Sunday, May 29, 2016

मोदी सरकार के 2 साल कानून की नजर में

मेरी क्षमता के अनुसार मैं मोदी सरकार के 2 सालों के कामकाज को एक कानून का छात्र होने के नाते समझना चाहता हूं। यह मूल्यांकन ही सरकार के सबका साथ सबका विकास के नारे को सफल बनाएगा। मोदी सरकार ने जजों की नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव के लिए एनजेएसी कानून बनाया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। अड़ंगेबाजी लगाते हुए मोदी सरकार ने अभी तक एमओपी पर फैसला नहीं लिया, जिससे हाईकोर्टों में 443 जजों की कमी हो गई है। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने भावुक होते हुए प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया कि न्यायिक व्यवस्था को बदहाली से बचाने के लिए जजों की नियुक्ति पर सरकार को जल्द फैसला करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस विषय पर बंद कमरे में बैठकर समस्या के समाधान के लिए कहा। परंतु Central Law Minister सदानंद गौड़ा ने बाद में साफ कह दिया कि विधि आयोग द्वारा 40,000 जजों की सिफारिश का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। हकीकत यह है कि ट्रिब्यूनल एवं हाईकोर्टों में स्वीकृत जजों की नियुक्ति ही, सरकार द्वारा समय पर नहीं की जा रही है। देश में 3 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। राष्ट्रीय मुकदमा नीति के विरुद्ध  सरकार द्वारा गलत मुकदमे दायर करने से अदालतों का बोझ ज्यादा बढ़ता है। अदालत में फैसले रद्द होने से सरकार की खिल्ली भी उड़ती है, जैसा कि जाट आरक्षण, कॉल ड्रॉप और उत्तराखंड के मामलों में हुआ। उत्तराखंड में मोदी सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को रद्द कर दिया। चीफ जस्टिस जोसफ ने कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्रपति और सरकार के निर्णय भी गलत हो सकते हैं।
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने संसद से आधार का कानून नहीं पारित कराया जिसे दुरुस्त करने की बजाए मोदी सरकार ने प्राइवेसी के अधिकार पर ही सवालिया निशान लगा दिया। कॉल ड्रॉप मामले में सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख सरकार द्वारा तथ्यों का सही प्रस्तुतीकरण नहीं करने से टेलीकॉम कंपनियों की लूट जारी है जिससे 100 करोड़ मोबाइल उपभोक्ताओं में खासा असंतोष है। भाजपा शासित हरियाणा तथा अन्य सरकारों द्वार सरकारी वकीलों की नियुक्ति में अनियमितताओं के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बावजूद केंद्र सरकार सुधारात्मक कदम उठाने में विफल रही। सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों के बावजूद सरकार द्वारा जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की मुक्ति के लिए गंभीर प्रयास नहीं करने से गरीब जनता में भी हताशा है।
वोडाफोन के खिलाफ 3200 करोड़ रूपए के मामले में मोदी सरकार की कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील फाइल नहीं करने का निर्णय लेकर खतरनाक मिसाल बनाई। इस मामले में अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की राय पर भी सवाल खड़े हुए जिन्हें भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने हटाने की मांग की है। जनता का पैसा नहीं लौटाने पर सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय कई वर्ष तक जेल में बंद रहे। विजय माल्या तो सरकार को ठेंगा दिखाकर विदेश भाग गए पर देश में मौजूद बाकी उद्योगपतियों के विरूद्ध 6 लाख करोड़ से अधिक सरकारी पैसे को हजम करने के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की कोशिश भी नहीं की गई।
क्रिकेट तथा बीसीसीआई को दुरुस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति बनाई थी। बीसीसीआई प्रमुख की कुर्सी पर अब भाजपा नेता अनुराग ठाकुर काबिज हो गए हैं जिन्होंने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को पूरी तरह से मानने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी खर्च से विज्ञापन का दुरुपयोग रोकने के लिए आदेश पारित किया था जिसका पालन कराने की बजाय मोदी सरकार ने राज्य सरकारों का साथ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश में परिवर्तन ही करा दिया। संसद द्वारा पारित आरटीआई कानून प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही के लिए जनता का प्रभावी हथियार है जिसके ऊपर अब सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार सिर्फ केंद्रीय सूचना आयोग के सम्मुख जनवरी 2015 तक 35 हजार से अधिक आरटीआई के मामले लंबित थे जो सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करते हैं।
चुनावों के दौरान और प्रधानमंत्री बनने पर मोदी ने घोषणा की थी कि सभी दागी सांसदों का फास्ट ट्रैक ट्रायल होगा जिससे एक वर्ष के भीतर संसद  अपराधियों से मुक्त हो सके। इस संदर्भ में सरकार के अधूरे प्रयासों को सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति नहीं मिल पाई। भाजपा अपने दागी सांसदों-विधायकों के शपथ-पत्र और सरकार (अभियोजन पक्ष) की स्वीकृति को यदि न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत करती तो फास्ट ट्रैक ट्रायल संभव हो सकता था, जो लोकतंत्र के शुद्धीकरण की दिशा में प्रभावी शुरुआत होती। इसकी बजाय पिछले दो सालों में अन्य दलों की तर्ज पर भाजपा द्वारा राज्यों के चुनाव में अपराधी उम्मीदवारों को खड़ा करने से प्रधानमंत्री मोदी के दावों पर सवाल खड़े होते हैं। मोदी सरकार के बचे हुए तीन सालों में क्या जनता दागी प्रतिनिधियों से मुक्त होने का सुख पाएगी जो उसका संवैधानिक हक भी है? इसके जवाब और क्रियान्वयन में ही मोदी सरकार का सही मूल्यांकन हो सकेगा।

Sunday, May 22, 2016

सैराट, एक आम सी ख़ास कहानी....

