Tuesday, August 29, 2017

लालू की रैली के मायने

पूरा पटना शहर राजद और महागठबंधन के नेताओं-कार्यकर्ताओं, उनके पोस्टर-बैनरों और कट आउटों से अटा पड़ा था. जितने लोग मैदान में जमा थे, उसी अनुपात में लोग गांधी मैदान के चारों तरफ़ सड़कों पर, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों के आसपास भी राजद के झंडे डंडों के साथ दिख रहे थे. वह भी ऐसे समय में जबकि आधा बिहार बाढ़ की चपेट में है. यह रैली कहने को तो 'भाजपा भगाओ, देश बचाओ' के नारे पर हुई लेकिन निशाने पर मुख्य रूप से महागठबंधन के 'विश्वासघाती' नीतीश कुमार ही थे.
लालू प्रसाद और उनके पुत्रों के साथ ही राजद के तमाम नेताओं और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी 'संघ मुक्त भारत' का नारा देने वाले नीतीश कुमार पर महागठबंधन तोड़कर संघ के शरणागत होने और भाजपा से मिलकर सरकार बना लेने का आरोप लगाया. नीतीश कुमार के महागठबंधन तोड़ने के बाद यह लालू प्रसाद और उनके राजद के साथ ही नीतीश कुमार के साथ नहीं गए जद यू के पूर्व अध्यक्ष, सांसद शरद यादव एवं कांग्रेस के लिए भी बड़ा शक्ति प्रदर्शन था जिसमें ये लोग सफल रहे. इस रैली के आयोजन की घोषणा लालू प्रसाद ने काफी पहले तब की थी जब नीतीश कुमार महागठबंधन की सरकार चला रहे थे. हालांकि अंदरखाने वह लालू प्रसाद को गच्चा देकर भाजपा के साथ नए सिरे से जुगलबंदी की जुगत भिड़ाने में लगे थे. लालू प्रसाद पटना से भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन खड़ा करने की कार्ययोजना पर काम कर रहे थे लेकिन नीतीश कुमार ने उसमें फच्चर लगाने की कोशिश की. वे खुद तो भाजपा के साथ गए ही और उन्होंने यह कोशिश भी की कि शरद यादव और उनके साथी भी उनका अनुसरण करें. उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद के प्रलोभन दिए गए. उनके मना कर देने और नीतीश कुमार के पलट जाने के बाद विपक्ष की धुरी बनने की सोच के तहत महागठबंधन के साथ ही बने रहने के राजनीतिक रुख के साफ हो जाने के बाद कोशिशें इस बात की हुईं कि वह इस रैली में नहीं जा सकें. कभी उनके सिपहसालार कहे जाते रहे जद यू के महासचिव के सी त्यागी ने दो दिन पहले उन्हें पत्र भेजकर आगाह किया कि राजद की रैली में उनका भाग लेना अनुशासन की लक्ष्मण रेखा को लांघने जैसा होगा.
रैली के बाद भी त्यागी ने कहा कि शरद दूसरे खेमे में चले गए हैं. अब जद यू के साथ उनका रिश्ता नहीं रह गया है. हालांकि जद यू से उनका औपचारिक निलंबन अथवा निष्कासन अभी बाकी है. त्यागी ने कहा है कि उनका मामला अनुशासन समिति के हवाले है. लेकिन शरद यादव और उनके साथियों पर इस तरह की घुड़कियों का असर नहीं पड़ा. दो दिन पहले उन्होंने कहा भी कि महागठबंधन की रैली का फैसला काफी पहले हुआ था जिसमें नीतीश कुमार के भी शामिल होने की बात थी. नीतीश पलट गए लेकिन हम पलटनेवाले नहीं क्योंकि हम ही असली जद यू हैं जिसके साथ हमारी अधिकतर प्रदेश इकाइयां हैं.
मंच पर उनके साथ राज्यसभा के एक और सदस्य अली अनवर और जद यू के वरिष्ठ नेता, राज्य सरकार में पूर्व मंत्री रमई राम भी थे. मंच से ही शरद यादव ने राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपाई महागठबंधन खड़ा करने की घोषणा की जिसका समर्थन मंच पर मौजूद विपक्ष के तमाम नेताओं ने भी किया. रैली के आयोजकों के अनुसार दिल्ली के इशारे पर कुछ और दलों और नेताओं को भी इस रैली से विमुख होने के दबाव पड़े. मायावती अथवा उनकी बसपा का एक भी प्रतिनिधि नहीं दिखा. रैली में शामिल होने को लेकर वह लगातार अपना स्टैंड बदलते रहीं.
