Thursday, December 11, 2014

धर्म परिवर्तन या घर वापसी


आगरा में 60 मुस्लिम परिवारों के धर्म परिवर्तन के मामले में नया मोड़ गया है। आरएसएस और बजरंग दल ने सोमवार को 60 मुस्लिम परिवारों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया था, लेकिन जिन लोगों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया गया था उन्होंने ही पैसों का लालच देकर फोटो खिंचवाने का आरोप लगाया है। इन लोगों का कहना है कि जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर वे नाराज हैं। वहीं, इस मामले में बजरंग दल का कहना है कि उनके ऊपर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने किसी को किसी भी तरह का लालच नहीं दिया था। इस मामले में बढ़ते विवाद के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हो गई है। मैजिस्ट्रेट ने लोगों के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो परिवार कुछ घंटो पहले तक खुशी खुशी हवन में शामिल हुए और एकदम से पलट गए। कुछ तो बदला ही होगा। बदला हो या ना बदला हो लेकिन मामला पूरा उल्टा पड गया। उन लोगों ने पैसे देकर धर्म परिवर्तन का आरोप लगा डाला। ईसाई को 2 लाख और मुस्लिम को 5 लाख रुपए दिए जा रहे थे, हिन्दू बनने के लिए। और यह इतनी बड़ी रकम है, जिससे एक गरीब आदमी की गरीबी कुछ हद तक तो कम हो ही सकती है। गरीब आदमी पैसे के आगे अपने भगवान और विचारधारा को भूलना मुनासिब समझेगा। आप यह कह सकते हैं क़ि ऐसा ही तब भी हो सकता है जब हिन्दू लोग मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे थे। लेकिन ऐसे कोई प्रमाण तब की परिस्थितियों के बारे में तो नहीं हैं। आज जो हुआ तो तब से बिल्कुल अलग है। आज की राजनीति में यह साम्प्रदायिकता फैलाने के इरादे से उन संगठनों द्वारा किया गया है, जो 2 साल पहले से मोदी सरकार आने पर हिन्दू राष्ट्र की बात करते थे। आज वही हिन्दुत्ववादी संगठन इसमे ज्यादा सक्रिय हैं, जो संघ परिवार से जुड़े हुए हैं। 
मैं इस विषय के तीन पक्ष रखना चाहूंगा। पहला कि इसका एक नैतिक पक्ष है जो कानूनी रूप से जायज है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार हमें धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। फिर तो उन सबको आजादी है, जो अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में जाना चाहते हैं। दूसरी बात मेरी इस प्रश्न से जुड़ी हुई है कि क्या इन सबको जबरजस्ती, बहला-फुसलाकर या किसी धमकी के आधार पर ऐसा करने को मजबूर किया गया। और इस मामले में आपको तीनों चीजें देखने को मिल रही हैं। उनको पैसे का लालच दिया गया। उनको राशन कार्ड देने की बात की गई। आखिर राशन कार्ड देने वाले ये संगठन या हिन्दुत्व के ठेकेदार होते कौन हैं? और जो लोग इससे नहीं माने उनको कहा गया कि आने वाले दिनों में यहाँ पर दंगे होंगे, जो हिन्दू हैं वही रहेगे और सब बांग्लादेशी घोषित करके भगा दिये जाएंगे? यह एक धमकी ही नहीं साम्प्रदायिकता की चेतावनी थी जो समाज में घृणा फैलाएगी। अब मैं अपनी सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण बात स्वेच्छा से किए गए धर्म परिवर्तन पर आना चाहता हूँ। बहुत सारे धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से होते हैं। बाबा साहब अम्बेडकर भी तो बौद्ध धर्म में हजारों महार जाति के लोगों को लेकर चले गए थे। इसके बाद तो बौध्द धर्म में महाराष्ट्र के दलितों के जाने का सिलसिला ही शुरु हो गया। जिसे कांशीराम सहित बहुत लोगों ने पूरे देश में चलाया। आखिर ये लोग तो अपने सामाजिक पिछड़ेपन के  कारण हिन्दू धर्म छोड़कर चले गए थे। इसी तरह से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग ईसाई बने, उत्तरभारत और