लगभग दो हफ्ते पहले मराठी फिल्म सैराट’ आई. अति चर्चित और लोगों के इंतेजार वाली. मुझे भी देखना था. लेकिन थिएटर जाकर तो नहीं देख पाया. लेकिन मोबाइल पर इस उद्देश्य से देखी कि जल्दी जल्दी देखकर मुझे आलोचना कर देनी है. और ऐसा ही किया अपने एक दो लोगों को चिढ़ाने के लिए उसकी आलोचना करके 50 ग़लतियाँ गिना डालीं. हो सकता है इसमें मैने वकालत के गुण का इस्तेमाल कर लिया हो. फिर उसी रात मैने दूसरी बार वो फिल्म देख केवल समझने के लिए इसबार पूरी देखी. पहली बार में काट काट के आधे घंटे में पूरी कर दी थी. फिर जो मैने इसका एनालिसिस किया उसके दो पक्ष हैं. पहला पक्ष है फिल्म को केवल मनोरंजन के नज़रिए से देखकर उसपर कुछ कह देना. वही 70-80 के दशक की कहानी. जिसमें एक हैंडसम हीरो, लेकिन बेहद ग़रीब. हीरोइन दबंग, पैसेवाल बाप की बेटी. फिर दोनों में प्यार. भागकर शादी आदि आदि......मेरी आलोचना थी कि आपका सामाजिक एनालिसिस तो ठीक रहा लेकिन फिल्म इतना सबकुछ ध्यान नहीं दे पाई. उसने कहाँ पर दिखाया क़ि प्यार अमीरी ग़रीब, जाति या सामन्तवाद का विरोध कर रही है. कहीं से भी उसमें वो सब विरोध नहीं दर्ज हो पाए जो फिल्म की स्टोरी के हिसाब से होने चाहिए थे. पहले हाफ़ में तो युवा जेनेरेशन को प्यार में पड़ने की लवस्टोरी दिखाई गई, लेकिन अंत होते होते प्यार की नकारात्मकता दिखा दी गई. जैसे उनका भागने के बाद का जो संघर्ष. जैसा आमतौर पर कच्ची उम्र की लव मैरीजेस में होता है. आपस में लड़ना-भिड़ना. यहाँ तक की सड़क पर भी उसको थप्पड़ रसीद करना. फिर अंत में क्या कर दिया.
इसके बाद जो मेरा इसपर सीरियस एनालिसिस है वो अलग है. मराठी शब्द ‘सैराट’ का संक्षिप्त अर्थ हिंदी में संभव नहीं है. और यह अंत तक बिखरती प्रेम कहानी में दिख जाता है. थिएटर में लगे एक महीना नहीं हुआ है कि मराठी फिल्म ‘सैराट’ का नाम करोड़ों गैर-मराठी जुबानों पर भी है. उसने नाना पाटेकर अभिनीत कामयाब ताजा फिल्म ‘नटसम्राट’ को पीछे छोड़ा है और अब वह मराठी सिनेमा के इतिहास की सफलतम फिल्म मानी जा रही है. यह एक सपना ही था कि कोई मराठी फिल्म सिर्फ थियेटरों में पहले तीन हफ्तों में 50 करोड़ का आंकड़ा छू ले. कई कारणों से बीच में मराठी फिल्म पिछड़ी, लेकिन इधर अनेक नए, युवतर मराठी फिल्मकार उसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी के समकक्ष ही नहीं, आगे ले जाते दिखते हैं. मराठी सिनेमा की बहु-आयामीय अस्मिता का एक नया ‘टोटल स्कूल’ विकसित होता लग रहा है.