हालांकि, 17 अगस्त को दिल्ली में शरद यादव के साझी विरासत बचाओ सम्मेलन में बसपा के सांसद वीर सिंह मौजूद थे. उस सम्मेलन में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी की मौजूदगी भी थी. इन सभी ने एक स्वर से कहा था कि भाजपा शासन और संघ परिवार की देखरेख में साझी विरासत खतरे में है. इसे बचाने के लिए भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाने की बात कही गई थी. राहुल गांधी ने स्वयं कहा था कि बदली परिस्थतियों में अगर सभी विपक्षी दलों का एक महागठबंधन बन जाए तो भाजपा कहीं दिखेगी नहीं. लेकिन जहां साझी विरासत बचाओ सम्मेलन में 17 दलों के नेता और प्रतिनिधि शामिल हुए वहीं महागठबंधन खड़ा करने की अगली कड़ी के रूप में आयोजित राजद की रैली में केवल 14 दलों के नेता-प्रतिनिधि ही दिखे.
राहुल गांधी स्वयं नहीं आए. उन्होंने पटना आने और लालू प्रसाद के साथ मंच साझा करने के बजाय नार्वे की राजधानी ओस्लो की यात्रा को मुनासिब समझा. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी नहीं आ सकीं. दक्षिण में तमिलनाडु से द्रविड़ मुनेत्र कझगम के लोकसभा सदस्य टी के एस इलेंगोवन और केरल कांग्रेस के प्रतिनिधि आए तो उत्तर पूर्व में असम से एयूडीफ के नेता लोकसभा सदस्य बदरुद्दीन अजमल की मौजूदगी रैली को राष्ट्रीय बना रही थी. ओडिसा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल, दिल्ली से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और हरियाणा से इंडियन नेशनल लोकदल के किसी प्रतिनिधि की गैर मौजूदगी भी खटक रही थी. संभवतः कांग्रेस की नापंसदगी के कारण उन्हें बुलाया ही नहीं गया था. कुल मिलाकर यह रैली लालू प्रसाद और उनके राजद और राजनीतिक कुनबे का शक्ति प्रदर्शन था जिसमें वह पूरी तरह से सफल रहे. एक बार फिर उन्होंने यह साबित किया कि जोड़ तोड़ के खेल से नीतीश कुमार भले ही सरकार चला रहे हों, बिहार में जनाधार वाले वह अकेले नेता हैं. तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच मुकदमों के बावजूद वह भाजपा और उसके नेतृत्व में उभर रही सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध झुकनेवाले नहीं हैं. उन्होंने और उनके पुत्रों ने भी रैली में साफ किया कि मुकदमे और जेल की दीवारें भी सांप्रदायिक ताकतों से लोहा लेने के उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकतीं. उनके जनाधार और सांप्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष के उनके कमिटमेंट का लोहा मंच पर मौजूद विपक्ष के तमाम नेताओं ने भी एक स्वर से माना. यह महा रैली नीतीश कुमार और भाजपा गठबंधन सरकार के लिए भी खतरे का संकेत साबित हो सकती है. राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपा और गैर राजग महागठबंधन ने आकार लेना शुरू हो गया है. इससे इतर बिहार में नीतीश कुमार और भाजपा की राजनीति से नाखुश जद यू और राजग में रालोसपा जैसे घटक दलों के नेताओं, विधायकों के बीच इस महा रैली की सफलता एक नई ताकत का संचार कर सकती है. जद यू के विधायकों का एक बड़ा गुट शरद यादव और लालू प्रसाद के साथ सिर्फ एक आश्वासन भर से जुड़ने को तैयार है कि चुनाव हों अथवा उप चुनाव उन्हें टिकट मिलेगा और उनकी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के ईमानदार प्रयास होंगे. इसका एहसास सृजन घोटाले और भयावह बाढ़ की विभीषिका का भी सामना कर रहे नीतीश कुमार और उनके सहयोगी भाजपा-राजग के लोगों को भी है. आश्चर्य नहीं होगा कि महागठबंधन के साथ जुड़ रहे दलों, नेताओं और राजनीतिक ताकतों को इससे विमुख करने के प्रयास के बतौर प्रलोभन और दबाव भी नए सिरे से नजर आने लगें.

