कांग्रेस पार्टी में सबसे भारी दिक्कत यही है क़ि उनके युवा नेताओं को खुलकर ज़िम्मेदारी नहीं दी जा रही है. सबसे पहले तो राहुल गाँधी को ही कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाना, वो तो फिर भी ठीक है क़ि ये केवल औपचारिक है. लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव सिर पर हैं. और उनके युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को ज़िम्मेदारी नहीं मिल पा रही है. दोनों की राह में रोड़े बने हैं उनके दो बुजुर्ग नेता अशोक गहलोत और दिग्विजय सिंह. एमपी में ही सुना है क़ि कमलनाथ तो सिंधिया के नाम पर मान गए हैं लेकिन दिग्विजय सिंह 3300 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर निकाल रहे हैं. अशोक गहलोत तो फिर भी अपने पूर्व कार्यकाल के विकास को वसुंधरा राजे सरकार के काम से तुलना कर चुनाव जीत सकते हैं लेकिन दिग्विजय सिंह मानने को नहीं तैयार हैं क़ि वो गुज़रे जमाने के नेता हो चुके हैं, और उनके सामने बीजेपी का जीतना बहुत आसान हो जाता है. छत्तीसगढ़ में तो खैर कांग्रेस की चुनौती ही नहीं है. वहीं हिमाचल प्रदेश भी वीरभद्र पर लगे आरोपों के बाद हाथ से निकलता दिख रहा है. हरियाणा में राहुल गाँधी के युवा मित्र दिपेंदर सिंह हुड्डा हो सकते हैं लेकिन उनके पिता भुपेन्दर सिंह हुड्डा की ही हर हफ्ते बीजेपी में जाने की खबरें आती हैं. यूपी में भी उनके कई साथी आरपीएन सिंह सहित हैं लेकिन किसी में वो ज़िम्मेदारी निभाने की क्षमता ही नहीं दिखती. जबकि किसी भी पार्टी में इतने काबिल युवा नेता नहीं हैं. शायद कांग्रेस पार्टी को अभी भी बहुत होमवर्क करने की ज़रूरत है और राहुल गाँधी को एक राष्ट्रीय चेहरा मान कर राज्यों में अपने नेतृत्व को अपने इन युवा महारथियों के भरोसे छोड़ना पड़ेगा. ये आप बीजेपी में देख सकते हैं. छत्तीसगढ़ में रमनसिंह, एमपी में शिवराज सिंह, कर्नाटक, बिहार, यूपी और राजस्थान. जबकि कांग्रेस के पास इन युवा और काम करने के अनुभवी नेताओं की फौज है. ईमानदार छवि जो युवा और शिक्षित वर्ग में प्रभाव डाल सकते हैं.
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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