Friday, October 20, 2017

गुजरात की युवा तिकड़ी

गुजरात विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते-आते राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल गुजरात में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. बीजेपी ने भी गुजरात में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी कोई भी ऐसा कारण नहीं छोड़ना चाहती जो किसी तरह के बुरे परिणाम का नतीजा बने. ऐसा कहा जा रहा कि पिछले दो सालों में उभरकर सामने आए पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदायों को प्रभावित करने वाले तीन युवा बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर गुजरात की राजनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं.
साल 2015 में पटेल आरक्षण की मांग के बाद हार्दिक पटेल का नाम तेज़ी से उभरकर सामने आया. इस आंदोलन को दबाने की गुजरात सरकार की कोशिशों के बावजूद अभी तक यह मांग शांत नहीं हुई है.
पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल किसी भी पार्टी में न शामिल होने की बात कह चुके हैं. हार्दिक पटेल ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी को आरक्षण न देने के लिए दोषी ठहराया है. अमित शाह को गुजरात गौरव यात्रा के दौरान पाटीदार युवाओं का विरोध भी झेलना पड़ा था. साथ ही हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की तरफ़ झुकाव भी प्रकट किया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात जाने पर हार्दिक ने ट्वीट करके उनका स्वागत किया था. ऐसे में बीजेपी की चिंताएं बढ़ना लाज़मी है. पाटीदार भले ही 12 प्रतिशत का वोट शेयर रखते हों लेकिन अपनी आर्थिक ताक़त के कारण वो ​स्थितियां प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. शुरुआत में इस आंदोलन का विरोध करने के बाद आज बीजेपी पाटीदारों का वोट पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है. आंदोलन में शामिल पाटीदार नेताओं के ख़िलाफ़ केस वापस लिए गए हैं और अनामत आंदोलन समिति के सदस्यों पर हुए पुलिस अत्याचार की जांच के लिए समिति का निर्माण किया गया है. हालांकि, इसके बावजूद भी हार्दिक पटेल का रुख़ बीजेपी के प्रति नरम पड़ता नहीं दिख रहा है. राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक जिग्नेश मेवाणी राज्य में दलितों पर हो रहे हमलों के लिए गुजरात सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं. लगातार दलितों पर हुए हमले की ख़बरों के बाद बीजेपी की छवि का पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक भी है. गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था. 'आज़ादी कूच आंदोलन' में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी. इस आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी.
जिग्नेश मेवाणी का कहना है, ''राज्य में दलित पर हो रहे हमलों को रोकने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. बीजेपी का हिंदुत्व का एजेंडा है और इस सरकार के रहते उनका भला नहीं हो सकता.'' मेवाणी साफ़-साफ़ कहते हैं, ''इस बार बीजेपी को हर क़ीमत पर हराया जाना चाहिए.'' हालांकि, वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ भी साफ़ तौर पर नहीं कह रहे हैं. राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है. राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं. गुजरात में दलितों का प्रतिनिधित्व बहुत ज्यादा न होने के बावजूद भी चुनाव में हर एक वोट बहुत कीमती होता है. ऐसे में बीजेपी के लिए जिग्नेश मेवाणी मुसीबत ला सकते हैं. ओबीसी नेता के तौर पर उभरे अल्पेश ठाकुर पाटीदारों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे हैं. साथ ही वह देसी शराब से होने वाले नुक़सान के चलते शराबबंदी के पक्षधर रहे हैं. ओबीसी, एससी और एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकुर ने अलग-अलग मंचों से गुजरात की हालत ख़राब होने की बात कही है. वह कहते हैं कि विकास सिर्फ दिखावा है. गुजरात में लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. ओबीसी का वोट प्रतिशत 40 है जो पाटीदार और एससी व एसटी से कहीं ज्यादा है. ऐसे में बीजेपी के लिए ये वर्ग और महत्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन, पाटीदारों को आरक्षण देने के मसले पर बीजेपी और उनकी राय एक होने के चलते अल्पेश ठाकुर का झुकाव बीजेपी की तरफ जाने की संभावना है. उनका रुख साफ़ नहीं है. लेकिन, अगर वो बीजेपी की तरफ जाते हैं तो उनके सपोर्ट बेस में दरार पड़ सकती है. अल्पेश का बीजेपी की तरफ झुकाव होना मुश्किल है. क्योंकि बीजेपी ने पाटीदारों को जो लाभ दिए हैं वो ओबीसी को नहीं दिए हैं. इन तीनों नेताओं के उभरने की कहानी निजीकरण से शुरू होती है. जब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात की बात की.उस समय काफ़ी निजीकरण हुआ. बहुत सारे निजी शैक्षणिक संस्थान आ गए. बहुत बड़े-बड़े समिट होने लगे जिनमें बड़े स्तर पर निवेश होने और रोजगार के अवसर खुलने की बातें कही गईं. लोगों को सुखद भविष्य के सपने दिखाए गए. लोगों ने अपने बच्चों को उन्हीं प्राइवेट इंस्टीट्यूट में महंगी फीस देकर पढ़ाया. लेकिन, जब उनके बच्चे बाज़ार में आए तो उन्हें नौकरी ही नहीं मिली. नौकरी मिली भी तो 5-6 हज़ार की.  'सरकार की कथनी और करनी के अंतर की वजह से युवाओं में निराशा और ग़ुस्सा भर गया है. पाटीदार एक संपन्न वर्ग है. जब उनके बच्चे भी सड़क पर उतरे हैं तो दूसरों का क्या हाल होगा.' घनश्याम दास कहते हैं, ''बीजेपी को ओबीसी से मुश्किल ज़रूर होगी. दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश का रुख साफ़ नहीं है कि वह किस तरफ जाएंगे. उन्होंने कांग्रेस की तरफ भी झुकाव नहीं दिखाया है.'' बीजेपी पर गुजरात में चुनौतियां का असर दिखने लगा है तभी बीजेपी नेता लगातार गुजरात दौरे कर रहे हैं.