Sunday, August 27, 2017

एक और संत निकला अपराधी

राजसत्ता और धर्म सत्ता के बीच की जटिलताओं का एक भरा पूरा राजनीतिक इतिहास है. अब तक यह राजनीतिक चिंतन का ही विषय था लेकिन डेरा प्रकरण ने इसे न्यायिक क्षेत्र का विषय भी बना दिया. अब तक यह गंभीर विषय माना जाता था लेकिन इस प्रकरण से इसमें रोचकता का तत्व भी आ गया. रोचक इसलिए क्योंकि सिरसा और पंचकूला से डेरा प्रकरण का जो सीधा प्रसारण देखने सुनने को मिल रहा है उसमें नाटयशास्त्र के लगभग सारे अंग एकसाथ दिख रहे हैं. आमतौर पर शांत और रौद्र रस एक साथ देखने को नहीं मिलते लेकिन यहां दोनों गुंथे गए. वैसे बाकी और सात रसों से भरपूर इस प्रकरण में राजनीतिक ज्ञान विज्ञान और शिक्षा का पाठ भी भरपूर है. खासतौर पर एक बात को लेकर कि व्यवस्था में प्रभुत्व किस का रहे लेकिन डेरा प्रकरण में एक नई बात है. वर्तमान परिस्थितियां दोनों सत्ताओं के बीच समन्वय का दृश्य प्रस्तुत कर रही हैं. और मान लें कि न्याय के प्रति दोनों में सम्मान का भाव है तो क्या यह नहीं दिख रहा है माननीय न्यायालय राजसत्ता से कह रहा है कि डेरा भक्तों को हटाइए और सरकार कह रही है कि हम बल प्रयोग नहीं करेंगे बल्कि निवेदन का उपाय अपनाएंगे जो पिछले बीस घंटो से कारगर नहीं हो रहा है. सरकार पिछले 20 घंटे से आश्वस्त करती चली आ रही है कि हालात काबू में हैं. न्यायालय कह रहा है कि फैसला सुनाने लायक हालत बनाइए. न्यायालय का कहना है कि प्रशासन धारा 144 के अपने एलान को लागू क्यों नहीं कर पा रहा है. 
देश भर से आकर डेरे के बाहर डेरा डाले डेरा भक्त सिर्फ भक्त ही नहीं बल्कि जिस तरह से जागरूक दिख रहे हैं यह अभूतपूर्व है. देश के तेजतर्रार मीडिया का जबाव देने में डेरा भक्तों ने चतुर और दबंग पत्रकारों को भी लाजवाब कर दिया. मसलन एक पत्रकार पूछ रहा था आप यहां कब से हैं? उसका जवाब था जन्म से. दूसरे का जबात था यह हमारा घर है हम तो यहीं के हैं. पुलिस से मीडिया का सवाल था कि 144 के बाावजूद इतने हजार या लाख लोग जमा कैसे हो गए? उसका जवाब था चार की पाबंदी है लेकिन दो-दो तीन-तीन करके आ गए. सीमाएं सील थीं फिर बसें और दूसरे वाहन  कैसे आ गए? इसका जवाब यह कि समर्पित भक्त है मीलों पैदल चलकर आ गए. अदालती आदेश के बाद उन्हें हटाया क्यों नहीं जा पा रहा है. जवाब कि हम बल प्रयोग नहीं करेंगे. इस तरह 144 का मतलब क्या? इसका जवाब ये कि भीड़ शांत है तो इसकी क्या ज़रूरत. अन्ना आंदोलन की नज़ीर हाज़िर है. किसी ने बात नहीं कि धारा 144 एहतियात की है. भीड़ जमा होने से रोकने की है ताकि अफे- दफे हो ही न पाए. यहां सरकार की मुद्रा यह कि कोई अफे दफे नहीं होने जा रही. और जब होगी तो हम उसके लिए तैयार हैं लेकिन मामला कानून के पालन का तो बन ही गया. 
सरकार ने बाबा से निवेदन किया कि अदालती फेसला सुनने के लिए हैलिकोप्टर से चलिए लेकिन बाबा ने इनकार कर दिया और कार के बड़े काफिले के साथ सड़क से जाने को पसंद किया. मुसलसल मुस्तैद और तैनात होने के बावजूद मीडिया वह दृश्य कैद ही नहीं कर पाया कि बाबा कब अपने आवास से निकले, न यहे रिकॉर्ड कर पाया कि उनके काफिले को कहां कहां रोक रक छोटा किया गया. दृश्य की बजाए यह सूचना उसने सिर्फ बोलकर दी. सरकार और पुलिस अदालत में पेश करने के लिए अपनी मुस्तैदी के सबूत बनाने में लगी रही कि हमने आपके आदेश के मुताबिक हालात पर लगातार नज़र बनाए रखी. अभी भारतीय मीडिया में इसका आकलन शुरू नहीं हुआ है लेकिन इस समय इस रोचक और गंभीर प्रकरण का सीधा प्रसारण दुनिया के सारे देश देख रहे हैं. इनमें रोचक प्रकरण मानकर चलने वाले सामान्य दर्शक तो होंगे ही लेकिन अपने अपने धर्मों की सत्ता के प्रभुत्व के आंकाक्षी भक्त भी होंगे और राजनेता और राजनीतिक चिंतक भी होंगे. इस तरह प्रसारण के लिहाज़ से ये प्रकरण  विश्वव्यापी साबित होता है. भले ही दुनिया में इस समय इस तरह के प्रकरणों का राजनीतिक आगा-पीछा सोचने का माहौल बिल्कुल भी नहीं बचा हो लेकिन राजनीति विज्ञान के विद्वान और शोधछात्र सोचे बगैर रह नहीं पा रहे होंगे.

