Wednesday, May 10, 2017

फ्रांस चुनावों के नतीजे

इस समय पूरी दुनियाँ की राजनीति में एक बदलाव का दौर चल रहा है. यह बदलाव राजनीति की विचारधारा से शुरू होकर आम जनता के मुद्दों तक में हो रहा है. दक्षिण पंथी विचारधारा पूरे विश्व में फैल रही है, भारत से लेकर अमेरिका सहित सभी जगह है. ऐसे में नीदरलैंड के चुनावों में एक बेहतरीन बदलाव हो गया. वहाँ जनता ने सभी ट्रेडिशनल दलों को हराकर जेसी क्लेवर नाम का एक ऐसा युवा चुनाव जीता जो पर्यावरण की बात कर रहा था. उसकी पार्टी का नाम है ग्रीन लेफ्ट. वहाँ सभी नफ़रत की बात करने वाले या दक्षिण पंथी नेता और दल हार गए. हर जगह दक्षिणपंथी एक ही तरह की बातें करते हैं. मुसलमानों को आतंक के नाम पर निशाना, देशभक्ति, रंगभेद, माइग्रेट्स का विरोध, प्रवासी टैक्स का पैसा खा जाते हैं आदि...........
इसी दौर में फ्रांस में चुनाव होते हैं. मैक्रों मात्र 39 साल के हैं. नेपोलियन के बाद पहली बार कोई इतनी कम उम्र का नौजवान फ्रांस की सत्ता के शिखर पर बैठने जा रहा है. मैक्रों खुद के बारे में कहते हैं कि वे न लेफ्ट हैं न राइट हैं. दोनों की खूबियों का मिश्रण हैं. ऐसा आदमी होता ख़तरनाक है, पता नहीं कब लेफ्ट हो जाए, कब राइट हो जाए. फिर भी मैक्रों को 66 प्रतिशत वोट मिले हैं. दक्षिणपंथी ला पेन को 34 प्रतिशत वोट मिल हैं. फ्रांस में अभी तक दक्षिणपंथी ताकतों को कभी इतना वोट नहीं मिला था. मैक्रो ग्लोबलाइज़ेशन के समर्थक हैं. यूरोपियन यूनियन में फ्रांस के बने रहने की वकालत करते हैं. वे इमिग्रेंट यानी प्रवासियों से भी नफरत नहीं करते हैं, ट्रंप की तरह नहीं कहते कि दूसरे देश से आने वाले नौजवान अमेरिकी नौकरियां नहीं खा सकते. मैक्रों की पत्नी ब्रिगिट मैक्रों 64 साल की है. मैक्रों जब 15 साल के थे तब ब्रिगिट उन्हें ड्रामा सिखाया करती थीं. 16 साल की उम्र में ही मैक्रों ने शादी का फैसला कर लिया था. मैक्रों जिस क्लास में थे उस क्लास में ब्रिगिट की बेटी भी पढ़ती थी मगर मैक्रों को अपनी टीचर से प्यार हो गया था. ब्रिगिट की पहली शादी से तीन बच्चे भी हैं. मैक्रों अपने प्रेम को किसी से छिपाते नहीं बल्कि दुनिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ हाज़िर होते हैं. क्या भारत में ये संभव है? शायद एंटी रोमियो वाले मार डालते. फ्रांस में बेरोज़गारी बहुत बड़ा मुद्दा था. बेरोज़गारी की दर दस प्रतिशत है. चार में से एक युवा बेरोज़गार है. इसके बाद भी अमेरिका की तरह मुद्दा नहीं चला कि दूसरे देश के लोग उनकी नौकरियां खा जा रहे हैं जैसे अमेरिका में चल गया. राष्ट्रपति ट्रंप तो इमिग्रेंट के खिलाफ खूब बोलते हैं. हाल ही इंफोसिस को भी कहना पड़ा कि वह कई हज़ार अमेरिकियों को अपनी कंपनी में भर्ती करेगी. इमिग्रेंट्स के खिलाफ इतना गुस्सा भड़का कि इसके शिकार भारतीय भी हुए. अमेरिका में भारतीयों की हत्या हो गई. आम तौर पर माना जाता है कि बेरोज़गारी बढ़ती है तो दक्षिणपंथ गरम होने लगता है. नौजवानों को राष्ट्रवाद की भाषा अच्छी लगने लगती है मगर फ्रांस में ऐसा नहीं हुआ. वहां अमेरिका से ज़्यादा बेरोज़गारी है मगर वहां दक्षिणपंथी नेता ला पेन एक नए राजनेता से हार गईं जो पहली बार चुनाव ही लड़ रहा था. जीत के बाद मैक्रों ने कहा कि वे फ्रांस और यूरोप की रक्षा करेंगे. यूरोप और पूरी दुनिया हमें देख रही है और इंतज़ार कर रही है कि हम कई जगहों पर ख़तरे में पड़े विवेक की रक्षा के लिए आगे आएं. उन्‍होंने कहा, 'मैं पूरी कोशिश करूंगा ताकि आगे से आपके सामने अतिवाद के लिए वोट करने का फिर कोई कारण बाकी ना रहे. सब कह रहे थे कि मेरी जीत असंभव है, लेकिन ऐसे लोग फ्रांस को नहीं जानते थे.' 
मैक्रों को भले ही 66 प्रतिशत वोट मिले हैं लेकिन फ्रांस के इतिहास में 40 साल में सबसे कम मतदान हुआ है. एक तिहाई मतदाताओं ने तो न मैक्रों को वोट दिया न ला पेन को. एक करोड़ बीस लाख वोटरों ने वोट ही नहीं दिया. तीन साल पहले तक फ्रांस की राजनीति में उन्हें कोई नहीं जानता था. आखिर फ्रांस में लोगों ने दक्षिणपंथ को क्यों नकार दिया, उदारवादी समाजवादी ओलांद को क्यों नकार दिया. एक ऐसे नेता को क्यों अपना रहनुमा चुन लिया जो न लेफ्ट से आता था न राइट से. 39 साल का नौजवान पहला चुनाव लड़ता है, फ्रांस का राष्ट्रपति बन जाता है.
फ्रांस में भी दक्षिणपंथी नेता ला पेन ने फ्रांस को फिर से महान और फ्रेंच बनाने का नारा दिया. ट्रंप तो जीत गए मगर नीदरलैंड और फ्रांस में महानता की दुकानदारी फिलहाल बंद हो गई है. लोग समझ गए कि मुल्कों को महान बनाने का नारा बोगस होता है और एक नेता अपनी दुकान चमकाने के लिए इसका इस्तेमाल करता है. फ्रांस का नतीजा बता रहा है कि बड़ी संख्या में मतदाता इन सब बातों से चट गए थे इसलिए वोट ही देने नहीं गए और जो गए वो जानते थे कि असली मसला बेरोज़गारी है. धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर दक्षिणपंथी नेता नौकरियों के सवाल से बच रहे हैं. फ्रांस में राष्ट्रपति पद के 11 उम्मीदवार थे, इनमें से अकेले मैक्रों ही थे जिन्होंने ग्लोबलाइजेशन का समर्थन किया.

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