Saturday, October 14, 2017

भूख से हारता भारत

विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले भारत के लोग खाने जैसी बेसिक नेसेसिटी (बुनियादी जरूरत) से महरूम हैं ये एक बड़ी विडंबना ही कही जा सकती है. देश डिजिटल क्रांति के जरिए वर्ल्ड लीडर के तौर पर बढ़ता दिख रहा है और आने वाले सालों में सबको घर, सबको बिजली जैसे ‘न्यू इंडिया’ की उम्मीदें लगाए बैठा है, लेकिन दुनिया के सारे देशों में से जहां के लोग अपने पेट भरने की रोज की जरूरत को भी पूरा नहीं कर पाते ऐसे देशों में से सिर्फ 19 देशों से आगे है. इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) के मुताबिक, भारत में भूख एक ‘‘गंभीर’’ समस्या है और 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100वें पायदान पर है. भारत उत्तर कोरिया और बांग्लादेश जैसे देशों से पीछे है लेकिन पाकिस्तान से आगे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों में कुपोषण (मेल न्यूट्रीशन) की उच्च दर से देश में भूख का स्तर इतना गंभीर है कि पिछले साल भारत इस इंडेक्स में 97वें स्थान पर था और अब 100वें स्थान पर है. यानी इस साल वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में भारत और 3 स्थान पीछे चला गया है. आईएफपीआरआई ने एक बयान में कहा, ‘‘119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है और समूचे एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘31.4 के साथ भारत का 2017 का जीएचआई (वैश्विक भूख सूचकांक) अंक ऊंचाई की तरह है और ‘गंभीर’ श्रेणी में है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन (29), नेपाल (72), म्यामांर (77), श्रीलंका (84) और बांग्लादेश (88) से भी पीछे है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें स्थान पर हैं. जाहिर तौर पर राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर इसे सुधारने के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है. हाल ही में फोर्ब्स की सबसे धनवान भारतीयों की लिस्ट में दिखा था कि देश के सबसे धनवानों की संपत्ति में पिछले साल के मुकाबले काफी इजाफा हो चुका है. वहीं कल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के और नीचे खिसकने से यही आकलन किया जा सकता है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब और गरीब हो रहे हैं. देश के टॉप 100 धनी व्यक्तियों की संपत्ति में 26 फीसदी का इजाफा हुआ है. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी लगातार 10वें साल भारत के सबसे अमीर व्यक्ति रहे और उनकी प्रॉपर्टी बढ़कर 38 अरब डॉलर (करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये) पर पहुंच गई है. अमीरों की संपत्ति का आकलन करने वाली पत्रिका फोर्ब्स की वार्षिक सूची ‘इंडिया रिच लिस्ट 2017’ में यह जानकारी दी गयी थी.
दुनिया के देशों में लोगों को खाने की चीज़ें कैसी और कितनी मिलती हैं?, ग्लोबल हंगर इंडेक्स इसे दिखाने का माध्यम है. हर साल नए आंकड़ों, नए डेटा कलेक्शन के आधार पर ही ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ की लिस्ट निकाली जाती है. इस इंडेक्स में दिखाया जाता है कि दुनिया भर में भूख के खिलाफ चल रही देशों की लड़ाई में कौनसा देश कितना सफल और कितना असफल रहा है. साल 2006 में सबसे पहले वेल्ट हंगरलाइफ नाम के जर्मनी के स्वयंसेवी ऑर्गेनाइजेशन ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया था, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के तहत ये काम किया जाता है. इसे सुधारने के लिए सभी राज्यों, सरकारों और सामाजिक संगठनों को मैराथन प्रयास करने होंगे वर्ना ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की खाई को पाटना लगभग-लगभग असंभव हो जाएगा और अमीर-गरीब (वंचितों) के बीच बढ़ते फासले को मिटाने का सरकार का सपना, सपना ही रह जाएगा. एक न्यूक्लियर सुपरपावर देश की बड़ी जनसंख्या खाने जैसी फंडामेंटल जरूरत और हक से भी महरूम हैं जो बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है.
एक और जहां भारत भूख की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी और देश में बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी की जाती है. खाने की बर्बादी भुखमरी का एक अहम कारण है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आंकड़ों में कहा गया है कि यह उतना खाना होता है जिसे पैसों में आंके तो यह 50 हज़ार करोड़ के आसपास पहुंचेगा. आंकड़ों पर ना भी जाएं, तो भी हम रोज़ाना अपने आस-पास ढेर सारा खाना बर्बाद होते हुए देखते ही हैं. शादी, होटल, पारिवारिक और सामाजिक कार्यक्रमों, यहां तक की घरों में भी कितना खाना यू हीं फेंक दिया जाता है. अगर ये खाना बचा लिया जाए और ज़रूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाए तो कई लोगों का पेट भर सकता है.  संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में खाने का पर्याप्त उत्पादन होता है, लेकिन ये खाना हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाता. भूख से पीड़ित दुनिया की 25 फ़ीसदी आबादी भारत में रहती है. भारत में करीब साढ़े 19 करोड़ लोग कुपोषित हैं. इसमें वो लोग भी हैं जिन्हें खाना नहीं मिल पाता और वो लोग भी हैं जिनके खाने में पोषण की कमी होती है. खाने की बर्बादी रोकने के लिए हर इंसान को व्यक्तिगत रूप से ज़ागरुक होने की ज़रूरत है. जितना खाना है उतना ही लें. अगर घर में खाना बच जाता है तो अपने आस-पास किसी ज़रूरतमंद को दें. शादी, पार्टी, होटल में भी ऐसा ही किया जा सकता है, वैसे कई संस्थाएं ऐसी हैं जो लोगों का बचा हुआ खाना एकत्रित करके उसे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का दावा करती हैं. ऐसी ही एक संस्था रॉबिन हुड आर्मी को शुरू करने वाले संचित जैन बताते हैं कि दिल्ली की एक शादी में बचे खाने से कई बार पांच सौ से ढाई हज़ार लोगों का पेट भर जाता है. संचित जैन खाने की चीज़ों की बर्बादी की वजह सप्लाई चेन का कमज़ोर होना बताते हैं. वो कहते हैं खेतों से अनाज निकलकर मंडी तक तो पहुंच जाता है, लेकिन भंडारण की सुविधाएँ अच्छी नहीं होने और समय पर आगे सप्लाई नहीं किए जाने की वजह से मंडियों में ही सड़ जाता है. रॉबिन हुड आर्मी का दावा है कि वे होटलों से एकत्रित किया हुआ खाना झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों तक पहुंचाते हैं. वैसे सच्चाई यही है कि गैर-सरकारी संस्थाओं के अलावा सरकार भी कई बार खाने की बर्बादी पर चिंता जता चुकी 

