Tuesday, December 23, 2014

किसान दिवस (भाग-2)

किसान हर देश की प्रगति में विशेष सहायक होते हैं। एक किसान ही है जिसके बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश मे राष्ट्रपिता गांधी जी ने भी किसानों को ही देश का सरताज माना था। लेकिन देश की आजादी के बाद ऐसे नेता कम ही देखने में आए जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप में काम किया। ऐसे नेताओं में सबसे अग़्रणी थे, देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आज उन्ही की याद में हमारे देश में किसान दिवस मनाया जाता है। किसान ही वो है, जो हमारे देश को जीवित रखता है। लेकिन आज यह विडंबना ही है कि सबसे ज्यादा किसान ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्यादा तर किसान खेती छोड़ कर बाहर शहरों की ओर जा रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहता है। 
एक नेता ऐसा भी था ,,जो जितनी सम्पति लेकर राजनीती मै आया था ,उतनी लेकर अमर हुआ ! जबकि वह परधानमंत्री भी रहा ! उनकी ईमानदारी से काम करने की वजा से इंद्रा Gandhi जेल भी गयी ! जबकि उन दिनों मै इंद्रा जी के आगे सब झुकते थे ,एसे निडर इंसान थे वो ! आज भी किसान उनके कामो को याद क्र क्र के रोता है.!
चौधरी चरण सिंह (जन्म: 23 दिसम्बर, 1902 मेरठ - मृत्यु- 29 मई, 1987) भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री थे। चरण सिंह किसानों की आवाज़ बुलन्द करने वाले प्रखर नेता माने जाते थे। चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक रहा। यह समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस (ओ) के सहयोग से देश के प्रधानमंत्री बने। इन्हें 'काँग्रेस इं' और सी. पी. आई. ने बाहर से समर्थन दिया, लेकिन वे इनकी सरकार में सम्मिलित नहीं हुए। इसके अतिरिक्त चौधरी चरण सिंह भारत के गृहमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 1 जुलाई 1978), उपप्रधानमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979) और दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।
इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त, 1979 को बिना बताए समर्थन वापस लिए जाने की घोषणा कर दी. अब यह प्रश्न नहीं था कि चौधरी साहब किसी भी प्रकार से विश्वास मत प्राप्त कर लेंगे. वह जानते थे कि विश्वास मत प्राप्त करना असम्भव था. यहाँ पर यह बताना प्रासंगिक होगा कि इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए शर्त लगाई थी. उसके अनुसार जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो मुक़दमें क़ायम किए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए. लेकिन चौधरी साहब इसके लिए तैयार नहीं हुए थे.
इस प्रकार की गलत सौदेबाज़ी करना चरण सिंह को क़बूल नहीं था. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवाना बर्दाश्त कर लिया. वह जानते थे कि उन्होंने जिस ईमानदार नेता और सिद्धान्तवादी व्यक्ति की छवि बना रखी है, वह सदैव के लिए खण्डित हो जाएगी. अत: संसद का एक बार भी सामना किए बिना चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया.
स्वतंत्रता आंदोलन के रास्ते राजनीति में घुसने वाले चौधरी चरण सिंह 1950 के दशक में पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के विरोध के कारण जाने जाते थे. उन्होंने किसानों की लड़ाई को बड़ी मज़बूती के साथ रखा और यही वजह है कि उन्हें किसान नेता के तौर पर जाना जाता है. 1967 तक कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली थी.
चौधरी चरण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान उर्वरकों और डीजलों के दामों में कमी की और कृषि यंत्रों पर उत्पाद शुल्क घटाया। काम के बदले उन्होंने अनाज योजना को लागू किया। विलासिता की सामग्री पर चौधरी चरण सिंह ने भारी कर लगाए।
वह उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार के लिए अग्रणी पुरुष माने जाते थे। 1939 में कृषकों के क़र्ज मुक्ति विधेयक को पारित कराने में चरण सिंह की निर्णायक भूमिका थी। 1960 में उन्होंने भूमि हदबंदी क़ानून को लागू कराने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगर वे प्रधानमंत्री का एक सत्र भी पूरा करते तो इसमें संदेह नहीं कि आज किसानों की स्थिति कुछ और बयां करती। 29 मई 1987 को जनमानस का यह नेता इस दुनिया को छोड़कर चला गया। चौधरी चरण सिंह तो इस दुनिया को छोड़कर चले गए लेकिन लोगों के जेहन में उनका राजनीतिक प्रभाव पहले ही की तरह बरकरार है।
जब तक दुखी किसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा...
देश और किसानो को एसे नेताओं की जरुरत है !
जय हिन्द जय भारत
 

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