यह है कि फिल्म एक दूसरे दर्जे की लेकिन पहले दर्जे पर पहुँचती हुई दिखती है. एक लिबरल विचारधारा के कारण मैं काफ़ी प्रभावित हुआ इस फिल्म से. कम से कम उसमें गावों और समाज की एक असलियत पेश की गई है. जो सच में होता है समाज में. इसके डायरेक्टर खुद एक निचली जाति से आते हैं और इसी तरह क़ी फिल्में बनाई हैं. शायद उनमें दीपांकर बनर्जी और कई कम्युनिस्ट लोगों की सोंच है. इसको जो पसंद करने वाले लोग हैं वो भी मुझे पसंद आए कि कम से कम वो लोग भी इस फिल्म के ज़रिए समाज की हक़ीकत को समझ पाए. अब उसको वो कैसे असल जिंदगी में देखेंगे? वो देखने वाली बात है. इसमें प्रमुख रूप से तीन बातें मैं कह सकता हूँ पहली बात तो यह क़ि प्यार करना है या नहीं करना है यह सबका निजी अधिकार है. फिर प्यार करके आगे क्या करना है इसपर भी निर्माता ने उन युवाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है जो फिल्मों का प्यार देख कर भागकर शादी कर लेते हैं. कम से कम इस फिल्म में बताया गया कि जो बहुत अच्छा पढ़ा लिखा और समझदार इंसान होता है वो भागता नहीं है. जो भागता है वो इतना मजबूत पैसे और पढ़ाई लिखाई से होता नहीं है इसके बाद उनको शहर जाकर संघर्ष भी करना पड़ता है. और अंत में नौबत मरने तक की आ सकती है. मतलब इतना संघर्ष झेलने का दम हो तो भागना. फिर इसमें तीसरी बात यह सामने आती है क़ि इस फिल्म को पसंद करने वाले युवा इस तरह की घटनाओं पर क्या सोचते हैं. अगर कोई दलित बड़ी जाति की लड़की से शादी करे तो? जिस तरह से पूरे भारत में दलितों को आज भी गावों के बाहर रहने को मिलता है वही फिल्म में भी है, घर के बाहर बर्तन साफ करती हुई हीरो की ग़रीब माँ. यह है दलितों की असलियत. इसपर युवा क्या सोचते हैं? क्या उनको ये सब बातें किताबों से समाज में उतारने का मन नहीं होता है? तो क्यों पढ़ी थी वो किताबें, संविधान की बातें. फिर तो फिल्म में भी ये बातें पसंद ना करो? अगर फिल्म में पसंद है तो छोड़ो समाज का डर और उन ग़रीबों के हक की लड़ाई में शामिल हो जाओ.
अब मैं इसके बाद इस फिल्म के निर्माता के दिमाग़ पर बात करना चाहता हूँ उसने इस फिल्म को हिट करने के लिए एक एज ऑफ ग्रुप ढूँढा. 12-14 साल से लेकर 25-26 साल तक के लोगों का. ऐसा कहें कि अविकसित दिमाग़ (Un-matured Mind) के युवा या फिर जिन्होने खुद ऐसा कुछ झेला होगा. या फिर वो हर तरह के लोग जो दलित या पिछड़े समाज से आते हैं. ‘सैराट’ के अधिकांश अभिनेता या तो अज्ञात हैं या अल्पज्ञात. उसका कथा-स्थल सैलानियों में लोकप्रिय नहीं है. कस्बा देश-भर के सैकड़ों ऐसे कस्बों की तरह सामान्य है – न सुंदर, न कुरूप. किशोरों-युवकों के पास आपसी क्रिकेट-मैच, कुएं की तैराकी और कभी नाव की सैर के अलावा मनोरंजन के कोई साधन नहीं हैं. बस-अड्डा है लेकिन ट्रेन यहां से नहीं जाती. फिल्म के नृत्य-संगीत आकर्षक हैं लेकिन वह शेष तत्वों को दबाने की कोशिश नहीं करते. कोई डांस-आइटम-गर्ल नहीं है. ‘प्रेम’ की हसरत है, कभी-कभी वह हासिल भी हो जाता है, लेकिन ‘सेक्स’ उतना नहीं है. मराठी भाषा का बहुत ज्ञान तो नहीं है लेकिन जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ वो शुद्ध मराठी तो नहीं थी. बीच बीच में हिन्दी शब्द आना, चालू भाषा, या फिर डबल मिनिंग्स का बोल जाना, गलियों में होता प्यार, लड़की पटाने की कोशिशें हर युवा को दिखा रहा था क़ि ये फिल्म हमारे लिए ही बनाई गई है. सबको लगा कि बस मेरी ही स्टोरी है.
