Sunday, August 30, 2015

क्या आरक्षण पर सार्थक बहस हो रही है?

पिछले एक सप्ताह से भारतीय राजनीति में हार्दिक पटेल नाम का एक युवा निकलकर आया है, जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक की गलियों में अपना दमखम दिखा रहा है। हार्दिक पटेल 22 साल के एक युवा हैं, जो पाटीदार(पटेल) समाज के लिए पिछड़ा वर्ग में आरक्षण की माँग को लेकर लड़ रहे हैं। उनकी माँग है क़ि गुजरात का पटेल समाज खेती में कुछ नहीं कर पा रहा है, उसकी दशा खराब हो रही है इसलिए उनको सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए। बात अगर पटेल समाज की की जाए, तो ये मूलतः उत्तर प्रदेश के हैं, जो गुजरात में बस गए थे। ये क्षत्रिय समाज से आते हैं, गुजरात में इनके दो भाग है, लेहुआ (लव के वंशज) और कड़ेवा (कुश के वंशज)। उत्तर प्रदेश और बिहार में कुर्मी समाज और आंध्रप्रदेश में नायडू इसी समाज के हैं। हालाँकि उत्तरप्रदेश में इनको पिछड़ावर्ग में आरक्षण प्राप्त है। भारत की राजनीति में अपनी शुरुआत से ही आरक्षण एक बड़ी जटिल समस्या रही है। गुजरात के ही महात्मा गाँधी से लेकर वो सरदार बल्लभ भाई पटेल तक आरक्षण के विरोध में थे, जिनको हार्दिक पटेल अपना हीरो बताते हैं। उनके (हार्दिक पटेल के) दूसरे हीरो बाला साहेब ठाकरे भी इसके विरोधी ही थे। भाजपा भी हमेशा इसके विरोध में रही है, लेकिन अब वो इसमे खुद को न्यूट्रल  बताते हैं। अब तो भाजपा में इतना दम नहीं है जो यह भी कह सके क़ि आरक्षण ख़त्म होना चाहिए। लेकिन भाजपा के पर्दे के पीछे काम करने वाला संघ अभी भी आरक्षण का विरोधी है। इसका प्रमुख कारण है संघ पूर्णतया बड़ी जातियों का संगठन है। इसमें कभी भी बड़े नेता पिछड़े समाज के नहीं रहे हैं। आजकल भी जो व्हाट्सएप पर दलीलें देकर आरक्षण ख़त्म करने की माँग की जाती है, वो पूरी तरह से तथ्यों से अलग है। आरक्षण को आर्थिक आधार पर होने की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन कौन मूर्खों को समझाए क़ि आरक्षण की परिभाषा ही अलग है, इसको ग़रीबी उन्मूलन से कैसे जोड़ा जा सकता है? ग़रीबी उन्मूलन के लिए सैकड़ों योजनाएँ सरकार चला रही है। आरक्षण पिछड़े तबके के लोगों को मिलता है, जो हज़ारों साल से उस असमानता को झेल रहे हैं, जिसके ज़िम्मेदार सवर्ण हैं। आरक्षण की परिभाषा ही सामाजिक असमानता (जैसे छुआछूत, रियासाती क़ानून, जमींदारी, बंधुआ आदि) से लिखी गई है। ऐसे में जिस समाज से लोग मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पा रहे थे, उनको इसमें लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। रही बात मंडल  के बाद ओबीसी में रिज़र्वेशन की तो, लोगों को अपने तथ्य और इतिहास ठीक कर लेने चाहिए। पिछले 2-3 साल की सांप्रदायिक अफवाह से भले ही मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद को विलेन बना दिया गया हो, लेकिन वो मंडल आंदोलन के हीरो थे, यही कारण है क़ि बाबरी कांड, आडवाणी की रथ यात्रा, फिर उसपर गोली चलवाने के बाद भी उत्तरप्रदेश और बिहार में ये दोनों