Friday, May 20, 2016

ममता की जीत और लेफ्ट की हार के कारण

विधानसभा चुनावों का आख़िरी दौर चल रहा था कि सबको भनक लग चुकी थी कि इसबार ममता दीदी ने कांग्रेस+लेफ्ट को धूल चटा दी है. इसकी भनक शायद लेफ्ट को देर से लगी तभी तो उनको एक्ज़िट पोल्स के बाद भी खुशफ़हमी रही.  बंगाल की राजनीति से परिचित लोगों के लिए यह कयास लगाना तो मुश्किल नहीं था कि 'सब 294 सीटे एकला' लडऩे वाली ममता को कम से कम इस बार वामपंथियों और कांग्रेस के लिए मिलकर हराना भी संभव नहीं होगा, लेकिन कोई विरला ही यह सोच पाया था कि ममता को 2011 के 184 से भी बहुत ज्यादा सीटें मिल जाएंगी। 
इससे यह भी कयास लगता है कि वामपंथियों के वोट कांग्रेस के उम्मीदवारों को तो मिले, मगर कांग्रेस का वोट वामपंथियों की ओर कम ही गया। यह वोट अगर तृणमूल की ओर नहीं गया होगा तो शायद कुछ शहरी इलाकों में बीजेपी की ओर मुड़ गया होगा। लिहाजा, भगवा रंग कुछ खुलकर रंग जमाता दिखा। 
असल में उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में पिछले साल नगर निगम चुनावों में किए गए प्रयोग में कामयाबी से यह आशा उपजी थी। वहां इस दोस्ती के अच्छे नतीजे दिखे, इसीलिए इसे 'सिलीगुड़ी फार्मूला' कहा गया और विधानसभा चुनावों में वामपंथी और कांग्रेस के नेता हाथ मिलाकर चुनाव प्रचार करने लगे।
इस गणित का आधार 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वोटों के कांग्रेस और वाममोर्चा में बंटने से ममता और एक सीट पर बीजेपी को हुए फायदे को रोकने की कोशिश था। इसका लाभ अधिक उत्तर बंगाल में होने की उम्मीद थी, जो कुछ हद तक मिला भी, लेकिन दक्षिण बंगाल में इसका ज्यादा फायदा नहीं मिला। उत्तर बंगाल में 74 सीटें हैं, जबकि दक्षिण में 220 सीटें हैं।
उत्तर और दक्षिण बंगाल की तासीर कुछ अलग है। ममता के लिए उत्तर बंगाल कुछ कमजोर रहा है, लेकिन इस बार इस इलाके में भी उनकी पहुंच बढ़ी है। इस तरह वामपंथियों और कांग्रेस के मन के लड्डू मन में ही रह गए। तृणमूल नेताओं के खिलाफ शारदा चिट फंड और नारद स्टिंग ऑपरेशन के घोटालों का भी कोई खास असर नहीं हुआ। इसके विपरीत जीत के बाद पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने ऐलान किया कि जनता ने बता दिया है कि बंगाल भ्रष्टाचार मुक्त राज्य है।
इस जनादेश का राष्ट्रीय राजनीति में फर्क पड़ेगा ही। ममता के जीतने की खबरें आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली ने उन्हें बधाई दी। ममता ने भी कहा कि वह जीएसटी विधेयक पर सकारात्मक रुख अपना सकती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ हैं, इसलिए उनसे किसी तरह के तालमेल की संभावना नहीं बनती। हालांकि बीजेपी की कोशिश होगी कि ममता और जयललिता को साथ लेकर कम से कम राज्यसभा में कांग्रेस की घेराबंदी तोड़ी जाए।
बहरहाल, इन नतीजों का कांग्रेस से भी अधिक बुरा असर वाममोर्चे पर होगा और प्रकाश करात के बाद माकपा की कमान संभालने वाले सीताराम येचुरी के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। येचुरी ही कांग्रेस के साथ गठजोड़ के हिमायती रहे हैं। जो भी हो, ममता ने साबित किया कि बंगाल में अभी वह बेजोड़ हैं। बंगाल की जनता वैसे भी जल्दी-जल्दी गद्दी बदलने में यकीन नहीं करती। यह आजादी के बाद से कांग्रेस और बाद में 34 साल तक वाममोर्चा के शासन से स्पष्ट है। एक और बात यह कि कम से कम बंगाल के इन नतीजों से 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को कुछ लाभ शायद ही मिले।

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