लगभग दो हफ्ते पहले मराठी फिल्म सैराट’ आई. अति चर्चित और लोगों के इंतेजार वाली. मुझे भी देखना था. लेकिन थिएटर जाकर तो नहीं देख पाया. लेकिन मोबाइल पर इस उद्देश्य से देखी कि जल्दी जल्दी देखकर मुझे आलोचना कर देनी है. और ऐसा ही किया अपने एक दो लोगों को चिढ़ाने के लिए उसकी आलोचना करके 50 ग़लतियाँ गिना डालीं. हो सकता है इसमें मैने वकालत के गुण का इस्तेमाल कर लिया हो. फिर उसी रात मैने दूसरी बार वो फिल्म देख केवल समझने के लिए इसबार पूरी देखी. पहली बार में काट काट के आधे घंटे में पूरी कर दी थी. फिर जो मैने इसका एनालिसिस किया उसके दो पक्ष हैं. पहला पक्ष है फिल्म को केवल मनोरंजन के नज़रिए से देखकर उसपर कुछ कह देना. वही 70-80 के दशक की कहानी. जिसमें एक हैंडसम हीरो, लेकिन बेहद ग़रीब. हीरोइन दबंग, पैसेवाल बाप की बेटी. फिर दोनों में प्यार. भागकर शादी आदि आदि......मेरी आलोचना थी कि आपका सामाजिक एनालिसिस तो ठीक रहा लेकिन फिल्म इतना सबकुछ ध्यान नहीं दे पाई. उसने कहाँ पर दिखाया क़ि प्यार अमीरी ग़रीब, जाति या सामन्तवाद का विरोध कर रही है. कहीं से भी उसमें वो सब विरोध नहीं दर्ज हो पाए जो फिल्म की स्टोरी के हिसाब से होने चाहिए थे. पहले हाफ़ में तो युवा जेनेरेशन को प्यार में पड़ने की लवस्टोरी दिखाई गई, लेकिन अंत होते होते प्यार की नकारात्मकता दिखा दी गई. जैसे उनका भागने के बाद का जो संघर्ष. जैसा आमतौर पर कच्ची उम्र की लव मैरीजेस में होता है. आपस में लड़ना-भिड़ना. यहाँ तक की सड़क पर भी उसको थप्पड़ रसीद करना. फिर अंत में क्या कर दिया. इसके बाद जो मेरा इसपर सीरियस एनालिसिस है वो अलग है. मराठी शब्द ‘सैराट’ का संक्षिप्त अर्थ हिंदी में संभव नहीं है. और यह अंत तक बिखरती प्रेम कहानी में दिख जाता है. थिएटर में लगे एक महीना नहीं हुआ है कि मराठी फिल्म ‘सैराट’ का नाम करोड़ों गैर-मराठी जुबानों पर भी है. उसने नाना पाटेकर अभिनीत कामयाब ताजा फिल्म ‘नटसम्राट’ को पीछे छोड़ा है और अब वह मराठी सिनेमा के इतिहास की सफलतम फिल्म मानी जा रही है. यह एक सपना ही था कि कोई मराठी फिल्म सिर्फ थियेटरों में पहले तीन हफ्तों में 50 करोड़ का आंकड़ा छू ले. कई कारणों से बीच में मराठी फिल्म पिछड़ी, लेकिन इधर अनेक नए, युवतर मराठी फिल्मकार उसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी के समकक्ष ही नहीं, आगे ले जाते दिखते हैं. मराठी सिनेमा की बहु-आयामीय अस्मिता का एक नया ‘टोटल स्कूल’ विकसित होता लग रहा है. यह है कि फिल्म एक दूसरे दर्जे की लेकिन पहले दर्जे पर पहुँचती हुई दिखती है. एक लिबरल विचारधारा के कारण मैं काफ़ी प्रभावित हुआ इस फिल्म से. कम से कम उसमें गावों और समाज की एक असलियत पेश की गई है. जो सच में होता है समाज में. इसके डायरेक्टर खुद एक निचली जाति से आते हैं और इसी तरह क़ी फिल्में बनाई हैं. शायद उनमें दीपांकर बनर्जी और कई कम्युनिस्ट लोगों की सोंच है. इसको जो पसंद करने वाले लोग हैं वो भी मुझे पसंद आए कि कम से कम वो लोग भी इस फिल्म के ज़रिए समाज की हक़ीकत को समझ पाए. अब उसको वो कैसे असल जिंदगी में देखेंगे? वो देखने वाली बात है. इसमें प्रमुख रूप से तीन बातें मैं कह सकता हूँ पहली बात तो यह क़ि प्यार करना है या नहीं करना है यह सबका निजी अधिकार है. फिर प्यार करके आगे क्या करना है इसपर भी निर्माता ने उन युवाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है जो फिल्मों का प्यार देख कर भागकर शादी कर लेते हैं. कम से कम इस फिल्म में बताया गया कि जो बहुत अच्छा पढ़ा लिखा और समझदार इंसान होता है वो भागता नहीं है. जो भागता है वो इतना मजबूत पैसे और पढ़ाई लिखाई से होता नहीं है इसके बाद उनको शहर जाकर संघर्ष भी करना पड़ता है. और अंत में नौबत मरने तक की आ सकती है. मतलब इतना संघर्ष झेलने का दम हो तो भागना. फिर इसमें तीसरी बात यह सामने आती है क़ि इस फिल्म को पसंद करने वाले युवा इस तरह की घटनाओं पर क्या सोचते हैं. अगर कोई दलित बड़ी जाति की लड़की से शादी करे तो? जिस तरह से पूरे भारत में दलितों को आज भी गावों के बाहर रहने को मिलता है वही फिल्म में भी है, घर के बाहर बर्तन साफ करती हुई हीरो की ग़रीब माँ. यह है दलितों की असलियत. इसपर युवा क्या सोचते हैं? क्या उनको ये सब बातें किताबों से समाज में उतारने का मन नहीं होता है? तो क्यों पढ़ी थी वो किताबें, संविधान की बातें. फिर तो फिल्म में भी ये बातें पसंद ना करो? अगर फिल्म में पसंद है तो छोड़ो समाज का डर और उन ग़रीबों के हक की लड़ाई में शामिल हो जाओ. अब मैं इसके बाद इस फिल्म के निर्माता के दिमाग़ पर बात करना चाहता हूँ उसने इस फिल्म को हिट करने के लिए एक एज ऑफ ग्रुप ढूँढा. 12-14 साल से लेकर 25-26 साल तक के लोगों का. ऐसा कहें कि अविकसित दिमाग़ (Un-matured Mind) के युवा या फिर जिन्होने खुद ऐसा कुछ झेला होगा. या फिर वो हर तरह के लोग जो दलित या पिछड़े समाज से आते हैं. ‘सैराट’ के अधिकांश अभिनेता या तो अज्ञात हैं या अल्पज्ञात. उसका कथा-स्थल सैलानियों में लोकप्रिय नहीं है. कस्बा देश-भर के सैकड़ों ऐसे कस्बों की तरह सामान्य है – न सुंदर, न कुरूप. किशोरों-युवकों के पास आपसी क्रिकेट-मैच, कुएं की तैराकी और कभी नाव की सैर के अलावा मनोरंजन के कोई साधन नहीं हैं. बस-अड्डा है लेकिन ट्रेन यहां से नहीं जाती. फिल्म के नृत्य-संगीत आकर्षक हैं लेकिन वह शेष तत्वों को दबाने की कोशिश नहीं करते. कोई डांस-आइटम-गर्ल नहीं है. ‘प्रेम’ की हसरत है, कभी-कभी वह हासिल भी हो जाता है, लेकिन ‘सेक्स’ उतना नहीं है. मराठी भाषा का बहुत ज्ञान तो नहीं है लेकिन जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ वो शुद्ध मराठी तो नहीं थी. बीच बीच में हिन्दी शब्द आना, चालू भाषा, या फिर डबल मिनिंग्स का बोल जाना, गलियों में होता प्यार, लड़की पटाने की कोशिशें हर युवा को दिखा रहा था क़ि ये फिल्म हमारे लिए ही बनाई गई है. सबको लगा कि बस मेरी ही स्टोरी है. समाज निम्न और अन्य वर्गों में यथावत बंटा हुआ है. बस्ती के बाहर दलित झोपड़पट्टी की बेहद नारकीय हालात में रह रहे हैं. चीनी मिल है जो सत्ता और राजनीति के केंद्र और हर तरह के शोषण-पेरण का प्रतीक है. गन्ने और केले के घने हरे आदमकद खेत कोई राहत या सुकून नहीं देते – एस.यू.वी. पर सवार मौत वहां भी अपने शिकारों के लिए गश्त लगाती है. कस्बे पर काबिज ताकतवर खानदानी शरीफ लोगों के पास बेशुमार दौलत, रसूख और ताबेदार कातिल माफिआएं हैं. प्रशासन और पुलिस उनके गुलाम हैं. उनसे कोई जीत नहीं सकता, उनके खिलाफ कोई सुनवाई हो नहीं सकती. न वह कुछ भूलते हैं और न कुछ मुआफ करते हैं. जब कोई दलित किशोर-युवा किसी सर्वोच्च सवर्ण लड़की से प्रेम करने लगता है और यह जात-बिरादरी-समाज की इज्जत का सवाल बन जाता है तभी उस और उसके परिवार पर भयावहतम प्रतिहिंसा बरपा की जाती है. यदि खुद अपनी बेटी उसके प्रेम में जिद्दी और कुलघातिनी है, तो उसे भी किसी कीमत पर बख्शा नहीं जा सकता. मुसलमानों की मुसलमान जानें, ऐसी कहानियां अखिल भारतीय हिंदू समाज में हम आजीवन सुनते-पढ़ते-देखते आए हैं. किसी भी बहु-संस्करण कस्बाई दैनिक को देखते रहें, ये घटनाएं मनमानी उबाऊ नियमितता से लौटती आती हैं. उनके प्रस्तार-समुच्चय (permutations-combinations) अपने पल-पल परिवर्तित खूनी कैलाइडोस्कोप में लगभग अनंत हैं. विडंबनावश, एक कलाकृति के रूप में ‘सैराट’ अब खुद उनमें शामिल हो गई है. ऐसी हर कृति की एक त्रासद नियति ऐसी भी होती है. फिर यह भी है कि ऐसी ‘सम्मान-हत्याएं’ (ऑनर किलिंग्ज़) भले ही बहुत लोकप्रिय न हों, दलित या विजाति-घृणा और हत्यारी मानसिकता चहुंओर बनी हुई हैं. यहां ध्यान रखना होगा कि विजातीय प्रेम/विवाह तथा दलित-स्वीकृति के मामले में मराठी संस्कृति तब भी कुछ पीढ़ियों से अपेक्षाकृत शायद कुछ कम असहिष्णु हुई प्रतीत होती है. राष्ट्रीय स्तर पर कई अन्य ऐसे विवाह परिवारों द्वारा स्वीकारे भी जाते रहे हैं, लेकिन मेरे निजी अनुभव कुछ और ही कहते हैं. उस राज्य के उस जिले में जहाँ अम्बड़ेकर ने आंदोलन किए थे वहाँ भी अंबेडकर या दलित की बात करो तो लोग आपको शक की नज़र से देखते हैं कि कहीं ये भी तो दलित नहीं है. दंपतियों की सर-कटी लाशों और उनके बेसहारा शिशुओं को इस सबसे कुछ तसल्ली और राहत नहीं मिलतीं. किसी कम-लागत फिल्म को ‘सैराट’ जितनी बेपनाह सानुपातिक व्यावसायिक सफलता मिले तो कुछ दुर्निवार प्रश्न खड़े होते हैं. फिल्म पसंद करने वाले अक्सर कहते दिखे कि पहला भाग बहुत अच्छा था. दूसरा कम अच्छा. इसके कारण हैं. पहला एक घंटा ‘आती क्या खंडाला’- टाइप है और वह प्रचलित homo-erotic (समलिंग–स्नेहिल) भले ही न हो, अधिकांश भारतीय फिल्मों की तरह नाच-गाने और मेल-बॉन्डिंग (पुरुष-मैत्री) पर टिका हुआ है. लेकिन उसमें शराफत से किसी एक लड़की से संबंध बना लेने की जोखिम भरी हसरत-ओ-तड़प भी है. हमारे किशोर और युवा वर्ग में नारी के लिए दीवानगी तक ललक है. यहां एक विचित्र तथ्य है कि फिल्म की नायिका वास्तविक जीवन में अब भी नाबालिग है और शायद नायक भी. यह एक घंटा self-indulgent है क्योंकि वह ऐसा कुछ भी स्थापित नहीं करता जो बीस मिनट में establish नहीं हो सकता था. वह क्लिशे (पिष्ट-पेषण) के साठ मिनट हैं और शायद निर्देशक वैसा ही वातावरण निर्मित करना चाहता था. लेकिन होश में लाने वाला पहला तमाचा नायिका के भाई के हाथ से उसके पिता के इंटर कॉलेज में मराठी कविता पढ़ाने वाले दलित शिक्षक के मुंह पर नहीं, हमारे गाल पर पड़ता है और पिछला सारा शीराजा बिखर जाता है. लेकिन यह तो होना ही था. अपना संभावित जाति-विवाह तोड़ना, माता-पिता-भाई को समाज और कस्बे में बदनाम कर भयानक जोखिम उठा अपने दलित प्रेमी के साथ पलायन, अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बीच सीमावर्ती आंध्र प्रदेश में डोसा बनाते हुए और पीने के पानी की मशीनी बोतलें भरते हुए टीन की दीवारों-छतों वाली एक गंदी बस्ती में अज्ञातवास, बीच में एक लगभग आत्मघाती गलतफहमी और अनबन और पुनर्मिलन, फिर वह दो बरस जिनमें एक बेटे, एक स्कूटी और एक छोटे से फ्लैट का जीवन में आना, और इस सब बदलाव में नायिका आर्ची का अपने माता-पिता, भाई-बहनों और घर को सहसा याद करना. बहुत अधिक पढ़ा लिखा ना होने के कारण छोटे छोटे काम करना एक रियलिटी बताता है. सर्वनाश मायके से कई भेंटें लेकर आता है. क्या दर्शकों ने सिर्फ उस सुपरिचित, लगभग टपोरी पहले घंटे को चाहा? क्या उन्हें बीच का ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’- स्पर्श अच्छा लगा? क्या उन्हें कस्बाई माफिया द्वारा नायक-नायिका को चेज़ करने और उस पलायन में पराजित होने में आनंद आया? क्या वह आंध्रप्रदेश में अपने आदर्शवादी, ‘पवित्र’ नायक-नायिका के सफल संघर्ष से खुश हुए? क्या उन्हें यह हीरो अच्छा लगा जो एक ऐंटी-हीरो, अ-नायक है? क्या उन्हें बीच में उन दोनों के मनमुटाव के सस्पेंस ने रोमांचित किया? क्या वह जानते या चाहते थे कि बाद की सुख-स्वप्न जैसी जिंदगी न चले? फिर ये दर्शक हैं कौन? इनके पैसे कैसे वसूल हुए? कितने दलित, कितने सवर्ण, किन जातियों के/ कितने किशोर/युवा/ कितने वयस्क, बुद्धिजीवी/ क्या सब सवर्णवाद के आजीवन शत्रु रहेंगे? इससे कोई सामाजिक क्रांति होगी? क्या वाकई ‘सैराट’ कोई जातीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न उठाती है? यदि वह त्रासदी को ही उनका एकमात्र हल बनाकर पेश कर रही है तो उसमें कहां मनोरंजन हो रहा है कि फिल्म सुपर-हिट है? क्या यह फिल्म दर्शकों को और मनोरंजन की उनकी अवधारणाओं को बदल रही है? क्या दर्शकों ने इसे एक समूची जिंदगी की फांक की तरह देखा, टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं? क्या इसमें कहीं कोई सैडो-मैसोकिस्ट, परपीड़क-आत्मपीड़क तत्व, किशोर-प्रेम का नेत्र-सुख, prurience और voyeurism भी सक्रिय हैं? क्या यह फिल्म सिर्फ मराठी संस्कृति में वैध फिल्म है? हिंदी में बनी तो नतीजे क्या होंगे? ‘सैराट’ की अपूर्व सफलता गले से तो उतरती है, दिमाग में अटक कर रह जाती है. युवा फिल्म ख़त्म होते होते डर जाता है. लेकिन उसका यह डर उस हज़ारों साल से चली आ रही शोषण की संस्कृति का है जिसने समाज में असमानता फैलाई हुई है. इसको शिक्षा के द्वारा पूरा किया जाना था लेकिन उस तरह की शिक्षा बच्चों को दी नहीं गई. क्योंकि अध्यापकों में तो दबदबा बड़ी जातियों का ही है. घरों में लड़कियों को ख़ासकर ऐसी आज़ादी मिली ही नहीं क़ि वो इस असमानता के खिलाफ आवाज़ उठा सकें. लेकिन जब युवाओं ने पसंद किया इस फिल्म को तो निर्माता की कम्युनिष्ट और हमारे जैसे लोगों सेकुलर सोंच एक आस लेकर बैठ गई कि ये भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा. लेकिन फिर रिटर्न में याद आया कि हिन्दी में तो ऐसी हज़ारों फिल्में बनाई गईं उनसे क्या बदला? तो लगा कि ये सब युवा फिल्म में ही इस सबको सपोर्ट कर सकते हैं असलियत में समाज के झूठे नकाब के खिलाफ बोलने की इनमें हिम्मत नहीं है. कैसे बोलेंगे अपने परिवार की पुरानी सोंच पर, कैसे बोलेंगे जो उनको पढ़ाया गया है उसके खिलाफ. और ऐसे जागरूकता का कोई कार्यक्रम सरकारें चला नहीं सकती हैं. तब लगता है कि इस सबके लिए हम जैसों को ही संघर्ष करना पड़ेगा और युवाओं को रील लाइफ में पसंद आने वाली कहानियाँ रियल लाइफ में भी सपोर्टिंग बनानी पड़ेंगी. अंत में फिल्म के निर्माता नागराज मंजुले को हार्दिक बधाई उसकी संफलता के लिए. फिल्म के लिए यूथ के मुद्दों, प्यार, पढ़ाई, बैकग्राअंड, गाँव, खेत, स्कूल, कॉलेज, ट्रैक्टर, दबंग पाटिल यह सब दिखना इस फिल्म की सफलता का कारण था. जो हर इंसान को अपनेपन का अहसास दिला रही थी. इस फिल्म की सफलता में इसके संगीत का बड़ा योगदान रहा. इसलिए अजय अतुल को भी बधाई. मेरे जैसे हिन्दी भाषी का 15 दिन तक इस फिल्म की रिंग्टोंन लगाना, दो बार फिल्म देखकर 3 घंटे ब्लॉग लिखना, मराठी भाषा को उँचाई पर ले जाता है. मतलब मराठी भाषा की बाउंड्रीस टूट रही हैं. और यह सब प्यार, संगीत और कला से ही हो सकता है. अन्यथा राज ठाकरे साहब जैसे लोग कहते कहते हार गए.........