नेता खूब पसंद किए गए। हमारी पीढ़ी को अपने अपने पिताजी से पूछने की ज़रूरत है, ज़्यादा नहीं दो दशक पहले की ही बात है। इस आंदोलन के बाद 27% रिज़र्वेशन उन जातियों को दिया गया, जो दलित तो नहीं थी, लेकिन जिनको सुद्रों में गिनकर बहुत अपमानित किया जाता रहा। यूपी में कुछ जगह आप यादवों की स्थिति बेहतर मान लो, लेकिन क्या बिहार के सभी यादव उसी स्थिति में हैं? भूमिहारों और ठाकुरों के मजदूर हैं आज भी। तेली, नाई, कुम्हार, मल्लाह जैसी कई जातियों को इसमें शामिल किया गया। इसके बाद भी राज्य सरकारें अलग अलग आयोग बनाकर कुछ पिछड़ी जातियों के सर्वे करवाकर उनको ओबीसी में सामिल करती रही है। इसी तरह पटेल समुदाय को इंतजार करना चाहिए, राज्य सरकार द्वारा बनाए गए आयोग की रिपोर्ट का। लेकिन उनको पता है क़ि जब रिपोर्ट आएगी तो सच सबके सामने जाएगा। वह सच जो दुनियाँ पहले से जानती है। पटेल समाज हमेशा से उँची सामाजिक हैसियत वाला रहा है, जिसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहतर ही है। दलितों और पिछड़ों पर सबसे ज़्यादा अत्याचार के इतिहास को भी देखा जाए तो पटेल समाज ने ही किए हैं, यह गुजरात के आँकड़े बताते हैं।
अब अगर बात की जाए हार्दिक पटेल की तो वो खुद को एक बड़ा नेता प्रोजेक्ट करने के चक्कर में हैं। पटेल समाज गुजरात में 90 के दशक से पहले कांग्रेस और अब भाजपा का समर्थक रहा है। हार्दिक पटेल की विचारधारा संघ से मिलती है। वो प्रवीण तोगड़िया को पसंद करते हैं, बाला साहेब ठाकरे,और राज ठाकरे को पसंद करते हैं। मेरे एक पूर्व सहकर्मी भी वीरमगाम (हार्दिक पटेल का गृहक्षेत्र) के ही थे, वो बताते थे कि वीरमगाम का क्या योगदान था 2002 के दंगों में। उनके हीरो तो बाबू भाई बजरंगी भी हैं। हार्दिक पटेल के पिताजी भाजपा के स्थानीय नेता हैं। हार्दिक पटेल खुद बड़ा नेता बनना चाहते हैं, तभी उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ लोकसभा चुनावों में काम किया था। आज मैं हार्दिक पटेल को किसी का एजेंट या , बी, सी टीम ना बताते हुए उनकी असली पहचान बताना चाहता हूँ। वो एक ऐसे शहरी युवा हैं जो ग्रामीण किसानों की भावनाओं को आरक्षण के नाम पर उकसा कर आंदोलन खड़ाकर रहे हैं, और अपने लिए गुजरात में एक बड़े नेता के तौर आनन्दीबेन, केशुभाई पटेल जैसे बड़े नेताओं से अलग ज़मीं तलाश कर रहे हैं। जिसका विकल्प भाजपा भी हो सकती है या फिर पटेल समुदाय का कोई एक अलग दल। हार्दिक पटेल की आरक्षण की माँग कुछ लोगों के अनुसार जायज़ हो सकती है लेकिन वो हर भाषण में कहते हैं क़ि या तो हमें भी आरक्षण दो या फिर सबका आरक्षण ख़त्म कर दो। तब शक की सुई जाती है उनकी नियत पर? अर्थात उन आंदोलनकारियों को खुद को अभीतक नहीं पता है क़ि उनको चाहिए क्या? वो क्या कर रहे हैं? आरक्षण की माँग या किसानों की समस्याओं का आंदोलन? ऐसे में हार्दिक पटेल खुद को हीरो बना चुके हैं, जिनका राजनीतिक भविष्य संभवतः उज्ज्वल ही होगा।
