यहाँ मौजूद हैं हमारे देश में कम से कम 3000 ऐसे एक्ट और कानून हैं। हम कानून के छात्रों को राजनीति से अलग हटकर चलना खतरे भरा है, पता नहीं कब कौन सा कानून पास हो जाए और कब किस कानून में बदलाव हो जाए। अगर बिना जानकारी के पहले पढ़ा हुआ कानून ही पढ़कर अदालत पहुंच गए तो जज की डांट सुनकर भागना पड़ेगा 
इनमें से बहुत सारे कानून ऐसे हैं, जो अंग्रेज़ों के समय से चल रहे हैं, और उनका प्रयोग बिल्कुल खत्म हो गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘प्रधानमंत्री ने पुराने पड़ चुके कानूनों की समीक्षा के लिए समिति के गठन को मंजूरी दी है।यह नई समिति उन सभी कानूनों की समीक्षा करेगी जिन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 1998 में गठित प्रशासनिक कानूनों की समीक्षा समिति ने रद्द करने की सिफारिश की थी। पीएमओ ने कहा कि मोदी ने इस बात पर चिंता जताई है कि उस समिति ने जिन 1,382 कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की थी उनमें से सिर्फ 415 ही अभी तक समाप्त किए गए हैं।
आगे ऐसे ही कुछ कानूनों के बारे में मैं भी आपको बताना चाहूंगा। दिल्ली में किराया नियंत्रण कानून भी इसी तरह के कानूनों की श्रेणी में आता हैमैने पढ़ा कि किराएदार की शुरूआती जांच करने की सलाह तो हर राज्य की पुलिस सुरक्षा कारणों से देती है। लेकिन इसके बाद भी मकान मालिक क्यों किराएदार को हमेशा संदेह से ही देखते हैं? क्यों किराया चुकाने में एक दिन की भी देरी मकान मालिकों को बैचैन कर देती है? क्यों मकान मालिक अपने किराएदार के साथ कानूनी एग्रीमेंट करने के बावजूद भी आश्वस्त नहीं हो पाते? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए उन अनुभवों को समझना जरूरी है जो पिछले 60-70 साल में देशभर के मकान मालिकों को हुए हैं। इन्हें समझने की शुरुआत दिल्ली से ही करते हैं। इसको लेकर तहलका में एक रिपोर्ट आई थी। किराएदारों कोकिराया नियंत्रण कानूनके अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। यह कानून देश की आजादी के बाद लगभग सभी राज्यों में लागू किया गया था। उस वक्त विभाजन के कारण बड़ी सख्या में लोगों का पलायन हुआ था। ऐसे में लाखों लोग अपना बसा-बसाया घर और कारोबार छोड़कर देश में शरणार्थी बनकर पहुंचे थे। इन्हीं लोगों की मदद के लिए किराया नियंत्रण कानून बनाया गया था। हालांकि हर राज्य के किराया नियंत्रण कानून का स्वरूप अलग था लेकिन इसका मूल उद्देश्य किराएदारों के हितों की रक्षा करना था। 
दिल्ली में यह कानून 1958 में लाया गया। इसका नाम थादिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम 1958′ शुरुआती दौर में यह कानून किराएदारों का शोषण रोकने में तो सफल साबित हुआ लेकिन धीरे-धीरे मकान मालिकों के शोषण का सबसे बड़ा कारण भी बन गया। इस कानून की सबसे बड़ी कमी यह रही कि इसमें वक्त के साथ संशोधन नहीं किए गए। इसमें मुख्य संशोधन इसके लागू होने के लगभग 30 साल बाद हुआ। 1988 में इस कानून में दो मुख्य बदलाव किए गए। एक, 3500 रुपये प्रतिमाह से ज्यादा किराया चुकाने वाले किराएदारों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया और दूसरा हर तीन साल में 10 प्रतिशत तक किराया बढ़ाए जाने की व्यवस्था की गई। यह कानून मकान मालिकों को ज्यादा किराया वसूलने और किराएदार को जबरन निकालने से प्रतिबंधित करता था। विश्व के लगभग 40 देशों में किराया नियंत्रण कानून मौजूद हैं। हालांकि इनका स्वरुप सभी देशों में अलग है लेकिन इसके दुष्परिणाम लगभग सभी जगह देखे गए हैं। स्वीडन के प्रख्यात अर्थशास्त्री असर लिंडबेक ने इसीलिए किराया नियंत्रण के बारे में कहा है किकिसी शहर को बर्बाद करने के लिए बमबारी के अलावा यदि कोई दूसरा काबिल तरीका है तो वह किराये का नियंत्रण है।’ 
