आज हिन्दी के महान उपन्यासकार, साहित्य लेखक मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिन है। मैं बचपन से ही उन्हें पढता रहा हूँ। उनकी जीवन शैली, कहानी हिंदी के सिलेबस में थी। फिर जब रवीश का फैन होकर लिखने के बारे में सोच रहा था तब पता चला कि गूगल से ज्यादा किताबें पढ कर तैयारी करें तो मैं फिर से मुंशी प्रेमचंद को पढने लगा। उनकी सब कहानियां और उपन्यास पढ डाले मुस्किल से कोई छूटा हो। ऐसा नशा था कि दो रात में गबन जैसी बडी किताब खत्म कर दी।
फिर आज के ही दिन 2013 में पहला ब्लाग लिखा था, मुंशी प्रेमचंद के साहित्य योगदान के लिए। तब से वो सिलसिला जारी है। रवीश कुमार का लमही (प्रेमचंद की जन्म भूमि) वाला प्रोग्राम तो 15 से अधिक बार देखा है। अब तो कानून के आगे साहित्य पढने का समय कम ही मिलता है लेकिन समय मिलते ही पूस की रात, सवा सेर गेहूँ जैसी कहानी पढ लेता हूँ। नमक का दरोगा तो हर साल पढता हूँ, यही वजह है कि मैं अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं कर सकता। मेरे कमलेश होने में मुंशी प्रेमचंद का बहुत बडा हाथ है। मेरी विचारधारा बदली है उन्हें पढकर। गरीब समर्थक, सामंतवाद विरोधी, सेकुलर और जातिवाद विरोधी उन्हें पढकर ही हुआ मैं। समाज में चल रही असमानता और दमन को सही ढंग से समझा। कहानियाँ पढते पढते खूब रोया हूँ। आज भी रात में उन्हें पढा और सपने में देखा। मेरे जूनियर को एक बडी परिक्षा के लिए तैयार करना है तो आज के दिन ही उसको दो बैलों की कहानी पढने को दी। क्योंकि उसकी लगातार पढने की आदत छूट गई है तो उसे आदत डालना है। क्योंकि आज की जेनरेशन तो मोबाइल और गूगल वाली है जिसे पढना कम पसंद है।
Sunday, July 31, 2016
मुंशी प्रेमचंद की जन्मदिन विशेष टिप्पणी
Friday, July 22, 2016
महंगी पडेगी भाजपा को दलित हिंसा
गुजरात के ऊना में दलितों पर हुए अत्याचार का वीडियो देख कर मैं अंदर से दहल गया. यह मुझे पाकिस्तान रेंज के उस वीडियो की याद दिला रहा था जिसमें वो कॉलेज के एक स्टूडेंट को सरकार के खिलाफ नारे लगाने के बदले गोली मार दी थी. उस वीडियो को देखने के बाद मैने 2 दिन तक खाना नहीं खाया था. ये वीडियो भी देखकर मैं दहल गया. गुजरात में दलितों की आबादी अपेक्षाकृत कम (कुल आबादी का साढ़े सात प्रतिशत) है. इस उत्पीड़न की घटना का विडियो प्रसारित होने के बाद वहां पहली बार ही यह देखने को मिल रहा है कि दलितों का आंदोलन प्रदेश बंद के आह्वान तक पहुंचा है. इस बार गुजरात में दक्षिण भारत की तरह ही लोगों ने आंदोलन को उग्र कर दिया. बीस से अधिक लोगों ने आत्महत्या की कोशिशें की, दूसरी तरफ दलित आंदोलनकारी गायों की लाश लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं और इन लाशों को सरकारी दफ्तरों के बाहर फेंक दे रहे हैं. इसके जरिए वे संदेश दे रहे हैं कि वर्ण-व्यवस्था ने उन पर गायों का चमड़ा निकालने का जो काम थोपा है, उसका अब उनके लिए कोई औचित्य नहीं बचा है. महाराष्ट्र से सटा होने के बावजूद गुजरात अभी तक दलित आंदोलन की चेतना से अछूता रहा है. इसीलिए दलित उत्पीड़न की बहुतेरी घटनाएं वहां संगठित प्रतिरोध का रूप नहीं ले सकीं.ऊंची जातियों व संपन्न वर्गों के आधार वाली संसदीय पार्टियों के बीच सत्ता की होड़ में दलितों को महज वोट के रूप में देखा जाता रहा है. इसीलिए सरकारें बदलती रहती हैं लेकिन दलित उत्पीड़न यथावत बना रहा है. दरअसल गुजरात में दलित उत्पीड़न और सांप्रदायिक हमलों का एक मिला-जुला मॉडल तैयार हुआ है, जो देश के विभिन्न हिस्सों में दिखाई देता रहता है. मॉडल यह है कि दलितों को सांप्रदायिक हमलों का औजार बनाया जाता है और मुस्लिमों को दलितों के राजनीतिक-सामाजिक हितों के खिलाफ खड़ा किया जाता है.