लोहिया जी का व्यक्तित्व

जेपी तो 1953 से ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर दलविहीन लोकतंत्र और ‘सर्वोदय’ का प्रयोग कर रहे थे. ऐसे में वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. यह राम मनोहर लोहिया की ही दूरदर्शिता थी कि तमाम वंचित जातियों और वर्गों की धीरे-धीरे ही सही, सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी बढ़ रही है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया. उच्च शिक्षा के दौरान जर्मनी में राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सक्रियता की जानकारी कांग्रेस के नेताओं विशेषकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को भी थी. इसलिए 1933 में पीएचडी करने के बाद देश लौटने पर नेहरू ने उन्हें कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति में रखा था. अगले दो सालों तक उन्होंने भविष्य के भारत की विदेश नीति तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसलिए उन्हें भारत का पहला गैर-आधिकारिक विदेश मंत्री भी कहा जाता है. आजादी के बाद देश ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे निर्धारित करने में लोहिया का महत्वपूर्ण योगदान था. कांग्रेस मॉडल के तहत कांग्रेस का सदस्य रहते हुए कोई किसी अन्य संगठन का भी सदस्य बन सकता था. इसलिए समाजवादी विचारधारा से प्रभावित जयप्रकाश नारायण जैसे कई कांग्रेसी नेताओं ने मई 1934 में ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ की नींव डाली. लोहिया का इसमें महत्वपूर्ण योगदान था. लेकिन नेहरू से लोहिया के संबंध 1939 के बाद खट्टे होने लगे. संबंधों के खराब होने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के शामिल होने के सवाल पर हुई. लोहिया चाहते थे कि अंग्रेजों की कमजोर स्थिति को और कमजोर करने के लिए भारत को युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए. उधर, नेहरू चाहते थे​ कि भारतीय सेना इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ दे. नौ अगस्त 1942 को जब भारत छोड़ोंं आंदोलन छेड़ा गया तो अंग्रेजों ने पूरे देश में कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. ऐसा लगा अब यह आंदोलन विफल हो जाएगा. लेकिन कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने आंदोलन का अगले दो सालों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया. आंदोलन की घोषणा होते ही मुंबई में एक भूमिगत रेडियो स्टेशन से आंदोलनकारियों को ​दिशा-निर्देश दिए जाने लगे थे. ऐसा करने वाले कोई और नहीं लोहिया थे. अंग्रेज जब तक उस रेडियो स्टेशन को ढूंढ़ पाते तब तक लोहिया कलकत्ता जा चुके थे. वहां वे पर्चे निकालकर लोगों का नेतृत्व करने लगे. उसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के साथ नेपाल पहुंच गए. वहां पर ये लोग ‘आजाद दस्ता’ बनाकर आंदोलनकारियों को सशस्त्र गुरिल्ला लड़ाई का प्रशिक्षण देने लगे. अंग्रेजों को दो सालों तक छकाने के बाद जेपी और लोहिया मई 1944 में पकड़ लिए गए. इन दोनों पर मुकदमा चला और वे लाहौर जेल में बंद कर दिए गए. यहां से वे लोग अप्रैल 1946 में ही छूट पाए. जेल में अंग्रेजों ने लोहिया को जमकर यातनाएं दी थीं जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था. लोहिया ने अपनी किताब ‘विभाजन के गुनहगार’ में बताया है कि दो जून 1947 की बैठक में वे और जेपी विशेष आमंत्रित सदस्य थे. बैठक का नजारा ऐसा था मानो नेहरू और पटेल पहले से सब कुछ तय कर आए हों. महात्मा गांधी के विरोध करने के बाद नेहरू और पटेल ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे देने की धमकी दे दी. लोहिया लिखते हैं कि तब गांधी के पास विभाजन के प्रस्ताव पर मौन सहमति देने और विभाजन के गुनहगारों में शामिल हो जाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं बच गया था. गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समा​जवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया. इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने ​1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया. लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया. इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा. राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे. पर वे अक्टूबर में चल बसे. हालांकि राम मनोहर लोहिया का प्रयास करीब एक दशक बाद रंग लाया जब 1975 में जयप्रकाश नारायण राजनीति की मुख्यधारा में वापस लौटे. आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता रंग लाई और 25 सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. राम मनोहर लोहिया ने जर्मनी में रहते कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को खूब पढ़ा. लेकिन उन्होंने पाया कि भारत के संदर्भ में कम्युनिस्ट विचारधारा अपूर्ण है. मार्क्सवाद ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के संबंधों की जो व्याख्या की थी लोहिया उससे असहमत थे. बल्कि वे तो उसे उल्टा मानते थे. मार्क्सवाद मानता था कि पूंजीवाद के विकास से साम्राज्यवाद पनपता है. इसलिए पूंजीवाद के खात्मे से ही साम्राज्यवाद का विनाश होगा. लोहिया ने बताया कि मामला असल में उल्टा है. वह साम्राज्यवाद ही है जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ. इसलिए पूंजीवाद का नाश करने के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंका जाए. उन्होंने ब्रिटेन के उदय को भारत जैसे उपनिवेशों के शोषण से जोड़ दिया और कहा कि भारत को आजाद किए बगैर पूंजीवाद की जड़ें कमजोर नहीं हो सकती. इस तरह लोहिया ने पूंजीवाद के विनाश के लिए भारत जैसे उपनिवेशों की आजादी को सबसे महत्वपूर्ण बताया.  
लोहिया ने मार्क्स के वर्ग-सिद्धांत की भारत के संदर्भ में नई व्याख्या दी. उनके अनुसार भारत का समाज औद्योगिक समाज नहीं है. इस समाज में असमानता की मुख्य वजह जाति रही है. यहां पर शोषण का कारण जाति व्यवस्था रही है. इसलिए यहां पर ‘बुर्जुआ’ और ‘सर्वहारा’ वर्गों की मौजूदगी मार्क्सवाद के सिद्धांतों की तरह नहीं है. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण जातियों को बुर्जुआ माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं, को सर्वहारा माना जाना चाहिए. भारत के संदर्भ में मार्क्सवाद की लोहिया की यह व्याख्या और इसके परिणाम क्रांतिकारी रहे. आलोचकों का भी मानना है कि साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही योगदान रहा है. इसने जातिगत पहचानों को तो मजबूती दी ही है, राजनीति में वंचित जातियों की पैठ भी बढ़ाई है. हर तरह की विषमता को खत्म करने की दिशा में सप्तक्रांति सिद्धांत को भी राम मनोहर लोहिया की अनूठी देन माना जाता है. इस सिद्धांत में सात बिंदु थे. मसलन रंगभेद खत्म हो, जातिगत भेदभाव बंद हो, औरत और मर्द में कोई अंतर नहीं है, राष्ट्रवाद को संकुचित नहीं व्यापक तरीके से समझा जाए, समाजवादी आर्थिक मॉडल श्रेष्ठ है, सभी देश निरशस्त्रीकरण के रास्ते चलें और भेदभाव से लड़ने का तरीका सत्याग्रह ही होना चाहिए. लोहिया के प्रयासों का ही असर रहा कि तमाम पिछड़ी जातियों में आत्मविश्वास विकसित हुआ. उन्होंने कमाबेश सभी पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाया. उनके जाने के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में समाजवादी विचारधारा की सरकार बनी. इससे सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व मजबूती मिली. किसी जानकार ने कहा है कि गांधी को छोड़ दिया जाए तो लोहिया का अनुसरण करने वाली पार्टियों और नेताओं की संख्या देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है.

