Saturday, August 29, 2015

जनगणना के धार्मिक आँकड़ों का खेल

मुझे एक बात नहीं समझ में आती है, क़ि केंद्र सरकार बिहार चुनावों की निकटता को देखते हुए 2011 की जनगणना के जातिगत आँकड़े तो नहीं सामने लाती है, लेकिन धार्मिक आँकड़े ज़रूर लेकर जाती है। अब इन आँकड़ों का जबर्जस्त दुरुपयोग होगा। सोसल मीडिया पर, व्हाट्सएप, फेसबुक पर खूब अफवाहें फैलाई जाएँगी। दरअसल बहुसंख्यकवाद और सांप्रदायिकता की शुरुआत यहीं से शुरू होती है। आप इसकी आहट सबसे पहले एक बड़े दक्षिणपंथी संगठन के बड़े नेताओं और सत्ताधारी पार्टी बेजीपी के कुछ नेताओं के भाषणों में देख सकते हैं। हद तो तब हो गई जब शिवसेना की आगरा इकाई ने उन हिंदू परिवारों को 2-2 लाख रुपए देने की घोषणा कर दी, जिनके 5 या उससे अधिक बच्चे हैं।  अब मैं इन आँकड़ों को एक न्यूज चैनल की वेबसाइट के अनुसार आपको बताना चाहता हूँ।  
हमारे देश की 1.21 अरब की आबादी में हिंदू 96.63 करोड़ (79.8%), मुस्लिम 17.22 करोड़ (14.2%), ईसाई 2.78 करोड़ (2.3%), सिख 2.08 करोड़ (1.7%), बौद्ध 0.7%, जैन 0.4% हैं। आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि आबादी की रफ्तार में  हिंदू 0.7% घटे हैं , मुस्लिम 08% बढ़े हैं, ईसाई में कोई बदलाव नहीं और सिख 0.2% घटे हैं। पहला सवाल तो इसकी टाइमिंग को लेकर ही उठा लिया गया है। बिहार में इस साल के अंत में चुनाव है। बिहार की आबादी में हिन्दू 82.69 प्रतिशत  और मुस्लिम 16.87% हैं। अगर 2001 से 2011 के बीच बढ़ोतरी देखें तो हिंदू 24.61%, मुस्लिम 27.95%, जैन 17.58% और बौद्ध 41.25% हैं। हिन्दू मुस्लिम में जो 3 प्रतिशत का अंतर है, वैसे तो भाजपा इस बात को चुनावी मुद्दा बनाने से इनकार कर रही है, लेकिन उन अफवाहों के चलते हिन्दू समाज में इस बढ़ोतरी पर शंका बीजेपी को फायदा पंहुचा सकती है। शायद यही बजह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन आंकड़ों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे। 
अगर 2001 से 2011 के बीच हिन्दू 16.76 प्रतिशत बढ़े तो मुस्लिम 29.52 प्रतिशत की दर से बढ़े। अगर हम इनकी तुलना पिछले 10 सालों से करें तो बढ़ोतरी दर 19.92 प्रतिशत और 29.52 प्रतिशत थी। जानकारों के अनुसार दोनों समुदायों में बढ़ोतरी की दर कम हो रही है। सेक्स रेश्यो में मुस्लिम समुदाय में ज्यादा सुधार देखा गया है, एक हजार पुरुषों पर 951 महिलाएं हैं। वहीं हिन्दुओं में 1000 पुरुषों पर 939 महिलाएं हैं, पिछले 2001 के 931 से कुछ सुधार। एक और आंकड़े चौकाने वाले हैं कि अशिक्षित और गरीब मुसलमानों में बाल मृत्यु दर शिक्षित हिन्दुओं के बाल मृत्यु दर से बहुत कम हैजिससे मुसलमानों की जनसंख्या में थोड़ी बढ़ोतरी दिखती है
अब वह आंकड़े जो सरकारी प्रचार के झूठ का पर्दाफाश करते हैं वह है मुसलमानों की जनसंख्या दर हिन्दुओं से बहुत अधिक होना
1981-91 के बीच मुसलमानों की जनसंख्या दर 33 % थी जबकि हिन्दुओं की 22•8% जबकि 1991-2001 के बीच में मुसलमानों की जनसंख्या दर 29•52 % थी जबकि हिन्दुओं की 19•92 % , स्पष्ट है कि इस बीच मुसलमानों में जनसंख्या वृद्धि का अनुपात 3•48 % घटा जबकि हिन्दुओं में 2•88% , अर्थात जनसंख्या अनुपात में मुसलमानों की जनसंख्या हिन्दूओं की अपेक्षा •66% अधिक कम हुई , अब आगे देखिए
2011 के आंकड़ों में मुसलमानों की जनसंख्या दर 24•6% दिखाया गया है जबकि हिन्दुओं की 16•76% , अब गणना करें तो 2001 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की जनसंख्या दर में 4•92% की गिरावट आई है जबकि हिन्दुओं में 3•16% ।अर्थात मुसलमानों में जनसंख्या दर में गिरावट हिन्दूओं की अपेक्षा 1•76 % अधिक है  मीडिया के लोग और कुछ तथाकथित नेताओं ने इन आँकड़ों की ग़लत तरीके से व्याख्या शुरू कर दी है। अब बात यह है क़ि सभी आँकड़ों पर तो कुछ बात नहीं हुई लेकिन जब भी बढ़ने का आँकड़ा आता है तो धर्म प्रमुख कारण क्यों बन जाता है? असल में यह आँकड़े एक अवयव की तरह हैं, जो एक सार्वभौमिक सत्य हैं। इसमें वो नेता भी बोल रहे हैं जिनको डेमोग्रेफी की कोई समझ नहीं है। मुझे किसी की कही हुई एक बात याद आती है क़ि तथ्य जो होता है वो एक मछली की तरह है, उसको अलग अलग तरह से परोसा जा सकता है, उसको एक तरह से ही देखना ग़लत होगा। डेमोग्रेफी का नियम कहता है क़ि आँकड़ों को गैर-वर्गीकृत करने की ज़रूरत होती है। उसको टोटल में होमोजिनाइज नहीं करना चाहिए। क्योंकि एनएफएचएस का भी जो डाटा है उसके अनुसार जो सबसे निचला(मुसलमानों) तबका है, जहाँ अशिक्षा, बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ हैं वहाँ बृद्धि में भारी कमी देखने को मिली है। क्योंकि प्रतिशत का गणित काफ़ी भटकाऊ तरीके का होता है इसलिए आपको बताता हूँ कि सच तो यह भी है पिछले दशक में लगभग 14 करोड़ हिंदू और 3 करोड़ मुसलमान बढ़े हैं।  आँकड़ों को धर्म के आधार पर तो तब देखा जाता है, जब आपके पास जानकारी की कमी होती है, तब आप परंपरागत बातों पर लौटकर देखते हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट, एनएसएच का डाटा यह कहता है क़ि भारत की अधिकतम मुस्लिम आबादी ग़रीब है। क्योंकि वह ग़रीब है इसलिए वो उस वाले पायदान पर होगी जिसमें अशिक्षा होगी। ऐसे में जनसंख्या बढ़ना लाजमी है। धार्मिक संख्या निकालने के लिए कारणों का पता लगाने के लिए अलग तरह का मैथेड़ निकालना पड़ता है क्योंकि उसमें यह नहीं किया जाता है क़ि आपकी आबादी क्यों बढ़ीअब मैं आपको एक और बात बता दूं कि बहू विवाह को लेकर भारत में पहली और आखरी बार 1971 में एक स्टडी हुई थी, जिसके आँकड़े 1975 में दर्ज हैं। इसके आँकड़ों के अनुसार सबसे ज़्यादा बहू विवाह की प्रथा ट्राइबल्स(आदिवासियों) में, फिर बौद्ध, फिर हिंदू तब कहीं जाकर मुसलमानों में थी। इसका एक सरकारी सर्वे भी 2005 में नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे 2005 जिससे यह पता चला क़ि मुसलमानों में शादियों का प्रतिशत काफ़ी गिरा है। 