Friday, August 25, 2017

राइट टू प्राईवेसी पर ऐतिहासिक फ़ैसला


प्राइवेसी का सवाल सिर्फ आधार नंबर के संदर्भ में नहीं है. इस संदर्भ में भी है कि एक धर्म की लड़की जब दूसरे धर्म की लड़के से शादी करेगी तो सरकार की एजेंसियां जांच नहीं करेंगी. समलैंगिकों के सवाल को यह अधिकार मज़बूती देगा. यह सवाल वहां भी आता है कि क्या कोई सरकारी एजेंसी आपका फोन रिकॉर्ड कर सकती है. अदालत की संविधान पीठ ने कहा कि वे यहां निजता क्या-क्या है, सभी की सूची तैयार नहीं कर रहे हैं, इसके बाद भी प्राइवेसी का जो दायरा बताया गया है कि वो काफी महत्वपूर्ण है. संविधानपीठ ने कहा है कि सेक्सुअल संबंध, व्यक्तिगत संबंध, पारिवारिक जीवन की मान्यता, शादी करना, बच्चे पैदा करना यह सब निजता के अधिकार हैं. प्राइवेसी का अधिकार वो है जो व्यक्तिगत स्वायत्ता का बचाव करता है. यह अधिकार मान्यता देता है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन के वाइटल पहलुओं को कैसे नियंत्रित करता है. व्यक्तित चयन भी प्राइवेसी का हिस्सा है. प्राइवेसी हमारी संस्कृति की विविधता, बहुलता को भी संरक्षण देती है. कोई व्यक्ति पब्लिक प्लेस में है, इस वजह से उसकी प्राइवेसी खत्म नहीं हो जाती है. इंसान की गरिमा का अभिन्न अंग है प्राइवेसी. कोर्ट ने कहा कि संविधान के मायने, इसके बनने के दौर के संदर्भ में बंद नहीं किये जा सकते हैं. बदलते वक्त की लोकतांत्रिक चुनौतियों के अनुसार इसकी ठोस व्याख्या होती रहनी चाहिए. निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है. केके वेणुगोपाल, भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल ने संविधान पीठ के सामने कहा था कि राज्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत जो हक देता है उसके हित में निजता का अधिकार छोड़ा जा सकता है. हमारा मत है कि निजता का अधिकार अमीरों की कल्पना है जो बहुसंख्यक जनता की आकांक्षाओं और ज़रूरतों से काफी अलग है. अदालत मानती है कि इस दलील में दम नहीं है. यह दलील संविधान की समझ के साथ धोखा है. हमारा संविधान एक व्यक्ति को सबसे आगे रखता है. यह कहना कि ग़रीब को सिर्फ आर्थिक उन्नति चाहिए, नागरिक और राजनीतिक अधिकार नहीं, सही नहीं है. संविधान पीठ ने सरकार के कार्यों की समीक्षा, सवाल करने, उससे असहमत होने के अधिकार को भी संरक्षण दिया है. अदालत का कहना है कि यह सब लोकतंत्र में नागरिकों को सक्षम बनाता है, इससे वे राजनीतिक चुनाव बेहतर करते हैं. एक जगह तो सरकार के कटु आलोचक प्रोफेसर अमर्त्य सेन का भी ज़िक्र आया है जिसे देखकर सरकार के मशहूर वकीलों को अच्छा नहीं लगेगा. अदालत ने बड़े विस्तार से समझाया कि सामाजिक आर्थिक तरक्की का नागरिक राजनीतिक अधिकारों से कोई झगड़ा नहीं है. इसी संदर्भ में संविधान पीठ के फैसले में एक जगह ज़िक्र आता है कि इनमें से कुछ चिंताओं की झलक नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के लेखों में भी मिलती है. सेन ने अकाल के समय में ग़ैर लोकतांत्रिक सरकारों और लोकतांत्रिक सरकारों की हरकतों की तुलना की है. उनका विश्लेषण बताता है कि निरंकुश राज्य में सरकार के नेताओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है जिसके कारण अकाल जैसे स्थिति में जनता को राहत नहीं मिल पाती है.सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ राइट टू प्राइवेसी को लेकर फैसला सुनाया है। पीठ को ये तय करना था कि निजता मौलिक अधिकार है या नहीं ? क्या ये संविधान का हिस्सा है ? इस फैसले का असर सीधे सीधे विभिन्न सरकारी योजनाओं को आधार कार्ड से जोडने के मामले पर पडेगा। सुप्रीम कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं हैं।  कोर्ट ने सात दिनों की सुनवाई के बाद 2 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। दरअसल 1954 में 8 जजों की बेंच ने और 1962 में 6 जजों की बेंच ने कहा था कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार नहीं है।इस पीठ में CJI जे एस खेहर, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस AR बोबडे,जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन,  जस्टिस अभय मनोगर स्प्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड जस्टिस संजय किशन कौल और  जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणीअगर मैं अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में हूं तो ये प्राइवेसी का हिस्सा है। एेसे में पुलिस मेरे बैडरूम में नहीं घुस सकती। लेकिन अगर मैं बच्चों को स्कूल भेजता हूं तो ये प्राइवेसी के तहत नहीं है क्योंकि ये राइट टू एजूकेशन के तहत आता है ,आप बैंक में अपनी जानकारी देते हैं, मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। ये सब कानून द्वारा संचालित है यहां बात अधिकार की नहीं है।आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बडा मुद्दा है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है| सरकार द्वारा गोपनीयता भंग करने एक बात है लेकिन उदाहरण के तौर पर टैक्सी एग्रीगेटर द्वारा आपका दिया डाटा आपके खिलाफ ही इस्तेमाल कर ले प्राइसिंग आदि में वो उतना ही खतरनाक है।मैं जज के तौर पर बाजार जाता हूं और आप वकील के तौर पर माल जाते हैं। टैक्सी एग्रीगेटर इस सूचना का इस्तेमाल करते हैं। राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं क्योंकि आप बैंक में अपनी जानकारी देते हैं, मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। ये सब कानून द्वारा संचालित है यहां बात अधिकार की नहीं है। आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बडा मुद्दा है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है। राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं | सरकार को वाजिब प्रतिबंध लगाने से नहीं रोक नहीं सकतेक्या केंद्र के पास आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है ?विचार करने की बात ये है कि मेरे टेलीफोन या ईमेल को सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ शेयर क्यों किया जाए ?मेरे टेलाफोन पर काल आती हैं तो विज्ञापन भी आते हैं। तो मेरा मोबाइल नंबर सर्विस प्रोवाइडर्स से क्यों शेयर किया जाना चाहिए,क्या केंद्र सरकार के पास डेटा प्रोटेक्ट करने के लिए ठोस सिस्टम है ? सरकार के पास डेटा को संरक्षण करने लिए ठोस मैकेनिज्म होना चाहिएहम जानते हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार डेटा इकट्ठा कर रहे हें लेकिन ये भी सुनिश्चित हो कि ड

