Thursday, October 12, 2017

राहुल की बदलती छवि

सुना है क़ि राहुल गाँधी के लिए भी वही पीआर एजेंसी हायर की जा रही है जो अमेरिका में ट्रम्प के लिए काम कर रही थी. उसी की रणनीति के तहत वो इसबार कुछ अधिक बदले और मेहनत करते दिख रहे हैं. अभी तक उनका गुजरात में इसबार 15 दिन में दूसरा दौरा है. वो जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं. मुझे नहीं पता कि वो जनता कौन है? कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं या फिर नैचुरल? इसमें वो छात्रों, डॉक्टर्स, सीए, व्यापारियों, आदिवासी युवाओं से सीधा संवाद कर उनके हर सवाल पर जवाब दे रहे हैं. कई बार तो ऐसे टेक्निकल सवाल होते हैं क़ि लगता है वो जवाब नहीं दे पाएँगे लेकिन वो काफ़ी तैयारी के साथ दिखते हैं और जवाब में ईमानदारी दिखती है. वो जीएसटी पर बहुत अधिक नॉलेज रखते हैं. एक इंजीनियर सवाल करता है तो टेक्निकल और अमेरिकन इंस्टीट्यूट, चाइना की बात करते हैं. डॉक्टर्स सवाल करते हैं तो वो मेडिकल में भारत को सुपर पवार बनाने की बाते करते हैं जो विश्व मे सबसे अधिक जॉब क्रिएक करके चाइना का मुकाबला करने की भी बात करते हैं. वो अमूल दुधा, और पापड़ अचार जैसे छोटे उद्योगों को बढ़ाने की बात करते हैं, वो रोज़गार पर ईमानदारी से बहुत अच्छी बात करते हैं. मेरे ख़याल से केजरीवाल से भी बेहतर इस मामले में. खुद की ग़लतियाँ स्वीकार करते हैं क़ि कैसे कांग्रेस के नेता गमंड में आ गए, कैसे 2011 के बाद से सब विकास बंद करके भ्रष्टाचार करने लगे. किसानों से फूड प्रोसेसिंग लगाकर आस्ट्रेलिया का मुकाबला करने की बात करते हैं. वो पर्यवरण पर बात करते हैं. कम से कम एक नया नेता दिखता है. कोई कह सकता है कि मैं उनका बखान कर रहा हूँ, लेकिन नहीं. 2013 में जब मोदी जी गुजरात से बाहर निकल कर यही कर रहे थे तो भी हम लिखकर उनके नेतृत्व पर अपनी राय रखते थे. अब मोदी जी शीर्ष नेता हैं तो उनका एनलिसिस नहीं हो इस तरह से नहीं हो सकता. जब बीजेपी से कोई नया आएगा तो होगा. इसके पहले मोदीजी के सामने हमेशा बच्चे ही नज़र आते थे लेकिन आज लगता है क़ि अगर प्रधान मंत्री उम्मीदवारों में उनकी बहस मोदी जी से हो तो वो हर मुद्दे पर उनके हरा सकते हैं. लेकिन भाषण देने की कला और जनता से कनेक्ट होने का जादू अभी भी मोदी जी के पास बेहतर है. वो इतना टेक्निकल नॉलेज भले न रखते हों लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं में जोश भरना उनकी कला है. वहीं राहुल गाँधी इस बार खुद को हिंदू विरोधी भी नहीं दिखाना चाहते हैं. कहीं भी 2002 के दंगे, हिंदू मुस्लिम या फिर सेकूलरिज़्म की बात नहीं की. उनको पता है क़ि मुस्लिम वोटों के पास विकल्प ही एक है. यूपी की तरह तीन चार सेकुलर दल तो हैं नहीं. वो हर रैली और रोडशो के पहले उस क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करते हैं. फिर माथे पर बड़ा सा तिलक लगाते हैं जो लोगों को सांकेतिक तौर पर दिखाए क़ि वो हिंदू ही हैं. फिर वो आक्रमक होकर जमकर हमला करते हैं. लोगों का रिस्पोन्स भी काफ़ी अच्छा है. क्योकि हार्दिक पटेल का भी समर्थन मिला है उनको. शायद कांग्रेस को लगता है क़ि अगर वो गुजरात फ़तह कर लेते हैं तो 2019 का किला ढहने में अधिक समय नहीं लगेगा. लेकिन अमित शाह और मोदी बिल्कुल निश्चिंत हैं उनको गुजरात पर भरोसा है वो केवल अंत में एक दो दिन प्रचार से ही सबकुछ संभालने का भरोसा रखते हैं. हालाँकि इतना आसान भी नहीं है कांग्रेस के लिए गुजरात जीतना. मुझे अभी भी ये असंभव ही लगता है. 

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