कांग्रेस की एक आस प्रियंका गाँधी

बुरे दिन हर राजनीतिक दल के आते हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी का वर्तमान हाल देख कर यकीन करना मुश्किल है कि यह वही राजनीतिक दल है, जिसने आजादी दिलाई थी इस देश को। वही राजनीतिक दल, जिसमें हुआ करते थे गांधी, पटेल और आंबेडकर जैसे महान नेता। जिस दिन असम और केरल में कांग्रेस की दुर्गति की खबरें आर्इं, ऐसा लगा कि हमारी यह सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी दिशाहीन और नेतृत्वहीन हो गई है। टीवी पंडितों ने जब कांग्रेस प्रवक्ताओं से पूछा कि क्या अब प्रियंका गांधी ही बचा सकती हैं कांग्रेस को, तो कइयों ने कहा कि प्रियंका का स्वागत है। ऐसी बातें चुनाव नतीजों के पहले से होने लगी थीं। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में खबर थी कि प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सुझाव दिया कांग्रेस आला कमान को कि प्रियंका का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर घोषित किया जाता है तो कांग्रेस शायद जीत सकती है उत्तर प्रदेश में। ये वही प्रशांत किशोर हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि चुनावी रणनीति बनाने में इतने महान जादूगर हैं कि उनके बिना नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री न बनते और न नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते। प्रियंका पर इतना भरोसा करके शायद किशोर साहब ने यह नहीं सोचा होगा कि इस तरह का सुझाव पेश करते हुए वे स्वीकार कर रहे थे कि इतना बुरा हाल है कांग्रेस पार्टी का कि अपने राज परिवार के अलावा कुछ नहीं रहा उसके पास। चुनाव परिणाम जिस दिन आए और टीवी की चर्चाओं में प्रियंका का नाम आने लगा, तो याद आया मुझे कि इसी तरह की बातें मैंने 2014 के आम चुनाव के दौरान बनारस में भी सुनी थी। इस प्राचीन शहर के बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ मिला करते थे रोज शाम पप्पू की चाय की दुकान पर, जो अस्सी घाट के एक नुक्कड़ पर है। एक शाम वहां मैं भी थी, जब चर्चा हो रही थी इस बात को लेकर कि नरेंद्र मोदी को बनारस में कांग्रेस का कौन-सा नेता हरा सकता है। आम सहमति हुई कि यह काम सिर्फ प्रियंका कर सकती हैं, लेकिन फिर कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया, जिसके बाद किसी ने कहा, ‘लेकिन प्रियंका को तभी लाया जाएगा, जब राहुल गांधी पूरी तरह फ्लॉप साबित हो जाएं।’ इस पर भी आम सहमति हुई। तो क्या राहुल गांधी पूरी तरह फ्लॉप हो गए हैं? कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तो जरूर कह सकते हैं कि 2014 के बाद कांग्रेस ने सरकारें गंवाई हैं महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, असम और केरल में। रही बात बिहार की, तो यहां भी महागठबंधन में कांग्रेस की बहुत छोटी भूमिका रही है। चुनावों के अलावा भी राहुल गांधी ने बतौर विपक्ष के सबसे बड़े नेता, कुछ खास करके नहीं दिखाया है। लंबी छुट्टियों के बाद जब नई ऊर्जा लेकर वापस वतन आए, तो सक्रिय जरूर हुए संसद के अंदर भी और बाहर भी, लेकिन उनकी बातों में बचपना दिखता है, गंभीरता नहीं। सो, लोकसभा में जब भी दिखते हैं, उनके आसपास होते हैं ऐसे सांसद, जो उनकी तरह किसी राजनीतिक परिवार के वारिस हैं। संसद के अंदर राहुल के ये साथी हल्ला मचाने में माहिर हैं, लेकिन अक्सर जब बहस शुरू होती है, तो हार जाते हैं भारतीय जनता पार्टी के सांसदों के सामने। यही हाल राहुल का होता है बावजूद इसके कि मेरे कई पत्रकार बंधु मानते हैं कि उनका ‘सूट-बूट की सरकार’ वाला ताना ब्रह्मास्त्र साबित हुआ। संसद के बाहर जहां भी राहुलजी गए, उन्होंने अपने आपको गरीबों के मसीहा के रूप में पेश करने की कोशिश की, बिना यह देखे कि गरीबी हटाओ का नारा बहुत पुराना है। उनकी दादी ने इस नारे के बल पर 1971 का चुनाव जीता था, लेकिन उस समय के भारत और वर्तमान भारत में रात-दिन का अंतर है। उस समय गरीबी ही गरीबी थी भारत में, इस हद तक कि माना जाता था कि भारत की अधिकतर आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यतीत करती है। मैंने अपनी आंखों से देखे हैं ऐसे गांव, जहां एक भी पक्का मकान नहीं था। कच्ची बस्तियों का देश था सत्तर के दशक में भारत, जहां ऐसे लोग मिलते थे, जिन्होंने कभी पैसा नहीं देखा था। बंधुआ मजदूरी करके पेट भरा करते थे। ऐसी गरीबी आज भी बिहार और ओड़िशा में देखने को मिलती है, लेकिन अब दूर-दराज देहातों में टीवी और सेलफोन पहुंच गए हैं, सो गरीब से गरीब लोग भी जानते हैं कि गरीबी उनकी नियति नहीं है। गरीबी की बातें जब नहीं करते हैं राहुल तो सेक्युलरिज्म की बातें करते हैं, लेकिन यहां भी उनकी समझ कम दिखती है, वरना कैसे कह दिया उन्होंने अमेरिका के एक राजदूत से कि भारत को हिंदू आतंकवाद से ज्यादा खतरा है, जिहादी आतंकवाद से कम? जिहादी आतंकवाद का खतरा दुनिया के हर देश को है और भारत जैसे बुतपरस्त देश को और ज्यादा, सो अगर इसका अहसास कांग्रेस पार्टी के भावी अध्यक्ष को नहीं है, तो समस्या गंभीर है। सवाल है कि इसका इलाज क्या वास्तव में राहुल की बहन प्रियंका हैं? सच तो यह है कि कांग्रेस की राजनीति पुरानी हो गई है और यह बात उसकी चुनावी रणनीति में दिखने लगी है। विडंबना यह है कि कांग्रेस की समस्या की जड़ है उसका राजपरिवार। राजपरिवार के बिना उसका काम चलना मुश्किल है। सो, प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ का नारा खूब सुनने को मिलेगा आने वाले दिनों में।

