बात
2011 की है,
मैं मुम्बई
आया था,
कानून की
पढ़ाई करने
के लिए
संघर्ष करते
हुए। मैं
प्रवेश परीक्षा
में कानपुर
से पास
और मुम्बई
से फेल
हुआ था।
एडमिशन भी
कानपुर में
हुआ था।
लेकिन जॉब
मुम्बई में
मिल गई
तो यही
जम गया।
लेकिन मेरे
यहाँ होने
में एक
इंसान का
बहुत बड़ा
हाथ है।
मेरे एकाउनट्स
के गुरु
कीर्ति रजनीकांत
सोनेजी का।
जब मैं
ओफ़िसे में
आया था,
तो मेरे
6 सीनियर थे,
सबने एम
काम और
बीकाम तो
किया ही
था। कीर्ति
भाई सबके
सीनियर और
सीए सर
के असिस्टेंट
थे। सब
सीनियर मुम्बई
के ही
थे, तो
सब मेरे
उपर रौब
झाड़ते थे,
हमेशा काम
बताते थे।
लेकिन कीर्ति
भाई ने
मेरी बहुत
मदद की।
काम करने
में ही
नहीं। उसनें
मुझे मुम्बई
जैसे शहर
में रहना
और बोलना
भी सिखाया।
मैं इतना
परफेक्ट माइंड
नहीं था,
उसने मुझे
सीरियस इंसान
बनाया। मेरे
जैसे आर्ट्स
के स्टूडेंड
को ऐसा
एकाउन्ट्स सिखाया कि बड़े बड़े
बीकाम, एमकॉम
वाले जूनियर
हो गए।
खुद जॉब
छोड़कर गए
तो सीए
सर का
असिस्टेंट बना दिया। किसी को
जबतक बताता
नहीं हूँ
तो किसी
को
विश्वास ही नहीं होता है
क़ि मैं
आर्ट्स का
स्टूडेंट हूँ।
वो मुझे
बिल्कुल छोटे
भाई की
तरह मानते
थे। साथ
में खाना
खिलाते थे।
अगर उनको
देर हुई
तो मुझे
देर नहीं
होने देते
थे। अगर
कभी बीमार
हो जाता
था, तो
डॉक्टर के
पास जबरजस्ती
भेजते थे।
कई बार
मेरे लिए
बॉस से
भी लड
जाते थे।
याद है
मुझे कि
एक बार
दिवाली के
व्यस्त समय
में मुझे
ओफ़िस के
दूसरे (शॉप
या ऑपरेटर)
डिपार्टमेन्ट में भेजने की बात
होने लगी
थी, तो
बॉस से
झगड़ा करके
मुझे अपने
साथ ही
रखा था।
अगर तब
ऐसा ना
किया होता
तो मैं
आकाउनट्स का
ए बी
सी भी
नहीं जान
पाता। हमारी
उम्र में
कम से
कम 14-15 साल
का फर्क
था, फिर
भी एक
अच्छी दोस्ती
थी। हर
बड़े त्योहार
में घर
आने का
निमंत्रण, मेरे जन्मदिन पर भी
अपने घर
बुलाकर सेलिब्रेट
करना। बोलते
क़ि तू
अकेला है,
परिवार दूर
है इसलिए।
फिर एक
समय आया
जब उनके
दिन खराब
आ गए,
फिर भी
वो हर
बात मुझे
शेयर करते
थे। हमारे
ओफ़िस में
कुछ लोगों
के पैसे
के चक्कर
में उनके
मतभेद हुए
थे, लेकिन
मैने अपने
पैसे कभी
नहीं मांगे
उनसे। जब
यहाँ से
जॉब छोड़
दिया, तो
कई महीने
तक संपर्क
नहीं रहा
हमारा, लेकिन
एक दिन
फोन आया
और हमने
बात क़ि
तब तक
उनका अच्छा
समय फिर
आ चुका
था। उन्होने
मेरे पास
सबके पैसे
भेजे, और
मैने खुद
सबको पैसे
वापस किए
जिस जिस
से कीर्ति
भाई ने
लिए थे।
किसी के
भी एक
पैसे की
बेईमानी नहीं
की। अन्यथा
लोग उनके
बारे में
बहुत कुछ
बोलने लगे
थे। इसबार
भी गाँव
में था,
दशहरा और
दिवाली को
फोन आया
था। न्यू
ईयर में
मेरे जन्म
दिन की
शुभकामना का
संदेश नहीं
आया। तो
मैने दूसरे
दिन फोन
किया तो
बंद था।
वाट्सएप, फ़ेसबुक,
जीमेल और
फोन पर
भी कई
मैसेज कर
डाले लेकिन
कोई उत्तर
नहीं मिला।
फिर थोड़ा
व्यस्त हो
गया तो
ध्यान नहीं
रहा लेकिन
4-5 दिन पहले
ओफ़िस के
एक आदमीं
ने बताया
कि वो
नहीं रहे।
मैने उनके
भाई को
फ़ेसबुक पर
मैसेज किया,
और नेट
से पता
करके उनके
ओफ़िस में
फोन किया
तो पता
चला कि
दिसंबर में
ही दिल
का दौरा
पड़ने से
उनकी मृत्यु
हो गई
थी। मैं
उस दिन
ओफ़िस से
जल्दी चला
गया। बहुत
रोया। पता
भी नहीं
चला, उनको
एक श्रद्धांजलि
भी नहीं
दे पाया।
3 महीने बाद
व्हाट्स और
फ़ेसबुक पर
उनको श्रद्धांजलि
का स्टेटस
लगाने के
अलावा मेरे
हाथ में
कुछ भी
नहीं बचा
था। उनकी
पत्नी और
7 साल की
बेटी फिलहाल
तो अहमदाबाद
में उनके
घर में
हैं। उनके
परिवार का
क्या हाल
हुआ होगा?
उनकी यादें
आते ही
अभी भी
आंखे भीग
जाती हैं।
लेकिन अब
हमारे हाथ
में क्या
है? सिवाय
उनकी यादों
के, और
कभी कभी
चिटठी ना
कोई संदेश
जैसे गाने
सुनने के।
बड़ा दुख
होता है,
उनकी बेटी
जिया के
भविष्य को
लेकर, उसको
बहुत प्यार
करते थे।
कभी भी
उनको भुलाना
मेरे लिए
आसान नहीं
होगा। मुम्बई
में मेरी
पहचान के
जितने भी
लोग हैं,
उनमें सबसे
प्रिय थे
मेरे लिए।
कहीं भी
रहूगा, तो
उनके अहसान
हमेशा ही
मेरे उपर
रहेगे। कीर्ति भाई आप सच में एक अच्छे इंसान थे। आपने मुझे अपने जिंदगी जीना सिखाया। आप जो भी करते थे, दिल से। चाहे काम हो, परिवार की जिम्मेदारी, अच्छाई-बुराई, प्यार-लड़ाई सब दिल से करते थे। वही मैने आपसे सीखा. उम्मीद है कि आप जहाँ भी होंगे ऐसे ही खुश दिल रहेगे, आपके और आपके परिवार के लिए मैं प्रार्थना करूंगा. मुम्बई आने पर उनसे मिलता भी रहूँगा।
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