समाज निम्न और अन्य वर्गों में यथावत बंटा हुआ है. बस्ती के बाहर दलित झोपड़पट्टी की बेहद नारकीय हालात में रह रहे हैं. चीनी मिल है जो सत्ता और राजनीति के केंद्र और हर तरह के शोषण-पेरण का प्रतीक है. गन्ने और केले के घने हरे आदमकद खेत कोई राहत या सुकून नहीं देते – एस.यू.वी. पर सवार मौत वहां भी अपने शिकारों के लिए गश्त लगाती है. कस्बे पर काबिज ताकतवर खानदानी शरीफ लोगों के पास बेशुमार दौलत, रसूख और ताबेदार कातिल माफिआएं हैं. प्रशासन और पुलिस उनके गुलाम हैं. उनसे कोई जीत नहीं सकता, उनके खिलाफ कोई सुनवाई हो नहीं सकती. न वह कुछ भूलते हैं और न कुछ मुआफ करते हैं. जब कोई दलित किशोर-युवा किसी सर्वोच्च सवर्ण लड़की से प्रेम करने लगता है और यह जात-बिरादरी-समाज की इज्जत का सवाल बन जाता है तभी उस और उसके परिवार पर भयावहतम प्रतिहिंसा बरपा की जाती है. यदि खुद अपनी बेटी उसके प्रेम में जिद्दी और कुलघातिनी है, तो उसे भी किसी कीमत पर बख्शा नहीं जा सकता. मुसलमानों की मुसलमान जानें, ऐसी कहानियां अखिल भारतीय हिंदू समाज में हम आजीवन सुनते-पढ़ते-देखते आए हैं. किसी भी बहु-संस्करण कस्बाई दैनिक को देखते रहें, ये घटनाएं मनमानी उबाऊ नियमितता से लौटती आती हैं. उनके प्रस्तार-समुच्चय
(permutations-combinations) अपने पल-पल परिवर्तित खूनी कैलाइडोस्कोप में लगभग अनंत हैं. विडंबनावश, एक कलाकृति के रूप में ‘सैराट’ अब खुद उनमें शामिल हो गई है. ऐसी हर कृति की एक त्रासद नियति ऐसी भी होती है. फिर यह भी है कि ऐसी ‘सम्मान-हत्याएं’ (ऑनर किलिंग्ज़) भले ही बहुत लोकप्रिय न हों, दलित या विजाति-घृणा और हत्यारी मानसिकता चहुंओर बनी हुई हैं.