Friday, May 20, 2016

ममता की जीत और लेफ्ट की हार के कारण

विधानसभा चुनावों का आख़िरी दौर चल रहा था कि सबको भनक लग चुकी थी कि इसबार ममता दीदी ने कांग्रेस+लेफ्ट को धूल चटा दी है. इसकी भनक शायद लेफ्ट को देर से लगी तभी तो उनको एक्ज़िट पोल्स के बाद भी खुशफ़हमी रही.  बंगाल की राजनीति से परिचित लोगों के लिए यह कयास लगाना तो मुश्किल नहीं था कि 'सब 294 सीटे एकला' लडऩे वाली ममता को कम से कम इस बार वामपंथियों और कांग्रेस के लिए मिलकर हराना भी संभव नहीं होगा, लेकिन कोई विरला ही यह सोच पाया था कि ममता को 2011 के 184 से भी बहुत ज्यादा सीटें मिल जाएंगी। 
इससे यह भी कयास लगता है कि वामपंथियों के वोट कांग्रेस के उम्मीदवारों को तो मिले, मगर कांग्रेस का वोट वामपंथियों की ओर कम ही गया। यह वोट अगर तृणमूल की ओर नहीं गया होगा तो शायद कुछ शहरी इलाकों में बीजेपी की ओर मुड़ गया होगा। लिहाजा, भगवा रंग कुछ खुलकर रंग जमाता दिखा। 
असल में उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में पिछले साल नगर निगम चुनावों में किए गए प्रयोग में कामयाबी से यह आशा उपजी थी। वहां इस दोस्ती के अच्छे नतीजे दिखे, इसीलिए इसे 'सिलीगुड़ी फार्मूला' कहा गया और विधानसभा चुनावों में वामपंथी और कांग्रेस के नेता हाथ मिलाकर चुनाव प्रचार करने लगे।
इस गणित का आधार 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वोटों के कांग्रेस और वाममोर्चा में बंटने से ममता और एक सीट पर बीजेपी को हुए फायदे को रोकने की कोशिश था। इसका लाभ अधिक उत्तर बंगाल में होने की उम्मीद थी, जो कुछ हद तक मिला भी, लेकिन दक्षिण बंगाल में इसका ज्यादा फायदा नहीं मिला। उत्तर बंगाल में 74 सीटें हैं, जबकि दक्षिण में 220 सीटें हैं।
उत्तर और दक्षिण बंगाल की तासीर कुछ अलग है। ममता के लिए उत्तर बंगाल कुछ कमजोर रहा है, लेकिन इस बार इस इलाके में भी उनकी पहुंच बढ़ी है। इस तरह वामपंथियों और कांग्रेस के मन के लड्डू मन में ही रह गए। तृणमूल नेताओं के खिलाफ शारदा चिट फंड और नारद स्टिंग ऑपरेशन के घोटालों का भी कोई खास असर नहीं हुआ। इसके विपरीत जीत के बाद पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने ऐलान किया कि जनता ने बता दिया है कि बंगाल भ्रष्टाचार मुक्त राज्य है।
इस जनादेश का राष्ट्रीय राजनीति में फर्क पड़ेगा ही। ममता के जीतने की खबरें आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली ने उन्हें बधाई दी। ममता ने भी कहा कि वह जीएसटी विधेयक पर सकारात्मक रुख अपना सकती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ हैं, इसलिए उनसे किसी तरह के तालमेल की संभावना नहीं बनती। हालांकि बीजेपी की कोशिश होगी कि ममता और जयललिता को साथ लेकर कम से कम राज्यसभा में कांग्रेस की घेराबंदी तोड़ी जाए।
बहरहाल, इन नतीजों का कांग्रेस से भी अधिक बुरा असर वाममोर्चे पर होगा और प्रकाश करात के बाद माकपा की कमान संभालने वाले सीताराम येचुरी के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। येचुरी ही कांग्रेस के साथ गठजोड़ के हिमायती रहे हैं। जो भी हो, ममता ने साबित किया कि बंगाल में अभी वह बेजोड़ हैं। बंगाल की जनता वैसे भी जल्दी-जल्दी गद्दी बदलने में यकीन नहीं करती। यह आजादी के बाद से कांग्रेस और बाद में 34 साल तक वाममोर्चा के शासन से स्पष्ट है। एक और बात यह कि कम से कम बंगाल के इन नतीजों से 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को कुछ लाभ शायद ही मिले।

Thursday, May 19, 2016

असम में आरएसएस की जीत

दिल्ली-बिहार की हार और हाल ही में उत्तराखंड के दुस्साहस से मिली चोट से बुझे चेहरों पर आज ज़बर्दस्त चमक दिखी। मोदी सरकार के दो साल का जश्न भी इसमें शामिल हो गया।
बीजेपी के लिए असम की जीत बहुत बड़ी है। आरएसएस के पुराने स्वयंसेवक और बीजेपी के कई नेताओं ने अपना पूरा जीवन उत्तर-पूर्व के राज्यों में आरएसएस और बीजेपी के संगठन को खड़ा करने में लगा दिया। वहां असम जैसे बड़े राज्य में अपनी सरकार उनका एक बड़ा सपना था, जो आखिरकार पूरा हुआ।
असम की जीत में बीजेपी के लिए कई संदेश हैं। पहला तो यह है कि स्थानीय स्तर के नेताओं को ज्यादा अहमियत देनी होगी। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का फायदा पार्टी ने महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में उठाया। वहां पीएम मोदी का चेहरा ही सामने रखा गया। मगर दिल्ली और बिहार में ये आक्रामक रणनीति चारों खाने चित हो गई। बिहार में जगह-जगह लगाया गया मोदी के साथ शाह का चेहरा स्थानीय लोगो ने ख़ारिज कर दिया। असम में बीजेपी ने ये गलती नहीं की और सर्वानंद सोनोवाल को अपना चेहरा बनाया, जिसका फायदा मिला।

दूसरा संदेश है प्रचार की शैली का। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के जैसे बयान शाह ने बिहार में दिए, असम में ऐसे बयानों से बचते रहे। वहां बीजेपी को न गाय याद आई और न ही राम मंदिर। बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ बयानबाज़ी हुई मगर ये ध्यान रखा गया कि ध्रुवीकरण न हो सके। बीजेपी बांग्लादेशी मुस्लिमों को भारतीय मुस्लिमों से अलग कर दिखाती रही। सोनोवाल और कांग्रेस से लाए गए हेमंत बिस्व सरमा बार-बार कहते रहे कि असम का सेक्यूलर मिज़ाज है और यहां ऐसे मुद्दों का जगह नहीं। प्रधानमंत्री मोदी और शाह की बिहार की तरह अंधाधुंध रैलियां करने के बजाए सोनोवाल और सरमा को प्रचार में आगे रखा गया।
गठबंधन को लेकर बीजेपी ने लचीला रुख़ अपनाया मगर सहयोगियों की मांगों के सामने अडिग रही। पार्टी को इसका फायदा मिला। बीपीएफ और एजीपी से तालमेल कर बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ बड़ा गठबंधन तैयार कर लिया। कांग्रेस ने एआईयूडीएफ से गठबंधन नहीं कर बीजेपी को एक बड़ा मौका दे दिया।

इस जीत ने बीजेपी को एक बड़ा रणनीतिकार भी दे दिया है। जम्मू-कश्मीर में पार्टी की जीत में बड़ी भूमिका निभाने वाले पार्टी महासचिव राम माधव असम जीत के एक बड़े नायक के तौर पर उभरे हैं। पीडीपी के साथ साझा एजेंडे पर कई दिनों की मशक़्क़त से उन्होंने खुद को एक मंझे हुए वार्ताकार के तौर पर स्थापित किया। मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन से बाद महबूबा के दबाव में न झुकना भी उनकी राजनीतिक चतुराई का सबूत रहा। असम जैसे कठिन राज्य में पार्टी के संगठन को मज़बूत करना, अलग-अलग गुटों को साथ लेना, प्रचार के मुद्दे और उम्मीदवार तय करने तक में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई।
अब बीजेपी के सामने चुनौती अगले साल के उत्तर प्रदेश चुनाव हैं। साथ ही उत्तराखंड भी जहां चुनाव समय से पहले भी हो सकते हैं। उत्तराखंड में पार्टी की विफल रणनीति से मात खाए पार्टी अध्यक्ष शाह के लिए असम की जीत मरहम का काम करेगी। मगर इस जीत के संदेश वो यूपी में अमल में लाते हैं या नहीं, ये देखना होगा। यूपी में अखिलेश यादव और मायावती के चेहरों के सामने बीजेपी का कोई नया चेहरा उतारकर सिर्फ मोदी-राजनाथ-शाह के चेहरों पर ही भरोसा करना भारी भी पड़ सकता है। असम की ही तरह यूपी में भी कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता अहम भूमिका में हैं। ऐसे में विकास के बजाए हिंदुत्व और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की चुनावी रणनीति शायद बीजेपी को मनमाफिक नतीजे न दे सके।
असम की जीत से मोदी सरकार को भी राहत मिलेगी। ख़ासतौर से राज्यसभा में जहां सरकार का बहुमत नहीं है। ममता बनर्जी और जयललिता की जीत बीजेपी के लिए सोने पर सुहागे जैसी है, क्योंकि इन दोनों ही पार्टियों का मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस गठबंधन से था। इस लिहाज से वह संसद में शायद ही कांग्रेस का साथ दें। 11 जून के राज्यसभा चुनाव में भी ममता और जयललिता को फायदा होगा। बीजेडी, टीएमसी और एआईएडीएमके का न्यूट्रल समूह राज्यसभा में सरकार की मुद्दों के आधार पर मदद कर सकता है। इसीलिए अब ये कयास भी लग रहा है कि मॉनसून सत्र में जीएसटी का रास्ता थोड़ा आसान हो गया है।

Tuesday, May 17, 2016

एक्जिट पोल्स 2016

ममता बनर्जी पहले से भी अधिक बड़े बहुमत से पश्चिम बंगाल की सत्ता बरकरार रखने जा रही हैं। यह अनुमान राज्य में सोमवार को समाप्त हुए मतदान के बाद 'पोल्स ऑफ एक्जिट पोल' में लगाया गया है। पोल ऑफ पोल्‍स के मुताबिक, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस राज्य की 294 सीट में से 196 पर जीत हासिल कर सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 184 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को 92 और बीजेपी को तीन सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है। पोल ऑफ पोल्स में विभिन्न एक्‍जिट पोल्‍स को जोड़ा गया है।
इंडिया टुडे के अनुमान के अनुसार,  तृणमूल कांग्रेस राज्य में 243 सीट जीत सकती है जबकि वामदल-कांग्रेस के गठबंधन को 45 सीटें मिलेंगी। बीजेपी को राज्य में तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ सकता है। एबीपी आनंदा के अनुमान के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस को 178 सीटें हासिल होंगी जबकि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को 110 सीटें मिल सकती हैं। बीजेपी को एक सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है।
चाणक्य का अनुमान भी इससे मिलता-जुलता है। इसमें ममता को 173 सीटें दी गई हैं जबकि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को 115 और बीजेपी को दो सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। सी-वोटर ने तृणमूल को 167 सीटें मिलने का अनुमान जताया है, इसमें लेफ्ट को 75, कांग्रेस को 45 और बीजेपी को चार सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। राज्‍य में लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।

