इतने दिनों से चल रहा है लेकिन मैं कश्मीर के बारे में कुछ नहीं लिख रहा था। इतने गंभीर मामले पर जल्दबाजी में क्या लिख दूं? लेकिन आज यह तस्वीर भी फेसबुक पर ही कहीं से मिल गई तो रहा नहीं गया। शायद कश्मीर के लोग और सेना इतना नफरत नहीं करते हैं एक दूसरे से, जितना इन नेताओं ने नफरत पैदा कर दी है। या फिर टीआरपी वाली मीडिया के लिए जरूरी है। आप कश्मीर के इतिहास को देखिए, हमेशा सूफीवाद के साथ मिलकर रहे हैं लोग। लेकिन थोडी सी सम्प्रदायिक चिंगारी को आग में अमन और चैन के दुश्मन बदल देते हैं। यह चिंगारी हमारी सामाजिक असफलता की वजह से निकल कर बाहर आती है। युवाओं को भडकाकर हथियार के रूप में प्रयोग करने के लिए अलगाववादी बैठे हुए हैं, कभी कश्मीर में, तो कभी छत्तीसगढ के दंतेवाडा में। हमारी खास कर बहुसंख्यक समाज की सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम अपने अल्पसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार न करें, जिससे वे गलत रास्ते पर भटक कर न जाने पाए। चाहे वह मुसलिम, ईसाई या फिर दलित समुदाय हो। बहुसंख्यक समाज को समझने की जरूरत है कि हमेशा बडे भाई के कर्तव्य अधिक होते हैं इसलिए छोटी मोटी बातों को अनसुना करके बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। कहीं न कहीं कश्मीरी पंडितों के पलायन के कारण पर समाधान के बजाए हर दल ने राजनीतिक तौर पर इसे जिंदा रखा। कुछ लोगों कहीं के मुददे कहीं खडे किए, अयोध्या के मुददे पर वहां और 370 पर यूपी में राजनीति हुई। यही कारण है कुछ खराब लोग आम जनता से लोगों को भडकाकर कर ट्रेनिंग कैंप ले गए। 1990 के दशक में तो कुछ नहीं था? यही वह समय था जब देश में सम्प्रदायिक राजनीति पहली बार चरम पर पहुंच गई थी। मंडल कमीशन के बाद आरक्षण तो कभी बाबरी विध्वंस के दंगे। तब तक न मुस्लिम आतंकवाद था न कभी पलायन। कभी दंगों की आग जली तो कभी बम धमाके। फिर कभी अलगाववादियों ने खूब नरसंहार किया। फिर कभी अफास्पा कानून का का गलत इस्तेमाल तो कभी वहाँ के लोगों से पत्थरबाजी फिर जवाब में सेना की गोलियां। और हाँ ये जो दल, नेता और राष्ट्रवाद के नमूने पत्रकार सोसल मीडिया पर सेना सेना किया करते हैं ये सब सेना के दुश्मन हैं। इनको सेना की शहादत पर तिरंगा लगाकर पाकिस्तान की मां *** आता है बस। इनकी देशभक्ति यहां से समाप्त। किसी में दम नहीं है कि सेना के जिंदा जवानों के अधिकारों के लिए सरकार से सवाल पूछ सकते। वन रैंक वन पेंशन के लिए आंदोलन में कितने सैनिक मरे? अबतक लड रहे हैं लेकिन कोई नहीं बोला। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करके एक झुनझुना थमा दिया गया। मात्र 18 हजार रुपये सैलरी मिलती है, क्या हमारा देश उन्हें 50 हजार रुपये सैलरी नहीं दे सकता है? क्यों नहीं ये शिक्षित राष्ट्रवादी युवा ये सवाल करते हैं कि सेना के उस जवान के बच्चे अच्छे स्कूलों में नहीं पढ पाते हैं। 20 साल की नौकरी में 10-12 साल तो उस कर्ज को चुकाने में बीत जाते हैं जो उसकी नौकरी के समय मां बाप ने इन नेताओं तक जाने वाली रिश्वत के खातिर लिया था। जब मैं ये सवाल करता हूं तो आप मुझे राष्ट्रद्रोही या पाकिस्तान चले जाओ कह देते हैं। लेकिन जब जब ये नफरत के सौदागर दो समुदायों को लडाने के लिए ललकारेंगे, चित्कारेंगे तब तब मैं उन समुदायों को आपस में गले मिलने के लिए पुकारते हुए पाएंगे। आप इसे कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन मैं इसे आंधियों के बीच खडा रहना कहता हूँ।
सेना के नाम पे भी हमें राष्ट्रवाद नाम की पट्टी पढाई जाती है पर उनकी बुनयादी जरुरतो पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, अगली बार जब आप को सेना के नाम पर ललकारे तो इसे याद करना, और कभी दिल्ली आ के संसद के आस-पास नेताओ के घर के बाहर देखना दो कौड़ी के नेता अंदर AC रूम मैं बैठ के खाना खाते है और हमारे जवान उनके गेट के बहार सड़क पे बैठ के खाते है.
Monday, August 1, 2016
कश्मीर पर टिप्पणी
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