Thursday, October 12, 2017

राहुल की बदलती छवि

सुना है क़ि राहुल गाँधी के लिए भी वही पीआर एजेंसी हायर की जा रही है जो अमेरिका में ट्रम्प के लिए काम कर रही थी. उसी की रणनीति के तहत वो इसबार कुछ अधिक बदले और मेहनत करते दिख रहे हैं. अभी तक उनका गुजरात में इसबार 15 दिन में दूसरा दौरा है. वो जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं. मुझे नहीं पता कि वो जनता कौन है? कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं या फिर नैचुरल? इसमें वो छात्रों, डॉक्टर्स, सीए, व्यापारियों, आदिवासी युवाओं से सीधा संवाद कर उनके हर सवाल पर जवाब दे रहे हैं. कई बार तो ऐसे टेक्निकल सवाल होते हैं क़ि लगता है वो जवाब नहीं दे पाएँगे लेकिन वो काफ़ी तैयारी के साथ दिखते हैं और जवाब में ईमानदारी दिखती है. वो जीएसटी पर बहुत अधिक नॉलेज रखते हैं. एक इंजीनियर सवाल करता है तो टेक्निकल और अमेरिकन इंस्टीट्यूट, चाइना की बात करते हैं. डॉक्टर्स सवाल करते हैं तो वो मेडिकल में भारत को सुपर पवार बनाने की बाते करते हैं जो विश्व मे सबसे अधिक जॉब क्रिएक करके चाइना का मुकाबला करने की भी बात करते हैं. वो अमूल दुधा, और पापड़ अचार जैसे छोटे उद्योगों को बढ़ाने की बात करते हैं, वो रोज़गार पर ईमानदारी से बहुत अच्छी बात करते हैं. मेरे ख़याल से केजरीवाल से भी बेहतर इस मामले में. खुद की ग़लतियाँ स्वीकार करते हैं क़ि कैसे कांग्रेस के नेता गमंड में आ गए, कैसे 2011 के बाद से सब विकास बंद करके भ्रष्टाचार करने लगे. किसानों से फूड प्रोसेसिंग लगाकर आस्ट्रेलिया का मुकाबला करने की बात करते हैं. वो पर्यवरण पर बात करते हैं. कम से कम एक नया नेता दिखता है. कोई कह सकता है कि मैं उनका बखान कर रहा हूँ, लेकिन नहीं. 2013 में जब मोदी जी गुजरात से बाहर निकल कर यही कर रहे थे तो भी हम लिखकर उनके नेतृत्व पर अपनी राय रखते थे. अब मोदी जी शीर्ष नेता हैं तो उनका एनलिसिस नहीं हो इस तरह से नहीं हो सकता. जब बीजेपी से कोई नया आएगा तो होगा. इसके पहले मोदीजी के सामने हमेशा बच्चे ही नज़र आते थे लेकिन आज लगता है क़ि अगर प्रधान मंत्री उम्मीदवारों में उनकी बहस मोदी जी से हो तो वो हर मुद्दे पर उनके हरा सकते हैं. लेकिन भाषण देने की कला और जनता से कनेक्ट होने का जादू अभी भी मोदी जी के पास बेहतर है. वो इतना टेक्निकल नॉलेज भले न रखते हों लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं में जोश भरना उनकी कला है. वहीं राहुल गाँधी इस बार खुद को हिंदू विरोधी भी नहीं दिखाना चाहते हैं. कहीं भी 2002 के दंगे, हिंदू मुस्लिम या फिर सेकूलरिज़्म की बात नहीं की. उनको पता है क़ि मुस्लिम वोटों के पास विकल्प ही एक है. यूपी की तरह तीन चार सेकुलर दल तो हैं नहीं. वो हर रैली और रोडशो के पहले उस क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करते हैं. फिर माथे पर बड़ा सा तिलक लगाते हैं जो लोगों को सांकेतिक तौर पर दिखाए क़ि वो हिंदू ही हैं. फिर वो आक्रमक होकर जमकर हमला करते हैं. लोगों का रिस्पोन्स भी काफ़ी अच्छा है. क्योकि हार्दिक पटेल का भी समर्थन मिला है उनको. शायद कांग्रेस को लगता है क़ि अगर वो गुजरात फ़तह कर लेते हैं तो 2019 का किला ढहने में अधिक समय नहीं लगेगा. लेकिन अमित शाह और मोदी बिल्कुल निश्चिंत हैं उनको गुजरात पर भरोसा है वो केवल अंत में एक दो दिन प्रचार से ही सबकुछ संभालने का भरोसा रखते हैं. हालाँकि इतना आसान भी नहीं है कांग्रेस के लिए गुजरात जीतना. मुझे अभी भी ये असंभव ही लगता है. 