Monday, May 16, 2016

कैदियों की संख्या के धार्मिक आकडे

अलग-अलग मामलों में मुस्लिमों को हिरासत में लेने के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया गया है. इसके अनुसार देश भर में हिरासत में लिए गए कुल मुस्लिमों की संख्या में एक-तिहाई की संख्या सिर्फ गुजरात से है. टॉइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार देश भर में कुल 658 मुस्लिमों को हिरासत में लिया गया है. जिसमें से 220 केवल पीएम नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात से हैं. टॉइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार गुजरात में 58.6 लाख मुस्लिम आबादी है जो राज्य की 6 करोड़ आबादी का 9.7 प्रतिशत है.
गौरतलब है कि देश में कुल 82 हजार 190 मुस्लिम अलग-अलग जेलों में बंद हैं या हिरासत में लिए गए हैं. इसमें 21 हजार 550 सजायाफ्त हैं जबकि 59 हजार 550 पर ट्रायल चल रहा है. इसमें से 658 मुस्लिम थानों के ऑकअप में कैद हैं.
इसके साथ ही गुजरात में देश की कुल 17.2 करोड़ की मुस्लिम आबादी का केवल 3.4 प्रतिशत ही बसता है. लेकिन, राज्य में देश भर में हिरासत में लिए गए कुल मुस्लिमों का प्रतिशत 36.5 है. यही हाल तमिलनाडु का भी है जहां देश की मुस्लिम आबादी का प्रतिशत तो ज्यादा नहीं है.
लेकिन, मुस्लिम आबादी की तुलना में राज्य में हिरासत में बंद मुस्लिमों की संख्या काफी अधिक है. तमिलनाडु में पूरी मुस्लिम आबादी का मात्र 2.5 प्रतिशत ही है लेकिन यहां भी हिरासत में लिए गए मुस्लिमों की संख्या काफी अधिक है. गुजरात में 846 मुस्लिमों को सजा सुनाई जा चुकी है. जबकि, यहां 1 हजार 724 मुस्लिमों पर मुकदमा चल रहा है.
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम कैदियों की संख्या सबसे ज्यादा है. यहां 5 हजार 40 सजायाफ्त मुस्लिम कैदी हैं. इसके साथ ही 17 हजार 858 पर मुकदमा चल रहा है. हालांकि, यूपी में हिरासत में लिए गए कुल मुस्लिमों की संख्या मात्र 45 है.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में भारत की कुल मुस्लिम आबादी के 22.4 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं. आश्चर्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर में केवल 35 मुस्लिम ही हिरासत में हैं. यहां यहां 153 मुस्लिमों को सजा सुनाई गई है जबकि 1 हजार 125 पर मुकदमा जारी है.

Saturday, May 14, 2016

PK Returns

2007 के आसपास मैं क्रिकेट का बहुत फ़ैन हुआ करता था. तब कॉलेज से क्लास बंक करके बिठुर के बाबा होटल के पास एक नाई की दुकान पर मैच देखता था. उसके शीशे में देखता था खड़ा रहता था, तो सचिन लेफ्टी खेलते हुए दिखता था. ठीक ठीक याद नहीं कि वहाँ था या घर पर लेकिन तब कई लोग मैच देख रहे थे एक नया नया बॉलर आया था भारतीय टीम में. पाकिस्तान के खिलाफ़. पहला ही ओवर फेंकने को मिला. अपने रन-अप पे खड़ा हुआ तो लगा कि स्पिनर है, अफ़रीदी जैसा रनअप लेता होगा. फ़ास्ट बॉलर जो गेंद फेंकने से पहले 40-45 कदम का रन-अप न ले तो बॉलर काहे का? फिर उसने गेंद फेंकनी शुरू करीं. पहली ही गेंद पर इमरान फरहत बीट.......सब अचकचा गए. ऑफ स्टम्प से थोड़ा सा बाहर या सीधे स्टम्प पे ही. एक के बाद एक. हल्की सी स्विंग मिलती हुई. बाहर की ओर. एक गेंद पिच पे पड़ के स्किड भी हुई. छः गेंदों में एक भी रन नहीं. पहला ओवर मेडेन. किसी बॉलर को और क्या चाहिए? ये था प्रवीण कुमार. मालूम चला मेरठ का है. पहलवानों के घर से आता है. अपने पहले मैच के छः महीनों के भीतर उसे सबसे तगड़ी परीक्षा के लिए भेजा जाता है. अभी तक उसने खुद को एक स्विंग बॉलर के रूप में स्थापित कर लिया था. लेकिन आगे ऑस्ट्रेलिया का टूर था. कठिन था. वहां तेज़ पिचें मिलती हैं. गेंद बल्ले पे आती है. प्रवीण कुमार में ब्रेट ली जितनी तेज़ी नहीं थी. लेकिन उनमें स्विंग थी. और एक ही जगह गेंद खिलाने की आदत. स्विंग उनका मुख्य हथियार था. लेकिन टूर पे स्विंग नहीं मिल रही थी. प्रवीण कुमार ने कहा कि उन्हें नयी गेंद मिले तो स्विंग भी वापस आ जाएगी. इंडिया फाइनल में पहुंची. पहले फाइनल में नयी गेंद थमाई गयी. पहले ही स्पेल में गिलक्रिस्ट और पोंटिंग. ऑस्ट्रेलियन बैटिंग के दो बड़े खम्भे ढहाए जा चुके थे. ऑस्ट्रेलिया जो 300 के स्कोर को टारगेट कर रहा था, मात्र 239 बना सका. इंडिया पहला फाइनल जीत गया. दो ही दिन बाद दूसरे फाइनल में फिर से गिलक्रिस्ट और पोंटिंग प्रवीण कुमार के ही हत्थे चढ़े. इस बार दो शिकार और – माइकल क्लार्क और ब्रेट ली. यानी खम्भे भी उखाड़े और छत भी गिरा दी. इंडिया दूसरा फाइनल भी जीता. दोनों ही मैचों में सितारा बन चमके सचिन. 117 और 91 का स्कोर बनाया. लेकिन प्रवीण कुमार अपनी छाप छोड़ चुका था. धोनी की आंखों में चढ़ चुका था. अब नयी गेंद का मतलब होने लगा प्रवीण कुमार. और प्रवीण कुमार का मतलब होने लगा था नयी गेंद के साथ स्विंग. प्रवीण कुमार को लोग अब जानने लगे थे. आईपीएल में उसकी हनक चलती थी. बड़े-बड़े प्लेयर्स से ऐसे ही भिड़ जाता था. खैर, फ़ास्ट बॉलर्स की ये आदत ही होती है. ऐसा न हो तो काहे का फ़ास्ट बॉलर. अग्रेशन तो मांगता है बॉस! लेकिन उसी वक़्त दिमाग में आता है कि ये कैसा अग्रेशन कि आप मैदान पर अम्पायर से ही भिड़ पड़ें? सिर्फ़ इसलिए क्यूंकि उसने आपके मन मुताबिक़ डिसीज़न नहीं दिया था. 2011 में ट्रेंट ब्रिज में खेले गए टेस्ट मैच में प्रवीण कुमार पर 20% फाइन लगा. अम्पायर से ही भिड़ पड़े. एक एलबीडब्लू के लिए. इसके बाद इसी टेस्ट सीरीज़ में प्रवीण कुमार बाहर हो जाते हैं. इंजरी. अगले ऑस्ट्रेलियन टूर के लिए भी इंजर्ड. इंजरी से बाहर आने के बाद भी उसे टीम में नहीं लिया जाता है. प्रवीण कुमार अब फ्रस्ट्रेट हो रहा था. बहुत कुछ ऐसा था जो उसकी चाहत के मुताबिक़ नहीं हो रहा था. टीम इंडिया के लिए न खेल पाना जिसमें मुख्य वजह थी.इसी बीच ओएनजीसी के लिए कॉर्पोरेट ट्रॉफी में खेलते हुए इन्कम टैक्स की ओर से खेलने वाले एक बैट्समैन को उन्होंने मैदान पर ही गालियां देनी शुरू कर दीं. यहां प्रवीण कुमार पर एक बड़ी मार पड़ी. उसे न सिर्फ सस्पेंशन मिला बल्कि साथ ही इंडिया के लिए कमबैक की एकमात्र राह भी बंद हो गयी. साथ ही मैच रेफ़री की रिपोर्ट के मुताबिक़ ‘प्रवीण कुमार प्रोफ़ेशनल क्रिकेट खेलने के लिए अनफिट थे’. ये किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी मार कही जा सकती है. इसका मतलब साफ़ था. प्रवीण कुमार अब क्रिकेट के मैदान पर नहीं दिखेगा. कब तक? जब तक वो वाला प्रवीण कुमार वापस नहीं आ जाता जिसपर धोनी ने भरोसा करके ऑस्ट्रेलिया में नयी गेंद सौंप दी थी. मेरठ की सड़कों पर एक डॉक्टर से खुलेआम हाथापाई करने वाले प्रवीण कुमार की क्रिकेट के मैदान पर कोई ज़रुरत नहीं थी. फिर अचानक से वो खबरों से गायब हो गए तो मैंने मेरठ की लोकल खबरों के लिए खूब रिसर्च किया तो बीच में पता चला कि वो अपने पूर्वजों के बड़े 6-7 सौ बीघे के फार्म हाउस पर राइफ़ल लेकर घोड़े से रईसों जैसे खेती करवाते हैं. प्रवीण कुमार की परफॉरमेंस एक साइन वेव जैसी मालूम देती है. उन्होंने शुरुआत एक श्रृंग के साथ की मगर पहुंच चले गर्त पर. हाल फिलहाल में वो रोड टु रिडेम्पशन पर हैं. उन्हें इस सिलसिले में पहली बार सहारा मिला रोहित शर्मा का. मुंबई इंडियन्स में ज़हीर खान की इंजरी के बाद प्रवीण कुमार को बुलाया गया. प्रवीण ने मुंबई से मात्र तीन मैच खेले. अभी उनके खेवनहार बने हैं सुरेश रैना. पिछले साल प्रवीण कुमार ने आईपीएल में 12 मैचों में सात विकेट लिए. ऐवरेज 47 का. इकॉनमी 9.13 की. पिछले साल वो पंजाब से खेल रहे थे. इस साल प्रवीण को गुजरात ने 50 लाख में खरीदा. कुछ तो होगा ही जो ऐसे पास्ट को अपने कन्धों पर लेकर घूम रहा प्लेयर 3.5 लाख की बेस वैल्यू से 50 लाख की कीमत में बिका. यहां पर रैना आते हैं. 2015-16 के सीज़न में सैयद मुश्ताक़ अली ट्रॉफी में रैना खेल रहे थे. वो ऑस्ट्रेलिया के अपने टूर से पहले पूरी तरह तैयार हो जाना चाहते थे. उनके साथ खेल रहे थे प्रवीण कुमार. यहीं से उन्होंने गुजरात फ्रेंचाइज़ी के लिए प्लेयर्स को पिक किया. 2016 आईपीएल में पहले सात मैचों में प्रवीण कुमार एक भी विकेट नहीं ले पाते हैं. लेकिन उन्हें रैना फिर भी खिलाते हैं. दिल्ली के खिलाफ़ क्रिस मॉरिस के कहर से जब गुजरात हारने के कगार पे थे तो मैच का सेकण्ड लास्ट ओवर रैना देते हैं प्रवीण कुमार को. जीतने के लिए दो ओवर में 18 रन चाहिए थे. मॉरिस के फ्लो को देखते हुए लग रहा था किवो एक ही ओवरमें मैच की नैया पार लगा देंगे. लेकिन प्रवीण कुमार उन्नीसवें ओवर में मात्र 4 रन देते हैं. ऐसे क्लोज़ मैचों में उन्नीसवां ओवर रिज़ल्ट के लिए सबसे ज़्यादा ख़ास होता है. प्रवीण ने उसी ओवर में मौके पर चौका मारा. स्पेल खत्म होने पर उनके फिगर थे चार ओवर में 13 रन. कलकत्ता की टीम के खिलाफ़ ओपेनिंग स्पेल में 3 ओवर में मात्र 7 रन और 2 विकेट. इसमें एक ओवर मेडन. ये तीन ओवर बहुत थे मैच के रिज़ल्ट के कांटे को कलकत्ता के खेमे से गुजरात की ओर लाने के लिए. रैना उन पर सिश्वास करते हैं और उनकी कमजोरियों और ताकत को जानते हैं. वो ये भी कहते हैं कि कुछ ऐसे दिन आएंगे जब उन्हें मार पड़ेगी और वो 40 रन खायेंगे. लेकिन कुछ दिन ऐसे भी होंगे जब वो सिर्फ 12 रन देंगे और अपनी टीम को मैच जिताएंगे. ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है. प्रेस कांफ्रेंस में उनसे किसी ने इंडियन टीम में कम-बैक के बारे में पूछा. उस सवाल के जवाब में आये रिएक्शन ने उनके प्रति मेरे पूरे नज़रिए को बदल दिया. मेरी नज़रों में एक सरफ़िरे गुंडे रुपी खिलाड़ी से वो खुद को दोबारा तराशते खिलाड़ी बन चुके थे. सवाल के जवाब में वो हल्का सा मुस्कुराते हैं, नीचे देखते हैं और फिर कहते हैं – “सही बात है.” थोड़ा और मुस्कुराते हुए वो आगे बताते हैं – “मेरा हमेशा से एक सिंपल सा फंडा रहा है. मैं अपनी परफॉरमेंस पर ध्यान देता हूं. जो हो रहा है, जो नहीं हो रहा है, इसके बारे में लोग भी बात करते हैं. किआप कम-बैक करोगे या नहीं. आपको करना चाहिए. अपना काम है मेहनत करना. ”बाकी सब के साथ ये भी हो रहा है कि प्रवीण कुमार वापस आ रहे हैं. वो इंडियन टीम में वापस आने से कितनी दूर हैं, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ये ज़रूर कहा जा सकता है कि नयी बॉल के साथ स्विंग करते हुए प्रवीण को देखने में अब फिर से मज़ा आने लगा है. अब फिर से एक सरफ़िरे की बजाय एक कंजूस गेंदबाज गेंद फेंकने लगा है. बल्लेबाजोंके दम पर मैचखेलती टी-20 टीमों को सिंगल के लिए तरसाने वाली अड्डे पर पड़ती गेंदों को देखना, एक नयी एनर्जी से भर रहा है.

