मैने
पीके फिल्म का
नंगा वाला पोस्टर
देखकर आमिर को
पहली बार कोसा
था। लेकिन जब
फिल्म देखी तो
कुछ और ही
निकला। मैं कोई
फिल्म समीक्षक तो
नहीं हूँ, लेकिन
एक दर्शक के
तौर पर कुछ
बातें जरूर कह
सकता हूँ। कॉमेडी,
स्टोरी और म्यूजिक के
आधार पर फिल्म
काफी अच्छी थी।
एक ऐसा संदेश
हमें दे जाती
है,
हम लोगों
ने दुनिया को
उलझा लिया है
इसे सुलझाने के
लिए हमें फिर
से एलियन बनकर
ही धरती को
देखना होगा। जैसे
देखने के लिए
पीके किसी अनजान
ग्रह से धरती
पर आता है।
वो धरती को
गोला कहता है।
अंतरिक्ष में तैरते
अनगिनत गोलों में
से एक छोटा
सा गोला। एक
छोटा सा गोला
ताकि मज़हब और
मुल्क की सीमाओं
के बीच घिरे
हम और आप
अपने नज़रिये का
विस्तार कर सकें।
हम एक बार
बाहर से धरती
को देख सकें
कि हमने इसके
बाशिंदों को किस
कदर बांट दिया
है। विधू विनोद
चोपड़ा और राजकुमार हिरानी
की फिल्म पी
के अपने रीलिज
होने के समय
के संदर्भ के
कारण भी एक
रोचक और साहसिक
फिल्म बन जाती
है।
जो
समाज को अपने
उपर सोंचने पर
मजबूर करता है।
कुछ लोग इसे
हिन्दुत्व के खिलाफ
मान रहे हैं,
लेकिन उसमें हिन्दू,
मुस्लिम, शिख, ईसाई
सबपर सवाल खड़े
किए गए। भगवान
का विरोध नहीं
हुआ बल्कि यह
बताया कि एक
भोला भाला इंसान
इस धरती पर
आता है, और
कैसे भगवान के
नाम पर उसको
ठगा जाता है।
वो तो उस
भागवान को मानने
की बात करता
है, जिसने हमे
बनाया है। जिसको
हमने बनाया है
उसका विरोध।
इसमें
क्या बुरा हुआ?
आमिर ने सही
किया जो पहले
से किसी को
स्टोरी नहीं बताई
नहीं तो लोग
उसकी फिल्म के
पोस्टर जलाते, मुकदमा
करते। अच्छा हुआ
जो इस सबसे
बचकर एक अच्छी
फिल्म दिखाई। वैसे
आमिर की फिल्मों में
हीरोइन के लिए
बहुत कम काम
बचता है। लेकिन
इसमें बहुत अच्छा
रहा कि अनुष्का शर्मा
ने अपनी पहली
फिल्म रब ने
बना दी जोड़ी
के बाद पहली
बार अच्छी एक्टिंग की।
फिल्म में भोजपुरी भाषा
का होना मेरे
लिए कुछ एक्स्ट्रा एडवांटेज था।
उसमें केवल बार
बार हिलती हुई
कार को दिखाना
थोड़ा सा ओवर
एक्टिंग लगा। एक
बार होता तो
ठीक है, अगर
उसे कपड़े और
पैसे ही चुराते
हुए दिखाना था
तो दिल्ली में
चोरी के लिए
कहाँ जगह की
कमी है। लालकिला, जामा
मस्जिद, यमुना के
किनारे, मेट्रो में
कहीं पर भी।
यह हरकत बार
बार दिखाते समय
थोड़ा सा बचकाना
लगा। इसके बाद
जो नंगे पोस्टर
के माध्यम से
जाति-धर्म और
बंटे हुए समाज
पर हमला हुआ,
वो काफी मजेदार
था। मेरे हिसाब
से तो सबको
एक बार फिर
से नंगा होकर
देखने की जरूरत
है कि उनके
कौन सा ठप्पा
लगाकर भगवान ने
भेजा था। यह
फिल्म उनसबको जरूर
देखनी चाहिए जो
आजकल बहुत धर्म
परिवर्तन, घर वापसी
और हिन्दुत्व के
ठेकेदार बने हुए
हैं। ताकि सिर्फ
जूता ना रह
जाए (अगर फिल्म
से सीखकर यह
दंगे बंद होंगे
तो ही हम
बचेगे नहीं तो
एक दिन सिर्फ
जूता ही हाथ
में रह जाएगा।
जैसे पाकिस्तान के
एक बच्चे के
जूते को बहुत
शेयर किया जा
रहा है ट्विटर
पर)।.............सही कहा
रवीश
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