औरंगजेब के इतिहास पर सियासत, भेदभाव तथा सत्य
पिछले दिनों दिल्ली में एक सड़क का नाम औरंगजेब रोड से बदलकर अब्दुल कलाम कर देने पर ओवैसी के विरोध भरे ट्वीट के बाद राजनीति और इतिहासकारों में फिर से औरंगजेब के इतिहास को लेकर चर्चा होने लगी है। कुछ लोगों का कहना है क़ि क्योंकि वो मुस्लिम था इसलिए दक्षिणपंथी इतिहासकारों को पसंद नहीं था, और क्योंकि वह कट्टर धार्मिक था, इसलिए वामपंथियों को पसंद नहीं था। वैसे भी अगर हम देखें तो जितना मैने अभी तक औरंगजेब के बारे में पढ़ा या सुना था उसमें यह पता चलता रहा है क़ि औरंगजेब ने हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किए थे, सबसे अधिक मंदिरों को उसने ही तुडवाया था। लेकिन कल फेसबुक पर कुछ लोगों के विचार पढ़ने के बाद मुझे भी उसके बारे में पढ़ने और जानने का शौक चढ़ गया। इसलिए रात को ही लाइब्रेरी में जाकर एक पुस्तक ले गया और काफ़ी कुछ पढ़ा।
अच्छा जितना औरंगजेब के बारे में मैने पढ़ा उसमें तो यह पता चला क़ि उसको विदेशी कहना बिल्कुल ग़लत है। उसकी 5 पीढ़ियाँ भारत में रह चुकी थी, वो यहीं पर पला-बढ़ा था, इसलिए उसको हिन्दुस्तानी तो कहा ही जा सकता है। दूसरी बात यह कि मैं भी मानता हूँ क़ि वो धार्मिक रूप से काफ़ी कट्टर था, लेकिन अपने धर्म के प्रति, वो दूसरे धर्मों या हिंदू धर्म के प्रति उतना विरोधी नहीं था, जितना उसे बताया गया है। अगर ऐसा नहीं है तो वो अपनी सग़ी बहन की शादी वाराणसी के अपने संस्कृत के शिक्षक ब्रम्हान से कैसे कर देता? वो कोई बड़ा लुटेरा नही था जो यहाँ से धन लेजाकर बाहर के देशों में रख देता या आज के लोगों के जैसे स्विस बैंक में जमा करवा देता। उसने कभी भी अपने शौक में देश को बर्बाद नहीं किया क़ि इश्क में ताजमहल बनवाकर आर्थिक स्थिति खराब कर दे। वो दस लाख के सूट नहीं पहनता था वो तो राज्य के खजाने की 1 फूटी कौड़ी भी खुद पर नहीं खर्च करता था। वो क़ुरान की आयतें लिखकर और टोपी बनाकर उनको बेंचकर अपने खर्च निकालता था। यहाँ तक कि वो ऐसा बादशाह था जिसने राज्य को कंगाली से बचाने के खातिर अपने ऐय्यास पिता को क़ैद कर लिया था, और शराबी भाइयों को मरवा दिया था। हो सकता है कि इस तथ्य को अलग तरीके से पेश किया जाए। एक समय था जब उसको पता चला क़ि राज्य की मज़ारों में बलात्कार और जुर्म जैसी घटनाएँ हो रही हैं तो उसने कितनी मज़ारें तुड्वा दी थी। एक बार बनारस के ही एक ब्रम्हान की बेटी की इज़्ज़त बचाने की बात की गई तो अपने ही मुस्लिम सेनापति को दो हाथियों में पैर बँधवाकर बीच से चीरवा दिया था। मुग़लों के इतिहास में सबसे अधिक 368 हिन्दू मनसबदार ( वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ) औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में नियुक्त किए थे। उसने भगवत गीता का अरबी, फ़ारसी और उर्दू में अनुवाद कराकर अरब में भेजा और सनातन धर्म व संस्कृति को वहाँ तक पहुँचाया। सतीप्रथा पर सबसे पहले रोंक औरंगजेब ने ही अपने कार्यकाल में लगवाई थी। इसका अर्थ यह भी नहीं है क़ि औरंगजेब पूरी तरह से दूध के धुले थे, वो काफ़ी हद तक कठोर थे। लेकिन दोनो ही धर्मों पर। हिंदुओं पर जजिया कर लगवाया था, उसके बदले अलग अलग तरह के लगभग 50 कर माफ़ भी कर दिए थे। यह कर मुस्लिमों पर नहीं लगा था क्योंकि ज़कात के रूप में एक कर लगा हुआ था। जो जजिया कर से अधिक दर का था। अगर ज़कात को ही हिंदुओं पर अनिवार्य कर देता या मुस्लिमों पर कोई कर ना होता तो उसे ग़लत कहा जाता। अब मैं आता हूँ सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मंदिरों के तोड़े जाने पर। काफ़ी जगह पर मैने पढ़ा है कि औरंगजेब ने कई मंदिर बनवाए भी थे। चित्रकूट का संकट मोचन मंदिर औरंगज़ेब ने बनवाया था और चित्रकूट में तमाम मंदिरों जो सभी औरंगज़ेब की दी हुई ज़मीन पर बने हैं। उज्जैन में महाकाल मंदिर भी उसने ही बनवाया था। यह भी सत्य है क़ि उसने मंदिर टुडवाये भी थे। लेकिन जैसा क़ि मैं आपको बता चुका हूँ क़ि औरंगजेब काफ़ी कठोर बादशाह था। इसलिए उसके फ़ैसलों के बीच में जो भी आता था वो उसको टुड्वा देता था, उसमें मंदिर और मस्जिद दोनो ही थे। लेकिन संख्या के आधार पर मंदिर ज़्यादा टूटे होंगे। वो एक कठोर शासक था इसलिए जीत के लिए कई तरह के साम, दाम, दंड और भेद की राजनीति पर भी चलता होगा। उसमें कई ग़लत काम भी हुए होंगे। जब वर्तमान में लोकतांत्रिक सरकारें(राजस्थान में वसुंधरा राजे) मंदिर टुड्वा देती हैं। और कई सरकारों के कार्य जनता के हित में नहीं होते हैं। तो के बादशाह से शत-प्रतिशत सही होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
उड़ीसा के पूर्व राज्यपाल और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रो। बी। एन पाण्डेय का एक लेख मैने कल पढ़ा। कुछ लोगों ने औरंगजेब के इतिहास के लिए उनकी एक किताब ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ को कई बार कोर्ट भी किया। उनके लेख में यह लिखा है क़ि जब वो इलाहाबाद के चेयरमैन(1948-1953) थे, तो उनके सामने एक मामला दाखिल खारिज को लेकर आया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। उन्होने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। उनको आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। उनको यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले उन्होने डा। सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। उनके दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।
इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर उनके सामने पेश की, उससे वो खुद आश्चर्य में पड़ गए। डाक्टर सप्रू की सलाह पर उन्होने भारत के विभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब उनके सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नकलें उनको प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि। से 1091 हि।, अर्थात 1659 से 1685 ई। के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा।
औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और पनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोडने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।
पांडे साहब के लेख का लिंक नीचे दिया गया है, अधिक जानकारी के लिए पढ़ सकते हैं.
पांडे साहब के लेख का लिंक नीचे दिया गया है, अधिक जानकारी के लिए पढ़ सकते हैं.
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इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ा कि ।।।।
तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।
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