उत्तराखंड में भाजपा ने मुंह की क्यों खाई?

उत्तराखंड में बीजेपी को करारा झटका लगा है। पार्टी समर्थक पूछ रहे हैं कि यही होना था तो फिर इतना सक्रिय होने की आवश्यकता क्या थी? हरीश रावत के विरुद्ध नौ विधायकों के विद्रोह के बाद राज्य सरकार अल्पमत में आ गई थी। बीजेपी ने इस स्थिति का लाभ उठाकर सरकार को गिराने और अपनी सरकार बनाने की कवायद शुरू की लेकिन अंत में मुंह के बल गिरी। बीजेपी की जगह कांग्रेस होती तो शायद वह भी इसी तरह विरोधी के घर में पड़ी फूट का फायदा उठाने की कोशिश करती। लेकिन अगर परिणाम ऐसा ही आता जैसा अभी आया है, तो उसे भी विफल राजनीति ही कहा जाता। बीजेपी के रणनीतिकार तरह-तरह के तर्क दे रहे हैं। मसलन, उनकी सदन में जितनी संख्या थी उतनी ही है, जबकि कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटी है। या फिर यह कि जब कांग्रेस के नेता धनबल का खुलेआम प्रयोग कर रहे हों तो फिर क्या किया जा सकता है! इस दलील के पक्ष में वे हरीश रावत के उस स्टिंग का उदाहरण देते हैं जिसमें वे विधायकों को खरीदने की बात कर रहे हैं। ये सारे तर्क एक हद तक सही हैं। हरीश रावत के खिलाफ स्टिंग की सीबीआई जांच चल रही है। इस जांच रिपोर्ट और उस पर आधारित कानूनी कार्रवाई की प्रतीक्षा की जाएगी। किंतु बीजेपी के लिए यह ‘फिएस्को’ (घोर असफलता) सिर्फ इसलिए नहीं है कि हरीश रावत ने बहुमत प्राप्त कर लिया, या बीजेपी केवल एक कांग्रेस विधायक का समर्थन पा सकी। यह इस मायने में है कि बीजेपी की भूमिका से देश भर में संदेश गया कि वह रावत सरकार को गिराकर कांग्रेस के विद्रोही विधायकों के समर्थन से सरकार बनाना चाहती थी। केंद्र में सत्ता संभाल रही पार्टी को हर कदम सोच-विचार कर और उसके सभी संभावित परिणामों का आकलन करके उठाना चाहिए था। बीजेपी के रणनीतिकार चाहे जो भी तर्क दें, सच यही है कि उत्तराखंड मामले में बीजेपी से बड़ी चूक हुई है। पाला बदलने वाले व्रिदोही विधायकों का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और बीजेपी उसमें उम्मीद की किरण देख रही है। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने नौ विधायकों की सदस्यता पहले रद्द कर दी, उसके बाद हाइकोर्ट ने भी अध्यक्ष के कदम को सही ठहराया। यानी वे अभी तक इनके किसी काम न आए। उनको चार्टर्ड जहाज से दिल्ली लाना, राष्ट्रपति के पास ले जाना, खास मेहमान की तरह उनकी आवभगत करना, कुछ भी किसी काम नहीं आया। क्या बीजेपी ने इस परिणाम पर विचार किया था? एक राजनीतिक दल के तौर पर बीजेपी को कांग्रेस की फूट का लाभ उठाना चाहिए था या नहीं, इस बहस को छोड़ दें। वर्तमान राजनीतिक माहौल में कोई भी पार्टी यही करती। हां, उसका तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए था जिससे लगे कि पार्टी किसी भी कीमत पर अपनी सरकार बनाना चाहती है। बीजेपी को कांग्रेस की फूट को परवान चढ़ने देना चाहिए था और उसकी भीतरी लड़ाई को बाहर से ही देखते रहना चाहिए था। देहरादून छोड़कर उसे राज्य की आम जनता के बीच जाना चाहिए था। प्रचार करना चाहिए था कि देखिए आपने जिनको निर्वाचित किया, जिन्हें सरकार चलाना है, वे आपस में लड़ रहे हैं। बीजेपी जनता को बता सकती थी कि नौ विधायकों के विद्रोह के बाद सदन का बहुमत रावत के पक्ष में नहीं है। ऐसा करके वह स्टिंग को भी एक बड़ा मुद्दा बना सकती थी। उसको रावत के इस्तीफे की मांग के साथ प्रदेश भर में आंदोलन करना चाहिए था। जनता को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा करने की रणनीति अपनानी चाहिए थी। नौ विद्रोही विधायकों ने हरीश रावत पर भ्रष्टाचार और कुशासन के जो आरोप लगाए उनको प्रचारित करना चाहिए था। इसका अलग असर होता।

ऐसा करके वह प्रदेश में रावत और कांग्रेस के विरुद्ध वातावरण बनाने में काफी हद तक सफल हो सकती थी। यह एक राजनीतिक दल के रूप में स्वस्थ, जोखिमरहित और लाभकारी भूमिका होती। इसका लाभ उसे विधानसभा चुनाव में भी मिल सकता था। नैतिकता की बात करें तो हरीश रावत को विधायकों के विद्रोह के बाद ही त्यागपत्र दे देना चाहिए था या कम से कम इसकी पेशकश करनी चाहिए थी। उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनका यह रवैया अनैतिक था। लेकिन बीजेपी ने जिस तरह सरकार गिराओ और बनाओ का शर्मनाक खेल खेला, वह भी उतना ही अनैतिक था। उसने यह नहीं सोचा कि उसकी छवि पर इसका कितना बुरा असर पड़ रहा है। कांग्रेस के चार वर्ष के शासनकाल में दो मुख्यमंत्री होने और भ्रष्टाचार-कुशासन के आरोपों के कारण जो सत्ता विरोधी रुझान वहां बन रहा था, उसको बीजेपी ने अपने रवैये से कम से कम फिलहाल तो खत्म ही कर दिया है।
इसके विपरीत हरीश रावत ने लोकतंत्र बचाओ यात्रा से सहानुभूति हासिल करने की कुशल रणनीति अपनाई। उन्होंने लगातार सभाएं कीं। लोगों से कहा कि बीजेपी ने केंद्र सरकार की ताकत से उन्हें गलत तरीके से हटाया है, फैसला आपको करना है कि आप हमारे साथ हैं या बीजेपी के साथ। यह अवसर भी बीजेपी ने ही उन्हें दिया। बीजेपी ने भी रैलियां और सभाएं कीं लेकिन उसके कदम ऐसे थे कि उसे रक्षात्मक होना पड़ा। ऐसी लड़ाई में जब आप रक्षात्मक हो जाते हैं तो फिर आपके पास विकल्प सीमित रह जाते हैं। बीजेपी ने जो भूमिका आरंभ से अपनाई, उसमें हमलावर होने का विकल्प काफी कम था। कुल मिलाकर बीजेपी की हालत ‘माया मिली न राम’ वाली हो गई।