Tuesday, October 10, 2017

चे ग्वेरा की क्रांति

"मैं कोई मुक्तिदाता नहीं हूँ। मुक्तिदाता का कोई अस्तित्व नहीं होता। लोग खुद को अपने आप मुक्त करते हैं"... 
ये शब्द हैं चे ग्वेरा के जिनको पूरी दुनिया में क्रांतिदूत के नाम से जाना जाता है। चे ग्वेरा का जन्म अर्जेंटीना के रोसारियो शहर में 1928 में हुआ था। इनके पूर्वज आयरलैंड से अर्जेंटीना आए थे। माता पिता ने नाम एर्नेस्तो रखा। बचपन से ही चंचल स्वभाव का होने की वजह से उनके पिता कहते थे कि सबसे पहली चीज जो मेरे बेटे में नजर आती है वो है उसकी रगों में दौड़ रहा विद्रोही आयरिश खून। दमे की बीमारी होने के बावजूद चे ने अपने आपको एक अच्छे एथलिट के रूप में ढाल लिया था। वे स्विमिंग, गोल्फ, फुटबाल, शूटिंग और रग्बी के अच्छे खिलाड़ी थे। किशोरावस्था में काव्य के प्रति उनकी रुचि बनी जो जीवनपर्यंत रही। वे पाब्लो नेरुदा, लोर्का, जॉन कीट्स के बहुत बड़े प्रशंसक थे। 1948 में चे ग्वेरा ने डॉक्टरी की पढाई करने के लिए ब्यूनस एरिस यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 1950 में वे अपनी प्रसिद्ध मोटरसाइकिल यात्राओं में से पहली पर निकल पड़े जिस दौरान उन्होंने उत्तरी अर्जेंटीना का 4800 किलोमीटर का सफ़र अकेले मोटरसाइकिल पर तय किया। उसके बाद 1951 में लगभग पूरे दक्षिण अमेरिका की 9000 किलोमीटर की यात्रा मोटरसाइकिल पर तय की जो कि 9 महीने तक चली। इस दौरान उन्होंने चिली के खान श्रमिकों की दशा देखी जो पूंजीवादी शोषण की वजह से नारकीय जीवन बिता रहे थे। साथ में माचू पिचू के गरीब किसानों की दशा ने उनको झकझोर कर रख दिया था। यात्राओं से लौट कर जून 1953 में उन्होंने अपनी मेडिकल की डिग्री पूरी की। *अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भूख, गरीबी और बीमारी देखी और देखा कैसे लोग पैसे की कमी के कारण अपने बीमार बच्चों का इलाज नहीं करवाते और कैसे अपने बच्चे की मौत को एक "महत्वहीन दुर्घटना" मान कर संतोष कर लेते हैं। इन अनुभवों से उनको एहसास हुआ कि अगर इन लोगों की सहायता करनी है तो उनको डॉक्टरी के साथ साथ क्रांति का भी रास्ता अख्तियार करना होगा।
जुलाई 1953 में वे फिर से यात्रा पर निकले पेरू, बोलीविया, अल सल्वाडोर, पनामा, कोस्टा रिका, निकारागुआ, ग्वाटेमाला होते हुए। उसके बाद उन्होंने दिवंगत स्तालिन की तस्वीर के आगे शपथ कि वे तब तक चैन नहीं लेंगे जब तक पूंजीवाद रूपी इस ऑक्टोपस को खत्म न कर दें। 1953 में ही वे निर्वासित क्यूबाई विद्रोही फिदेल कास्त्रो के संपर्क में आये। इसी दौरान अर्नेस्टो ग्वेरा को उनका प्रसिद्ध नाम "चे" मिला। ग्वाटेमाला में उनकी मुलाकात हिल्डा गादेया से हुई जो एक अर्थशास्त्री और वामपंथी झुकाव वाली राजनीतिक कार्यकर्त्ता थी। हिल्डा ने उनकी मुलाकात ग्वाटेमाला की वामपंथी झुकाव वाली सरकार के उच्चाधिकारियों से करवाई। लेकिन इस सरकार का सी.आई.ए. की साजिश से तख्तापलट होने के बाद हिल्डा गादेया को गिरफ्तार कर लिया गया और चे को अर्जेंटीनी दूतावास में छिप कर जान बचानी पड़ी। उसके बाद वे मेक्सिको चले गए। मेक्सिको में ही सितम्बर 1955 में उन्होंने हिल्डा गादेया से विवाह किया। ग्वाटेमाला में तख्तापलट के बाद चे का संयुक्त राज्य अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के प्रति विरोध तीव्र होता चला गया। गादेया ने बाद में लिखा कि ग्वाटेमाला के तख्तापलट से ही अंततः चे को पूर्ण विश्वास हो गया था कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष ही उपाय है। उसके बाद क्यूबा की क्रांति में उनकी भूमिका इतिहास निर्मात्री साबित हुई जब उन्होंने 1959 में फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर बतिस्ता की अमेरिका परस्त तानाशाही को उखाड़ फेंका और जनता का राज्य कायम किया।उसके बाद चे ने 1965 में क्यूबा को छोड़ दिया और दुनिया के दूसरे देशों में क्रांति के लिए निकल पड़े। पहले कांगो और फिर बोलीविया में कम्युनिस्ट विद्रोह का नेतृत्व किया। बोलीविया में विद्रोह के दौरान सी.आई.ए. ने बोलिवियन सरकार की मदद से उनको पकड़ लिया और 9 अक्टूबर 1967 को उन्हें गोली मार दी गई। शहीद होने से पहले उन्होंने गोली मारने वालों को ललकारा था कि "मुझे पता है तुम मुझे मारने आए हो। गोली चलाओ, कायरों। तुम सिर्फ एक व्यक्ति को मार रहे हो"। चे एक डॉक्टर थे। और एक क्रांतिकारी थे। इस क्रांतिकारी डॉक्टर ने मानवता की बीमारी, पूंजीवाद, को पहचान लिया था और इस बीमारी के खिलाफ जीवन पर्यन्त संघर्ष में लगे रहे थे। उन्होंने कहा था -- "एक क्रांतिकारी डॉक्टर बनने के लिए, या फिर कहें कि एक क्रांतिकारी ही बनने के लिए, एक क्रांति की जरूरत होती है। अलग थलग रह कर किये गए निजी प्रयास, अपने तमाम आदर्शों की पवित्रता के बावजूद, किसी काम के नहीं होते, और अगर कोई आदमी अकेले ही काम करते हुए, अमेरिका के किसी कोने में किसी बुरी सरकार और प्रगतिरोधी सामाजिक परिस्थितियों के खिलाफ लड़ते हुए, किसी महान आदर्श के लिए पूरी जिंदगी का बलिदान भी कर देता है तो भी उससे कोई फायदा नहीं होता। एक क्रांति को पैदा करने के लिए हमारे पास वह होना चाहिए, जो आज क्यूबा में है, यानि पूरी जनता की लामबंदी। और अंततः आज आपके सामने, अन्य सभी बातों से ऊपर, एक क्रांतिकारी डॉक्टर, यानि कहें तो वह डॉक्टर जो अपने पेशे से सम्बंधित तकनीकी ज्ञान को लोगों और क्रांति की सेवा में लगाता हो, बनने का अधिकार भी है और कर्तव्य भी।"

Sunday, October 1, 2017

क्या सच में गाँधी ने भगत सिंह को नहीं बचाया?