Wednesday, August 2, 2017

अहमद पटेल पर राजनीतिक संकट

अगर अहमद पटेल यह चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो बीजेपी एक साथ कई निशाने लगाने में कामयाब हो जाएगी. प्रतिद्वंद्वी पार्टी के शीर्ष नेता को उसी गृहराज्य में पटखनी देकर शर्मिन्दा करने का लाभ तो होगा ही, पार्टी का नैतिक बल भी कमज़ोर होगा, और इसके बाद इसी साल दिसंबर से पहले होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अन्य विधायक भी बीजेपी की ओर रुख कर सकते हैं. अहमद पटेल के पास अब दोबारा चुने जाने के लिए आवश्यक वोटों के मामले में कतई मामूली बढ़त रह गई है.
बीजेपी उस राज्य में एक बार फिर जीत की तरफ बढ़ती नज़र आ रही है, जिस पर वह लगभग 22 साल से निर्बाध शासन कर रही है. लेकिन अपनी पकड़ का विस्तार करने के साथ-साथ कांग्रेस की पकड़ को कम करने के लिए अमित शाह ने 'मिशन 150' का आह्वान किया है, जो बीजेपी को मौजूदा 121 विधायकों से 150 तक ले जाने की कवायद है, जो 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के उनके अभियान की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा.
पिछले ही सप्ताह बिहार में कांग्रेस को हटाने में बीजेपी कामयाब रही है, जहां कांग्रेस नीतीश कुमार की सरकार का हिस्सा थी. नीतीश ने कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ चल रहे महागठबंधन को धता बताते हुए बीजेपी के साथ पुराने रिश्तों को फिर कायम कर लिया. अहमद पटेल का कहना है कि जिन राज्यों में जनमत नहीं मिलता है, वहां राजनैतिक उठापटक के ज़रिये सरकार बना लेना बीजेपी का तरीका रहा है. उन्होंने कहा, "(प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी और (अमित) शाह सत्ता के बेहद भूखे हैं... देखिए, उन्होंने बिहार में क्या किया है... अरुणाचल प्रदेश में उनके पास एक भी विधायक नहीं था, लेकिन वे सरकार बनाने में कामयाब रहे... वे किसी भी हद तक जा सकते हैं... उन्हें पहली बार केंद्र में सत्ता हासिल हुई है, और इसीलिए वे सभी कुछ कर रहे हैं, उसे बचाए रखने के लिए हर तरीका अपना रहे हैं..."
उन्होंने बीजेपी नेताओं द्वारा लगाए गए उन आरोपों का भी खंडन किया कि वह भीषण बाढ़ से जूझ रही गुजरात की जनता की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर इपनी निजी ज़रूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी सहित कई आलोचकों ने कहा है कि ऐसे समय में विधायकों को राहत और बचाव कार्यों की देखरेख के लिए अपने-अपने क्षेत्र में होना चाहिए, बेंगलुरू के होटल में नहीं. पलटवार करते हुए अहमद पटेल कहते हैं, "रूपाणी अमित शाह की कठपुतली हैं... क्या मुझे उनकी बात का जवाब देना चाहिए... मुझे उन पर तरस आता है... उन्हें अपनी पार्टी की चिंता करने दीजिए... हमें विधायकों को (बेंगलुरू) ले जाना पड़ा, क्योंकि वे (बीजेपी) किसी भी नियम को नहीं मानते... वे उन्हें परेशान कर रहे थे... मैं यहां गुजरात में ही हूं, और सुनिश्चित कर रहा हूं कि बाढ़ राहत का काम चलता रहे..."
उन्होंने यह दावा भी किया कि उन्होंने अपनी बॉस सोनिया गांधी को बता दिया था कि वह राज्यसभा में पांचवां कार्यकाल नहीं चाहते हैं, लेकिन जब उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें नामांकित कर दिया है, तो "मुझे चुनाव लड़ना पड़ा..." उन्होंने कहा, "सत्ता के भूखे वे लोग हैं, जो सत्ता में आने के लिए दंगे करवाते हैं... उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे किसने करवाए...? अगर मुझे सत्ता का लालच होता, तो मैं राजीव गांधी के ही कार्यकाल से मंत्री होता... मुझे चार बार बढ़िया मंत्रालयों की पेशकश की गई थी, जिनमें से दो बार डॉ मनमोहन सिंह द्वारा की गई थी - लेकिन मैंने कभी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मैं पार्टी के लिए काम करना चाहता था..."
बताया जाता है कि अमित शाह कांग्रेस नेता के खिलाफ इसलिए हैं, क्योंकि वह वर्ष 2010 में हत्या के आरोप में उन्हें जेल भेजे जाने के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती केंद्र सरकार को दोषी ठहराते हैं. मामला गुजरात पुलिस द्वारा एक मामूली अपराधी को मार डालने का था, और आरोप था कि पुलिस ने वह काम गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह के आदेश पर किया था. उस समय बीजेपी ने कहा था कि सीबीआई के आरोप कांग्रेस सरकार की शह पर लगाए गए हैं. गुजरात में कांग्रेस को और सिमटा देने की इस योजना में बीजेपी प्रमुख को शंकरसिंह वाघेला के रूप में 'अच्छा' सहयोगी भी मिल गया है. वर्ष 1996 में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, और इस साल कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाने की उनकी मांग को ठुकरा दिया था. इस बात से गुस्साए वाघेला ने अपनी ताकत दिखाई, और पिछले माह हुए राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के 11 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ वोट दिया. अब वह विधायकों को कांग्रेस से दूर और बीजेपी के पास ले जा रहे हैं. अहमद पटेल का कहना है कि उन्होंने वाघेला को अपनी राज्यसभा सीट देने की पेशकश की थी, लेकिन उनकी पार्टी ने इस पेशकश को ठुकरा दिया. उन्होंने यह भी ज़ोर देकर कहा कि अगर किसी तरह वह हार जाते हैं, तो इसे सोनिया गांधी तथा उनके पुत्र के नेतृत्व द्वारा किए गए कुप्रबंधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अपनी पार्टी के प्रथम परिवार को सभी तरह के दोषों और आरोपों से दूर रखने के कांग्रेसी नेताओं के हमेशा अपनाए जाने वाले रुख के तहत अहमद पटेल ने कहा, "मैं प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहा हूं, कांग्रेस अध्यक्ष के सचिव के रूप में नहीं... दोनों का आपस में क्या रिश्ता है...? कृपया उन्हें (सोनिया गांधी) या हमारे उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इसमें मत लाइए..."