NIA की चार्जशीट से शहीद हेमंत करकरे की शहादत पर उठते सवाल

महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व प्रमुख और शहीद हेमंत करकरे के बारे में आजकल बहुत चर्चा हो रही है. और यह चर्चा है एनआईए की नई चार्जशीट के कारण.  NIA ने जब अपना चार्जशीट पेश किया तो कइयों को लगा कि हेमंत करकरे की जांच को ही संदिग्ध बना दिया गया है। क्या ऐसा अफसर जिसने अपनी जान की परवाह तक नहीं की वो ऐसी जांच करेगा जिससे आतंकवाद की एक ऐसी थ्योरी हवा में तैरने लगेगी जिस पर कोई यकीन करने के लिए तैयार नहीं है। महाराष्ट्र में पुलिस कवर करने वाले पत्रकार बताते हैं कि हेमंत करकरे जांच पूरी कर कई दिनों तक इंतज़ार करते रहे ताकि कोई जल्दबाज़ी न हो जाए। वो फूंक फूंक कर कदम रख रहे थे ताकि उनकी जांच सवालों के घेरे में न आ जाए। हेमंत करकरे की जांच के आधार पर दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत के सदस्यों को मालेगांव धमाके में गिरफ्तार किया गया था। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य लोगों को पकड़कर जेल में डाला गया.
मालेगांव धमाके मामले में चार्जशीट पेश करते हुए NIA के महानिदेशक शरद कुमार से जब पत्रकार ने पूछा कि एनआईए पहले तो मालेगांव धमाके के आरोपियों का विरोध करती रही है। क्या अब उसने अपना स्टैंड बदल लिया है। तो उन्‍होंने कहा, 'जब तक हमारी जांच पूरी नहीं हो गई थी तब तक हमें एटीएस की जांच पर निर्भर होना पड़ा था। अब हमने जांच पूरी कर ली है। इसलिए हमने अंतिम चार्जशीट दायर कर दी है।'
समाचार एजेंसी पीटीआई ने एनआईए चीफ का यह बयान प्रकाशित किया है। हेमत करकरे की टीम ने साध्वी प्रज्ञा और पांच अन्य के ख़िलाफ़ कुछ तो सबूत जुटाये होंगे तभी तो वो इतना आगे तक गए। सात साल से साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित जेल में हैं। क्या यह कह देना काफी है कि पर्याप्त सबूत नहीं है। क्या यह नहीं बताया जाना चाहिए कि सात साल तक जेल में रखने के पीछे किस तरह सबूतों से छेड़छाड़ हुई। यह मामला तमाम कोर्ट की निगाह से भी गुज़रता रहा है। वो मोटरसाइकिल जो साध्वी प्रज्ञा के नाम पर थी और जिस पर धमाके हुए थे वो बात कहां गई। इसी आधार पर आरोप लगा। साध्वी का कहना था कि उनकी गाड़ी दो साल से सहकर्मी इस्तमाल कर रहा था इसलिए उनका रोल नहीं है। एजेंसी की दलील थी कि सहकर्मी आपके साथ काम कर रहा है। गाड़ी यहां तक आई है उसके बीच में कुछ लोग हैं जिनकी हत्या हो गई है। इन सब बातों पर विस्तार से तभी कहा जा सकता है जब चार्जशीट में क्या लिखा है आप जान पायेंगे। लेकिन क्या एनआईए ने दक्षिण पंथी संगठन अभिनव भारत को आरोप मुक्त कर दिया है। क्या एनआईए ने लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को आरोप मुक्त कर दिया है। अभी भी दस लोगों के ख़िलाफ कथित रूप से आरोप बरकरार हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के ख़िलाफ़ बारूद सप्लाई करने, बम रखने और साज़िश के आरोप अब भी हैं। 2006 और 2008 के अलग-अलग मालेगांव धमाको के आरोपियों में दो नाम एक से हैं। एनआईए मानती है कि ये दो लोग इन धमाकों में कथित रूप से सक्रिय थे। दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत के सदस्यों के नाम इस आरोप पत्र में भी हैं।
साध्वी प्रज्ञा और पांच के ख़िलाफ़ मकोका हटाया गया है क्योंकि मकोका लागू करने के सबूत नहीं मिले है। तो क्या इससे जांच की दिशा बदल गई या सिर्फ साध्वी प्रज्ञा को राहत पहुंचाई गई क्योंकि विपक्ष उनके बीजेपी और संघ के नेताओं से रिश्ते के कारण संघ को भी घसीट लेता था। पिछले साल से ही मीडिया के ज़रिये संकेत मिल रहे थे कि साध्वी प्रज्ञा को राहत मिल सकती है। सरकारी वकील अविनाश रसाल ने कहा है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि चार्जशीट दायर की जा रही है। मैं दुखी हूं और इस्तीफा दे सकता हूं। अब उन्होंने इस्तीफे से इंकार किया है और कहा है कि जिस तरह से जूनियर सरकारी वकील को आगे करके अदालत में चार्जशीट पेश की गई है उससे वो नाराज़ हैं।
अब बात यह सोचने वाली है कि एनआईए या सीबीआई जो हमेशा से ही सरकार के इशारों पर चलते रहे हैं वो किसी और सरकारी एजेंसी के एक ऐसे शहीद और महान कहे जाने वाले अधिकारी की जाँच पर सवाल कैसे उठा सकते हैं. यहाँ सवाल ही नहीं उठाए गए पूरी तरह से जाँच को खारिज कर दिया गया. 




काॅल ड्रॉप पर भी जनता की तरफ से हारी सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने कॉल ड्रॉप पर मोबाइल कंपनियों द्वारा ग्राहकों को मुआवजा देने वाले नियम को खारिज करते हुए इसे मनमाना, असंगत और गैर-पारदर्शी बताया है। यह निर्णय देश के 100 करोड़ मोबाइल ग्राहकों के लिए बुरी खबर है जिसके खिलाफ सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका अवश्य दायर करना चाहिए। दरअसल मोबाइल कंपनियां नेटवर्क पर पर्याप्त निवेश नहीं कर रहीं तथा स्पैक्ट्रम को भी ज्यादा आमदनी वाली सेवाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे कॉल ड्रॉप की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, पर उसका पूरा विवरण ग्राहकों को मिलता ही नहीं है। कानून के अनुसार मोबाइल में हुई बातचीत जैसे एसटीडी, आईएसडी एवं कॉल ड्रॉप इत्यादि का विवरण, पोस्टपेड उपभोक्ता को बिल से और प्री-पेड ग्राहक को एसएमएस से मिलना चाहिए। इस नियम का क्रियान्वयन 1 जनवरी 2016 से होना था, जिसका मोबाइल कंपनियों से पालन नहीं कराने पर ट्राई की भूमिका संदेह के घेरे में है।
दूरसंचार कंपनियों को मोबाइल सेवा के लिए दूरसंचार विभाग द्वारा लाइसेंस दिया गया है। कॉल ड्रॉप में ग्राहक की बात ही नहीं होती, इसलिए उस पल्स/मिनट का पैसा मोबाइल कंपनी नहीं वसूल सकती। कंपनियां मोबाइल बातचीत से लगभग 300 करोड़ रुपये रोज कमाती हैं, जिसमें से 41 फीसदी हिस्सा मिनट प्लान के ग्राहकों से आता है। कॉल ड्रॉप होने पर इन ग्राहकों को बेवजह पूरे मिनट का पैसा देना पड़ता है, जो लाइसेंस की शर्तों के विपरीत होने के साथ गैर-कानूनी भी है। बड़े पैमाने पर कॉल ड्रॉप होने से मोबाइल कंपनियां इस मद से 57,000 करोड़ रुपये से अधिक की गलत वसूली कर रही हैं।
ट्राई द्वारा कॉल ड्रॉप पर मुआवजे के नियम को 16 अक्‍टूबर 2016 में बनाने से पहले मोबाइल कंपनियों से कई  दौर की बैठक की गई थी जिसके तहत ही इसे 3 महीने बाद 1 जनवरी 2016 से लागू किया गया। इस विमर्श के अनुसार ही मोबाइल कंपनियों द्वारा पूर्व में गैर-कानूनी वसूली के खिलाफ ट्राई द्वारा कोई कार्रवाई नहीं करते हुए, कॉल ड्रॉप पर मुआवजे की अधिकतम सीमा 3 रूपये रखी गई। मोबाइल कंपनियों के दवाब से ट्राई द्वारा 28 नवंबर के संशोधित आदेश से इनकमिंग नेटवर्क के कारण कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का प्रावधान खत्म कर दिया। जब यह फैसला मोबाइल कंपनियों की भागीदारी के बाद लिया गया, तब किस आधार पर इसे अदालत में चुनौती दी गई?
नेटवर्क में कमी के प्रावधान से दो फीसदी कॉल ड्रॉप का कानूनी हक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में मोबाइल कंपनियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का विरोध किया। क्या टेलीकॉम मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ने बहस करके संविधान की शपथ और गोपनीयता का उल्लंघन नहीं किया? लाइसेंस की शर्तों के अनुसार मोबाइल कंपनियों को 98 फीसदी इलाके में नेटवर्क का विस्तार जरूरी है, जिसके विफल होने पर कड़े जुर्माने का प्रावधान है। इसे कुतर्क के माध्यम से 2 फीसदी कॉल ड्रॉप की अनुमति बना दिया गया, जिसका सरकार के वकीलों ने जोरदार विरोध किया ही नहीं। अगर इस कुतर्क को मान भी लिया जाए तो भी कॉल ड्रॉप होने पर मोबाइल कंपनियों को बगैर सर्विस को पैसे वसूलने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मोबाइल कंपनियों के बल्ले-बल्ले हो गई है। एयरटेल ने कहा है कि वह 1.5 फीसदी तक कॉल ड्रॉप रखने के लिए कृत संकल्प है। विदेशों में कॉल ड्रॉप होने पर ग्राहकों को मुफ्त कॉल मिलती है पर भारत में इसका पालन ही नहीं होता। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोबाइल कंपनियां संगठित गिरोहबंदी करके ग्राहकों को चूना लगा रहीं है। क्या इसी वजह से सभी तथ्यों को सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख प्रभावी तरीके से रखा ही नहीं गया। क्या रविशंकर प्रसाद जी इस गोरखधंधे की जांच कराकर सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे? अन्यथा कॉल ड्रॉप मंत्री का कलंक तो इतिहास में दर्ज ही हो जाएगा..।