गुजरात में अमर सिंह चौधरी की सरकार के कार्यकाल में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने के फैसले के बाद आरक्षण विरोधियों ने पहले दलितों पर हमले किए. इसके बाद गुजरात में बंद का आह्वान किया और इस बंद को मुसलमानों ने अपना समर्थन नहीं दिया तो उनके खिलाफ सांप्रदायिक हमले शुरू हो गए. केंद्र में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने आरक्षण देने का फैसला किया तो बीजेपी ने हिंदुत्व की रथयात्रा निकाल दी और देश भर में सांप्रदायिक हमले की वारदातें हुई थीं. गौर से देखें तो सांप्रदायिक हमलों और दलित विरोधी हमलों के बहानों में कोई फर्क नहीं है. 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक हमले का एक मॉडल तैयार किया गया, जिसमें उसी अनुपात में दलित विरोधी मानसिकता को जाहिर करने की छूट भी मिली हुई है. तलवार निकालकर मुस्लिम स्त्रियों को मारने की तस्वीर उतरवाने का दुस्साहस ही दलितों को पीटने और उसका विडियो पूरे देश को दिखाने में भी जाहिर होता है. गुजरात सरकार इस तरह की अन्य घटनाओं की तरह ही मुआवजा, जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी जैसे सरकारी कर्मकांड पूरे करने में जुटी है. लेकिन इन औपचारिकताओं से घटना के पीछे मौजूद मानसिकता पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या मानकर पूरे देश में विरोध के कार्यक्रमों का सिलसिला चला और अब गुजरात में भी ऊना की घटना के खिलाफ आंदोलन संगठित हुआ है. मैनें महाराष्ट्र में रहकर जितना 5 साल में नहीं देखा था वो आज देखने को मिल रहा है. बात 14 अप्रैल से शुरू होकर रोहित वेमूला के आंदोलन फिर अंबेडकर भवन टूटने पर हुई घटनाओं तक पहुँचा. हर बार दलित भारी संख्या में बाहर आए. जिसमें आबेडकर भवन टूटने पर तो बहुत ही ज़्यादा संख्या में. वही इसबार गुजरात में हुई हिंसा पर हुआ. लोगों ने अपने दफ़्तरों से छुट्टियाँ लेकर आंदोलन में शामिल होने का साहस किया. शिवसेना और मनसे जैसे पार्टियों से बार बार दलितों पर जवाब माँगा, जिसपर वो हमेशा चुप रहते थे. जो लोग राम दास अठावले को महाराष्ट्र के दलितों का चेहरा मानते थे, उनको बिकने और मोदी के चमचे जैसे नारे लगे. यहाँ तक की जब जेएन यू के कन्हैया कुमार मुंबई, पुणे और नागपुर आए थे, तो भी लोगों का उत्साह जमकर था. विरोध करने वालों के खिलाफ लोग जान देने और लेने की बात कर रहे थे. इसके साथ ही भले ही थोड़ी देर में सही लेकिन गुजरात जागा है. मैने देखा है वहाँ की सामाजिक असमानता को. दलितों के लिए श्मशान से लेकर कुएँ और नदियों में घाट तक अलग होते हैं. जितना मैने दलित इतिहास पढ़ा है, उसमें पता चला कि किसी ने भी गुजरात में दलित चेतना पर काम ही नहीं किया. जब समय आया तो हिंदुत्व के नाम पर एक किया और हिंदू एक हुए तो दलित बनाकर भगा दिया. इसबार कुछ आक्रोश अलग तरह का है. सरकार भी थोड़ा सा चिंतित दिख रही है. पहले हार्दिक पटेल के बहाने पटेल लोगों का भाजपा से बिखराव फिर दलितों का वैसे भी आनन्दी बेन पटेल की छवि एक ढीले ढले प्रशासक की है, तो भाजपा को यह राजनैतिक तौर पर बहुत भारी पड़ने वाला है. लेकिन इससे भी कुछ बदलेगा ऐसा लगता नहीं है, जब मानसिकता वही है, तो एक सरकार जाएगी दूसरी आएगी तो क्या फ़र्क पड़ेगा? क्योंकि असल सवाल ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देने वाली विचारधारा को खत्म करने का है.
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