आखिर देश में पुराने और निष्क्रिय कानूनों को निरस्त करने में इतनी दिक्कत क्यों हो रही है? आजादी के 68 साल बाद भी हमारे देश में अंग्रेज़ों के जमाने के बहुत सारे कानून जिंदा हैं। भारतीय रेलवे के 38 पुराने नियम 2012 में खत्म किए गए। लगभग 200 ऐसे कानून हैं, जो सौ साल से मौजूद हैं, और उनमें ईस्ट इंडिया कम्पनी, ब्रिटिश ताज, गर्वनर जनरल, या प्रिवी कौंसिल का जिक्र किया गया है। जबकि ईस्ट इंडिया कम्पनी और यह सब तो अंग्रेजो के साथ 1947 में ही वापस चला गया था 1836 का बंगाल डिस्ट्रिक एक्ट और इंडिगो कॉन्ट्रेक्ट  आज भी चालू है, जो नील की खेती और नए ज़िले बनाने के लिए बनाया गया था। 
इडियन एयरक्राफ्ट एक्ट 1934, जिसमें कहा गया है कि पतंग उड़ाने के लिए भी आपको परमिट की जरूरत होती है, नहीं तो 50 रुपए का जुर्माना हो सकता है। इसमें गुब्बारे को भी एक तरह का विमान ही माना गया है। Indian Motor Vehicle Act में एक नियम है कि गाड़ी चलने के लिए आपके अच्छे और शुन्दर दातों का होना आवश्यक है। हालांकि यह अभी केवल आंध्रप्रदेश में ही मौजूद है, बाकी सब जगह इसको समाप्त कर दिया गया है अगर आप कहीं जा रहे हैं, और शहर पर टिड्डी दल का हमला हो जाए तो East Punjab Agriculture Pets Act 1949 के तहत आपको भी ड्रम बजाने के लिए बुलाया जा सकता हैं। अगर आप ड्रम बजाने नहीं गए तो 50 रुपए का जुर्माना या दो महीने की सजा हो सकती है। Indian सराय एक्ट 1887 में नियम है क़ि आप किसी भी होटल में मुफ्त में पानी और शौंचलय का प्रयोग कर सकते  हैं। अगर होटल ऐसा करने से माना करे तो उसपर 20 रुपए का जुर्माना होगा। Indian Post Office Act 1898 निजी कुरियर सेवा गैर कानूनी है, लेकिन सबके सब चिट्ठियों को दस्तावेज बताकर काम चला रहे हैं। आजादी की लड़ाई के समय जब क्रांतिकारी जेलों में गाँधी टोपी पहनने लगे तो अंग्रेज़ों ने टोपी को जेल में बैन कर दिया था जो नियम  आज भी चालू है। Licensing and Controlling Places of Amusement (Other than Cinema)1960  के तहत एक डांस फ्लोर पर 10 से अधिक जोड़े डांस नहीं कर सकते हैं। पुलिस एक्ट 1861 के तहत आज भी शाही खानदानो के सामने पुलिस को टोपी उतार कर सलाम करना पड़ेगा, मजे की बात है कि शाही शब्द पर बहुत पहले ही रोक लगा दी गई थी। The Indian Treasurer Trove Act 1878 के तहत अगर आप 10 रुपए भी कही पर पड़े हुए पा जाएँ और इसकी खबर ना दें तो आपको जेल हो सकती है। Indian Majority Act 1875 के तहत आपको 18 साल की उम्र के बाद बच्चा गोद लेने कि छूट है, लेकिन शादी करने की उम्र 21 वर्ष है। अर्थात आप शादी करके तो बाप 21 वर्ष की उम्र के बाद बन सकते हैं, लेकिन बच्‍चा गोद लेनेकर 18 साल की उम्र मे ही अगर बच्चा गोद लेने के कानून पर भी बहुत ध्यान नए नियम देखे जाएँ तो इसपर संदेह खड़ा होता है और कई सवाल उठाए जा सकते हैं इससे बड़ा विरोधाभाष क्या होगा? यहाँ तक की आई पी सी की धारा 497 (विवाहेतर सम्बंध) में कहा गया है कि कोई भी विवाहित व्यक्ति अगर किसी विवाहित महिला से सम्बंध रखता है, तो महिला दोषी नहीं है, पुरुष को सजा होगी. इसी जगह शर्त है कि अगर वो पुरुष अविवाहित स्त्री से सम्बंध रखता है तो उस स्त्री के साथ साथ वो भी दोष मुक्त आखिर ऐसा क्यों? पुरुष ट वही है केवल सामने वाली महिला का विवाह होने ना होने से परिस्थिति में क्या बदल जाता है क़ि वो दोषी ही नहीं होगा?