हमारे देश में एक नया ट्रेंड चालू हुआ है इतिहास को फिर से लिखने का. गाँधी जी के बारे में ही अगर बात की जाए तो लोगों ने उनके खिलाफ ऐसा प्रोपेगेंडा फैला रखा है जो उनको विलेन साबित करता है. ऐसा लगता है देश में जितनी भी समस्याएँ हैं उन सबका ज़िम्मेदार अकेले गाँधी जी ही हैं. जबकि जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनके सरदार (मोदी जी) विश्व पटल या देश के अंदर भी खुद को साबित करने के लिए बार बार गाँधी का प्रयोग करते हैं. कई राज्यों की किताबों से गाँधी को हटाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ की विचारधारा वाले अन्य लोगों को जगह दी जा रही है. इसी कड़ी में जब हम कभी गाँधी पर बात करते हैं  तो बड़े पैमाने पर लोगों से ये बात सुनने को मिलती है कि गाँधी और भगत सिंह एक दूसरे के विरोधी थी. उनमें कोई समानता नहीं थी. यहाँ तक क़ि गाँधी ने भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए कुछ नहीं किया. अगर वो चाहते तो उन्हें बचा सकते थे. क्या सच में ऐसा था? और ये धारणा आज ही नहीं काफ़ी जनमानस में बन चुकी है. यहाँ तक क़ि भगत सिंह पर बनी हर फिल्म में यही दिखाने की कोशिश हुई है. इस बात में कितनी सच्चाई है आइए हम इसपर बात करते हैं.
24 मार्च, 1931 के दिन या भगत सिंह को फांसी दिए जाने की अगली सुबह गांधी जैसे ही कराची (आज का पाकिस्तान) के पास मालीर स्टेशन पर पहुंचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. स्वयं गांधीजी के शब्दों में, ‘काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे.’ 26 मार्च को कराची में प्रेस के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा - ‘मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा सका और इसी कारण नौजवानों ने मेरे प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन किया है. ...ये युवक चाहते तो इन फूलों को मेरे ऊपर बरसा भी सकते थे या मुझ पर फेंक भी सकते थे, पर उन्होंने यह सब न करके मुझे अपने हाथों से फूल लेने की छूट दी और मैंने कृतज्ञतापूर्वक इन फूलों को लिया. बेशक, उन्होंने ‘गांधीवाद का नाश हो’ और ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगाए और इसे मैं उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूं.’
लेकिन इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आगे कहा था- ‘आत्म-दमन और कायरता से भरे दब्बूपने वाले इस देश में हमें इतना अधिक साहस और बलिदान नहीं मिल सकता. भगत सिंह के साहस और बलिदान के सामने मस्तक नत हो जाता है. लेकिन यदि मैं अपने नौजवान भाइयों को नाराज किए बिना कह सकूं तो मुझे इससे भी बड़े साहस को देखने की इच्छा है. मैं एक ऐसा नम्र, सभ्य और अहिंसक साहस चाहता हूं जो किसी को चोट पहुंचाए बिना या मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाए.’ भगत सिंह को फांसी से बचाने में गांधी के विफल रहने के बारे में प्रचलित धारणाओं को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. अहिंसा के साधक गांधी किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सजा देने के विरोधी रहे थे. भगत सिंह से पहले उन्होंने अन्य मामलों में भी किसी को भी मृत्युदंड दिए जाने का विरोध किया था. उच्च कोटि के आस्तिक गांधी यह मानते थे कि किसी की जान लेने का हक केवल उसे ही है जिसने वह प्राण दिया है. यानी प्रकृति का नियम या ईश्वर ही किसी की जान ले सकता है, न कि कोई मनुष्य, सरकार या मनुष्य द्वारा बनाई कोई व्यवस्था. 26 मार्च, 1931 को कराची अधिवेशन में भगत सिंह के संदर्भ में ही बोलते हुए उन्होंने कहा था- ‘आपको जानना चाहिए कि खूनी को, चोर को, डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के विरुद्ध है. इसलिए इस शक की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती कि मैं भगत सिंह को बचाना नहीं चाहता था.’ इस सभा में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. दीवान चमनलाल जो नौजवान भारत सभा के सचिव थे, वे तो गांधी के अन्यतम सहयोगियों में से ही थे और वहां भी उनके साथ ही थे. इतने संवेदनशील और भावुक माहौल में भी गांधी पूरे होश में और पूरी करुणा से अपनी बात रख रहे थे.
तभी किसी ने चिल्लाकर पूछा- ‘आपने भगत सिंह को बचाने के लिए किया क्या?’
इस पर गांधी ने जवाब दिया- ‘मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया. मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी. भगत सिंह की परिवारवालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन यानी 23 मार्च को सवेरे मैंने वाइसराय को एक खानगी (अनौपचारिक) खत लिखा. उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी थी. पर सब बेकार हुआ.’ भगत सिंह को बचाने के लिए वाइसराय को लिखी उस अनौपचारिक चिट्ठी में गांधीजी ने उन्हें जनमत का वास्ता देते हुए लिखा था- ‘जनमत चाहे सही हो या गलत, सजा में रियायत चाहता है. जब कोई सिद्धांत दांव पर न हो तो लोकमत का मान रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है. ...मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद तो वह कदम वापस नहीं लिया जा सकता. यदि आप यह सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि इस सजा को, जिसे फिर वापस नहीं लिया जा सकता, आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें. ...दया कभी निष्फल नहीं जाती.’ भगत सिंह के बचपन के एक साथी जयदेव गुप्ता जो उस सभा में मौजूद थे, उन्होंने बाद में लिखा कि ‘उस सभा का वातावरण मिश्रित प्रकार का था. लोग दो धड़ों में बंट गए थे. एक धड़ा गांधी के पक्ष में था और दूसरा विरोध में. लेकिन महात्मा गांधी इतने अद्भुत वक्ता थे कि उन्होंने अपनी तार्किक बातों, मीठी आवाज, शांत और मृदुल अंदाज से सबको यह भरोसा दिला दिया कि भगत सिंह को बचाने की जितनी कोशिश की जा सकती थी वह की गई.’ लेकिन तब भी और आज भी एक ऐसा वर्ग है जो मानता है कि संयोगवश उसी दौरान एक अन्य संदर्भ में हो रहे गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की रिहाई भी एक शर्त के रूप में डाली जा सकती थी. गांधी ने इसका जवाब देते हुए इसी सभा में कहा था- ‘आप कहेंगे कि मुझे एक बात और करनी चाहिए थी— सजा को घटाने के लिए समझौते में एक शर्त रखनी चाहिए थी. ऐसा नहीं हो सकता था. और समझौता वापस ले लेने की धमकी को तो विश्वासघात कहा जाता. कार्यसमिति इस बात में मेरे साथ थी कि सजा को घटाने की शर्त समझौते की शर्त नहीं हो सकती थी. इसलिए मैं इसकी चर्चा तो समझौते की बातों से अलग ही कर सकता था. मैंने उदारता की आशा की थी. मेरी वह आशा सफल होने वाली नहीं थी, पर इस कारण समझौता तो कभी नहीं तोड़ा जा सकता.’ इससे करीब दो महीने पहले 31 जनवरी, 1931 को भी इलाहाबाद में गांधी कह चुके थे- ‘जिन कैदियों को फांसी की सजा मिली है, उन कैदियों को फांसी नहीं मिलनी चाहिए. पर यह तो मेरी निजी राय है. इसे समझौते की शर्त बना सकते हैं या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता.’
