Friday, August 25, 2017

राइट टू प्राईवेसी पर ऐतिहासिक फ़ैसला


प्राइवेसी का सवाल सिर्फ आधार नंबर के संदर्भ में नहीं है. इस संदर्भ में भी है कि एक धर्म की लड़की जब दूसरे धर्म की लड़के से शादी करेगी तो सरकार की एजेंसियां जांच नहीं करेंगी. समलैंगिकों के सवाल को यह अधिकार मज़बूती देगा. यह सवाल वहां भी आता है कि क्या कोई सरकारी एजेंसी आपका फोन रिकॉर्ड कर सकती है. अदालत की संविधान पीठ ने कहा कि वे यहां निजता क्या-क्या है, सभी की सूची तैयार नहीं कर रहे हैं, इसके बाद भी प्राइवेसी का जो दायरा बताया गया है कि वो काफी महत्वपूर्ण है. संविधानपीठ ने कहा है कि सेक्सुअल संबंध, व्यक्तिगत संबंध, पारिवारिक जीवन की मान्यता, शादी करना, बच्चे पैदा करना यह सब निजता के अधिकार हैं. प्राइवेसी का अधिकार वो है जो व्यक्तिगत स्वायत्ता का बचाव करता है. यह अधिकार मान्यता देता है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन के वाइटल पहलुओं को कैसे नियंत्रित करता है. व्यक्तित चयन भी प्राइवेसी का हिस्सा है. प्राइवेसी हमारी संस्कृति की विविधता, बहुलता को भी संरक्षण देती है. कोई व्यक्ति पब्लिक प्लेस में है, इस वजह से उसकी प्राइवेसी खत्म नहीं हो जाती है. इंसान की गरिमा का अभिन्न अंग है प्राइवेसी. कोर्ट ने कहा कि संविधान के मायने, इसके बनने के दौर के संदर्भ में बंद नहीं किये जा सकते हैं. बदलते वक्त की लोकतांत्रिक चुनौतियों के अनुसार इसकी ठोस व्याख्या होती रहनी चाहिए. निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है. केके वेणुगोपाल, भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल ने संविधान पीठ के सामने कहा था कि राज्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत जो हक देता है उसके हित में निजता का अधिकार छोड़ा जा सकता है. हमारा मत है कि निजता का अधिकार अमीरों की कल्पना है जो बहुसंख्यक जनता की आकांक्षाओं और ज़रूरतों से काफी अलग है. अदालत मानती है कि इस दलील में दम नहीं है. यह दलील संविधान की समझ के साथ धोखा है. हमारा संविधान एक व्यक्ति को सबसे आगे रखता है. यह कहना कि ग़रीब को सिर्फ आर्थिक उन्नति चाहिए, नागरिक और राजनीतिक अधिकार नहीं, सही नहीं है. संविधान पीठ ने सरकार के कार्यों की समीक्षा, सवाल करने, उससे असहमत होने के अधिकार को भी संरक्षण दिया है. अदालत का कहना है कि यह सब लोकतंत्र में नागरिकों को सक्षम बनाता है, इससे वे राजनीतिक चुनाव बेहतर करते हैं. एक जगह तो सरकार के कटु आलोचक प्रोफेसर अमर्त्य सेन का भी ज़िक्र आया है जिसे देखकर सरकार के मशहूर वकीलों को अच्छा नहीं लगेगा. अदालत ने बड़े विस्तार से समझाया कि सामाजिक आर्थिक तरक्की का नागरिक राजनीतिक अधिकारों से कोई झगड़ा नहीं है. इसी संदर्भ में संविधान पीठ के फैसले में एक जगह ज़िक्र आता है कि इनमें से कुछ चिंताओं की झलक नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के लेखों में भी मिलती है. सेन ने अकाल के समय में ग़ैर लोकतांत्रिक सरकारों और लोकतांत्रिक सरकारों की हरकतों की तुलना की है. उनका विश्लेषण बताता है कि निरंकुश राज्य में सरकार के नेताओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है जिसके कारण अकाल जैसे स्थिति में जनता को राहत नहीं मिल पाती है.सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ राइट टू प्राइवेसी को लेकर फैसला सुनाया है। पीठ को ये तय करना था कि निजता मौलिक अधिकार है या नहीं ? क्या ये संविधान का हिस्सा है ? इस फैसले का असर सीधे सीधे विभिन्न सरकारी योजनाओं को आधार कार्ड से जोडने के मामले पर पडेगा। सुप्रीम कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं हैं।  कोर्ट ने सात दिनों की सुनवाई के बाद 2 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। दरअसल 1954 में 8 जजों की बेंच ने और 1962 में 6 जजों की बेंच ने कहा था कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार नहीं है।इस पीठ में CJI जे एस खेहर, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस AR बोबडे,जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन,  जस्टिस अभय मनोगर स्प्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड जस्टिस संजय किशन कौल और  जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणीअगर मैं अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में हूं तो ये प्राइवेसी का हिस्सा है। एेसे में पुलिस मेरे बैडरूम में नहीं घुस सकती। लेकिन अगर मैं बच्चों को स्कूल भेजता हूं तो ये प्राइवेसी के तहत नहीं है क्योंकि ये राइट टू एजूकेशन के तहत आता है ,आप बैंक में अपनी जानकारी देते हैं, मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। ये सब कानून द्वारा संचालित है यहां बात अधिकार की नहीं है।आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बडा मुद्दा है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है| सरकार द्वारा गोपनीयता भंग करने एक बात है लेकिन उदाहरण के तौर पर टैक्सी एग्रीगेटर द्वारा आपका दिया डाटा आपके खिलाफ ही इस्तेमाल कर ले प्राइसिंग आदि में वो उतना ही खतरनाक है।मैं जज के तौर पर बाजार जाता हूं और आप वकील के तौर पर माल जाते हैं। टैक्सी एग्रीगेटर इस सूचना का इस्तेमाल करते हैं। राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं क्योंकि आप बैंक में अपनी जानकारी देते हैं, मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। ये सब कानून द्वारा संचालित है यहां बात अधिकार की नहीं है। आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बडा मुद्दा है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है। राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं | सरकार को वाजिब प्रतिबंध लगाने से नहीं रोक नहीं सकतेक्या केंद्र के पास आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है ?विचार करने की बात ये है कि मेरे टेलीफोन या ईमेल को सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ शेयर क्यों किया जाए ?मेरे टेलाफोन पर काल आती हैं तो विज्ञापन भी आते हैं। तो मेरा मोबाइल नंबर सर्विस प्रोवाइडर्स से क्यों शेयर किया जाना चाहिए,क्या केंद्र सरकार के पास डेटा प्रोटेक्ट करने के लिए ठोस सिस्टम है ? सरकार के पास डेटा को संरक्षण करने लिए ठोस मैकेनिज्म होना चाहिएहम जानते हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार डेटा इकट्ठा कर रहे हें लेकिन ये भी सुनिश्चित हो कि ड

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