दिन 11 मार्च 2017 जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतेजे आए और बीजेपी पूर्ण बहुमत से वहाँ सरकार बनाने में कामयाब हो जाती है. उसी समय बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने अपनी हार का ठीकरा ईवीएम के सिर फोड़ दिया. उनकी पार्टी ने उसपर काफ़ी सारे विरोध प्रदर्शन भी किए. लेकिन उसको हल्के में लेकर छोड़ दिया गया. उनके साथ ही लालू, अखिलेश, केजरीवाल सहित काफ़ी नेताओं ने इसपर सवाल उठाए जैसे पूर्व में आडवाणी जैसे लोग उठाते थे. लेकिन असली मुद्दा ये बनी जब मध्य प्रदेश के भिंड में डीएम ने मीडिया के सामने इसका डेमो दिया और किसी भी बटन के दबाने पर कमल की ही पर्ची निकलने लगी. काफ़ी बवाल मचा लेकिन चुनाव आयोग ने सबको नकार कर चुप करा दिया. फिर कल 9 मई 2017 को एक बड़ा वाक़या हुआ. जब आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारध्वाज ने विधानसभा में लाईव आकर ईवीएम जैसी एक मशीन बनाकर उसको टेम्पर करके दिखा दिया. बस उसके बाद तो सब जगह हंगामा मच गया. इस बीच इस मामले पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया आ गई है... चुनाव आयोग का कहना है कि ऐसी मिलती-जुलती मशीन तो कोई भी ला सकता है...
ये ईवीएम जैसी मशीन है, ईवीएम नहीं.
और इसकी कोई अहमियत नहीं है.
ऐसी मशीनों से मनचाहे नतीजे मिल सकते हैं.
जबकि चुनाव आयोग के EVM पूरी तरह सुरक्षित हैं.
ऐसी मशीनों से EVM को बदनाम नहीं किया जा सकता.
चुनाव आयोग 12 मई की बैठक में देगा सुरक्षा के ब्योरे.
बात केवल चुनाव आयोग के बयानों और सफाई से नहीं ख़त्म हो जाती है. उत्तराखंड में हाईकोर्ट ने सात विधानसभा क्षेत्रों में इस्तेमाल हुई इलेक्ट्रॉनिक मशीनों को ज़ब्त करने के आदेश दिए हैं. आरोप है कि एक बीजेपी नेता ने फेसबुक पोस्ट पर कई बूथों के बारे में किस दल को कितना वोट मिलेगा, इसकी भविष्यवाणी की थी, जो करीब करीब सही निकली. एक आरोप है कि जिस बूथ पर जो मशीनें भेजी गईं थीं, उनकी सूची के अनुसार, पोलिंग बूथ पर मशीनें नहीं थीं... दूसरी मशीनें थीं. हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस दिया है. यही नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के परबती विधानसभा की ईवीएम की फोरेंसिक जांच कराने के आदेश दिए हैं. 2014 में हुए विधानसभा चुनाव का यह मामला है. लगता है इस तरह का आदेश भी पहली बार हुआ है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने 9 सवाल भी पूछे हैं कि...
क्या ईवीएम में कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लग सकता है, जिसे ब्लूटूथ या इंफ्रारेड के ज़रिये संचालित किया जा सकता है. क्या ईवीएम में कोई मेमोरी चिप डाली जा सकती है.
इसमें सबसे गजब की बात यह है क़ि चुनाव आयोग की जगह बीजेपी इसकी सफाई देने में लगी है. बीजेपी अपने प्रवक्ता पीवीएल नरसिंहाराव की किताब ही पढ ले। सुब्रमण्यम स्वामी के भाषणों को सुन ले। और कुछ भक्त टाइप लोग बैलट चुनाव पर पर्यावरण का रोना रो रहे हैं। जबकि लोकतंत्र जैसे गंभीर मुद्दे पर पर्यावरण की चिंता है। लेकिन जब सच में पर्यावरण की बात हो तो सब मजाक उडाकर निकल जाते हैं। अरे प्रचार सामग्री में लगे कागज की चिंता क्यो नहीं है? अखबार के पन्नो में नेताओं के विज्ञापन पेज किस काम के बचाओ पेपर? और फिर जब फुलप्रूफ है तो क्यो 3000 करोड़ लगाने वाले हैं। क्या मुंबई और उत्तराखंड की मशीनें हाईकोर्ट के आदेश पर शील नहीं हुई? भिंड और धौलपुर में क्या हुआ फिर? बीएमसी चुनाव में जीरो वोट पाने वाले प्रत्याशियों का क्या हुआ? उन्हे न बीवी बच्चो अपना वोट तो मिलता न?
इसमें सबसे गजब की बात यह है क़ि चुनाव आयोग की जगह बीजेपी इसकी सफाई देने में लगी है. बीजेपी अपने प्रवक्ता पीवीएल नरसिंहाराव की किताब ही पढ ले। सुब्रमण्यम स्वामी के भाषणों को सुन ले। और कुछ भक्त टाइप लोग बैलट चुनाव पर पर्यावरण का रोना रो रहे हैं। जबकि लोकतंत्र जैसे गंभीर मुद्दे पर पर्यावरण की चिंता है। लेकिन जब सच में पर्यावरण की बात हो तो सब मजाक उडाकर निकल जाते हैं। अरे प्रचार सामग्री में लगे कागज की चिंता क्यो नहीं है? अखबार के पन्नो में नेताओं के विज्ञापन पेज किस काम के बचाओ पेपर? और फिर जब फुलप्रूफ है तो क्यो 3000 करोड़ लगाने वाले हैं। क्या मुंबई और उत्तराखंड की मशीनें हाईकोर्ट के आदेश पर शील नहीं हुई? भिंड और धौलपुर में क्या हुआ फिर? बीएमसी चुनाव में जीरो वोट पाने वाले प्रत्याशियों का क्या हुआ? उन्हे न बीवी बच्चो अपना वोट तो मिलता न?
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