ऐसा नहीं था कि भगत सिंह के क्रांतिकारी आदर्शों को गांधी समझते न थे. किसानों और मजदूरों के प्रति भगत सिंह और उनके साथियों की प्रतिबद्धताओं से गांधी बखूबी वाकिफ थे. लेकिन इस बारे में वे एकदम स्पष्ट और सख्त थे कि उसका साधन केवल और केवल अहिंसा ही होनी चाहिए. विशेषकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों की ओर इशारा करते हुए गांधी ने कराची अधिवेशन में कहा था- ‘उन नौजवानों से मैं यह जरूर कहूंगा कि उनके पैदा होने के बहुत पहले से मैं किसानों और मजदूरों की सेवा करता आया हूं. मैं उनके साथ रहा हूं. उनके सुख-दुःख में भाग लिया है. जबसे मैंने सेवा का व्रत लिया है, तभी से मैं अपना सिर मानवजाति को अर्पण कर चुका हूं.’ वहीं जब भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में भयंकर दंगे छिड़ गए, तो इस संदर्भ में गांधीजी ने कहा- ‘अखबारों से पता चलता है कि भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए, और भगत सिंह के सम्मान में दुकान न बंद करनेवालों को धमकाने लगे. नतीजा आपको मालूम ही है. मेरा विश्वास है कि अगर भगत सिंह की आत्मा कानपुर के इस कांड को देख रही है, तो वह अवश्य गहरी वेदना और शरम अनुभव करती होगी. मैं यह इसलिए कहता हूं कि मैंने सुना है कि वह अपनी टेक का पक्का था.’
भगत सिंह को फांसी मिलने के एक महीने पहले जब गांधी वाइसराय से मिलने गए थे, तब भी उन्होंने भगत सिंह की सजा मुल्तवी करने की मांग की थी. बिड़ला द्वारा इस मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर 18 फरवरी, 1931 को गांधी ने कहा था- ‘मैंने उनसे भगत सिंह की बात की. ...मैंने भगत सिंह के बारे में कहा, वह बहादुर तो है ही पर उसका दिमाग ठिकाने नहीं है, इतना जरूर कहूंगा. फिर भी मृत्युदंड बुरी चीज है. क्योंकि वह ऐसे व्यक्ति को सुधरने का अवसर नहीं देती. मैं तो मानवीय दृष्टिकोण से यह बात आपके सामने रख रहा हूं और देश में नाहक तूफान न उठ खड़ा हो, इसलिए सजा मुल्तवी कर देने का इच्छुक हूं. मैं तो उसे छोड़ दूं, लेकिन कोई सरकार उसे छोड़ देगी ऐसी आशा मुझे नहीं है.’ दरअसल भगत सिंह के बारे में ब्रिटिश हुकूमत शुरू से ही गलतफहमियों का शिकार थी. क्रांतिकारियों के तौर-तरीकों के बारे में यह गलतफहमी उस दौरान भारतीयों के एक बड़े वर्ग में भी मौजूद थी. ऊपर-ऊपर से हिंसक दिखनेवाले तौर-तरीकों की वजह से ब्रिटिश हुकूमत इन इन्कलाबियों के प्रति बेहद सख्त रवैया अपनाए हुई थी. गांधी समेत अन्य कई नेता इन युवाओं के जोश से प्रभावित अवश्य थे, लेकिन इनके तौर-तरीकों की वजह से वे इनसे परहेज भी करते थे. इसलिए जेल में भगत सिंह अपने, और साथियों के साथ दुर्व्यवहार के विरुद्ध जब अनशन पर बैठ गए और जवाहरलाल नेहरू ने उनकी पैरवी की थी, तो गांधी ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर इसे एक ‘असंगत’ कार्य बताया था. भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति ब्रिटिश हुकूमत पैरानोइया की हद तक भयभीत हो चुकी थी. और इसलिए सरकारी गुप्तचर उन सभी के पीछे पड़े हुए थे जिनके बारे में उन्हें थोड़ा सा भी लगता था कि इन्हें भगत सिंह से सहानुभूति हो सकती है. इनमें नेहरू, पटेल और मालवीय से लेकर तेजबहादुर सप्रू तक थे. माना जाता है कि भगत सिंह की फांसी के बाद ब्रिटिश इंटेलिजेंस को यह देखने तक के लिए लगाया गया था कि इस पर गांधी, नेहरू और पटेल इत्यादि की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया क्या थी. लेकिन अंतिम अवस्था तक आते-आते गांधी को भगत सिंह के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति हो चली थी. जब भगत सिंह को तय समय से एक दिन पहले ही फांसी दिए जाने की खबर मिली तो गांधी काफी देर के लिए मौन में चले गए थे. 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह की फांसी के संबंध में दिए गए अपने वक्तव्य में गांधी ने कहा था- ‘भगत सिंह और उनके साथी फांसी पाकर शहीद हो गए हैं. ऐसा लगता है मानो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है. इन नवयुवक देशभक्तों की याद में प्रशंसा के जो शब्द कहे जा सकते हैं, मैं उनके साथ हूं. ...मेरा निश्चित मत है कि सरकार द्वारा की गई इस गंभीर भूल के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्त करने की हमारी शक्ति में वृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने मृत्यु का वरण किया है.’
भगत सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए गांधी ने 29 मार्च, 1931 को गुजराती नवजीवन में लिखा था- ‘वीर भगत सिंह और उनके दो साथी फांसी पर चढ़ गए. उनकी देह को बचाने के बहुतेरे प्रयत्न किए गए, कुछ आशा भी बंधी, पर वह व्यर्थ हुई. भगत सिंह को जीवित रहने की इच्छा नहीं थी; उन्होंने माफी मांगने से इनकार किया. यदि वे जीते रहने को तैयार होते, तो या तो वह दूसरों के लिए काम करने की दृष्टि से होता या फिर इसलिए होता कि उनकी फांसी से कोई आवेश में आकर व्यर्थ ही किसी का खून न करे. भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन वे हिंसा को भी धर्म नहीं मानते थे. वे अन्य उपाय न देखकर खून करने को तैयार हुए थे. उनका आखिरी पत्र इस प्रकार था : ‘मैं तो लड़ते हुए गिरफ्तार हुआ हूं. मुझे फांसी नहीं दी जा सकती. मुझे तोप से उड़ा दो, गोली मारो.’ इन वीरों ने मौत के भय को जीता था. इनकी वीरता के लिए इन्हें हजारों नमन हों.’ हालांकि अहिंसा के पुजारी गांधी हमेशा ही चेताते रहे कि तमाम शहादत और नेकनीयती के बावजूद जांबाज क्रांतिकारियों के हिंसामार्ग का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन न हो. 