नीतीश और मोदी की मित्रता के बाद की राजनीति

बिहार की राजनीति में पिछले हफ्ते जो हुआ, उस पर पूरे देश में बहस जारी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस नाटकीय घटनाक्रम में महागठबंधन को अलविदा कहते हुए बीजेपी के साथ सरकार बनाई, उससे खुद पटना से दिल्ली तक बीजेपी के नेता हतप्रभ थे. ये कयास करीब तीन हफ्ते से स्‍पष्‍ट था कि सीबीआई द्वारा मामला दर्ज होने के बाद तेजस्वी यादव ने ना तो सफाई दी और ना ही इस्तीफा दिया, जिससे नीतीश को इस्तीफा देने का एक मजबूत आधार मिल गया. लेकिन हर व्‍यक्ति जानना चाहता है कि नीतीश कुमार ने जो किया, वो क्यों किया? नीतीश को मालूम था कि सीबीआई छापेमारी के बाद उनके फ़ोन का इंतजार करने वाले राजद अध्यक्ष लालू यादव भविष्‍य में चारा घोटाले या किसी अन्य मामले में जेल जाने के बाद उनसे जेल में मुलाकात की अपेक्षा रखते और उससे ज्यादा जैसे एक ज़माने में लालू यादव के तब के सहयोगी और अब केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान उन्हें निर्दोष करार देते थे, वैसी भूमिका में नीतीश भी दिखे.. ये बात नीतीश को कतई पसंद नहीं होती. नीतीश कुमार को इस बात का भरोसा हो गया था कि लालू यादव ने संपत्ति के चक्कर में अपने दोनों बेटों खासकर तेजस्वी के राजनीतिक जीवन को मिट्टी में मिला दिया हैं, लेकिन इन सबसे ज्यादा नीतीश कुमार महागठबंधन में असहज हो गए थे और लालू यादव के यादव वोटरों के सामाजिक बर्ताव के कारण उन्हें ये अपने नेता, कार्यकर्ता और प्रशासनिक मशीनरी के फीडबैक के आधार पर ये भरोसा हो गया था कि लोकसभा चुनाव में यादव वोट मिले या न मिले, लेकिन अति पिछड़ा, महादलित और अपने जाति का वोट भी शायद ही मिले... इसलिए अगर वो पूरे विपक्ष के प्रधानमंत्री के उमीदवार भी बन जाएं तो लालू यादव के साथ के कारण उनकी दुर्गति निश्चित है. लालू यादव यहां नीतीश से मात खा गए. वे अपने बड़बोलेपन और राजनीतिक स्थिति को भांपने में नाकामयाबी के कारण ये मानकर चल रहे थे कि नीतीश कुर्सी पर बैठे रहने के कारण शायद उनकी हर बात मानते रहेंगे.
लेकिन नीतीश ने जब एक बार पार्टी का मन भांप लिया, उसके बाद बीजेपी के साथ पुराने संबंधों के कारण न संवाद और न ही सरकार बनाने की जो भी आवश्यक औपचारिकता होती हैं, उसे पूरा करने में कोई देरी हुई, क्योंकि बीजेपी के शीर्ष पर बैठे लोगों ने इस मामले में राज्य इकाई के लोगों से रायशुमारी करने की जरूरत नहीं समझी और ये सब कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह और नीतीश के बीजेपी में सबसे विश्‍वस्‍त अरुण जेटली तक सब सीमित रहा. वर्तमान बीजेपी को लालू के साथ नीतीश के दिनोंदिन तनाव से राजनीतिक लाभ था, क्योंकि आने वाले चुनाव में फायदा उन्हें ही मिलता, लेकिन नीतीश को तुरंत समर्थन देकर बीजेपी यह सन्देश देने में कामयाब रही है कि 2019 में कोई ज्यादा मुकाबला बचा नहीं हैं और विपक्ष भले नीतीश पर जितना हमला कर ले, लेकिन उनके इस कदम से परेशान और हताश दोनों हैं.
लेकिन नीतीश के निर्णय पर आखिर प्रतिक्रिया क्या हैं? निश्चित रूप से नीतीश ने एक साथ अपने किसी निर्णय के लिए अपने राजनीतिक जीवन में इतना आलोचना नहीं झेली होगी. हालांकि इस पर आम लोग और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच कोई एक मत नहीं हैं. सबसे पहले बिहार में रहने वाले अधिकांश लोग, चाहे वो किसी जाति, वर्ग के हों, उन्हें पता नहीं, लेकिन एक राहत की सांस ले रहे हैं. हो सकता हैं कि ये अचानक पुलिस और प्रशासन के लोगों को सड़कों पर देखकर हो या अधिकारियों के तबादले की खबर से, क्योंकि महागठबंधन की धर्मनिरपेक्ष सरकार की ये सच्‍चाई थी कि तबादले खासकर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक या अन्य अधिकारियों के तबादले नीतीश के बूते नहीं था और लालू यादव ने इस बात को माना भी है कि उनका हस्तक्षेप रहता था, लेकिन उनके मनमाफिक अधिकारी इतने विवादास्पद होते थे कि सब कुछ लटका पड़ा था और पूरे राज्य में विधि व्‍यवस्‍था के गिरते स्तर पर सब वर्ग के लोग