यहां ध्यान रखना होगा कि विजातीय प्रेम/विवाह तथा दलित-स्वीकृति के मामले में मराठी संस्कृति तब भी कुछ पीढ़ियों से अपेक्षाकृत शायद कुछ कम असहिष्णु हुई प्रतीत होती है. राष्ट्रीय स्तर पर कई अन्य ऐसे विवाह परिवारों द्वारा स्वीकारे भी जाते रहे हैं, लेकिन मेरे निजी अनुभव कुछ और ही कहते हैं. उस राज्य के उस जिले में जहाँ अम्बड़ेकर ने आंदोलन किए थे वहाँ भी अंबेडकर या दलित की बात करो तो लोग आपको शक की नज़र से देखते हैं कि कहीं ये भी तो दलित नहीं है. दंपतियों की सर-कटी लाशों और उनके बेसहारा शिशुओं को इस सबसे कुछ तसल्ली और राहत नहीं मिलतीं. किसी कम-लागत फिल्म को ‘सैराट’ जितनी बेपनाह सानुपातिक व्यावसायिक सफलता मिले तो कुछ दुर्निवार प्रश्न खड़े होते हैं. फिल्म पसंद करने वाले अक्सर कहते दिखे कि पहला भाग बहुत अच्छा था. दूसरा कम अच्छा. इसके कारण हैं. पहला एक घंटा ‘आती क्या खंडाला’- टाइप है और वह प्रचलित homo-erotic (समलिंग–स्नेहिल) भले ही न हो, अधिकांश भारतीय फिल्मों की तरह नाच-गाने और मेल-बॉन्डिंग (पुरुष-मैत्री) पर टिका हुआ है. लेकिन उसमें शराफत से किसी एक लड़की से संबंध बना लेने की जोखिम भरी हसरत-ओ-तड़प भी है. हमारे किशोर और युवा वर्ग में नारी के लिए दीवानगी तक ललक है. यहां एक विचित्र तथ्य है कि फिल्म की नायिका वास्तविक जीवन में अब भी नाबालिग है और शायद नायक भी. यह एक घंटा self-indulgent है क्योंकि वह ऐसा कुछ भी स्थापित नहीं करता जो बीस मिनट में establish नहीं हो सकता था. वह क्लिशे (पिष्ट-पेषण) के साठ मिनट हैं और शायद निर्देशक वैसा ही वातावरण निर्मित करना चाहता था. लेकिन होश में लाने वाला पहला तमाचा नायिका के भाई के हाथ से उसके पिता के इंटर कॉलेज में मराठी कविता पढ़ाने वाले दलित शिक्षक के मुंह पर नहीं, हमारे गाल पर पड़ता है और पिछला सारा शीराजा बिखर जाता है. लेकिन यह तो होना ही था. अपना संभावित जाति-विवाह तोड़ना, माता-पिता-भाई को समाज और कस्बे में बदनाम कर भयानक जोखिम उठा अपने दलित प्रेमी के साथ पलायन, अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बीच सीमावर्ती आंध्र प्रदेश में डोसा बनाते हुए और पीने के पानी की मशीनी बोतलें भरते हुए टीन की दीवारों-छतों वाली एक गंदी बस्ती में अज्ञातवास, बीच में एक लगभग आत्मघाती गलतफहमी और अनबन और पुनर्मिलन, फिर वह दो बरस जिनमें एक बेटे, एक स्कूटी और एक छोटे से फ्लैट का जीवन में आना, और इस सब बदलाव में नायिका आर्ची का अपने माता-पिता, भाई-बहनों और घर को सहसा याद करना. बहुत अधिक पढ़ा लिखा ना होने के कारण छोटे छोटे काम करना एक रियलिटी बताता है. सर्वनाश मायके से कई भेंटें लेकर आता है. क्या दर्शकों ने सिर्फ उस सुपरिचित, लगभग टपोरी पहले घंटे को चाहा? क्या उन्हें बीच का ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’- स्पर्श अच्छा लगा? क्या उन्हें कस्बाई माफिया द्वारा नायक-नायिका को चेज़ करने और उस पलायन में पराजित होने में आनंद आया? क्या वह आंध्रप्रदेश में अपने आदर्शवादी, ‘पवित्र’ नायक-नायिका के सफल संघर्ष से खुश हुए? क्या उन्हें यह हीरो अच्छा लगा जो एक ऐंटी-हीरो, अ-नायक है? क्या उन्हें बीच में उन दोनों के मनमुटाव के सस्पेंस ने रोमांचित किया? क्या वह जानते या चाहते थे कि बाद की सुख-स्वप्न जैसी जिंदगी न चले?