क्या अब नरम हिंदुत्व की राह पर कांग्रेस?

इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमेरिका की यात्रा पर गए थे. अमरीका में राहुल गांधी ने कई थिंक टैंकों के सदस्यों से मुलाक़ात की और यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित भी किया. इस दौरान राहुल ने कई सवालों के जवाब भी दिए. राहुल ने भारत की वर्तमान स्थिति और राजनीति को भी कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कई पत्रिकाओं और अख़बारों को साक्षात्कार भी दिया. राहुल की यात्रा को मीडिया में अच्छी-ख़ासी जगह भी मिली. राहुल ने इस दौरान जो बातें कहीं उनकी तारीफ़ भी हुई. भारत में पहली बार सत्ताधारी बीजेपी ने महसूस किया कि विदेश में मोदी का जादू कम हो रहा है और राहुल गांधी को लोग गंभीरता से ले रहे हैं. भारत की अर्थव्यवस्था की बिगड़ती सेहत के कारण प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना हो रही है. शुरू में ऐसा लगा था कि मोदी भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक पैमाने पर बदलाव लाने जा रहे हैं, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अभी तक कोई बड़ा सुधार ज़मीन पर नहीं उतर पाया है.
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6 फ़ीसदी से भी कम हो गई है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती को साफ़ तौर पर महसूस किया जा रहा है. सरकार इस बात का आकलन नहीं कर पाई कि उसकी नीतियों से ग़रीबों को फ़ायदा नहीं हो रहा है. आने वाले महीनों में भारत के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. मोदी सरकार को लेकर जैसी बातें हो रही हैं, उस माहौल में बीजेपी की लिए चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में नवंबर और दिसंबर महीने में चुनाव हैं. गुजरात चुनाव का ख़ास महत्व है. गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है और वो वहां के मुख्यमंत्री भी रहे हैं. बीजेपी गुजरात में लंबे समय से सत्ता में रही है. गुजरात में अभी जैसा माहौल है उसमें बदलाव के संकेत साफ़ दिख रहे हैं, लेकिन क्या कांग्रेस इसका फ़ायदा उठा पाएगी? राहुल गांधी अमरीका से आने के बाद गुजरात दौरे पर गए. गुजरात में राहुल ने दौरे की शुरुआत एक बड़े मंदिर में पूजा से की. वो गुजरात में कई स्थानों पर गए, लेकिन उनके हर दौरे में किसी न किसी मंदिर में पूजा का कार्यक्रम तय था. राहुल के मंदिर जाने और पूजा-अर्चना को मीडिया में काफ़ी तवज्जो मिली. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल का मंदिर जाना अनायास नहीं था बल्कि यह कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था. कई विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए नरम हिन्दुत्व का सहारा ले रही है. बीजेपी कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर हमेशा सवाल उठाती रही है. राहुल गांधी के गुजरात दौरे को सफल बताया जा रहा है. मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के लिए गुजरात नाक का सवाल है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात के ही हैं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव काफ़ी अहम है. अगर गुजरात विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीत लेती है तो भारत की राजनीति में यह तख्तापलट साबित हो सकता है. यह बात 2014 के चुनावों में हार के बाद एके एंटिनी की रिपोर्ट में भी ये आ चुका है क़ि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी बन गई है. प्रमोद तिवारी जैसे वरिष्ट नेता कई बार राजीव गाँधी वाले नरम हिंदुत्व पर चलने की वकालत करते रहे हैं. शायद इसका अनुमान राहुल गाँधी को भी है. इसलिए ही वो गुजरात चुनावों में मुद्दों के ऊपर तो चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन बीजेपी को कोई मौका नहीं देना चाहते हैं, क़ि वो असली मुद्दों से बहस भटका कर कांग्रेस या राहुल गाँधी को हिंदू विरोधी कहकर बहस भटका दे. 

कांग्रेस से हारती राहुल की युवा टीम

कांग्रेस पार्टी में सबसे भारी दिक्कत यही है क़ि उनके युवा नेताओं को खुलकर ज़िम्मेदारी नहीं दी जा रही है. सबसे पहले तो राहुल गाँधी को ही कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाना, वो तो फिर भी ठीक है क़ि ये केवल औपचारिक है. लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव सिर पर हैं. और उनके युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को ज़िम्मेदारी नहीं मिल पा रही है. दोनों की राह में रोड़े बने हैं उनके दो बुजुर्ग नेता अशोक गहलोत और दिग्विजय सिंह. एमपी में ही सुना है क़ि कमलनाथ तो सिंधिया के नाम पर मान गए हैं लेकिन दिग्विजय सिंह 3300 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर निकाल रहे हैं. अशोक गहलोत तो फिर भी अपने पूर्व कार्यकाल के विकास को वसुंधरा राजे सरकार के काम से तुलना कर चुनाव जीत सकते हैं लेकिन दिग्विजय सिंह मानने को नहीं तैयार हैं क़ि वो गुज़रे जमाने के नेता हो चुके हैं, और उनके सामने बीजेपी का जीतना बहुत आसान हो जाता है. छत्तीसगढ़ में तो खैर कांग्रेस की चुनौती ही नहीं है. वहीं हिमाचल प्रदेश भी वीरभद्र पर लगे आरोपों के बाद हाथ से निकलता दिख रहा है. हरियाणा में राहुल गाँधी के युवा मित्र दिपेंदर सिंह हुड्डा हो सकते हैं लेकिन उनके पिता भुपेन्दर सिंह हुड्डा की ही हर हफ्ते बीजेपी में जाने की खबरें आती हैं. यूपी में भी उनके कई साथी आरपीएन सिंह सहित हैं लेकिन किसी में वो ज़िम्मेदारी निभाने की क्षमता ही नहीं दिखती. जबकि किसी भी पार्टी में इतने काबिल युवा नेता नहीं हैं. शायद कांग्रेस पार्टी को अभी भी बहुत होमवर्क करने की ज़रूरत है और राहुल गाँधी को एक राष्ट्रीय चेहरा मान कर राज्यों में अपने नेतृत्व को अपने इन युवा महारथियों के भरोसे छोड़ना पड़ेगा. ये आप बीजेपी में देख सकते हैं. छत्तीसगढ़ में रमनसिंह, एमपी में शिवराज सिंह, कर्नाटक, बिहार, यूपी और राजस्थान. जबकि कांग्रेस के पास इन युवा और काम करने के अनुभवी नेताओं की फौज है. ईमानदार छवि जो युवा और शिक्षित वर्ग में प्रभाव डाल सकते हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...