Sunday, May 8, 2016

माँ के नाम कमलेश का पत्र

प्रिय माँ,
चरणस्पर्श,
उम्मीद है, उम्मीद है कि घर में सब कुशल मंगल होंगे. आप भी बहुत अच्छी होंगी. मेरी चिंता मत करिए मेरे साथ तो आपका आशीर्वाद है तो मैं भी ठीक ही रहने वाला हूँ.
माँ पता है आज मदर्स डे है. अरे मदर्स डे मतलब माँ के लिए एक अलग दिन. अरे एक ही नहीं आपके तो सब दिन होते हैं लेकिन एक दिन विशेष होता है. बस उसी को अँग्रेज़ी में मदर्स डे कहते हैं. मैंने तो फेसबुक और ट्विटर पर बहुत सारी शायरी पोस्ट कर दी.
लेकिन सॉरी......पूरे दिन में आपको फ़ोन तक नहीं कर पाया संडे होने के बावजूद. अरे नहीं माँ ये मदर्स डे केवल अँग्रेज़ी और शहर के ..........हाउ आर यू मॉम टाइप लोगों के लिए ही होता है. हम गाँव वालों को, ख़ासकर मेरे जैसे को तो आपसे हैप्पी मदर्स डे कहने में भी शर्म आती है.
आज मैंने पत्र इसलिए लिखा क्योंकि अचानक मुझे समझ में आया कि आज मैं जो कुछ भी हूँ, जैसा भी हूँ, उस सबमें सबसे बड़ा योगदान किसका है? और किसी का कैसे निसंदेह आपका ही योगदान है. हर इंसान का पहला गुरु उसकी माँ ही होती है. कभी कभी मैं सोचता था कि सच में मैं कितना शरमाता हूँ, किसी से बात भी नही करता हूँ, बहुत डरता हूँ. शायद मेरे ऐसा होने में आपकी बहुत बड़ी कमी है. आपने मुझे कुछ सिखाया ही नहीं था. लेकिन आज जब ये सब चीज़ें मेरी ताक़त बन जाती हैं तो मुझे आपको धन्यवाद बोलने का मन होता है लेकिन किसे बोलूं उस समय? आप पास जो नहीं होती हो. मुझे अक्सर लोग पढ़ाकू लड़का, गाँधीवादी, नसे, लड़कियों या पार्टी से दूर रहने वाला कहकर खूब चिढ़ाते थे, आज भी चिढ़ाते हैं, लेकिन मैं कभी कभी अपने इन्हीं आदर्शों के दम पर उनपर हावी हो जाता हूँ. ये सब मेरे लिए समाज में बहुत गौरवान्वित होने का मौका देता है. ऐसे झूठे समय में सच्चाई को पकड़कर एक अलग सा रहना मुझे एक झूठी भीड़ से अलग करता है. जो मेरे, समाज के और देश के लिए कुछ तो सकारात्मक दिखता है. इस सबके लिए तहे दिल से धन्यवाद..........
आज रात को पढ़ते समय मुझे याद आ गया कि इतना पढ़ने की आदत भी आपने ही डाली थी. आप वो माँ थी जो खुद तो बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी. लेकिन मुझे हमेशा एक स्कॉलर ही बनाना चाहती थी. उसी के साथ आप मुझमें हर गुण कूट कूट कर भरते जा रहीं थी. कितना मुझे याद है जब मैं छोटा था तो रोज मुझे एक रुपया देकर स्कूल भेजती थी. मैं उसमें से भी 50 पैसे बचाकर लाता था. फिर 5 रुपए मुझे छोले खाने के लिए देतीं थी. फिर जब बड़ा हुआ तो कॉलेज जाने के लिए 30 रुपए किराए के लिए देतीं थी, फिर भी मैं साइकिल या बस से ट्रावेल कर बचा लेता था, पॉकेटमानी से किताबें खरीद लाता था. यह कम खर्चीला होना आज मुझे बहुत बुराइयों से बचाकर रखता है. हो सकता है लोग इसका मज़ाक उड़ाएँ. लेकिन हर अच्छाई का पहले मज़ाक ही उड़ता है ये बात आप मुझे तब समझाती थी जब मैं हीरो जैसे बाल रखना चाहता था और पिताजी छोटे छोटे कटवा देते थे. आज वो सब याद कर बहुत रोने को मन करता है, रातों को ऐसी हूक उठती है कि सिर दीवार पर दे मारु. फिर ये सोँचकर चुप रह जाता हूँ कि आपके सपने को पूरा करूँगा. आप ही कहती थी ना.....कि मेरा बेटा मजिस्टेट बनेगा........सब पुलिस वाले तक उसकी ही जी हुजूरी करते हैं........लगा हूँ, जिस दिन बन गया, उस दिन आपकी आँखों की खुशी देखने के लिए मेहनत कर रहा हूँ.
धन्यवाद............
आपका " बउआ".........

Sunday, May 1, 2016

पंजाब में आनाज घोटाला

पंजाब में सीएजी ने एक रिपोर्ट दी है जिसे मार्च महीने के बजट सत्र में विधानसभा में पेश किया गया। सीएजी ने 2009 से 2013 के बीच 3319 ट्रकों का सैंपल लेकर उनके बारे में पता करना शुरू किया तो निराशा हाथ लगी, क्योंकि सिर्फ 87 गाड़ियों का अता-पता लग सका, लेकिन इनमें से 15 ट्रक नहीं थे। स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार वगैरह के नंबर थे। 3232 ट्रकों का कोई अता पता नहीं चला। मंडी से जब अनाज उठता है गोदाम ले जाने के लिए तो बड़ी संख्या में ट्रकों का इस्तेमाल होता है। निश्चित रूप से स्कूटर और मोटरसाइकिल पर तो कोई गेहूं या धान की बोरी लाद कर नहीं ले जाएगा। लेकिन क्या यह संभव है कि 3319 ट्रकों का पता ही न चले। जब ट्रक माल लेकर गोदाम पहुंचता है तो बकायदा उसके नंबर की रसीद कटती है। इतनी बड़ी मात्रा में ग़लती तो हो नहीं सकती। अगर हुई होगी तो फिर उस ट्रक ने उस रसीद के बदले पैसे कैसे लिये होंगे। यानी रसीद भी फर्ज़ी और पैसे का भुगतान भी फर्जी। सीएजी ने कहा है कि चार सरकारी एजेंसियों के 16 अधिकारियों में से 7 ने कोई डेटा ही नहीं दिया कि कितने ट्रकों का इस्तेमाल हुआ और उनके नंबर क्या हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के ज़रिये भारत सरकार पंजाब को पैसे देती है कि वो अपने यहां धान और गेहूं की खरीद करे। रिजर्व बैंक से पैसा पहुंचता है भारतीय स्टेट बैंक सहित 30 बैंकों के पास। अब भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के लिए पंजाब सरकार अनाज खरीदने का काम शुरू कर देती है। पैसा मिलते ही पंजाब सरकार आढ़ती से कहती है कि वो किसानों से गेहूं खरीदे। आढ़ती ख़रीदकर मंडियों के ज़रिये सरकार को बता देता है कि इतनी ख़रीद हुई।
सरकार बैंक को बताती है कि फलां मंडी में इतने लाख टन गेंहू की खरीद हो गई है। उसके एवज में बैंक तुरंत राज्य सरकार को पैसा दे देता है। राज्य सरकार 48 घंटे के भीतर आढ़ती के खाते में पैसा भेज देती है, ताकि किसानों को जल्दी पैसा मिल सके। वैसे सरकार इस बिन्दु पर भी किसानों के खाते में सीधे पैसे भेजने पर विचार कर सकती है। ख़ैर…आढ़ती जब ख़रीद लेता है तो इसे गोदाम में ले जाने के लिए एजेंसियां ट्रक लेकर आ जाती हैं। इसके लिए पंजाब में पांच छह एजेंसियां हैं। ये ट्रक अनाज लेकर गोदाम पहुंचते हैं और वहां रसीद मिलती है कि कितना माल लेकर आए और किस ट्रक से आए। मंडी में कितना खरीदा गया और गोदाम में कितना पहुंचा, इसका अलग-अलग डेटा रखा जाता है। फिर इनका मिलान किया जाता है।
पंजाब में खरीद से जुड़े 30 बैंकों के समूह को 12,000 करोड़ के स्टॉक का हिसाब नहीं मिल रहा है। ख़बर आई कि बैंकों ने पता चलते ही इस सीजन में ख़रीद के बाद भुगतान रोक दिया। पंजाब का कहना है कि केंद्र से जो अनाज खरीदने के लिए पैसे मिले थे उनका कहीं भी ग़लत इस्तेमाल नहीं हुआ है। ये अनाज सेंट्रल पूल में जाता है यानी भारतीय खाद्य निगम को दे दिया जाता है और बकायदा इसका रिकार्ड रखा जाता है। अगर ऐसा है तो भारतीय रिजर्व बैंक को चिन्ता करने की क्यों ज़रूरत पड़ी। कई बार एफसीआई भी सीधे मंडी से अनाज उठाकर अपने ट्रकों से दूसरे राज्यों में भिजवा देती है। लिहाज़ा एफसीआई को भी बताना चाहिए कि 12000 करोड़ रुपये के गेहूं का जो हिसाब नहीं मिल रहा है क्या उसके ट्रक लेकर कहीं गए। गए भी या नहीं गए। 3000 से अधिक ट्रकों का तो अता-पता ही नहीं मिल रहा है। इस मसले को लेकर मुख्यमंत्री बादल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात भी की है। बैंकों ने पंजाब से कहा कि पूरा प्लान बताइये कि कैसे आप इस पैसे का भुगतान करेंगे और स्टॉक का हिसाब देंगे क्योंकि अगर यह हिसाब नहीं मिला तो बैंकों को 1800 से 3000 करोड़ का बैड लोन घोषित करना होगा। 
पंजाब सरकार ने अभी तक चावल मिलों से 1300 करोड़ रुपये नहीं वसूले हैं। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जालंधर, लुधियाना, संगरूर, मोहाली और फतेहगढ़ सहित कई मीलों से पता चला है कि जो स्टॉक है और उनके बदले बैंकों से जो पैसा लिया गया है उसमें काफी अंतर है। सीएजी के अनुसार मीलों को फायदा पहुंचाने के लिए पैसा तो दे दिया गया मगर माल का पता ही नहीं चल रहा है। पंजाब के किसान संकट में हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने तो रिपोर्ट किया है कि अब तो पंजाब में आढ़ती भी आत्महत्या करने लगे हैं। उन 3000 ट्रकों का कैसा पता लगाया जाए। क्या उनका विज्ञापन निकाला जाए, 12000 करोड़ के स्टॉक का हिसाब नहीं मिल रहा है, क्या ये हिसाब किताब का पुराना झमेला है या कोई घोटाला है।ऐसा हो सकता है कि 3232 ट्रकों के बारे में जानकारी न मिले या कोई इतनी बड़ी संख्या में ट्रकों के बारे में ग़लत जानकारी सरकारी रजिस्टर में भर दे।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...