पुराने और प्रचलन में नहीं रहे कानूनों को खत्म करने की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार संसद में नया बिल लाने की तैयारी कर रही है। इस बीच विधि आयोग ने 72 पुराने कानूनों को खत्म करने की सिफारिश की है। आयोग का कहना है कि यह तत्काल सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि कानूनी ढांचा बदलते वक्त की चुनौतियों के हिसाब से हो। आयोग ने 1836 में अस्तित्व में आए बंगाल जिला एक्ट को खत्म करने की सिफारिश की है। इसके अलावा जिन कानूनों को समाप्त करने को आयोग ने कहा है, वे ज्यादातर 1838 से 1898 के बीच बनाए गए हैं। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को सौंपी अंतरिम रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि वह 261 अन्य कानूनों का भी अध्ययन कर रही है। आयोग यह जानने की कोशिश कर रही है कि ये कानून मौजूदा वक्त में अपनी प्रासंगिकता रखते हैं या नहीं। आयोग का कहना है कि वह अपना काम किश्तों में करेगा और सरकार को आवश्यक कार्रवाई के लिए अपनी रिपोर्ट वक्त पर सौंपती रहेगी। आयोग से रिपोर्ट मिलने के बाद कानून मंत्री ने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अप्रचलित और बहुत पुराने कानूनों को खत्म करना चाहती है। पहले से ही 32 ऐसे कानूनों को खत्म करने संबंधी एक बिल संसद में लंबित है। संसद के अगले सत्र में सरकार पुराने कानूनों को खत्म करने संबंधी बिल का मुद्दा उठाएगी। इसमें कैबिनेट सचिव अजित सेठ, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और प्रधानमंत्री ने कुछ सराहनीय कदम उठाए हैं
इतिहास में संविधान के निर्माताओं ने जब अनुच्छेद 47 की रचना की तो महात्मा गाँधी के विचार मद्य निषेध (There will be no space for Alcoholism in India) राज्य का बहुत ख्याल रखा। लेकिन कभी भी काला बाजारी और राजस्व की कमी का बहाना देखर इसे लागू नहीं किया गया। इसके लिए मोरारजी देसाई ने कुछ असफल कोशिशें जरूर की थी। विधि आयोग तो इसपर कई बार अपनी रिपोर्टें पेश करता रहा है, लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कुछ भी संभव नहीं हो सका। यही कारण है कि आज Super Sonic युग में भी बैल गाड़ी के जमाने के कानूनों से न्याय देने का प्रयास किया जाता है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि अंग्रेज़ों के बनाए हुए सारे के सारे कानून बेकार हैं। जैसे आईपीसी (Indian Penal Code)1860, सी.आर.पी.सी. (Civil Producer Code) जो पहले बनाया गया और 1973 में कुछ बदलाव ही किए गए, CPC जैसे कई कानून अंग्रेज़ों ने ही बनाए थे, लेकिन आज भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इसके उपर मैने सोली सोराब का एक लेख इंडीयन् एक्सप्रेस में पढ़ा था। कुछ ऐसे कानून प्रक्रियाएं हैं जो कि आज की तारीख से मेल नहीं खाते। ये कानून कामकाज को सुगम बनाने के बजाय इसके रास्ते की अड़चन बनते हैं और ऐसी असमंजस की स्थिति पैदा करते हैं जिनसे बचा जा सकता है।
(इस लेख के लिए मैने इंडिया टुडे में दमयंती दत्ता की रिपोर्ट "कठघरे में कानून", सोली सोराब का इंडीयन् एक्सप्रेस में एक लेख, और कुछ कानून की किताबों को पढ़ा साथ-साथ गूगल से भी बहुत मदद मिली)

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