दक्षिण भारत में मुस्लिम बने। जिसका एक मात्र कारण था, उनका हिन्दू धर्म में होने वाला अपमान। इस अपमान के स्वरूप उसे क्या मिला? इसी जाति  प्रथा से  मजबूर होकर लोग नास्तिक भी हुए। आपको मैं कम से कम 10 रिसर्च के नतीजे बता रहा हूँ जो कहते हैं क़ि भारत में होने वाले 80% से भी अधिक धर्म परिवर्तन केवल जाति प्रथा से पीड़ित लोग करते हैं। वो ब्राम्हणवाद से जबरजस्त डरे हुए लोग होते हैं। और खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। आखिर क्यों ये हिन्दुत्ववादी अपने ही धर्म और समाज को सुरक्षा और समानता का भरोसा दिला पाते हैं।  दरअसल संघ परिवार के इतिहास को ही देखा जाए तो यह बहुसंख्यक अधिनायकवाद पर टिका हुआ है। पहले महाराष्ट्र के कोंकण और पुणे में दलितों पर अत्याचार संघ की ही प्राथमिक साखाओं के लोगों ने किए थे। संघ में सारे के सारे पदाधिकारी और सदस्य एक ही समाज के लोग होते थे, जो महाराष्ट्र में हमेशा ही दलितों पर अत्यचार करते रहे। आप इसके भी पहले जाएँ तो वीर शिवाजी के मामले में ऐसा कुछ हदतक देख सकते हैं। इसके बाद शाहूजी महाराज के समय भी ऐसी बाते हुई थी। जिनका विस्तृत जिक्र नहीं किया जा सकता है। भीमराव अम्बेडकर को भी पढ़ते समय आप इनकी हकीकत समझ पाएंगे। जब आजादी के बाद यह बहुसंख्यक वाद डॉक्टर अम्बेडकर के संवैधानिक प्रयासों से कम हुआ तो जिंन्ना के बहाने मुस्लिमों को शिकार बनाया जाने लगा। जैसे जैसे ईसाई धर्म यहाँ बढ़ा उनका यह अत्याचार बढ़ता ही गया। इस बहुसंख्यक अधिनायकवाद की जड़ें अभी तक कुछ राज्यों में छिपी हुई थी, उसीका नतीजा है कि अभी भी दलित दूसरे धर्मों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ हिन्दुत्ववादी इसे लालच और जबरजस्ती में कराया गया धर्म परिवर्तन बोलते हैं। मैं मानता हूँ कि कुछ पैसे, मूर्तिपूजा, विचारधारा, भगवान और समानता की बाते करके उनका धर्म परिवर्तन हुआ हो, लेकिन वो अल्पसंख्यक होकर जबरजस्ती तो नहीं कर पाएंगे। रही बात लालच देने की तो मैं इसे पूरी तरह से गलत मानता हूँ। लेकिन हिन्दुत्ववादियों को सोंचना चाहिए कि उनके ही हिन्दू भाई यहाँ से क्यों जा रहे हैं? वो सुरक्षित क्यों नहीं महसूस कर रहे हैं?
अब मैं इस मुद्दे के मूल पर लौटकर केन्द्र राज्य दोनो सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार मानता हूँ। आखिर क्यों अखिलेश सरकार ऐसे लोगों को रोकने में नाकाम है? आखिर क्यों मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से प्रवीण तोगडिया जैसे लोगो के हाथ खुल गए हैं? आखिर क्यों योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह और साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भाजपा सांसद अपने असली रूप को दिखाने लगे हैं? आखिर क्यों साक्षी महाराज जैसे लोग संघ के पुराने विचार (नाथूराम ने गांधीजी को मारकर राष्ट्रहित का काम किया था) को दोहराने लगे हैं? इसके कुछ जवाब हम इस तरह से भी निकल सकते हैं कि जब जनता से जुड़े मुद्दों को हल करने में सरकार असफल रहती है तो घटिया राजनीतिक हिसाब से ऐसे ही जनता की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर ध्यान ले जाती है।  यह जरूरी है की सरकार इन असामाजिक तत्वो से कठोरता से पेश आये। चाहे धरम परिवर्तन कराने वाले किसी भी धरम के क्यों हो सिर्फ मीडिया संसद मे बहस करने से कुछ नही होगा। आम आदमी को अपने अधिकार भारत के नागरिक होने के नाते मिलनी चाहिये इसके लिये धरम परिवर्तन कराना गलत है जिसके दुष्परिणाम हो रहे है और भयानक होंगे। सविधान पर बहस करने वाले कितने नेता सविधान की शपथ के प्रति ईमानदार है और अपना काम देश जनता के हित मे करते है ?

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