सहमत थे. दूसरा, नीतीश के इस कदम के जो सबसे मुखर आलोचक हैं और कल तक उनके हर कदम के सबसे बड़े समर्थक होते थे, उनकी आलोचना का कारण है कि नीतीश ऐसे पीठ दिखा कर जायेंगे, उन्हें उम्मीद थी लेकिन विश्‍वास नहीं हो रहा. ये नीतीश के नए आलोचक बीजेपी के सबसे बड़े विरोधी रहे हैं और उनके लिए मोदी, शाह के साथ नीतीश का आना एक कटु सच के अलावा व्‍यक्तिगत झटका है. इसमें बिहार से जुड़े, दिल्ली में बसे, बिहार के विशेषज्ञ सब तरह के लोग हैं. उन्हें लगता हैं कि फ़िलहाल दूर-दूर तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाला कोई नीतीश की तरह का कद्दावर नेता नहीं रहा. ऐसे लोग परेशान और दुखी दोनों हैं, लेकिन नीतीश की मजबूरी है कि वो सबको अपने इस कदम के पीछे की मजबूरी के बारे में और बिहार के हालात और लालू यादव की भूमिका के बारे में व्‍यक्तिगत रूप से सफाई नहीं दे सकते और उन्होंने खुद भी माना है कि अपने कामों से आलोचकों को गलत साबित करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं, लेकिन वोटर का भी एक बड़ा समूह है जो ठगा महसूस कर रहा है, लेकिन उसे नीतीश के बिहार बीजेपी से कोई डर नहीं लगता जितना मोदी-शाह का भय हमेशा सताता रहता है. 
आने वाले दिनों में, नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा. भले लालू यादव इस बात से खुश हो रहे हैं कि भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार की विश्‍वसनीयता कम हुई हैं और तेजस्वी यादव विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में अपने भाषण से सबको प्रभावित करने में सफल रहे हों, लेकिन लालू यादव जब तक अपने परंपरागत वोट बैंक में बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड समर्थित जातियों को तोड़ने में कामयाब नहीं होते, तब तक राजनीतिक चुनौती या चुनाव जीतने के समीकरण के लिए आश्‍वस्‍त नहीं हो सकते.. लेकिन नीतीश की असल चुनौती है जिस भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर उन्होंने इतना बड़ा बवाल खड़ा कर इतनी बड़ी राजनीतिक पलटी मारी वो अगर राज्य में नीचे से लेकर सचिवालय के स्तर तक करप्‍शन पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते तब तक आम जनता यही मानेगी कि तेजस्वी केवल मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के साथ मिलने के लिए एक बहाना थे. हालांकि ये उम्मीद की जा रही है कि केंद्र जल्द बिहार के लिए कुछ बड़ी घोषणा कर सकता है, लेकिन अगर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विभागों के कामकाज सुधार पाने में नीतीश ध्यान केंद्रित नहीं करते, तब शायद बिहार के लोगों में उनकी प्रशासनिक क्षमता को लेकर उठ रहे सवालों का निराकरण नहीं होगा. नीतीश कुमार के 12 सालों के शासनकाल के बावजूद सच्‍चाई यही है कि राजधानी पटना में सफाई हो या रोशनी व्‍यवस्‍था या ट्रैफिक सबकुछ बदहाल हैं.  हालांकि बीजेपी के साथ सत्ता संभालने के कुछ दिन के अंदर ही राज्य में माफिया खासकर बालू माफिया के खिलाफ अभियान की शुरुआत हो गई है, लेकिन राजद से जुड़े नेताओं को निशाने पर रखकर लोगों का विश्‍वास नहीं जीता जा सकता. जब तक इस गोरखधंधे में लगे सभी पक्षों, वो पुलिस हो या पर्यावरण और खनन विभाग के अधिकारी या इस धंधे में लगे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के पैसे को बेनकाब नहीं किया जाता, कार्रवाई की विश्वनीयता पर सवाल खड़े होते रहेंगे.. लेकिन इन सबसे ज्यादा जरूरी है कि नीतीश कुमार को शराबबंदी की आड़ में सामानांतर होम डिलीवरी से लेकर देशी शराब बनाने का जो धंधा घर-घर शुरू हो गया है, उसका समाधान ढूंढना होगा. आज किसी से ये बात छिपी नहीं कि पुलिस के अधिकारी थाने से लेकर जिला मुख्यालय तक इस शराबबंदी में चांदी काट रहे हैं और राज्य में ब्लैक मनी और बेनामी सम्पति बनाने का ये बड़ा आय का स्‍त्रोत हैं और आने वाले दिनों में नीतीश सरकार को सबसे ज्यादा इस कसौटी पर परखा जाएगा कि आखिर बिहार में  शराबबंदी सफल है या विफल.

लालू की हार या कुछ और संकेत?