यह तो रही बात आँकड़ों की लेकिन अब मैं आपका इसपर फिर से एक बार राजनीतिक ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। बिहार के चुनाव बीजेपी ही नहीं प्रधानमंत्री के लिए भी अहम हैं। लोकसभा चुनावों में जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर लोगों ने एनडीए को जीत दिलाई थी। दिल्ली में हार के बाद बिहार के नतीजे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और कामकाज पर मुहर के तौर पर देखे जा रहे हैं। एनडीए ने  लोकसभा चुनावों में 40 में से 31 सीटें जीती थीं। 
बिहार के चार जिले किशनगंज,अररिया,पुरनिया और कटिहार में 40 फीसदी मुस्लिम हैं, लेकिन इनका असर 80 सीटों पर पर है। किशनगंज में 68%, कटिहार में 43%,  अररिया में 41% और पूर्णिया में 37%, इन आंकड़ों को दल अपने-अपने तरह से प्रयोग करेंगे। एआईएमआईएम के ओवैसी की बिहार के किशनगंज में  हुई रैली में खासी भीड़ जुटी थी। उनके आने से जेडीयू-आरजेडी- कांग्रेस के एम-वाई के चुनावी गणित पर असर पड़ सकता है। इन आंकड़ों का राजनीतिक असर शायद ज्यादा अहम है। सामाजिक पहलू यह सामने रहा है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों में जनसंख्या वृद्धि की दर कम हुई है।
तो इन आंकड़ों की कई परतें है जो धीरे-धीरे सामने आएंगी। इनसे हम अपने समुदायों की स्थिति में कितना सुधार हम कर पा रहे हैं यह अहम रहेगा।


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