Friday, November 14, 2014

महाराष्ट्र में लोकतंत्र पर उठते प्रश्न

 एक बड़े अवकाश फिर काम में व्यस्तता के कारण मैं राजनीतिक बहस से दूर चला गया था। लेकिन ऐसे राजनैतिक धरातल पर वापसी करना उतना आसान नहीं था, जितना पहले होता था। एक तरफ मोदी लहर महाराष्ट्र और हरियाणा में जीत दिला चुकी है, दूसरी तरफ कुछ नए परिवर्तन भी देखने को मिले हैं। अगर मैं मोदीजी के पक्ष में ही सब लिख डालूंगा, तो एक ऐसे दौर में जहाँ मीडिया मोदी के गुणगान करने में लगा है,(उनकी झाड़ू अभियान, छोटे से भाषण को पूरा दिन दिखता है, और असली काले धन या मंहगाई के मुद्दों पर चुप रहता है,) तब यह कलम के साथ नाइंसाफी होगी। अगर मैं भी सब मोदी की तारीफ ही कर दूं। यह लोकतंत्र है, बोलने की आजादी का प्रयोग तो होना ही चाहिए। 
महाराष्ट की जनता इसबार फिर से ठगी गई है। उसने 15 साल के कांग्रेस-एनसीपी के भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट दिया था, लेकिन नई देवेन्द्र फड़नवीस सरकार भी बेहद कमजोर बनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को नेचुरली करप्ट पार्टी कहा। यह भी कहा कि कांग्रेसएनसीपी का गोत्र एक ही है। जल्दी ही कोई हरियाणा से कहेगा कि एक गोत्र वाले की शादी अनैतिक थी। अब जाकर नैतिक हुई है जब अलग गोत्र वाली बीजेपी और एन सी पी का गंधर्व विवाह हुआ है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने क्या क्या नहीं कहा। जनता को लगा होगा कि एन सी पी कांग्रेस से मुक्ति का वक्त गया है। पर क्या उस जनता को यह नहीं दिखा था कि चौबीस घंटे पहले तक इन पार्टियों में रहने वाले नेता बीजेपी के टिकट पर लड़ने गए हैं। शायद बीजेपी गंगा है जिसमें डुबकी लगाते ही सब पवित्र हो जाते होंगे। अब उस जनता ने इन उम्मीदवारों को वोट तो दिया ही। गुजरात विधानसभा में भी बीजेपी के टिकट से कई कांग्रेसी विधायक हैं। संसद में भी हैं।
महाराष्ट्र विधान सभा में आज लोकतंत्र का माखौल और हमारे संविधान का मज़ाक बना दिया गया। बिना किसी वोटिंग, बिना संख्या साबित किये ही बीजेपी को ध्वनि मत से 'विश्वास' मत दे दिया गया। आपको याद होगा किस तरह अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन पुरानी केंद्र सरकार सिर्फ़ 'एक' वोट से गिर गयी थी। आज महाराष्ट्र की भी ठीक 13 दिन पुरानी सरकार ने संविधान की मान-मर्यादाओं को तार-तार कर दिया।
महाराष्ट्र विधान सभा में हुआ छल कानूनन अवैध होने के साथ साथ, असंवैधानिक और अनैतिक भी है।
१। अवैध : संसदीय लोकतंत्र के न्यूनतम मानकों का उल्लंघन हुआ। यदि एक भी विधायक मांग करे तो हर हाल में मतों की गणना होनी चाहिए, जिसका आज पालन नहीं किया गया।
२। असंवैधानिक : सरकार में किये अपवित्र गठबंधन और साथ ही बीजेपी के अन्दर में हुए किसी तरह के दरार को छिपाने का असंवैधानिक प्रयास।
३। अनैतिक : विश्वास मत का मकसद होता है सरकार को एक नैतिक आधार और जनता का विश्वास देना। लेकिन आज जो हुआ वो लोगों का सरकार में विश्वास का दर्पण नहीं बन सकता।
लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियाँ उड़ा दी गयी हैं। क्या महाराष्ट्र का ये महा-धोखा आने वाले भविष्य की झाँकी है? क्या ये छल-कपट आने वाले समय की बानगी है जहाँ संवैधानिक कायदों को ताक पर रखना एक आम बात होगी?
नई पंरपरा कोई नहीं बना रहा। बीजेपी एक दिन कांग्रेस का भी समर्थन ले सकती है। एन सी पी और कांग्रेस में क्या फर्क है। वैसे हर दल एक दूसरे के सहयोगी रहे हैं और हो सकते हैं। इसी 19 अक्तूबर को प्रकाश जावड़ेकर का छपा एक बयान मिला जिसमें उन्होंने कहा कि हमने कांग्रेस और एन सी पी  के भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ा है। रूडी ने साफ कर दिया था कि हम कांग्रेस के अलावा किसी से भी समर्थन ले सकते हैं। यानी कांग्रेस अनैतिक है और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नैतिक। रूडी की इस लाइन से अब एकमात्र भ्रष्ट पार्टी कांग्रेस बच गई है। बाकी सब उसके साथ आकर या दूर से हाथ हिलाकर ईमानदार हो चुके हैं।
एन सी पी जैसी पार्टी कभी हारे। इनकी जीत ही भारतीय राजनीति की नैतिकता की जीत है। शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की राजनीतिक समझ से जलने वाले उन्हें क्या क्या कहे जा रहे हैं। कम से कम इतनी ईमानदारी तो होनी चाहिए कि चुनाव हार कर भी ये जीत गए हैं तो बधाई दे दें। जीत सिर्फ मतगणना के दिन नहीं होती। विश्वासमत के दिन भी होती है। एन सी पी जीत गई है। वो अब सत्तारूढ़ दल है। जो भी इन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाए उसके खिलाफ जांच होनी चाहिए कि कहीं आरोप लगाने वाला कांग्रेसी तो नहीं है। क्योंकि अनैतिक और भ्रष्ट तो सिर्फ कांग्रेस है।
बस एक फर्क है। दिल्ली में कांग्रेस ने बिना समर्थन मांगे ख़ुद से लिखकर दे दिया था। महाराष्ट्र में पवार ने बिना लिखे प्रेस कांफ्रेंस कर दे दिया। माडल वही है बस रंग अलग है। दिल्ल में जो बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को कहा और आम आदमी पार्टी उसका लोड लेकर नैतिकता के मोह में फंस गई। रही बात एन सी पी के खिलाफ आरोपों की तो वो बस आरोप थे। सरकार बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती। सिर्फ विपक्ष को बदले की भावना से आरोप लगाने की छूट होती है महाराष्ट्र की जनता को सरकार मिल गई। उसकी नैतिकता की खोज समाप्त होती है ज़रूर बीजेपी ने भावुकतावश कह दिया कि एन सी पी भ्रष्ट पार्टी है। एन सी पी की उदारता देखिये। वो आहत भी हुई और ही माफी मांगने के लिए कहा। ये होता है लोकतंत्र। जो इसे समझौते का खेल समझते हैं उन्हें इतिहास की हर घटनाओं को बैक डेट से सही घोषित करने में लग जाना चाहिए। क्योंकि नैतिकता और क्रांतिकारी पड़ोसी के घर पैदा हों तो अच्छा। क्योंकि यह नैतिकता राजनीति में सिर्फ दिखाने के लिए टीवी की बहस तक ही सीमित है।

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