राजनीति में कुछ भी संभव है. जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक हो सकते हैं, तो फिर क्‍या संभव नहीं है. नीतीश कुमार का वापस एनडीए के पास जाना कोई आश्‍चर्य पैदा नहीं करता. यह तो होना ही था. ऐसा पहले भी कहा जा रहा था और अब भी यही कहा जा रहा है. हालांकि नीतीश कुमार गठबंधन में संघर्ष के 20 महीने भी नहीं झेल पाए और निकल लिए. बिहार के राज्‍यपाल को अपना त्‍यागपत्र सौंपने के बाद जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की, उसमें यही कहा कि अब झेलना संभव नहीं है. लालू और नीतीश एक ही परिवार के दो भाइयों की तरह है. दोनों को राजनीति करनी है और अपनी ज़मीन को भी मजबूत बनाए रखना है. लालू प्रसाद ने जहां पिछड़े वर्ग और मुस्‍ल‍िमों को साथ लेकर बिहार की राजनीति में अपनी ज़मीन को मजबूत किया, वहीं नीतीश कुमार अपने लिए एक अलग वर्ग तैयार करने में कामयाब रहे. मंडल कमीशन लागू होने के बाद वह बिहार के पिछड़े वर्ग में जो समृद्ध थे और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे, ऐसे लोगों को साथ लेकर चले. रामविलास पासवान के वोट बैंक में सेंध लगाई और एक अलग वर्ग महादलित के नाम से तैयार किया. लालू प्रसाद के मुस्‍ल‍िम वोट बैंक में सेंध लगाकर पसमांदा वोट बैंक को अपने साथ जोड़ा और इस तरह नीतीश एक नए वोट बैंक के साथ बिहार की राजनीति में अपनी पहचान बनाई. बिहार में चुनाव से पहले जब गठबंधन की बात चल रही थी, उस दौरान दोनों नेता अपने-अपने हित को देख रहे थे. नीतीश कुमार ने देख लिया था कि कैसे नरेंद्र मोदी की भारी जीत के बाद भी दिल्‍ली की जनता ने उन्‍हें नकार दिया था. मतलब साफ था कि राज्‍य के चुनाव में राज्‍य के मुद्दे हावी रहेंगे. हालांकि जातीय गणित को देखा जाए, तो लालू के साथ मिलकर चुनाव लड़ना फायदेमंद था. नीतीश कुमार वैसे भी एनडीए से खफा चल रहे थे कि उनकी साफ छवि के बावजूद गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के तौर पर उनका नाम क्‍यों नहीं लिया गया. यही कुछ व्‍यक्‍तिगत कारण थे, जिन्हें लेकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से दूरी बना ली और लालू के साथ गठबंधन बनाकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला लिया। लालू प्रसाद पर खुद को बचाए रखने का संकट था. एक मामले में कोर्ट से उन्‍हें सजा मिल चुकी थी. वह चुनाव नहीं लड़ सकते थे. इस दौर में राबड़ी देवी को लेकर चुनाव में उतरना उनके लिए सेफ नहीं था. मीसा चुनाव हार चुकी थीं, तो लालू के पास दोनों बेटों को राजनीति के लिए तैयार करने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं बचा था. और यह तभी संभव था, जब कोई मजबूत ढाल उनके पास हो. बिहार की राजनीति में पासवान उतने प्रासंगिक नहीं बचे थे. उपेंद्र कुशवाहा का उदय हो रहा था, जो कोइरी-कुर्मी वोट बैंक के साथ लोकसभा की कुछ सीटों पर कब्‍जा जमाए थे. लालू के पास एकमात्र विकल्‍प नीतीश कुमार थे, जो उनके काम आ सकते थे. और उधर, नीतीश कुमार को एक सहारे की ज़रूरत थी, जो उनके वोट बैंक के साथ मिलकर बहुमत हासिल कर सके. यह महज संयोग नहीं था, बल्‍कि दोनों के अपने अपने हित थे, जो दोनों को ज़िन्दा बचाए रखने के लिए ज़रूरी था. अगर दोनों अकेले-अकेले चुनाव मैदान में जाते, तो उनका वोट बैंक बिखर जाता और इसका सीधा फायदा बीजेपी को होता. यह दोनों के हित में नहीं। अब इस गठबंधन के बिखर जाने से दोनों को फायदा हुआ है. नीतीश ने साबित कर दिया कि नरेंद्र मोदी की आंधी के बाजवूद बिहार में वही नेता हैं. यह नीतीश कुमार की व्‍यक्‍त‍िगत संतुष्‍ट‍ि भी है और उपलब्‍ध‍ि भी. वैसे भी नीतीश कुमार इस गठबंधन में फिट नहीं बैठ रहे थे. लालू प्रसाद का साथ न उनके व्‍यक्‍तित्‍व से मेल खा रहा था, न उनकी राजनीति के तौर-तरीकों से. गठबंधन बना और भारी जीत के साथ नीतीश सत्‍ता में आ गए. बिहार को नीतीश मिल गए, लेकिन लालू प्रसाद की पार्टी भी बच गई. एक राजनीतिक परिवार मजबूत हो गया. उनके दोनों बेटे चुनाव जीते और मंत्री बन गए. लालू प्रसाद को और क्‍या चाहिए था. गठबंधन की सरकार पूरे 20 महीने चली और इतने समय में लालू प्रसाद के दोनों बेटों की ट्रेनिंग भी हो गई. लालू के दोनों युवराज अब राजनीति में संघर्ष करने के दांव-पेंच देख लिए और संभव है, लालू की विरासत को दूर तक लेकर जाएं. इसके लिए लालू प्रसाद को अपने 'कल तक सहयोगी रहे' नीतीश कुमार का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...