अगर अहमद पटेल यह चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो बीजेपी एक साथ कई निशाने लगाने में कामयाब हो जाएगी. प्रतिद्वंद्वी पार्टी के शीर्ष नेता को उसी गृहराज्य में पटखनी देकर शर्मिन्दा करने का लाभ तो होगा ही, पार्टी का नैतिक बल भी कमज़ोर होगा, और इसके बाद इसी साल दिसंबर से पहले होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अन्य विधायक भी बीजेपी की ओर रुख कर सकते हैं. अहमद पटेल के पास अब दोबारा चुने जाने के लिए आवश्यक वोटों के मामले में कतई मामूली बढ़त रह गई है.
बीजेपी उस राज्य में एक बार फिर जीत की तरफ बढ़ती नज़र आ रही है, जिस पर वह लगभग 22 साल से निर्बाध शासन कर रही है. लेकिन अपनी पकड़ का विस्तार करने के साथ-साथ कांग्रेस की पकड़ को कम करने के लिए अमित शाह ने 'मिशन 150' का आह्वान किया है, जो बीजेपी को मौजूदा 121 विधायकों से 150 तक ले जाने की कवायद है, जो 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के उनके अभियान की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा.
पिछले ही सप्ताह बिहार में कांग्रेस को हटाने में बीजेपी कामयाब रही है, जहां कांग्रेस नीतीश कुमार की सरकार का हिस्सा थी. नीतीश ने कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ चल रहे महागठबंधन को धता बताते हुए बीजेपी के साथ पुराने रिश्तों को फिर कायम कर लिया. अहमद पटेल का कहना है कि जिन राज्यों में जनमत नहीं मिलता है, वहां राजनैतिक उठापटक के ज़रिये सरकार बना लेना बीजेपी का तरीका रहा है. उन्होंने कहा, "(प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी और (अमित) शाह सत्ता के बेहद भूखे हैं... देखिए, उन्होंने बिहार में क्या किया है... अरुणाचल प्रदेश में उनके पास एक भी विधायक नहीं था, लेकिन वे सरकार बनाने में कामयाब रहे... वे किसी भी हद तक जा सकते हैं... उन्हें पहली बार केंद्र में सत्ता हासिल हुई है, और इसीलिए वे सभी कुछ कर रहे हैं, उसे बचाए रखने के लिए हर तरीका अपना रहे हैं..."
उन्होंने बीजेपी नेताओं द्वारा लगाए गए उन आरोपों का भी खंडन किया कि वह भीषण बाढ़ से जूझ रही गुजरात की जनता की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर इपनी निजी ज़रूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी सहित कई आलोचकों ने कहा है कि ऐसे समय में विधायकों को राहत और बचाव कार्यों की देखरेख के लिए अपने-अपने क्षेत्र में होना चाहिए, बेंगलुरू के होटल में नहीं. पलटवार करते हुए अहमद पटेल कहते हैं, "रूपाणी अमित शाह की कठपुतली हैं... क्या मुझे उनकी बात का जवाब देना चाहिए... मुझे उन पर तरस आता है... उन्हें अपनी पार्टी की चिंता करने दीजिए... हमें विधायकों को (बेंगलुरू) ले जाना पड़ा, क्योंकि वे (बीजेपी) किसी भी नियम को नहीं मानते... वे उन्हें परेशान कर रहे थे... मैं यहां गुजरात में ही हूं, और सुनिश्चित कर रहा हूं कि बाढ़ राहत का काम चलता रहे..."
उन्होंने यह दावा भी किया कि उन्होंने अपनी बॉस सोनिया गांधी को बता दिया था कि वह राज्यसभा में पांचवां कार्यकाल नहीं चाहते हैं, लेकिन जब उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें नामांकित कर दिया है, तो "मुझे चुनाव लड़ना पड़ा..." उन्होंने कहा, "सत्ता के भूखे वे लोग हैं, जो सत्ता में आने के लिए दंगे करवाते हैं... उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे किसने करवाए...? अगर मुझे सत्ता का लालच होता, तो मैं राजीव गांधी के ही कार्यकाल से मंत्री होता... मुझे चार बार बढ़िया मंत्रालयों की पेशकश की गई थी, जिनमें से दो बार डॉ मनमोहन सिंह द्वारा की गई थी - लेकिन मैंने कभी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मैं पार्टी के लिए काम करना चाहता था..."
बताया जाता है कि अमित शाह कांग्रेस नेता के खिलाफ इसलिए हैं, क्योंकि वह वर्ष 2010 में हत्या के आरोप में उन्हें जेल भेजे जाने के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती केंद्र सरकार को दोषी ठहराते हैं. मामला गुजरात पुलिस द्वारा एक मामूली अपराधी को मार डालने का था, और आरोप था कि पुलिस ने वह काम गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह के आदेश पर किया था. उस समय बीजेपी ने कहा था कि सीबीआई के आरोप कांग्रेस सरकार की शह पर लगाए गए हैं. गुजरात में कांग्रेस को और सिमटा देने की इस योजना में बीजेपी प्रमुख को शंकरसिंह वाघेला के रूप में 'अच्छा' सहयोगी भी मिल गया है. वर्ष 1996 में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे, और इस साल कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाने की उनकी मांग को ठुकरा दिया था. इस बात से गुस्साए वाघेला ने अपनी ताकत दिखाई, और पिछले माह हुए राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के 11 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ वोट दिया. अब वह विधायकों को कांग्रेस से दूर और बीजेपी के पास ले जा रहे हैं. अहमद पटेल का कहना है कि उन्होंने वाघेला को अपनी राज्यसभा सीट देने की पेशकश की थी, लेकिन उनकी पार्टी ने इस पेशकश को ठुकरा दिया. उन्होंने यह भी ज़ोर देकर कहा कि अगर किसी तरह वह हार जाते हैं, तो इसे सोनिया गांधी तथा उनके पुत्र के नेतृत्व द्वारा किए गए कुप्रबंधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अपनी पार्टी के प्रथम परिवार को सभी तरह के दोषों और आरोपों से दूर रखने के कांग्रेसी नेताओं के हमेशा अपनाए जाने वाले रुख के तहत अहमद पटेल ने कहा, "मैं प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहा हूं, कांग्रेस अध्यक्ष के सचिव के रूप में नहीं... दोनों का आपस में क्या रिश्ता है...? कृपया उन्हें (सोनिया गांधी) या हमारे उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इसमें मत लाइए..."
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