फिर ये दर्शक हैं कौन? इनके पैसे कैसे वसूल हुए? कितने दलित, कितने सवर्ण, किन जातियों के/ कितने किशोर/युवा/ कितने वयस्क, बुद्धिजीवी/ क्या सब सवर्णवाद के आजीवन शत्रु रहेंगे? इससे कोई सामाजिक क्रांति होगी? क्या वाकई ‘सैराट’ कोई जातीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न उठाती है? यदि वह त्रासदी को ही उनका एकमात्र हल बनाकर पेश कर रही है तो उसमें कहां मनोरंजन हो रहा है कि फिल्म सुपर-हिट है? क्या यह फिल्म दर्शकों को और मनोरंजन की उनकी अवधारणाओं को बदल रही है? क्या दर्शकों ने इसे एक समूची जिंदगी की फांक की तरह देखा, टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं? क्या इसमें कहीं कोई सैडो-मैसोकिस्ट, परपीड़क-आत्मपीड़क तत्व, किशोर-प्रेम का नेत्र-सुख, prurience और voyeurism भी सक्रिय हैं? क्या यह फिल्म सिर्फ मराठी संस्कृति में वैध फिल्म है? हिंदी में बनी तो नतीजे क्या होंगे? ‘सैराट’ की अपूर्व सफलता गले से तो उतरती है, दिमाग में अटक कर रह जाती है. युवा फिल्म ख़त्म होते होते डर जाता है. लेकिन उसका यह डर उस हज़ारों साल से चली आ रही शोषण की संस्कृति का है जिसने समाज में असमानता फैलाई हुई है. इसको शिक्षा के द्वारा पूरा किया जाना था लेकिन उस तरह की शिक्षा बच्चों को दी नहीं गई. क्योंकि अध्यापकों में तो दबदबा बड़ी जातियों का ही है. घरों में लड़कियों को ख़ासकर ऐसी आज़ादी मिली ही नहीं क़ि वो इस असमानता के खिलाफ आवाज़ उठा सकें. लेकिन जब युवाओं ने पसंद किया इस फिल्म को तो निर्माता की कम्युनिष्ट और हमारे जैसे लोगों सेकुलर सोंच एक आस लेकर बैठ गई कि ये भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा. लेकिन फिर रिटर्न में याद आया कि हिन्दी में तो ऐसी हज़ारों फिल्में बनाई गईं उनसे क्या बदला? तो लगा कि ये सब युवा फिल्म में ही इस सबको सपोर्ट कर सकते हैं असलियत में समाज के झूठे नकाब के खिलाफ बोलने की इनमें हिम्मत नहीं है. कैसे बोलेंगे अपने परिवार की पुरानी सोंच पर, कैसे बोलेंगे जो उनको पढ़ाया गया है उसके खिलाफ. और ऐसे जागरूकता का कोई कार्यक्रम सरकारें चला नहीं सकती हैं. तब लगता है कि इस सबके लिए हम जैसों को ही संघर्ष करना पड़ेगा और युवाओं को रील लाइफ में पसंद आने वाली कहानियाँ रियल लाइफ में भी सपोर्टिंग बनानी पड़ेंगी.
अंत में फिल्म के निर्माता नागराज मंजुले को हार्दिक बधाई उसकी संफलता के लिए. फिल्म के लिए यूथ के मुद्दों, प्यार, पढ़ाई, बैकग्राअंड, गाँव, खेत, स्कूल, कॉलेज, ट्रैक्टर, दबंग पाटिल यह सब दिखना इस फिल्म की सफलता का कारण था. जो हर इंसान को अपनेपन का अहसास दिला रही थी. इस फिल्म की सफलता में इसके संगीत का बड़ा योगदान रहा. इसलिए अजय अतुल को भी बधाई. मेरे जैसे हिन्दी भाषी का 15 दिन तक इस फिल्म की रिंग्टोंन लगाना, दो बार फिल्म देखकर 3 घंटे ब्लॉग लिखना, मराठी भाषा को उँचाई पर ले जाता है. मतलब मराठी भाषा की बाउंड्रीस टूट रही हैं. और यह सब प्यार, संगीत और कला से ही हो सकता है. अन्यथा राज ठाकरे साहब जैसे लोग कहते कहते हार गए.........
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