अब मैं फिर से अपने आप को आरक्षण के मुद्दे पर लाना चाहता हूँ। मुझे नहीं लगता है क़ि देश में एक बार फिर से आरक्षण पर बहस की ज़रूरत है। उस समय जब 1-2 वर्षों में जाट आरक्षण के इतने बड़े आंदोलन के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने इसको नकार दिया था। कांग्रेस और भाजपा दोनो को पता था क़ि यह आरक्षण पहले दिन ही सुप्रीम कोर्ट में नकार दिया जाएगा, लेकिन कांग्रेस ने वोट बैंक के खातिर दिया, और भाजपा ने समर्थन किया, जबकि दोनो को पता था क़ि यह सुप्रीम कोर्ट के 50% वाले नियम से बाहर जा रहा है। हाँ इसमें एक प्रमुख कार्य यह हो सकता है क़ि सरकार एक परमानेंट आयोग बनाए, जो हमेशा जातियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर स्टडी करा रहे। उसमें कुछ जातियों का प्रमोशन भी किया जा सकता है, जो ओबीसी उपर उठ गईं, उनको सामान्य में डाल दें, और जो एससी से उपर हो गईं, उनको ओबीसी और जो एसटी में सुधरी उनको एस सी में दर्जा दिया जाए। तब भले संभव है क़ि किसी अन्य पिछड़ी जाति को मौका दिया जा सके। उदाहरण के तौर पर अगर यादवों और कुर्मियों की स्थिति सही हुई तो सामान्य में कर दो, उत्तरप्रदेश की एक दलित जाति(संवैधानिक कारणों से नाम नहीं लेना चाहता हूँ, लेकिन वो जाति जो पिछले वर्षों में बीएसपी सरकार के समय में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप में काफ़ी सबल हुई।) को ओबीसी में कर दो।  अगर इसी प्रक्रिया से अगर सबकी स्थिति सुधार दी जाए तो आरक्षण को ख़त्म भी किया जा सकता है। जो इसको एकदम से ख़त्म करना चाहते हैं, वो ज़रा अपने ही गाँव में शिक्षा की स्थिति पर नज़र डालें। गाँव में तीन तरह के छात्र होते हैं। सबसे निचली जातियों के जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, उन स्कूलों की स्थिति सबको पता है। दूसरी तरह के लोगों के बच्चे जो गाँव के ही निजी स्कूल में पढ़ते हैं, जो अपने अपने लिए कपड़े खरीदें, ना खरीदें लेकिन बच्चों के लिए 2500 की किताबें ज़रूर लाते हैं। तीसरी पंक्ति के लोग वो हैं जिनके पास पैसे की कमी नहीं है, और गाँव से बाहर इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं। जब तीनों 102वीं पास करेगे, तो क्या आप तीनों का कम्पटीशन करवा सकते हैं? नहीं ना? इसलिए आरक्षण एक टॉनिक है जो पिछड़े तबके के बच्चों को दिया जाता है। आरक्षण ख़त्म करने वाले कैसे भूल सकते हैं क़ि अभी भी हमारे समाज में जातीय रूप से बड़ी असमानता है, जिसको ख़त्म करने की ज़रूरत है। इसी असमानता के कारण सैकड़ों साल पहले ज़मीन बँटवारे में असमानता हुई, उसी कारण आर्थिक असमानता है। 
(विशेष अनुरोध: कृपया आरक्षण पर तार्किक और संवैधानिक बहस करें, तथ्यों की कमी होने पर उल्टे-सीधे सवाल मत करें। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये। हो सकता है कि आप मेरे मित्र और खुद सवर्ण हों, लेकिन सार्वभौमिक सत्य सत्य ही रहेगा। आप भी कोशिश करें क़ि  संविधान और बाबा साहब अंबेडकर या ड़ॉ। लोहिया को पढ़ें। मुस्किल हो तो कई पुस्तकों के नाम मैं सूझा दूँगा।)


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